जिस नेतन्याहू की वजह से अमरीका जंग में उलझा, वही ट्रम्प को दिखा रहा आंखें!

19 जून 2026  

 

अमरीका-ईरान के आज तक के सबसे महत्वपूर्ण समझौते के लागू होने के मौके पर ही इजराइल ने इस समझौते की भावना, और उसके शब्दों के खिलाफ जाकर जिस तरह लेबनान पर हमला जारी रखा है, उससे अमरीका बहुत विचलित है, और यह भी समझ पड़ता है कि इजराइल की नीयत क्या है। जो लोग इन देशों के रिश्तों की जटिलताओं को समझते हैं, वे जानते हैं कि अमरीका-ईरान समझौता इजराइल पर एक बड़ी चोट है। मौजूदा इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू का सारा अस्तित्व ही फिलीस्तीन, लेबनान, और ईरान के साथ जंग चलने तक ही है, इसके तुरंत बाद उसके जेल चले जाने का पूरा खतरा है। ट्रम्प शायद खुलकर यह बात बोल भी चुके हैं कि अगर वे नहीं रहते तो नेतन्याहू जेल में रहते। इजराइल में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के पुख्ता मामले हैं, लेकिन कोई भी देश जंग से गुजरते हुए अपने नेता के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुकदमे को कभी प्राथमिकता नहीं दे सकता, और इसीलिए नेतन्याहू का अस्तित्व बना हुआ है। उसने भरसक कोशिश की कि अमरीका और ईरान के बीच कोई तालमेल न बैठ पाए, लेकिन ट्रम्प ने जैसा कि अभी खुद ही कहा कि जंग अगर जारी रहती, जलडमरूमध्य से जहाज नहीं निकलते, तो दुनिया के पास चार हफ्ते से ज्यादा का तेल नहीं रहता। ऐसे में समझौते के दस्तखत के दिन ही अगर इजराइल हथियारबंद संगठन हिजबुल्ला को मारने के नाम पर लेबनान पर फिर हमला करता है, तो यह हमला सीधे ट्रम्प पर हमला है। और अमरीका ने इजराइल की इस नीयत और हरकत को समझते हुए उसे उसकी औकात याद दिलाने के लिए अपने उपराष्ट्रपति जे.डी.वेंस का इस्तेमाल किया है।

कल इजराइल की हरकतों को देखते हुए जे.डी.वेंस ने एक लंबी प्रेस कांफ्रेंस की, उन्होंने ईरान के साथ हुए समझौते की जानकारी तो दी ही, लेकिन साथ ही नेतन्याहू और उनके मंत्रियों को नसीहत भी दी। नेतन्याहू और उनके कुछ मंत्री सार्वजनिक रूप से ट्रम्प के करवाए हुए इस समझौते के खिलाफ बोल चुके हैं, और इजराइल के अलग फौजी तेवरों की बात कर चुके हैं। मानो जुबानी जमाखर्च काफी न रहा हो, इजराइल ने लेबनान की राजधआनी बेरूद पर हमला किया, जबकि ईरान ने ट्रम्प से यह शर्त रखी ही थी कि समझौते में लेबनान में भी पूरी तरह युद्धविराम लागू होना चाहिए। इजराइल को उसकी औकात याद दिलाते हुए अमरीकी उपराष्ट्रपति ने कहा कि पूरी दुनिया में सिर्फ डॉनल्ड ट्रम्प ही इकलौते नेता हैं जो इजराइल के प्रति सहानुभूति और समर्थन दिखा रहे हैं। साथ ही वह दुनिया के सबसे ताकतवर देश के नेता भी हैं। जे.डी.वेंस ने आगे कहा- अगर मैं इजराइली कैबिनेट का सदस्य होता, तो शायद मैं दुनिया में बचे अपने इकलौते ताकतवर सहयोगी पर सार्वजनिक रूप से हमला नहीं करता। उन्होंने इजराइली मंत्रियों का नाम लेते हुए कहा कि पिछली तीन महीनों में उनके देश की रक्षा करने वाले दो तिहाई रक्षा उपकरण अमरीकियों ने बनाए हैं, जिनका खर्च अमरीकी जनता ने उठाया है। उन्होंने आगे कहा कि इजराइल की समस्या डॉनल्ड ट्रम्प नहीं है, अगर कोई ऐसा सोचते हों, तो उन्हें जागना चाहिए, और उन्हें यह समझना चाहिए कि उनका देश वास्तव में किस हालत में है। हाल ही में ट्रम्प ने भी नेतन्याहू को यह सलाह दी थी कि वह हिजबुल्ला के गिने-चुने लड़ाकों को मारने के लिए पूरी की लेबनान की पूरी इमारतों पर बमबारी करने जैसी हरकत न करे।  अमरीकी राष्ट्रपति भवन के कुछ सूत्रों से निकली खबर यह भी कहती है कि कुछ दिन पहले एक टेलीफोन कॉल पर ट्रम्प ने नेतन्याहू को गालियों की जुबान में समझाईश दी थी, और कहा था कि वे नहीं रहते, तो नेतन्याहू जेल में रहते, और इजराइल का अस्तित्व ही मिट चुका रहता।

दुनिया भर के राजनीतिक विश्लेषक अब इस बात को बड़ी अच्छी तरह मान रहे हैं कि इजराइल ने ट्रम्प की कमअक्ली, और मनमानी के मिजाज का फायदा उठाते हुए उसे ईरान पर हमला करने में झोंक दिया। अमरीका-इजराइल का इतिहास जानने वाले लोग यह लिखते आ रहे हैं कि आधी सदी में हर इजराइली प्रधानमंत्री ने अपने वक्त के अमरीकी राष्ट्रपति को ऐसा ही झांसा बेचने की पूरी कोशिश की थी, और यह ट्रम्प जैसा मूर्ख था जिसने न सिर्फ बाकी पूरी दुनिया को मुसीबत में डालकर, बल्कि खुद अमरीका को खोखला करने की कीमत पर भी इजराइल के उकसावे पर यह जंग छेड़ दी। इजराइल की फौजी ताकत अमरीकी मेहरबानी पर चलती है, और खुद अमरीका इस जंग में अपने हथियारों को इतना खो चुका है कि अगले कई बरस उसे इसकी भरपाई करने में लगेंगे। अमरीकी जनता पर इस जंग का इतना बड़ा आर्थिक बोझ पड़ा है कि वह महंगाई से जख्मी पड़ी हुई है। अमरीका में इजराइली झांसे में आकर नाटो के अपने साथी देशों की दोस्ती खो दी, मध्य-पूर्व के देशों में उस पर भरोसा रखने वाले देशों का भरोसा खो दिया, और अमरीका की महाशक्ति होने की साख भी खो दी। हमने दो दिन पहले ही इसी जगह पर संपादकीय में लिखा था कि ईरान के साथ इस समझौते के लिए अमरीका किस तरह घुटनों पर आकर गिड़गिड़ा रहा था ताकि नवंबर में वहां होने वाले मध्यावधि चुनाव के पहले ट्रम्प अपनी खोई हुई साख को कुछ हद तक वापिस पा सके।

इजराइल ने अमरीका से परे अपने तेवर दिखाकर सिर्फ यही साबित किया है कि वह परले दर्जे का अहसानफरामोश देश है। अगर अमरीका संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने वीटो का इस्तेमाल करके बीती आधी सदी से इजराइल को बचाने का काम नहीं करते रहता, तो इजराइल की सारी गुंडागर्दी ठिकाने लग चुकी रहती। अमरीका जिस तरह दुनिया भर के देशों पर बात-बात पर आर्थिक प्रतिबंध लगाता है, दुनिया के इस सबसे बड़े हैवान-देश इजराइल पर तो दुनिया का हर प्रतिबंध लग जाना चाहिए था, लेकिन अमरीकी दादागिरी और धाक के चलते यह नहीं पाया था। अमरीकी भीख और मदद पर जिंदा इजराइल आज अमरीकी राष्ट्रपति के अपने अस्तित्व पर आए खतरे के बीच जिस तरह ट्रम्प की मर्जी के खिलाफ फौजी हरकत जारी रखे हुए है, उससे अमरीका को, और खासकर ट्रम्प को नसीहत लेना चाहिए कि इजराइल और नेतन्याहू भरोसेमंद साथी नहीं हैं, वे अमरीका को सिवाय दुश्मन देने के और कुछ नहीं कर रहे हैं। ऐसे अहसानफरामोश देश की जरूरत अमरीका को धरती के उस हिस्से में ईरान के साथ हुए समझौते के बाद वैसे भी कम रहने वाली है। और अपने अस्तित्व पर आए इस खतरे को देखकर ही बौखलाहट में इजराइल उस अमरीकी हाथ को ही काट रहा है, जो हाथ उसे खिलाते आया है। दुनिया के बाकी देशों को भी इजराइली अहसानफरामोशी देखकर यह सबक लेना चाहिए कि जिस दिन वे मुसीबत में रहेंगे, इस सूदखोर देश से कोई साथ नहीं मिलेगा, महज धोखा मिलेगा। फिलहाल तो दुनिया को राहत की सांस लेना चाहिए कि सांबा गब्बर के खिलाफ खड़ा हो रहा है, और किसी गिरोह के भीतर लोगों के बीच आपसी गोलीबारी होती है, तो उससे समाज का कोई नुकसान नहीं होता। नेतन्याहू को जेल हो, इससे खुद इजराइल का भला होगा। और जिस इजराइल के लोग नस्लवादी जनसंहार करने को अपना हक मान रहे हैं, उनकी अक्ल भी कुछ ठिकाने आने चाहिए। दुनिया के लोकतांत्रिक और जिम्मेदार देशों को इजराइल के खिलाफ बोलने, कुछ करने, और आर्थिक प्रतिबंध लगाने की अपनी वैश्विक और मानवीय जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, वरना इतिहास तो बेरहमी से दस्तावेजीकरण करना जानता ही है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 19 जून 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 18 जून 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

बिना मस्क के रॉकेट के, उसी के पैसों से अंतरिक्ष पहुंचे हिन्दुस्तानी-पाकिस्तानी लडक़े

 18 जून 2026  

 

दुनिया के सबसे पैसे वाले कारोबारी हो चुके एलन मस्क अभी अपनी कंपनी स्पेसएक्स को शेयर मार्केट में लेकर आए, नए शेयर बेचने को उतारे, तो लोग खरीदने को टूट पड़े। इससे समझ पड़ता है कि अंतरिक्ष और एआई जैसी भविष्य की टेक्नॉलॉजी, और मस्क की कल्पनाशीलता ने पूंजीनिवेशकों को प्रभावित किया है। लेकिन यह आईपीओ खबरों से हटा भी नहीं था एक दूसरी खबर आ गई। स्पेसएक्स ने एआई कोडिंग टूल, कर्सर, बनाने वाली एक नई कंपनी एनीस्फीयर को 60 अरब डॉलर में खरीदने की घोषणा कर दी। इस कंपनी को खड़ा करने वाले 25-26 साल के दो नौजवान हैं, अमन सेंगर, और सुअलेह आसिफ। ये 25-26 साल के लडक़े हैं, और इन्होंने अमरीका के विख्यात एमआईटी से पढ़ाई पूरी करके यह कंपनी शुरू की, और इसके काम को लेकर आज एलन मस्क की कंपनी इस कंपनी का अधिग्रहण कर रही है। 25-26 की उम्र में इन दोनों लडक़ों को, हर एक को, भारतीय मुद्रा में करीब सवा दो हजार करोड़ रूपए मिलेंगे। इस कंपनी को शुरू करने वाले दो दूसरे नौजवानों को भी इतना ही हिस्सा मिलेगा, और कर्मचारियों को भी सैकड़ों मिलियन डॉलर जैसी रकम मिलेगी। 

अमरीका की इस कंपनी के सौदे को लेकर कोई आर्थिक विश्लेषण करने की हमारी नीयत नहीं है, लेकिन एक भारतवंशी मूल का लडक़ा, एक पाकिस्तानी परिवार का लडक़ा, एक अमरीकी परिवार का, और एक स्वीडिश परिवार का, इन सबने मिलकर यह कंपनी बनाई, हिन्दुस्तानी-पाकिस्तानी नौजवान इसे चलाने वाले मुखिया हैं, और अब ये चारों ही दुनिया के सबसे कम उम्र के अरबपति हो गए हैं, अपने दम पर, बिना किसी पारिवारिक विरासत के। हमने इन चारों के नाम से काफी कोशिश की कि इनके परिवार के धर्म के बारे में, उनकी आस्था के बारे में, कुछ पता लगे, तो परिवार के लोगों के अलग-अलग पेशे में व्यस्त और सफल रहने के बाद भी उनके बारे में किसी धर्म से संबंध की कोई जानकारी नहीं मिली। अमरीका में इन दोनों नौजवानों को साथ काम करने में भी कोई दिक्कत नहीं हुई, और बिना मस्क के रॉकेट के ही ये दोनों साथ-साथ कामयाबी के अंतरिक्ष में पहुंच गए। इनको अपने परिवारों से हो सकता है कि एक-एक लैपटॉप मिल गया हो, लेकिन बाकी का सारा हुनर इन्होंने खुद हासिल किया, और आज दुनिया का सबसे संपन्न आदमी, एक सबसे कामयाब कंपनी इन छोकरों की कंपनी को खुद आकर खरीद रही है। कुछ दूसरी मिसालें भी अगर देखें, तो ईसाई ट्रम्प का दामाद एक यहूदी है, और पूरे परिवार के कारोबार का ख्याल रखने के साथ-साथ वह ट्रम्प के अंतरराष्ट्रीय समझौतों में भी सबसे बड़ा किरदार है। ट्रम्प के उपराष्ट्रपति जे.डी.वेंस पक्के ईसाई हैं, और उनकी पत्नी उषा वेंस भारतवंशी हिन्दू हैं। वेंस चाहते हैं कि वे ईसाई बन जाएं, लेकिन उषा हिन्दू ही बनी हुई हैं। फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग का जन्म एक यहूदी परिवार में हुआ, कॉलेज के दिनों में ही उन्होंने अपने को नास्तिक कहा, लेकिन बाद में किसी धर्म का होने के बजाय उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि वे अब नास्तिक नहीं हैं, और उनकी पत्नी प्रिसिला चैन चीनी-अमरीकी मूल की बौद्ध परिवार की हैं। उनके बच्चों को मां-बाप के परिवारों के सांस्कृतिक मूल्य मिल रहे हैं। 

अब धर्म या राजनीति में सफलता के साथ धार्मिक विविधता को जोडक़र हम इसलिए देख रहे हैं कि किसी भी तरह की सफलता के बिना सिर्फ कट्टरता पर टिकी हुई धर्मान्धता दुनिया के कई हिस्सों को आगे बढऩे से रोकती है। 14 बरस की उम्र में कोडिंग शुरू करके 25 बरस की उम्र में अपनी कंपनी मस्क को 60 अरब डॉलर में बेच देने वाले लडक़ों को देखें, तो दुनिया के जिन दूसरे देशों में धर्मान्धता के शिकार लडक़े, साम्प्रदायिकता की आक्रामकता फैलाते हुए जिस तरह सडक़ों पर अपनी नौजवानी गुजार रहे हैं, जिस तरह धर्म उनके स्कूल-कॉलेज के दिनों से ही उन पर हावी है, क्या वे अपनी संभावनाओं के आसमान को कभी छू पाएंगे? अफगानिस्तान हो, पाकिस्तान हो, या हिन्दुस्तान हो, जहां कहीं पूरी की पूरी पीढ़ी को धर्मान्धता, कट्टर जातिवाद, आक्रामक राष्ट्रवाद, क्षेत्रवाद, स्थानीय संस्कृतिवाद के हिंसक और अलोकतांत्रिक आंदोलनों में जोड़ दिया जाता है, वहां उनके आगे बढऩे की संभावनाएं खत्म हो जाती हैं। कोई यह कल्पना कर सकते हैं कि हिंसक सांप्रदायिकता के झंडे लेकर सडक़ों पर रात-दिन हमलावर धार्मिक नारे लगाने वाले 25 साल की उमर में 60 अरब डॉलर की कंपनी बनाकर बेच भी सकते हैं? वह भी घर के एक रूपए के बिना? चाहे अफगानिस्तान के तालिबान हों, चाहे पाकिस्तान के इस्लामिक कट्टरपंथी, चाहे हिन्दुस्तान के घनघोर हिन्दुत्ववादी, जिन्होंने भी अपनी नौजवान पीढ़ी को उसकी उत्पादकता से, संभावना से अलग रखा, और उसे एक बिल्कुल ही अनुत्पादक, बल्कि प्रतिउत्पादक काम में झोंक दिया, उन्होंने मानो अपने चंगुल में आई पूरी की पूरी पीढ़ी को एक विजातीय, विधर्मी, या विदेशी काल्पनिक दुश्मन से जूझने में झोंक दिया। अमरीका में इन चार नौजवानों ने अलग-अलग देशों की पृष्ठभूमि से आकर, अलग-अलग संस्कृतियों और धर्मों वाले परिवार से आकर बिना किसी राष्ट्रीय या धार्मिक अहंकार के जिस तरह अपनी पढ़ाई से लेकर असाधारण कामयाबी का सफर किया, इन सबके साथ एक बात एक सरीखी रही कि धर्म, जाति, या राष्ट्रीयता के मुद्दे इन पर हावी नहीं रहे। कुछ मिसालें ऐसी भी हो सकती हैं जिनमें धर्म को मानने वाले लोग भी कामयाबी के आसमान पर पहुंचे हों, लेकिन ऐसी मिसालें शायद ही मिलेंगी जिनमें धर्मान्धता के, सांप्रदायिकता के आसमान पर पहुंचे हुए लोग आतंक के अलावा किसी और मामले में कामयाब हुए हों। 

दुनिया में बहुत से देश, समाज, और संस्कृतियों में कमोबेश ऐसे हालात हो सकते हैं जहां नौजवान पीढ़ी के सिर पर नफरत का टोकरा रख दिया जाता है, और उसे ढोने को उसे गौरव बताया जाता है। यह याद रखने की जरूरत है कि सिर पर हिंसा का बोझ लदा हो, तो वैसे सिर के भीतर दिमाग से दुनिया की सबसे कामयाब कोडिंग नहीं हो सकती, कुछ भी कामयाब काम नहीं हो सकता। जो लोग अपनी नौजवान पीढ़ी को नफरत ढोने में झोंक चुके हैं, वे अपने धर्म, जाति, समाज, और देश-प्रदेश, इन सबकी संभावनाओं को खत्म करते जा रहे हैं। इनमें से किसी भी किस्म की हिंसा करने वाले न सिर्फ अपने निजी कारोबार में कामयाब हो सकते, बल्कि अब बाकी दुनिया में भी उनके जाने और काम करने की संभावनाएं खत्म होती जा रही हैं। अब दुनिया के कोई भी विकसित और सफल देश लोगों की सोशल मीडिया प्रोफाइल देखे-परखे बिना उन्हें दाखिला नहीं देते। और नफरती-हिंसा के खिलाफ एआई की मेहरबानी से ऐसी जांच आसान होती चल रही है, अनिवार्य तो होती ही जा रही है। मां-बाप, समाज, और नौजवान पीढ़ी खुद यह सोचे कि उसकी बाकी की जिंदगी कामयाबी के साथ एक बेहतर दुनिया में गुजरे, या नफरती-फटेहाली में!

(Daily Chhattisgarh)   

धरती के हर बच्चे पर मंडराता जलवायु-खतरा

17 जून 2026  

 

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक संस्था, यूनिसेफ, दुनिया भर के बच्चों के भले के लिए बनी है। दुनिया के अविकसित और विकासशील देशों में बच्चों के लिए जरूरी बहुत सारे काम यूनिसेफ की मदद से होते हैं। भारत में भी बहुत से राज्यों में इस संगठन की मदद से राज्य सरकारें कई कार्यक्रम चलाती हैं। उसकी ताजा रिपोर्ट यह बतलाती है कि जलवायु खतरे से किस तरह दुनिया के 180 करोड़ बच्चे सूखे का खतरा झेल रहे हैं। जलवायु परिवर्तन छोटे-बड़े, सभी इंसानों को प्रभावित कर रहा है, पशु-पक्षियों, पेड़ों, और कुदरत के बाकी तमाम पहलुओं को भी। लेकिन बाकी लोगों से परे बच्चे अधिक नाजुक होते हैं, उनकी बढऩे की उम्र में अगर उन पर बुरा असर पड़ता है, तो वे बाकी जिंदगी उससे नहीं उबर पाते। इसलिए उनके बारे में अधिक फिक्र की जरूरत रहती है।

यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट बताती है कि सूखे के खतरे से दुनिया के तीन चौथाई से अधिक बच्चे, 180 करोड़ प्रभावित हैं। दुनिया के आधे बच्चे एक साथ जलवायु के कम से कम तीन-तीन खतरे झेल रहे हैं, यह संख्या 110 करोड़ के करीब है। यह रिपोर्ट बताती है कि सूखा, भयानक गर्मी, और लू, इन तीनों से करीब 30 करोड़ बच्चे प्रभावित हैं। 40 लाख बच्चे ऐसे हैं जो जलवायु से संबंधित 6 अलग-अलग किस्म के खतरे झेल रहे हैं। और दुनिया के तकरीबन हर बच्चे पर जलवायु से जुड़ा हुआ कम से कम एक खतरा तो है ही। भारत के अलग-अलग राज्यों को हम देखते हैं तो बहुत फिक्र की हालत दिखती है। यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि महाराष्ट्र, राजस्थान, एमपी, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, और यूपी के बड़े हिस्सों में बच्चे सूखे और पानी की गंभीर कमी से गंभीर रूप से प्रभावित हैं। उत्तर भारत (खासकर दिल्ली-एनसीआर, यूपी, बिहार) में गर्मी का खतरा बहुत तेजी से बढ़ रहा है, बच्चे स्कूल जाने, खेलने, और बाहर निकलने में असमर्थ हैं। रिपोर्ट बताती है कि भारत के कई जिलों में, खासकर पूर्वी और मध्य भारत में बच्चे एक साथ सूखा, गर्मी, और बाढ़, तीनों का सामना कर रहे हैं। भारत की बहुत बड़ी आबादी खेती पर टिकी हुई है, और बहुत बड़ी संख्या में बच्चे ऐसे ही किसान परिवारों के हैं जहां खेती ही मुख्य कमाई है। सूखे का सीधा असर उनकी पढ़ाई-लिखाई, खान-पान, और सेहत पर पड़ रहा है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में ग्रामीण और गरीब बच्चों पर यह असर सबसे अधिक है, जिनके पास साफ पानी, इलाज, पढ़ाई, और सामाजिक सुरक्षा की कमी है।

हम किसी लेख की तरह की यह जानकारी, या कल ही आए हुए ताजा समाचार की जानकारी को विचारों के इस कॉलम में लिखना जरूरी और जायज इसलिए समझ रहे हैं कि हिन्दुस्तान अपने बच्चों के लिए एक बिल्कुल ही बेरहम देश है। बच्चों के लिए इसकी सारी फिक्र हिन्दू समाज में कृष्ण की बाललीलाओं तक सीमित है, या कि रामभक्तों में रामलला तक। असल बच्चों को लेकर लोगों की फिक्र जिम्मेदार परिवारों में तो विरासत छोडऩे की शक्ल में कहीं-कहीं सामने आती है, लेकिन जिनके विरासत में छोडऩे को कुछ नहीं है, ऐसे परिवारों में बच्चों को सरकारी स्कूलों के दोपहर के भोजन पर छोड़ दिया जाता है, और गरीबों में अधिकतर परिवार ऐसे दिखते हैं जहां कमाऊ मुखिया अपने नशे को अधिक जरूरी समझते हैं, और बच्चों के खानपान, पढ़ाई, उनकी बुनियादी जरूरतों की भी उपेक्षा करते हुए अपने में मगन रहते हैं। सरकारों, और राजनीतिक दलों की नजरों में बच्चे वोटर नहीं रहते, इसलिए उनकी जरूरतों की अनदेखी होती ही रहती है। सरकारों के बच्चों से जुड़े हुए विभाग आम सरकारी भ्रष्टाचार के शिकार रहते हैं, और किसी को यह रहम नहीं आता कि इससे छोटे-छोटे बच्चों का हक छिनता है।

देश-प्रदेश की सरकारें बच्चों की अतिरिक्त फिक्र करने की जहमत तो उठाती नहीं, वे पर्यावरण और प्रदूषण जैसे मुद्दों पर भी पांच-पांच साल के कार्यकाल से परे की दीर्घकालीन सोच नहीं रखतीं। फिर अधिकतर प्रदेशों में इन पांच बरसों में भी विधानसभा, लोकसभा, और स्थानीय संस्थाओं के चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं, और राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं वोटर रहते हैं, वोटरों के बच्चे भी नहीं रहते। महिलाओं को भत्ता, बालिग-बेरोजगारों को भत्ता, इसी तरह की बातें चुनावी घोषणापत्र पर हावी रहती हैं। जलवायु और पर्यावरण की बर्बादी धीमी रहती है, देश की जनता चुनावों के दौरान पर्यावरण और प्रदूषण पर कोई सवाल भी नहीं करती, इसलिए भी राजनीतिक दलों को इस बेजुबान विषय की परवाह नहीं रहती। नतीजा यह है कि बीते दशकों में धीरे-धीरे पर्यावरण की बर्बादी से आए जलवायु परिवर्तन ने पूरी दुनिया को इतनी बड़ी, और जानलेवा तबाही की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है, कि यहां से वापिसी भी मुमकिन नहीं लगती है। दुनिया के संपन्न देश इस तबाही के अधिक जिम्मेदार हैं, और तबाही की सबसे बड़ी मार सबसे विपन्न देशों पर हो गई है। रईस देशों के मजे की सजा गरीब देश भुगत रहे हैं। और आज दुनिया के सबसे गैरजिम्मेदार तानाशाह, अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने जिस तरह जलवायु परिवर्तन की रफ्तार घटाने की जिम्मेदारी से हाथ धो लिया है, और उसे एक हरित-झांसा करार दिया है, उससे रही-सही उम्मीद भी खत्म हो गई है।

दुनिया के लोग इतने आत्मकेन्द्रित हो गए हैं कि अपनी अगली पीढ़ी के लिए जायज और नाजायज तरीकों से दौलत छोडक़र जाने को वे अगली पीढ़ी के प्रति अपनी जिम्मेदारी मानते हैं। वे एक समाज या समुदाय के रूप में सामूहिक जिम्मेदारी पर सोचने की जहमत नहीं उठाते, और उन्हें यह समझ नहीं पड़ता कि उनके वारिस इस धरती से परे किसी दूसरे ग्रह पर तो जाकर रह नहीं सकेंगे, उन्हें रहना तो इसी धरती पर है, यहां के बाशिंदों के पास कोई प्लान-बी नहीं है। इसलिए दौलत चाहे कुछ कम छोड़ें, धरती और समाज बेहतर छोड़ें, यह किसी को समझ पड़ते दिखता नहीं है। और यह आम गैरजिम्मेदारी सिर्फ पर्यावरण को लेकर नहीं है, इंसानियत को लेकर भी है, धार्मिक सद्भाव को लेकर भी है, गरीबी-अमीरी की असमानता को लेकर भी है, और औरत-मर्द के बीच के लैंगिक फासले को लेकर भी है। इंसान किसी तरह समाज, और धरती को बेहतर बनाने के लिए फिक्रमंद नहीं हैं। एक सबसे विकसित देश, स्वीडन की एक किशोरी, ग्रेटा थुनबर्ग ने जिस तरह जलवायु को एक मुद्दा बनाया था, फिलीस्तीनियों के हक को एक मुद्दा बनाया था, क्या दुनिया के बाकी देशों के नौजवानों के बीच ऐसी किसी और जागरूकता की गुंजाइश है? ऐसे कई सवाल सिर्फ निराशा खड़ी करते हैं, इनमें से किसी का कोई उम्मीदभरा जवाब नहीं आता। यूनिसेफ की जिस रिपोर्ट से विचलित हुए मन से हम यह चर्चा छेड़ रहे हैं, यह आवाज भी अधिकतर लोगों तक नहीं पहुंचेगी। जो लोग आज किसी भी तरह की सत्ता पर काबिज हैं, उन्हें लगता है कि वे और उनके परिवार अपने निजी सुरक्षाचक्र में हमेशा के लिए सुख और सुरक्षा के साथ रहेंगे। ऐसा कोई टापू इस धरती पर है नहीं, लोगों को पूरी धरती को ही बेहतर बनाने की कोशिश करनी होगी, अपने लिए न सही, अपने बच्चों का चेहरा देखकर इस तरफ कुछ करना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 17 जून 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 16 जून 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

किशोरावस्था में सोशल मीडिया के खतरों पर कुछ सरकारें चौकन्नी

16 जून 2026  

 

ब्रिटेन ने कल घोषणा की है कि 16 बरस से कम उम्र के बच्चों को टिकटॉक, इंस्टाग्राम, फेसबुक, एक्स, स्नैपचैट, यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों से दूर रखा जाएगा। सरकार का तर्क है कि बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य, उनके ऑनलाईन उत्पीडऩ, अश्लील सामग्री, और इन प्लेटफॉर्मों की लत लगा देने की तकनीकों से बचाव के लिए यह रोक जरूरी है। ब्रिटेन के पहले सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने 16 बरस से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया पर दाखिला न देने का कानून लागू किया, और बच्चों के उम्र की जांच करने की जिम्मेदारी इन कंपनियों पर डाली। उसने इसे न मानने वाली कंपनियों पर आसमान छूते हुए जुर्माने का कानून बनाया। नार्वे ने भी 16 साल के कम उम्र के बच्चों के लिए ऐसा ही कानून कंपनियों पर लागू करने की घोषणा की है। ऑस्ट्रिया 14 साल के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने की जिम्मेदारी इन कंपनियों पर ही डाल चुका है। मलेशिया, फ्रांस, स्पेन, डेनमार्क, पुर्तगाल, इटली जैसे बहुत से देश हैं जिन्होंने तरह-तरह की रोक-टोक लगाई है।

ब्रिटेन की इस ताजा घोषणा के साथ प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कहा है कि सभी किशोर-किशोरियों की खुशी और उनकी सुरक्षा के लिए यह किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि वे खुद एक किशोर के पिता हैं, और वे जिम्मेदारी से यह कह सकते हैं कि ऐसी रोक लगाना बच्चों के भले के लिए जरूरी है। दुनिया के बहुत से देशों का यह अनुभव है कि ऐसे प्लेटफॉर्मों पर दुनिया भर में बिखरे हुए अपराधी भी दूर-दूर के देशों में बच्चों को फंसाते हैं, उनका यौन शोषण करते हैं, उन्हें अपनी नग्न तस्वीरें या नग्न वीडियो शेयर करने पर मजबूर करते हैं, और फिर ब्लैकमेलिंग का एक लंबा सिलसिला चलाते हैं। पश्चिमी देशों में ऐसी ब्लैकमेलिंग से डरे-सहमे हुए बच्चे दहशत में खुदकुशी तक कर रहे हैं, या मां-बाप की संपत्ति ब्लैकमेलरों के हवाले कर रहे हैं। ब्रिटिश प्रधानमंत्री इस मौके पर यह भी कहा है कि उन्हें मालूम है कि सरकार के लिए अपना यह फैसला लागू करना आसान नहीं रहेगा क्योंकि दुनिया की कुछ सबसे बड़ी टेक कंपनियां ऐसे प्लेटफॉर्म चलाती हैं, जिनसे लड़ाई बहुत मुश्किल रहेगी। 

हमने इस बारे में भारत के कानून पर एक नजर डाली, तो यहां कानूनी रूप से तो 18 बरस तक के नौजवानों को बच्चा माना जाता है, और उसके व्यक्तिगत डाटा की प्रोसेसिंग के लिए माता-पिता या पालकों की पुख्ता इजाजत जरूरी है। लेकिन आज हर किस्म के सोशल मीडिया पर भारत में बच्चे अपना खाता शुरू करते हुए अपनी उम्र 18 से अधिक बता देते हैं, और इस पर किसी तरह की जांच की जिम्मेदारी इन कंपनियों पर नहीं है। यह कुछ उसी किस्म का है कि भारत में 18 बरस से कम के बच्चों को तम्बाकू या शराब बेचने पर रोक है, लेकिन इस उम्र के बच्चे पानठेलों पर ही सिगरेट पीते खड़े दिखते हैं। यहां पर एक छोटा सा सवाल यह भी खड़ा होता है कि बच्चों की उम्र के सुबूत देने पर उनके मां-बाप की शिनाख्त उजागर होगी, और वह निजी कंपनियों तक चली जाएगी। लेकिन इसका आसान जवाब यह है कि आज भी हर मोबाइल कंपनी के पास, एयरलाईंस के पास, बैंक या क्रेडिट कार्ड कंपनियों के पास, यूपीआई जैसे एप्लीकेशन चलाने वाली कंपनियों के पास लोगों की शिनाख्त के दर्जनों कागज हैं, आज अगर उनमें उनके बालिग या नाबालिग बच्चों की उम्र के शिनाख्त का एक कागज और जुड़ जाएगा, तो उससे निजता क्या कुछ अधिक हद तक भंग हो जाएगी? 

आज डिजिटल-युग में दुनिया के सारे देश कमोबेश एक किस्म की दिक्कतें झेलते हैं, एक किस्म के खतरे झेलते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्मों का असर देशों की सरहदों के आरपार बेरोकटोक आते-जाते रहता है, और अब दुनिया भर में हर उम्र के लोग एक-दूसरे तक पहुंच भी रखते हैं। ऐसे में अगर विकसित देशों को भी 14 और 16 बरस की उम्र तक रोक लगाने की जरूरत लग रही है, और भारत 18 बरस की उम्र तक बेफिक्र बैठा हुआ है, तो फिर उम्रसीमा की भारत की इस छूट के साथ भारत में बढ़ते हुए नाबालिग अपराधों को भी देखना चाहिए कि क्या ये सोशल मीडिया और ऑनलाईन से भी प्रभावित हैं? यह भी देखना चाहिए कि क्या इस माध्यम से कई बड़े और बालिग मुजरिम छोटे बच्चों का शोषण करते हैं? भारत में आज भी बच्चों की सेक्स फिल्मों को पोस्ट करने वालों की जानकारियां देश के भीतर से पकड़ में नहीं आतीं, पश्चिम के कुछ विकसित देशों में ऐसे अंतरराष्ट्रीय निगरानी संगठन हैं जो भारत की जानकारी भारत को देते हैं कि किस मोबाइल नंबर से, किस इंटरनेट कनेक्शन से, किस पल, कौन सी चाइल्ड सेक्स वीडियो पोस्ट की गई है। इसलिए भारत अपने बच्चों की साइबर हिफाजत के मामले में नौसिखिए किस्म का है, यहां पर बच्चों के बचाव के लिए कड़े कानूनों की जरूरत है। लेकिन ऐसा लगता है कि इन कानूनों से दुनिया की इन सबसे बड़ी टेक कंपनियों के कारोबार पर असर पड़ेगा, इसलिए भी सरकार कुछ नर्मदिली दिखा रही है। 

दिक्कत यह भी है कि भारत में विधायकों और सांसदों की औसत उम्र खासी अधिक है। उन्होंने अपनी किशोरावस्था में सोशल मीडिया देखा नहीं था, इसलिए वे खतरों से नावाकिफ भी हैं। संसद और विधानसभा दलीय गुटबाजी का अड्डा होकर रह गए हैं, और ऐसे में जिंदगी के महीन पहलुओं पर संवेदनशीलता के साथ चर्चा के कोई मंच ही नहीं रह गए हैं। जिन विधानसभाओं, और जिस संसद को देश के सबसे महत्वपूर्ण कानून बनाने का जिम्मा मिला हुआ है, वे मंच संख्या के बाहुबल से अधिक कुछ नहीं देखते। ऐसे में देश के लोगों की जिंदगी के नाजुक पहलुओं की फिक्र किसी को नहीं है। और आज के डिजिटल उपकरण ऐसे हैं कि पिछली पीढ़ी के मां-बाप बच्चों पर अधिक नजर भी नहीं रख सकते। बच्चे मां-बाप के फोन या कम्प्यूटर के पासवर्ड पल भर में झपट लेते हैं, और अपने उपकरणों को मां-बाप की पहुंंच या जांच से परे रखना भी जानते हैं। भारत में सरकारों पर ऐसे सार्वजनिक दबाव की जरूरत है जो उसे अधिक संवेदनशील बना सके।

(Daily Chhattisgarh)