भारत की जिंदगी में बिखरी कतरा-कतरा अंधेरी बातें...

23 अगस्त 2026  

 

अभी एक शहर के बाहरी हिस्से में एक खाली खदान में भरे हुए पानी में डूबकर एक नौजवान की मौत हो गई। आपस में कुछ नौजवान वहां भरे हुए पानी को तैरकर पार करने का मुकाबला कर रहे थे, बीच में दम टूट गया, और एक नौजवान डूब गया। अब यह साधारण खदान जितनी गहराई नहीं थी, चार सौ फीट गहरे पानी में नीचे तक जाकर ढूंढना स्थानीय बचावकर्मियों के लिए मुमकिन नहीं था। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने नौसेना के अफसरों से बात करके गोताखोरों का इंतजाम किया था, लेकिन इसके पहले कि वे यहां के लिए रवाना हो सकें, कोई 80 घंटे बाद लाश तैरकर सतह पर आ गई। इस तरह छत्तीसगढ़ में नौसेना के गोताखोरों की पहली तलाश शुरू होने के पहले ही रूक गई। लेकिन इन चार दिनों शहर में जो बेचैनी रही, बचावकर्मियों पर जो दबाव रहा, वह बहुत था। ऐसी खतरनाक जगह पर लंबी तैराकी का मुकाबला बिना किसी बचाव के करने वाले लोगों ने अपनी जिंदगी तो गंवाई ही, सरकार पर भी एक असाधारण बोझ लाद दिया। एक दूसरी घटना में एक आदमी अपने दो बच्चों को लेकर कहीं नदी-तालाब के किनारे गया, बच्चे पानी में डूबते रहे, और किनारे बैठा बाप मोबाइल पर जुटे रहा, बच्चों की जिंदगी चली गई। रील बनाते हुए जिंदगियां देने वाले तो बहुत सारे लोग हैं, और हाईकोर्ट के हुक्म के बावजूद सडक़ों पर स्टंट करने वाले लोगों की भी कमी नहीं है। यह तो बात हुई जनता की, लेकिन जब हम सरकार या अदालत पर पडऩे वाले बोझ की बात करते हैं, तो सरकारों के बहुत सारे फैसले भी ऐसे रहते हैं जिनके बारे में सरकार को यह कानूनी समझ रहती है कि यह अदालती अग्निपरीक्षा को नहीं झेल पाएंगे, लेकिन वे ऐसे फैसले लेती हैं। ये फैसले सरकारी अमले के बारे में भी रहते हैं, जनता के बारे में भी रहते हैं। खुद अदालतों के भीतर अगर देखें, तो छोटी अदालतें ऐसे नाजायज फैसले भी देती हैं जो कि पहली नजर में ही गलत लगते हैं, और जिन पर ऊपर की अदालतों का और अधिक वक्त बर्बाद होता है। साम्प्रदायिक और राजनीतिक नेता कई तरह के भडक़ाऊ बयान देते हैं, जिनके बारे में उन्हें अंदाज रहता है कि इस पर या तो पुलिस रिपोर्ट होगी, या मुकदमे चलेंगे, या फिर कानून व्यवस्था की दिक्कत खड़ी होगी, और सरकारी अमला उसमें झोंकना पड़ेगा। 

हम भारत जैसे देश में सरकार और अदालत की उत्पादकता का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे ही गैरजरूरी मुद्दों में बर्बाद होते देखते हैं, जिन्हें वक्त रहते सुलझाया जा सकता था, या गलत फैसलों से बचा जा सकता था, बिना विवाद बढ़ाए काम हो सकता था। ऐसे फैसले निजी जिंदगी के भी रहते हैं, और सरकारी या अदालती भी। अब चाकू या पिस्तौल दिखाते हुए एक वीडियो बनाकर पोस्ट कर देने का मतलब यह रहता है कि उसकी तलाश करते हुए पुलिस सोशल मीडिया कंपनियों तक जाए, फिर पहचान निकालकर उनके घर जाकर पकड़े, उन्हें अदालत में पेश करे, जेल भेजे, और यही करते रह जाए। क्या आज टेक्नॉलॉजी और दूसरी वजहों से जिस रफ्तार से जुर्म बढ़ रहे हैं, उस अनुपात में अगर पुलिस और अदालत की क्षमता बढ़ाई जाएगी, तो उसका खर्च आएगा कहां से? जेलें कैदियों से उफन रही हैं, सडक़ें उन जानवरों से उफन रही हैं जिन्हें उनके मालिकों ने दूध की आखिरी बूंद तक निचोडक़र सडक़ों पर छोड़ दिया है। लोग इन जानवरों से टकराते हैं, अपनी जिंदगी देते हैं, और अगर खुद बच जाते हैं, तो जानवरों को जख्मी करने की तोहमत झेलते हुए जेल भी जाते हैं, भीड़ की मार भी खाते हैं, और कभी-कभी भीड़ के हाथों मारे भी जाते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या सरकार और अदालत का ढांचा, आम लोगों के लिए बनी हुई सडक़ें इसीलिए है कि लापरवाह और गैरजिम्मेदार लोग, मुजरिम किस्म के लोग उनका बेजा इस्तेमाल करें? यह सब होता तो जनता के ही टैक्स के पैसों से है। 

सरकारों की बात करें तो वे भी देश के संविधान के शब्दों और उसकी भावना के खिलाफ जाकर कई तरह के फैसले लेती हैं। फिर देश मेें चुनाव आयोग जैसी जो दूसरी संवैधानिक संस्थाएं बनाई गई हैं, वे भी बड़े पैमाने पर बदअमनी फैलाने का काम कर रही हैं। बंगाल में जिस तरह चुनाव के चलते हुए दसियों लाख मतदाताओं को वोटर लिस्ट से बाहर किया गया, सुप्रीम कोर्ट ने उसकी न्यायिक सुनवाई करने के लिए चुनाव आयोग से कहा। अभी भी इस लिस्ट में दसियों लाख लोग, शायद 30 लाख से अधिक, अर्जियां लेकर खड़े हुए हैं, और जिस रफ्तार से उनकी जांच की जा रही है, उससे खुद सुप्रीम कोर्ट का अंदाज है कि सारी अर्जियां निपटाने में 21 साल लग जाएंगे। इसका मतलब यह है कि यह चुनाव तो निकल ही गया, इसके बाद के और चार चुनाव निकल जाएंगे, तब तक आज की अर्जियां ही नहीं निपट पाएंगी, लोगों का वोट देने का अधिकार जाता रहेगा। यह तो गनीमत कि देश में सुप्रीम कोर्ट से ऊपर कोई और कोर्ट नहीं है, वरना यह फैसला किसी सुपर सुप्रीम कोर्ट में पल भर में खारिज हो गया रहता, कि अगर इस चुनाव में लोग वोट नहीं दे पा रहे हैं तो क्या हुआ, अगले चुनाव में दे देंगे। कोई सुप्रीम कोर्ट के जजों से यह बात कहकर देखते कि उनका इस जन्म में सुप्रीम कोर्ट के लिए सलेक्शन नहीं हो पाया तो क्या हुआ, अगले जन्म में हो जाएगा, तो पता लगता। हमारे कहने का मतलब यह है कि गनीमत कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को संसद के अलावा कहीं और चुनौती नहीं दी जा सकती है, वरना ढेर सारे फैसलों को खारिज करने के तर्क तो हमारे जैसे को ही सूझते रहते हैं। आज की इस चर्चा में हम कॉकरोच-प्रसंग पर कुछ लिखना नहीं चाहते क्योंकि उस अवांछित प्रसंग पर बहुत बार बहुत कुछ लिख चुके हैं। 

भारतीय लोकतंत्र में लोगों के नफरती और जहरीले बयानों से लेकर तरह-तरह के लोगों के किए जा रहे तरह-तरह के जुर्म तक इतना कुछ ऐसा हो रहा है कि उससे पुलिस, अदालत, सरकार, और समाज सबका जीना हराम है। यह सिलसिला कैसे कम होगा? कैसे लोगों में सामाजिक सरोकार आ सकता है, सामूहिक चेतना आ सकती है, कानून के प्रति सम्मान आ सकता है, कैसे सरकारों से बददिमागी कम हो सकती है, कैसे पूरे भारतीय समाज में बड़े पैमाने पर फैला हुआ भ्रष्टाचार घट सकता है, कैसे महिलाओं का सम्मान पत्थर-मिट्टी की देवी प्रतिमाओं के बराबर हो सकता है, कैसे बच्चों के साथ बर्ताव तथाकथित इंसानी हो सकता है, कैसे लोग अपने अधिकारों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी मंजूर कर सकते हैं? कैसे ये तमाम चीजें भारतीय जीवन में लौट सकती हैं, या पहली बार आ सकती हैं? यह न सिर्फ हथियारबंद अराजकता है, बल्कि तथाकथित मानवीय मूल्यों की अराजकता भी है, जो कि वैचारिक से लेकर शारीरिक हिंसा तक भारतीय जनजीवन पर हावी हो चुकी है। कानून के प्रति हिकारत, समाज के प्रति गैरजिम्मेदारी, दूसरों के अधिकारों की हेठी, क्या नहीं है हिन्दुस्तान में? किस तरह सार्वजनिक जगहों पर और जनजीवन मेंं कभी दुरुस्त न होने वाला नुकसान होते चल रहा है, क्या कोई इस बारे में सुधार करने की बात सोच भी रहे हैं? यह एक बहुत लंबी-गहरी अंधेरी सुरंग की तरह है, जिसमें अगर किसी को आखिर में उम्मीद की किरण अगर दिखती भी है, तो वह असली होने के बजाय घुप्प अंधेरे में दिखती मृगतृष्णा ही है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

पेपर बेचने वाले प्रोफेसर के लिए मौजूदा सजा कम, कानून में संशोधन जरूरी..

22 अगस्त 2026  

 

देश भर में जगह-जगह इम्तिहानों के पर्चे लीक होने को लेकर साल-दो साल से बवाल चल रहा है। मेडिकल दाखिले के लिए होने वाली नीट इम्तिहान के पेपर लीक की वजह से तो विश्व इतिहास में पहली बार पर्चों को दुबारा इम्तिहान में एयरफोर्स के विमानों से भेजा गया। देश भर में एक असाधारण ऐतिहासिक आंदोलन पर्चे आउट होने के खिलाफ चला, और एक  बहुत कड़ा कानून इसके लिए 2024 में बनाया गया था जिसमें तीन से पांच साल तक की जेल, और 10 लाख रूपए तक के जुर्माने का इंतजाम किया गया, और अगर मैनेजमेंट की भागीदारी साबित होती है तो 3 से 10 साल की कैद, और एक करोड़ रूपए तक जुर्माना लगाया गया था। इस कानून को गैरजमानती, और गैरसमझौता योग्य बनाया गया था। अब 2026 में पिछले ही महीने इसमें एक संशोधन पेश किया गया है जो कि लोकसभा में विचाराधीन है जिसमें पर्चों से जुड़े मैनेजमेंट पर पांच करोड़ रूपए तक जुर्माने, और आठ साल तक प्रतिबंध के कड़े प्रावधान किए गए हैं। व्यक्तियों को व्यक्तिगत अपराध के लिए 5 से 10 साल की कैद, और 50 लाख तक जुर्माने का प्रावधान रखा गया है। इसके बाद भी अभी जब छत्तीसगढ़ में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय का एक पर्चा लीक होकर धड़ल्ले से चारों तरफ फैला, तो यह समझ आया कि कागजों पर कड़ी सजा किसी को जुर्म से नहीं रोक पाती है। लोगों का भारतीय न्याय प्रक्रिया की कमजोरी पर इतना पुख्ता भरोसा है कि वे बड़े से बड़ा जुर्म करके बच जाने की उम्मीद रखते हैं। 

अभी पुलिस ने छत्तीसगढ़ के इस मामले में दुर्ग जिले के भारती एग्रीकल्चर कॉलेज नाम के निजी कॉलेज के एक प्रोफेसर सहित आधा दर्जन लोगों को गिरफ्तार किया है। विश्वविद्यालय ने इस इम्तिहान के लिए प्रदेश के 28 सरकारी, और 4 निजी कॉलेजों को छांटा था, और वहां पर पर्चे समय से पहले पहुंचाए जाते थे। अभी जिस प्रोफेसर योगेश सोनकेसरिया को गिरफ्तार किया गया है वह अपने कॉलेज से रायपुर के कृषि विश्वविद्यालय तक कॉपियां लाने ले जाने, प्रश्नपत्र लाने का काम करता था। उसने इसमें से एक लिफाफे के कोने में बारीक छेद करके भीतर एक छोटा कैमरा डालकर प्रश्नपत्र की फोटे खींची थीं, और फिर 11 हजार रूपए में बेच दी थी। खरीदने वाले छात्र ने इसे कुछ और लोगों को दिया। अब सवाल यह उठता है कि 2019 से जो एक कॉलेज में प्राध्यापक है, वह 11 हजार रूपए के लिए एक इम्तिहान को चौपट करने का काम कर रहा है, और अपने ही कॉलेज के छात्रों को पर्चा बेच रहा है। 

आज हिन्दुस्तान में नौजवान आबादी का एक बड़ा हिस्सा बेरोजगार है। लेकिन जिन लोगों को रोजगार मिला हुआ है, उनमें से कई शिक्षक शराब पिए हुए स्कूलों में पड़े रहते हैं, बहुत से लोग नौकरी की परवाह किए बिना रिश्वत लेने में लगे रहते हैं, और एक कॉलेज प्राध्यापक इस तरह की आपराधिक साजिश करके एक मामूली सी रकम के लिए इतना बड़ा खतरा मोल ले रहा है। यह 11 हजार रूपए की रकम एक कॉलेज प्राध्यापक की तनख्वाह के मुकाबले कुछ भी नहीं होगी। देश में कड़ा कानून बनने की चर्चा और लोगों में न सही, स्कूल-कॉलेज के लोगों में तो हुई ही होगी। आज जंतर-मंतर से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, संसद से लेकर सडक़ तक पर्चे आउट होने को लेकर जनता की अभूतपूर्व नाराजगी सामने आ ही रही है, बड़े-बड़े आंदोलन चल रहे हैं। ऐसे में भी लोगों को पर्चे आउट करके बेचने का उत्साह बना हुआ है। यह तो यह हरकत पकड़ में आ गई। मान लें कि नहीं आई होती, तो पर्चे खरीदने वाले छात्र दूसरे ईमानदार छात्रों के मुकाबले कई तरह के फायदे पा सकते थे, पाते ही। इसलिए इम्तिहानों में, नौकरी के साक्षात्कार में बेईमानी सिर्फ खुद के फायदे की बात नहीं होती, वह दूसरों के हक छीनने की बात भी होती है। कड़े कानून की जरूरत भी इसीलिए थी कि समान अवसरों से वंचित रह जाने वाले तबके इस तरह के जुर्म से इतने विचलित होते हैं कि खुदकुशी भी कर लेते हैं। जिस नीट इम्तिहान को लेकर देश हिल गया, उसके दुबारा होने से पहली बार के कामयाब बच्चों में से 20 से अधिक बच्चों ने खुदकुशी कर ली थी। एक प्रदेश के एक विश्वविद्यालय के ऐसे एक इम्तिहान के एक पर्चे से शायद कुछ सौ, या कुछ हजार लोग ही जुड़े होंगे, लेकिन जब किसी संस्थान के इंतजाम की विश्वसनीयता खत्म होती है, तो मुकाबला करने वाले सभी बच्चों, और नौजवानों का विश्वास भी खत्म होता है। लोगों में एक निराशा छा जाती है कि उनकी मेहनत से क्या फायदा, क्योंकि उनके मुकाबले कमजोर लोग तो पर्चे खरीदकर, या किसी और तरीके से लिस्ट में ऊपर आ जाएंगे। 

कानून में पांच-दस बरस की कैद के बाद ऐसे लोगों का पढऩा, और पढ़ाना खत्म ही हो जाएगा, लेकिन इन लोगों को सजा मिलने से परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता जल्दी नहीं लौट पाएगी। यही छत्तीसगढ़ है जहां बीते बरसों में राज्य लोकसेवा आयोग बेरोजगारों के हक की सरकारी कुर्सियों को पैसेवालों, और नेता-अफसरों के रिश्तेदारों को देते आया है, आज पीएससी के चेयरमैन सहित बहुत से लोग जेलों में पड़े हैं, जिनमें करोड़पति-अरबपति उद्योगपतियों के परिवारों के लोग भी हैं जिन्होंने 50-50 लाख में एक-एक कुर्सी खरीदी थी। आज देश में इम्तिहानों की बेईमानी, दाखिले, और नौकरी के मुकाबलों में बेईमानी एक बहुत बड़ा मुद्दा है। देश के सारे बेरोजगार, चाहे वे प्रतिभा के आधार पर चयन सूची में आने के लायक न हों, वे भी निराश हो जाते हैं कि सलेक्शन में बेईमानी चल रही है। यह सिलसिला टूटना चाहिए। जहां बाकी लोगों के हक छीनकर कुछ लोगों के बीच पढ़ाई या नौकरी की कुर्सी बेची जाती है, वहां पर इन लोगों को और कड़ी सजा मिलनी चाहिए, और लोकसभा में जो संशोधन अभी है, उसे भी कानून बनाया जाना चाहिए। इस बीच यह उम्मीद तो जायज ही होगी कि इम्तिहान और इंटरव्यू लेने वाले सभी संस्थान अपने इंतजाम और पुख्ता करते चलें, क्योंकि पेपर आउट करने का बड़ी कमाई का धंधा तो मुजरिम चलाते ही रहेंगे, और उसे रोकने की तरकीबें भी जारी रखनी होगी।

(Daily Chhattisgarh)   

एथेनॉल का बावलापन क्या डॉलर और पेट्रोल के टक्कर में शक्कर की भी सेंचुरी बनाएगा?

 21 अगस्त 2026  

 

भारत के बाजारों में शक्कर का दाम एकाएक आसमान छूने लगा है। कमी इतनी हो गई है कि केन्द्र सरकार ने शक्कर आयात पर शुल्क शून्य कर दिया है। मतलब यह कि टैक्स का नुकसान झेलते हुए, विदेशी मुद्रा खर्च करते हुए अब भारत के लोगों के मुंह में कड़वी शक्कर घुलेगी, दूसरी तरफ भारत में शक्कर कारखानों को गन्ना कम नसीब है क्योंकि गन्ना एथेनॉल फैक्ट्रियों में जा रहा है, और वहां से पेट्रोलियम में मिलावट के लिए। सरकार का तर्क है कि भारी-भरकम पेट्रोलियम आयात खर्च घटाने के लिए, विदेशी मुद्रा बचाने के लिए यह मिलावट की जा रही है, लेकिन अब पेट्रोलियम में यह बच रही है तो शक्कर में जा रही है। इसके साथ-साथ कुछ जानकार लोगों ने यह भी लिखा है कि एथेनॉल मिले हुए पेट्रोल से गाडिय़ों का माइलेज 10-15 फीसदी तक गिर रहा है, इसका मतलब है कि उनके पेट्रोल की खपत 10-15 फीसदी बढ़ जाएगी। अब उतने ही लोगों के उतने ही किलोमीटर पर 10-15 फीसदी अतिरिक्त पेट्रोल आयात करना पड़ेगा, तो फिर हासिल हुआ क्या? निल बटे सन्नाटा? 

पेट्रोल में एथेनॉल मिलावट का अधिक विरोध इसलिए कारगर नहीं हो रहा क्योंकि इस बाजार पर सरकार का एकाधिकार है। अधिकतर पेट्रोलियम कंपनियां सरकार की अपनी हैं, और ग्राहक के पास न कोई पसंद है, न कोई विकल्प। अभी दो दिन पहले ही प्रधानमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने सार्वजनिक रूप से यह कहा कि ग्राहकों को ई-20 पेट्रोल के साथ-साथ ई-10 पेट्रोल भी मुहैया कराया जाना चाहिए ताकि पुरानी गाडिय़ों वाले लोग अपनी पसंद का ईंधन चुन सकें। दरअसल यह तकनीकी तथ्य सामने आया है कि पुरानी गाडिय़ां एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के लायक बनी हुई नहीं हैं। केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने बहुत ही गोलमाल शब्दों में मजबूरी में ही संसद में यह माना है कि पुरानी गाडिय़ों के कुछ पुर्जे इससे खराब हो सकते हैं। लोगों का कहना है कि यह ‘कुछ’ शब्द सही ब्यौरा नहीं है, और कई पुर्जे खराब हो सकते हैं, उनके बदलने की लागत सरकार के रखे गए अंदाज से काफी अधिक हो सकती है, ऐसी गाडिय़ां खराब होने के वक्त कहीं भी दगा दे सकती हैं। भारत की ऑटोमोबाइल कंपनियां एक गजब की रहस्यमय चुप्पी साधे बैठी हैं, और अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों ने इन कंपनियों को चिट्ठी लिखने पर भी कोई जवाब न मिलने की बात सार्वजनिक रूप से कही है। देश के सबसे बड़े ऑटोमोबाइल संगठन एसआईएएम ने पेट्रोलियम मंत्रालय को एक चिट्ठी लिखी, और ई-20 पेट्रोल से होने वाले नुकसान की शिकायतें बढऩे की बात कही, लेकिन कुछ रहस्यमय कारणों से कुछ घंटों के भीतर ही यह चिट्ठी वापिस ले ली, और कहा कि अभी आंकड़ों की कुछ और पुष्टि करनी है। 

अब हिन्दुस्तान में त्यौहार के महीने शुरू हो चुके हैं, और अगले कई महीने लोगों के घर-बाजार में शक्कर की अधिक खपत रहेगी। अभी ही शक्कर दुगुने दाम पर पहुंच रही है, और आज बाजार का एक अंदाज यह है कि यह सौ रूपए किलो भी हो सकती है, यानी वह पेट्रोल और डॉलर दोनों को कड़ा मुकाबला दे सकती है। यह बड़ी गजब की नौबत है। सरकार ने अभी कुछ हफ्ते पहले यह मंजूर किया था कि इस मिलावट से गाडिय़ों को कुछ नुकसान पहुंच सकता है, लेकिन सरकार ने यह भी कहा था कि एथेनॉल से जुड़े हुए ढांचे को खड़ा करने में देश का सवा लाख करोड़ रूपए खर्च हो चुका है, इसलिए वापिस लौटना महंगा पड़ेगा। हमने उस वक्त भी लिखा था कि देश की सारी पेट्रोल-गाडिय़ों की मौजूदा कीमत इस सवा लाख करोड़ से बहुत अधिक है, और उनको नुकसान पहुंचाने की कीमत पर ऐसा फैसला नहीं लेना चाहिए। 

आज त्यौहार के वक्त लोगों की गाडिय़ां गन्ना रस से बने एथेनॉल वाले पेट्रोल से डायबिटिक हो रही हैं, बाजारों से शक्कर गायब हो रही है, महंगी हो रही है, गन्ना उगाने वाले खेत भयानक पानी पीते हैं, इसलिए धरती के पेट से पानी गायब हो रहा है, अब शक्कर आयात करने की नौबत आ गई है, इसलिए जीरो ड्यूटी करने से सरकार को सीधा नुकसान भी हो रहा है, और विदेशी मुद्रा भी जा रही है। गाडिय़ों को नुकसान हो रहा है, सेकेंडहैंड गाडिय़ों का बाजार ठप्प सरीखा हो रहा है, वहां दाम गिर गए हैं, ग्राहक बिदक गए हैं। अर्थशास्त्रियों को यह समझ नहीं पड़ रहा है कि पेट्रोल का 20 फीसदी आयात घटाने के लिए सरकार किस-किस तरह के नुकसान झेल रही है। यह भी खबर है कि राज्य सरकारें चावल के अपने विशाल अतिरिक्त भंडार से औने-पौने दाम पर एथेनॉल निर्माण के लिए चावल दे रही है जिससे अंधाधुंध अनुदान पर खरीदा गया चावल भारी नुकसान पर एथेनॉल बनाने में जा रहा है। किसको घाटा हो रहा है, किसको मुनाफा हो रहा है, यह कुछ भी साफ नहीं है। इतना जरूर है कि जनता का विश्वास सरकार पर से कमजोर हो गया है, और एथेनॉल के सेल्समैन की तरह जनता के सामने खलनायक बने हुए नितिन गडकरी अपनी दशकों की कमाई हुई लोकप्रियता को महीनों में खो बैठे हैं। 

इस पूरे मामले से जुड़े हुए सारे आंकड़ों का विश्लेषण हमारी साधारण समझ से ऊपर की बात है। लेकिन क्या आयात में 20 फीसदी की कमी करना सचमुच इतने किस्म के नुकसान के लायक है? क्या जनता का भरोसा खो देने के लायक है? क्या एथेनॉल निर्माण के लिए एक बार बन चुके ढांचे की लागत की विकरालता इतनी विशाल है कि सरकार अपना फैसला बदल न पाए, ऐसी बहुत सारी बातें हैं जिनके जवाब हमारे पास नहीं हैं, लेकिन जनता के मन में ये सवालों की शक्ल में खड़े हुए हैं, जब-जब लोगों को पेट्रोल पंप की शक्ल देखनी पड़ती है, उन्हें नितिन गडकरी की शक्ल भी दिमाग में घूम जाती है, चाहे वे पेट्रोलियम मंत्री न हों। अब तक पेट्रोल पंपों पर जो नाराजगी रहती थी, वह तो दो-चार दिनों में, या हफ्ते में एक बार रहती थी, लेकिन अब दिन में चार-छह बार चाय की हर प्याली के साथ लोगों के मन में यह टीस उठती रहेगी कि उनकी चाय एथेनॉल की वजह से कड़वी है। 

सरकार के अपने हित में यह है कि एकदम पारदर्शी तरीके से, लोगों को समझ आए ऐसी भाषा में इस पूरी अर्थव्यवस्था को समझाए, और जनता के सामने अपने फैसलों को न्यायोचित साबित करे। हम तो देश की जनता, और सरकार दोनों के शुभचिंतक की हैसियत से यह पारदर्शिता सुझा रहे हैं। जनता के इतने बड़े तबके, तकरीबन सौ फीसदी जनता के मन में स्थाई संदेह, और स्थाई आक्रोश लोकतंत्र में किसी भी सत्ता के लिए अच्छी बात तो रहती नहीं है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अगस्त 2026



 

बड़े तिलचट्टों के बाद अब छोटे तिलचट्टे, इनसे जूझना सरकारों के लिए और मुश्किल

 20 अगस्त 2026  

 

राजस्थान के बाद उत्तरप्रदेश सरकार ने आदेश निकाल दिया है कि बाहरी लोग स्कूल पहुंचकर कोई वीडियो नहीं बना सकेंगे। सरकारों के अपने तर्क रहते हैं, चूंकि सरकारी स्कूल सरकार की अपनी सम्पत्ति रहती है, इसलिए वहां बाहर के लोगों के आने, या वीडियो बनाने पर रोक लगाने का अधिकार तो उसे है, लेकिन पहली बार ऐसी नौबत क्यों आ रही है? आज राजस्थान में जाने कितने ही जिलों के दर्जनों या सैकड़ों गांवों के स्कूलों के छात्र-छात्राओं के आंदोलन सडक़ों पर उतर आए हैं। बात सिर्फ राजस्थान की नहीं है, उत्तर भारत और हिन्दी प्रदेशों में जगह-जगह यह हाल है। हम भी अपने अखबार में, और अपने यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर लगातार इस बारे में सच सामने रखते रहते हैं, जो कि खासा असुविधा का रहता है। एकाएक जिस तरह देश भर में सरकारी स्कूलों के बच्चों के भीतर अपने बुनियादी हक के लिए एक जागरूकता आ गई है, उन्हें सडक़ों पर निकलना जरूरी लग रहा है, वे कई जगहों पर कलेक्टरों को बुलाने पर आमादा हुए जा रहे हैं, और जंतर-मंतर से सहमा हुआ यह देश, खासकर सहमी हुई सरकारें बच्चों की बातें सुन भी रही हैं। जंतर-मंतर पर जेन-जी कही जाने वाली 1995 के बाद की पैदाइश आंदोलन कर रही थी, लेकिन अभी तो शायद 2010 के बाद की पैदाइश स्कूली पोशाक में ही आंदोलन कर रही है। इस एकदम ताजा, गैरमतदाता पीढ़ी के आंदोलन से सरकारें ऐसी सहमी हैं कि स्कूलों की बदहाली पर वीडियो बनाना कुछ दिनों में राजद्रोह करार दे दिया जाए, तो भी हैरानी नहीं होनी चाहिए। 

स्कूल तो सरकारों के हैं, उनकी हालत को लेकर ऐसी बदहवासी की नौबत क्यों आनी चाहिए? कोई अमरीकी राष्ट्रपति, या ब्रिटिश प्रधानमंत्री तो आ नहीं रहे कि कलकत्ता शहर से सारे फुटपाथजीवियों, और भिखारियों को बाहर कर दिया जाए, या अहमदाबाद की सडक़ किनारे की झुग्गीबस्तियों के सामने दीवार खड़ी कर दी जाए। यह तो गांव-गांव तक बिखरी हुई सरकार की अपनी स्कूलें हैं, उनमें देश के ही बच्चे पढ़ रहे हैं, देश के ही कॉकरोच वहां जाकर कुछ वीडियो बना रहे हैं, जिनमें उस बदहाली को दिखा रहे हैं जो सरकार को पहले से न सिर्फ मालूम होनी चाहिए थी, बल्कि जो होनी भी नहीं चाहिए थी। वे कोई रहस्य की बात तो बता नहीं रहे हैं। वैसे भी देश में कई जगहों से स्कूलों का यह हाल सामने आते ही रहता है कि वहां बैठकर मास्टर शराब पी रहे हैं, नशे में धुत्त फर्श पर पड़े हुए हैं, छत गिर रही है, पानी टपक रहा है, और घुटनों तक पानी में बच्चे आजादी का झंडा फहरा रहे हैं। अब ऐसे वीडियो पर तो सरकार को प्रोत्साहन देना चाहिए कि उसे जमीनी हकीकत की खबर लग रही है, ऐसे में सरकारी हुक्म निकालकर बाहरी लोगों के स्कूल जाने, और वीडियो बनाने पर रोक ऐसे लगाई जा रही है मानो वे इसरो में घुसकर किसी अंतरिक्ष रहस्य को चुरा रहे हैं। हकीकत जब इस हद तक छुपाने लायक हो जाए, तो पारदर्शिता, और जनभागीदारी के खिलाफ इस तरह के आदेश निकालना सरकार की अपनी नाकामयाबी पर पर्दा डालने के अलावा कुछ नहीं है।

भारत के सरकारी स्कूलों में कमियों और खामियों की लंबी फेहरिस्त है। और ये दोनों बातें मिलकर गरीबों की नई पीढ़ी को नाकाबिल बनाने का काम कर रही हैं। आज अधिकतर सरकारी स्कूलों में सिर्फ गरीबों के ही बच्चे पढ़ रहे हैं। सत्ता-विपक्ष, किसी भी तरह के और ओहदे, संपन्न और उच्च-मध्यम वर्ग के परिवार, और अब तो मध्यम वर्ग के भी परिवार अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेज रहे हैं। जिस तबके पर सरकार चलाने, सरकारी व्यवस्था बनाने, और बदइंतजामी को सुधारने का जिम्मा है, उनके कोई बच्चे इन गरीब स्कूलों में नहीं पढ़ते जहां पहुंचने वाले बच्चों को नदी-नाले पार करके आना पड़ता है, टपकती और गिरती हुई छत के नीचे गीली फर्श पर बैठना पड़ता है, पांच-पांच क्लासों के बच्चों को एक कमरे में पढऩा पड़ता है, कई विषयों के शिक्षक न होने पर बच्चों को सडक़ों पर उतरना पड़ता है। यह सब इसलिए है कि देश में किसी ताकतवर तबके के कोई बच्चे गरीब सरकारी स्कूल में शायद ही जाते हैं। कई बरस पहले का इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज का एक फैसला हमें याद पड़ता है जिसमें उन्होंने नेताओं, और अफसरों के बच्चों को अनिवार्य रूप से सरकारी स्कूल में भेजने की बात कही थी। हमने कानूनी आधार पर उस वक्त लिखा था कि यह आदेश कमजोर है, और किसी भी तबके पर अनिवार्य रूप से लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन हम इस बात के हिमायती थे कि सरकारी स्कूलों में अगर तमाम नेताओं, और अफसरों के बच्चे पढ़ेंगे, तो शायद उनमें कुछ सुधार आ सकेगा। किसी भी दफ्तर में अगर बड़े अफसरों के शौचालय अगर रहते हैं, और छोटे कर्मचारियों के अलग रहते हैं, तो यह गारंटी हो जाती है कि छोटे कर्मचारियों के शौचालय गंदे रहेंगे। जब वे एक साथ रहते हैं, तो खींचतान कर, मजबूरी में ही सही, शौचालयों को साफ-सुथरा रखा जाता है। 

आज जिन लोगों को सत्ता या अदालत पर बैठकर फैसले लेने पड़ते हैं, उन्हें अपने घर के बच्चों से पता ही नहीं चलता कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर क्या है। धीरे-धीरे ये स्कूल गरीब, कम पढ़े हुए, दलित, आदिवासी, और दूर-दूर गांवों में बसे हुए कमजोर तबकों के बच्चों के लिए ही रह गए हैं। इन बच्चों की भी अधिक आवाज नहीं रहती, इनकी माँ-बाप की तो बिल्कुल भी नहीं रहती। लेकिन अब भारतीय लोकतंत्र में कॉकरोच-युग आने से एक नई युगचेतना स्कूली बच्चों तक पहुंची है, और वे भी एकजुट होकर अपनी दिक्कतों के नारे लगाने लगे हैं। हमारा मानना है कि सरकारें अपने खुद के भले के लिए स्कूल सुधारो अभियान में जुट जाएं, वरना टूटी छतों से कॉकरोच टपकने लगेंगे, टूटी फर्श से तिलचट्टे निकलने लगेंगे, और नारे लगने लगेंगे। सरकारी आदेश स्कूलों के भीतर जाकर वीडियो बनाने से ही तो रोक सकते हैं, जब स्कूलों के बाहर सडक़ों पर, और जिला प्रशासन के दफ्तरों में बच्चों के प्रदर्शन होने लगेंगे, आज हो ही रहे हैं, तो सरकारें कितने कैमरे रोक लेंगी? 

सरकार को कैमरों के बजाय यह परवाह करना चाहिए कि टैक्स के पैसों से बने हुए स्कूल भवन ऐसे खंडहर क्यों हुए जा रहे हैं, फर्नीचर पहुंचते ही क्यों टूटने लगे हैं, पढ़ाई का स्तर इतना खराब क्यों है, और बिजली, इंटरनेट, कम्प्यूटर बंद क्यों हैं? क्यों सुप्रीम कोर्ट को देश भर के प्रदेशों को झिडक़ना पड़ रहा है कि हर स्कूल में अलग से छात्रा-शौचालय बनाया जाए? क्या सत्ता हांकने वाले तबके के घरों में स्कूल जाने वाली बच्चियां नहीं हैं? क्या उनके किशोरावस्था में पहुंचने पर उनकी माहवारी शुरू नहीं होती? क्या उन्हें स्कूलों में पैड, पानी, शौचालय, और डस्टबीन की जरूरत नहीं पड़ती? क्या स्कूलों में जैसा दोपहर का खाना मिल रहा है, सत्ता की संतानें क्या दो दिन भी वैसा खाना खा सकती हैं? ऐसे बहुत सारे असुविधा के सवाल हैं, और कॉकरोचों का क्या है, वे तो न सरकारी नोटिस पढ़ सकेंगे, न ही कोई गेट उन्हें रोक सकेेंगे, वे तो कहीं से भी सरककर भीतर पहुंच जाएंगे, और नारे लगाने लगेंगे? पश्चिम बंगाल में एक व्यक्ति ने अभी अपने मोहल्ले या गांव की स्कूल की बदहाली को सुधारने की बात कही, तो उसे कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। अब अगर ऐसी हिंसा का बाकी देश में हिंसक जवाब देना शुरू हो जाएगा, तो उस बदहाली पर सरकारों को जवाब देना मुश्किल पडऩे लगेगा। 

सरकारों को यह समझना चाहिए कि आज स्कूलों को सुधारने के लिए जो माहौल देश भर में बन रहा है, उसकी प्रतिबंध लगाने वाली आम सरकारी प्रतिक्रिया आत्मघाती होगी। देश भर में करोड़ों गरीब बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, और आज नहीं तो कल ये वोटर भी रहेंगे। इन बच्चों को जब तक गैरस्कूली बातों से बहलाना चलते रहा, तब तक तो सब कुछ खप गया। लेकिन अब बच्चों को समझ आ रहा है कि पढ़ाई का कोई दूसरा अंधविश्वासी विकल्प नहीं हो सकता, और वे पढऩे का अपना हक मांग रहे हैं। इस वक्त जिम्मेदारी से मुंह चुराने का कोई विकल्प सरकारों के सामने नहीं है। दूसरों पर प्रतिबंध लगाकर खुद नहीं बचा जा सकता, समय रहते सरकारें समझ लें, तो बेहतर होगा।

हमने अपनी बात लिखकर खत्म की ही थी कि छत्तीसगढ़ की कुछ जगहों से नई खबरें आ रही हैं कि कहां स्कूल की बदहाली को लेकर, तो कहां स्कूल के सामने सडक़ों की बदहाली को लेकर बच्चे आंदोलन पर बैठे हैं। सोशल मीडिया को देखें तो सैकड़ों अलग-अलग जगहों के असल वीडियो जमीनी बदहाली का नजारा दिखा रहे हैं। मुफ्त में मिले हुए इस फीडबैक की अनदेखी किसी भी सरकार को भारी पड़ सकती है, आज नहीं तो कल यह पीढ़ी भी वोटर बनेगी।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दुर्लभ किताबों को चारा बना देने वाली एआई कंपनियां क्या कर रही हैं एक जुर्म?

19 अगस्त 2026  

 

पिछले कुछ महीनों से दुनिया में पुरानी ऐतिहासिक किताबों को चाहने वाले लोगों की छाती पर उस वक्त लात पड़ी जब पता लगा कि एआई कंपनियां अपने कम्प्यूटरों का ज्ञान बढ़ाने के लिए दुर्लभ किताबों को खरीद रही हैं, उन्हें काटकर पन्ने अलग कर रही हैं, फिर उन्हें स्कैन करके अपनी मशीनों की ट्रेनिंग में इस्तेमाल कर रही हैं। यह नौबत अंतरराष्ट्रीय बाजार से दुर्लभ किताबों को रफ्तार से खत्म कर रही है क्योंकि एआई कंपनियां खुद यह जहमत उठाने के बजाय कई एजेंट कंपनियों को तैनात करके इस काम को तेजी से कर रही हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि इंटरनेट पर पहले से मौजूद सारा ज्ञान एआई कंपनियां अपनी मशीनों के दिमाग में पहले ही भर चुकी हैं। अब इंटरनेट पर जो सामग्री आ रही है उसके साथ एक बहुत बड़ा खतरा यह है कि उसमें से बहुत सारी तो अलग-अलग एआई कंपनियों, और मशीनों की ही बनाई हुई है। फिर एक खतरा यह भी है कि आज एआई जितनी जानकारी उगलता है, उसमें से बहुत सारी तो गलत भी निकल जाती है, और कई जानकारियां तो एआई अपनी कल्पना से गढक़र पूरी तरह झूठी दे देता है, जिसे वह पूरी तरह सच्ची दिखने वाली भी बना देता है। आज एआई का हमारी तरह के जो लोग भरपूर इस्तेमाल करते हैं, वे जानते हैं कि एआई के साथ अगर सावधान न रहा जाए, तो वह एक पूरी की पूरी कहानी गढक़र उसमें तारीखें, जगहें, नाम सब भरकर एक भरोसेमंद दस्तावेज की तरह पल भर में पेश कर देता है। इसलिए आज एआई कंपनियां मौजूदा इंटरनेट को अपनी ट्रेनिंग के लिए सावधानी के साथ और एक सीमा तक ही इस्तेमाल कर रही हैं। फिर यह भी है कि आज हासिल ज्ञान से ऊपर अगर जाना है, अगर उससे परे की चीजें अपनी मशीनों को बतानी है, तो इसके लिए इंटरनेट से परे के दुर्लभ ज्ञान तक जाना जरूरी रहेगा, और इसीलिए बड़ी कंपनियां, बड़ी रफ्तार से, बड़ी संख्या में दुर्लभ किताबें अपनी मशीनों में चारे की तरह डाल रही हैं। 

अब दुनिया में ऐतिहासिक, संग्रहणीय, और दुर्लभ चीजों के महत्व को जानने वाले लोग सदमे में हैं कि सिर्फ एक आधुनिक तकनीक को और अधिक ज्ञान-संपन्न बनाने के लिए क्या इतिहास को इस बेरहमी से मिटाया जा सकता है? क्या इसके खिलाफ दुनिया में कोई कानून नहीं है? क्या विश्व विरासत की फिक्र करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी एआई कंपनियों के इस बाजारू हमले को रोकने की फिक्र नहीं हो रही है? ऐसे कई सवाल हमारे दिमाग में भी उठते हैं। अभी विश्वकप फुटबॉल के बाद नार्वे के एक स्टार खिलाड़ी ने उसे मिले हुए दर्जनों करोड़ रूपयों में से एक बड़ी दुर्लभ किताब खरीदी, और अपने शहर या कस्बे की लाइब्रेरी को तोहफे में दे दी। एक फुटबॉल खिलाड़ी से किताब के प्रति ऐसी संवेदनशीलता कई लोगों को अनोखी लग सकती है, लेकिन एरलिंग हालांड ने 1594 में छपी किताब को करीब सवा करोड़ रूपए में खरीदकर अपने बचपन की सार्वजनिक लाइब्रेरी को उपहार में दिया। इसके साथ-साथ उसने सैकड़ों बच्चों के लिए लाइब्रेरी की फीस भी भरी। अब सवाल यह उठता है कि अगर एआई कंपनियां इस किताब को पहले खरीद लेतीं, तो वे इसके पन्ने फाडक़र, स्कैन करके अपनी मशीनों के दिमाग में तो डाल देतीं, लेकिन यह किताब फिर खत्म हो जाती। 

अब हम किसी एआई कंपनी की वकील की तरह भी थोड़ी सी देर के लिए सोचना चाहते हैं, क्योंकि दूसरा नजरिया भी तो समझ में आए। आज दुनिया में जहां कहीं भी दुर्लभ किताबें हैं, वे आम लोगों की पहुंच से मोटेतौर पर बाहर हैं। वे किसी बहुत रईस, गैररईस के निजी संग्रह में हैं, या किसी किताब दुकान में दबी हुई हैं, या किसी लाइब्रेरी की आलमारी में बंद हैं। आम लोगों की पहुंच दुर्लभ किताबों तक बहुत कम रहती है, इतना जरूर है कि यूनेस्को के एक प्रोजेक्ट के तहत ऐसी लाखों-करोड़ों दुर्लभ किताबों की पीडीएफ कॉपी इंटरनेट पर मुफ्त उपलब्ध है। अब अगर एआई कंपनियां इन किताबों की जानकारी को अपने कम्प्यूटरों में भरकर, उन्हें मुहैया कराएंगी, उनके आधार पर अपनी जानकारी और विश्लेषण में संपन्नता लाएंगी, तो क्या इससे दुनिया के ज्ञान का कुछ भला भी हो सकेगा? आज एंथ्रोपिक नाम की एआई कंपनी ने लाखों किताबें खरीदकर अपने कम्प्यूटरों पर भर डालीं, और उन्हें खत्म कर दिया। वे किताबें लोगों को आसानी से हासिल नहीं थीं, लेकिन अब इस एआई कंपनी से पूछने पर इन किताबों की जानकारी मिल सकती है। यह सोचना एक शैतान के वकील की तरह का है, लेकिन फिर भी हम विचार-विमर्श के लिए यह सोचना चाहते हैं। 

आज दुनिया में बहुत पुरानी किताबें ऐसी भी हैं जो कि दुबारा प्रकाशित नहीं हो रही हैं, क्योंकि उनके ग्राहक अधिक नहीं होंगे। ऐसी किताबें दुबारा दुनिया के सामने आने का और कोई जरिया नहीं है। यूनेस्को के जिस प्रोजेक्ट की हमने बात की है, वह एक जरिया जरूर है, लेकिन उससे परे की भी कई चीजें हो सकती हैं। अभी-अभी भारत में केन्द्र सरकार के कहे हुए देश के हर जिले में पुरानी पांडुलिपियों को डिजिटल करके उनकी कॉपी संभालकर रखी जा रही है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण, और अलग तरह का प्रोजेक्ट है। यह अभी तक बाजार व्यवस्था से परे का है, लेकिन क्या ऐसी जानकारी भी किसी एआई कंपनी को बेची जा सकती है, या सार्वजनिक, और सामाजिक उपयोग के लिए यूनेस्को को दी जा सकती है? फिर सवाल यह भी उठता है कि यूनेस्को ने सार्वजनिक उपयोग के लिए जो जानकारी सामने रखी है, वह तो एआई कंपनियों को वैसे भी हासिल थी। वे तो ऐसी ही किताबें खरीद रही होंगी जो कि यूनेस्को की वेबसाइट पर नहीं होंगी। 

अब बाजारू के अलावा एक दूसरा नैतिक सवाल उठ खड़ा होता है कि किसी दुर्लभ किताब की जानकारी पर एकाधिकार पाने वाली एआई कंपनी अपने कम्प्यूटरों में इस ज्ञान को किस तरफ मोडक़र कैसा इस्तेमाल करे, यह तो वह तय कर सकती है। हो सकता है कि गोरी सोच रखने वाली ऐसी कोई कंपनी काले गुलाम लोगों के इतिहास की किसी दुर्लभ किताब को कॉपी करने के बाद, नष्ट करने के बाद उसे अपने कम्प्यूटरों की याददाश्त में ताला डालकर रख दे। बाजार कुछ भी कर सकता है, व्यापार, और नैतिकता ये दोनों कभी भी एक सिक्के के दो पहलू नहीं हो सकते। ऐसे में किसी दुर्लभ ज्ञान पर बाजारू कंपनी के एकाधिकार, और फिर उसे नष्ट कर देने के खतरे धरती के इतिहास के एक हिस्से को हमेशा के लिए खत्म कर देने से कम खतरनाक, और कम नुकसानदेह नहीं है। इसलिए इस पूरे मुद्दे पर लोगों को बारीकी से सोचना चाहिए कि दुनिया के इतिहास के एक हिस्से को बाजार के एकाधिकार के हवाले करना कितना जायज है, कितना नाजायज है। हम इस खुली बहस को छेडक़र लोगों से सोचने की उम्मीद करते हैं।

(Daily Chhattisgarh)