19 जून 2026
अमरीका-ईरान के आज तक के सबसे महत्वपूर्ण समझौते के लागू होने के मौके पर ही इजराइल ने इस समझौते की भावना, और उसके शब्दों के खिलाफ जाकर जिस तरह लेबनान पर हमला जारी रखा है, उससे अमरीका बहुत विचलित है, और यह भी समझ पड़ता है कि इजराइल की नीयत क्या है। जो लोग इन देशों के रिश्तों की जटिलताओं को समझते हैं, वे जानते हैं कि अमरीका-ईरान समझौता इजराइल पर एक बड़ी चोट है। मौजूदा इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू का सारा अस्तित्व ही फिलीस्तीन, लेबनान, और ईरान के साथ जंग चलने तक ही है, इसके तुरंत बाद उसके जेल चले जाने का पूरा खतरा है। ट्रम्प शायद खुलकर यह बात बोल भी चुके हैं कि अगर वे नहीं रहते तो नेतन्याहू जेल में रहते। इजराइल में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के पुख्ता मामले हैं, लेकिन कोई भी देश जंग से गुजरते हुए अपने नेता के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुकदमे को कभी प्राथमिकता नहीं दे सकता, और इसीलिए नेतन्याहू का अस्तित्व बना हुआ है। उसने भरसक कोशिश की कि अमरीका और ईरान के बीच कोई तालमेल न बैठ पाए, लेकिन ट्रम्प ने जैसा कि अभी खुद ही कहा कि जंग अगर जारी रहती, जलडमरूमध्य से जहाज नहीं निकलते, तो दुनिया के पास चार हफ्ते से ज्यादा का तेल नहीं रहता। ऐसे में समझौते के दस्तखत के दिन ही अगर इजराइल हथियारबंद संगठन हिजबुल्ला को मारने के नाम पर लेबनान पर फिर हमला करता है, तो यह हमला सीधे ट्रम्प पर हमला है। और अमरीका ने इजराइल की इस नीयत और हरकत को समझते हुए उसे उसकी औकात याद दिलाने के लिए अपने उपराष्ट्रपति जे.डी.वेंस का इस्तेमाल किया है।
कल इजराइल की हरकतों को देखते हुए जे.डी.वेंस ने एक लंबी प्रेस कांफ्रेंस की, उन्होंने ईरान के साथ हुए समझौते की जानकारी तो दी ही, लेकिन साथ ही नेतन्याहू और उनके मंत्रियों को नसीहत भी दी। नेतन्याहू और उनके कुछ मंत्री सार्वजनिक रूप से ट्रम्प के करवाए हुए इस समझौते के खिलाफ बोल चुके हैं, और इजराइल के अलग फौजी तेवरों की बात कर चुके हैं। मानो जुबानी जमाखर्च काफी न रहा हो, इजराइल ने लेबनान की राजधआनी बेरूद पर हमला किया, जबकि ईरान ने ट्रम्प से यह शर्त रखी ही थी कि समझौते में लेबनान में भी पूरी तरह युद्धविराम लागू होना चाहिए। इजराइल को उसकी औकात याद दिलाते हुए अमरीकी उपराष्ट्रपति ने कहा कि पूरी दुनिया में सिर्फ डॉनल्ड ट्रम्प ही इकलौते नेता हैं जो इजराइल के प्रति सहानुभूति और समर्थन दिखा रहे हैं। साथ ही वह दुनिया के सबसे ताकतवर देश के नेता भी हैं। जे.डी.वेंस ने आगे कहा- अगर मैं इजराइली कैबिनेट का सदस्य होता, तो शायद मैं दुनिया में बचे अपने इकलौते ताकतवर सहयोगी पर सार्वजनिक रूप से हमला नहीं करता। उन्होंने इजराइली मंत्रियों का नाम लेते हुए कहा कि पिछली तीन महीनों में उनके देश की रक्षा करने वाले दो तिहाई रक्षा उपकरण अमरीकियों ने बनाए हैं, जिनका खर्च अमरीकी जनता ने उठाया है। उन्होंने आगे कहा कि इजराइल की समस्या डॉनल्ड ट्रम्प नहीं है, अगर कोई ऐसा सोचते हों, तो उन्हें जागना चाहिए, और उन्हें यह समझना चाहिए कि उनका देश वास्तव में किस हालत में है। हाल ही में ट्रम्प ने भी नेतन्याहू को यह सलाह दी थी कि वह हिजबुल्ला के गिने-चुने लड़ाकों को मारने के लिए पूरी की लेबनान की पूरी इमारतों पर बमबारी करने जैसी हरकत न करे। अमरीकी राष्ट्रपति भवन के कुछ सूत्रों से निकली खबर यह भी कहती है कि कुछ दिन पहले एक टेलीफोन कॉल पर ट्रम्प ने नेतन्याहू को गालियों की जुबान में समझाईश दी थी, और कहा था कि वे नहीं रहते, तो नेतन्याहू जेल में रहते, और इजराइल का अस्तित्व ही मिट चुका रहता।
दुनिया भर के राजनीतिक विश्लेषक अब इस बात को बड़ी अच्छी तरह मान रहे हैं कि इजराइल ने ट्रम्प की कमअक्ली, और मनमानी के मिजाज का फायदा उठाते हुए उसे ईरान पर हमला करने में झोंक दिया। अमरीका-इजराइल का इतिहास जानने वाले लोग यह लिखते आ रहे हैं कि आधी सदी में हर इजराइली प्रधानमंत्री ने अपने वक्त के अमरीकी राष्ट्रपति को ऐसा ही झांसा बेचने की पूरी कोशिश की थी, और यह ट्रम्प जैसा मूर्ख था जिसने न सिर्फ बाकी पूरी दुनिया को मुसीबत में डालकर, बल्कि खुद अमरीका को खोखला करने की कीमत पर भी इजराइल के उकसावे पर यह जंग छेड़ दी। इजराइल की फौजी ताकत अमरीकी मेहरबानी पर चलती है, और खुद अमरीका इस जंग में अपने हथियारों को इतना खो चुका है कि अगले कई बरस उसे इसकी भरपाई करने में लगेंगे। अमरीकी जनता पर इस जंग का इतना बड़ा आर्थिक बोझ पड़ा है कि वह महंगाई से जख्मी पड़ी हुई है। अमरीका में इजराइली झांसे में आकर नाटो के अपने साथी देशों की दोस्ती खो दी, मध्य-पूर्व के देशों में उस पर भरोसा रखने वाले देशों का भरोसा खो दिया, और अमरीका की महाशक्ति होने की साख भी खो दी। हमने दो दिन पहले ही इसी जगह पर संपादकीय में लिखा था कि ईरान के साथ इस समझौते के लिए अमरीका किस तरह घुटनों पर आकर गिड़गिड़ा रहा था ताकि नवंबर में वहां होने वाले मध्यावधि चुनाव के पहले ट्रम्प अपनी खोई हुई साख को कुछ हद तक वापिस पा सके।
इजराइल ने अमरीका से परे अपने तेवर दिखाकर सिर्फ यही साबित किया है कि वह परले दर्जे का अहसानफरामोश देश है। अगर अमरीका संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने वीटो का इस्तेमाल करके बीती आधी सदी से इजराइल को बचाने का काम नहीं करते रहता, तो इजराइल की सारी गुंडागर्दी ठिकाने लग चुकी रहती। अमरीका जिस तरह दुनिया भर के देशों पर बात-बात पर आर्थिक प्रतिबंध लगाता है, दुनिया के इस सबसे बड़े हैवान-देश इजराइल पर तो दुनिया का हर प्रतिबंध लग जाना चाहिए था, लेकिन अमरीकी दादागिरी और धाक के चलते यह नहीं पाया था। अमरीकी भीख और मदद पर जिंदा इजराइल आज अमरीकी राष्ट्रपति के अपने अस्तित्व पर आए खतरे के बीच जिस तरह ट्रम्प की मर्जी के खिलाफ फौजी हरकत जारी रखे हुए है, उससे अमरीका को, और खासकर ट्रम्प को नसीहत लेना चाहिए कि इजराइल और नेतन्याहू भरोसेमंद साथी नहीं हैं, वे अमरीका को सिवाय दुश्मन देने के और कुछ नहीं कर रहे हैं। ऐसे अहसानफरामोश देश की जरूरत अमरीका को धरती के उस हिस्से में ईरान के साथ हुए समझौते के बाद वैसे भी कम रहने वाली है। और अपने अस्तित्व पर आए इस खतरे को देखकर ही बौखलाहट में इजराइल उस अमरीकी हाथ को ही काट रहा है, जो हाथ उसे खिलाते आया है। दुनिया के बाकी देशों को भी इजराइली अहसानफरामोशी देखकर यह सबक लेना चाहिए कि जिस दिन वे मुसीबत में रहेंगे, इस सूदखोर देश से कोई साथ नहीं मिलेगा, महज धोखा मिलेगा। फिलहाल तो दुनिया को राहत की सांस लेना चाहिए कि सांबा गब्बर के खिलाफ खड़ा हो रहा है, और किसी गिरोह के भीतर लोगों के बीच आपसी गोलीबारी होती है, तो उससे समाज का कोई नुकसान नहीं होता। नेतन्याहू को जेल हो, इससे खुद इजराइल का भला होगा। और जिस इजराइल के लोग नस्लवादी जनसंहार करने को अपना हक मान रहे हैं, उनकी अक्ल भी कुछ ठिकाने आने चाहिए। दुनिया के लोकतांत्रिक और जिम्मेदार देशों को इजराइल के खिलाफ बोलने, कुछ करने, और आर्थिक प्रतिबंध लगाने की अपनी वैश्विक और मानवीय जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, वरना इतिहास तो बेरहमी से दस्तावेजीकरण करना जानता ही है।
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