म्युनिसिपल-पंचायत चुनावों से ईमानदारी शुरू होने की संभावना

13 दिसंबर 2014
संपादकीय

छत्तीसगढ़ में आज म्युनिसिपल चुनावों के लिए कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवारों की फेहरिस्तें आनी शुरू हो गई हैं, और कल भाजपा की अमित शाह की सभा से उसका चुनाव प्रचार शुरू हो गया है, और अपनी परंपरा के मुताबिक कांग्रेस ने भी कल राजधानी के कांग्रेस भवन में आधी रात गुटबाजी की मारपीट और गाली-गलौच से चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है। कल ही एक खबर यह थी कि भाजपा की एक बैठक में इस बात पर फिक्र जाहिर की गई कि पिछले 11 बरस में भाजपा ने प्रदेश में हर चुनाव में जीत तो हासिल की है, लेकिन उसके वोटों का प्रतिशत गिरा है, और कांग्रेस से वोटों का उसका फासला पिछले विधानसभा चुनाव में कुल पौन फीसदी बच गया था। अब म्युनिसिपल के चुनाव वार्ड स्तर पर होते हैं, और वहां पर पांच-दस वोटों से भी जीत-हार दर्ज होती है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी में अगर समझदारी होगी, और वह इसका इस्तेमाल करने की हालत में होगी, तो विधानसभा का पौन फीसदी का फासला पलट भी सकता है। लेकिन जिस तरह कहा जाता है कि उम्मीद पर दुनिया जिंदा रहती है, उसी तरह भाजपा भी कांग्रेस की घरेलू आग की उम्मीद में अपने ठंडे हाथ लिए बैठी है कि सेंकने का मौका आएगा ही आएगा। 
लेकिन आज म्युनिसिपल चुनावों पर लिखने का हमारा मकसद कांग्रेस पार्टी की फिक्र करना, या भाजपा को चौकन्ना करना नहीं है। हम आज से प्रदेश के हर शहरी मतदाता का सोचना शुरू करना चाहते हैं कि वे अपने वार्ड में किस तरह के जनप्रतिनिधि चाहते हैं। शहरी मतदाताओं को जो सबसे छोटे नेता चुनने होते हैं, वे पार्षद रहते हैं, और एक ही चुनाव में ऐसे मतदाताओं को महापौर या पालिका अध्यक्ष के लिए भी वोट डालना होता है। म्युनिसिपल के चुनाव अंग्रेजों के समय से लोग देखते आ रहे हैं, और लोगों ने अच्छे और बुरे, भ्रष्ट और ईमानदार, मेहनती और निकम्मे, सभी किस्म के पालिका अध्यक्ष, महापौर, या पार्षद देखे हुए हैं। हमारी सलाह महज इतनी है कि ऐसे लोगों को चुनें, जो कि भ्रष्ट न हों। जिन लोगों ने पिछले बरसों में अपने वार्ड में या अपने म्युनिसिपल में भ्रष्टाचार किया है, या भ्रष्टाचार को बचाया है, बढ़ावा दिया है, या किसी दूसरी सार्वजनिक संस्था या कुर्सी पर रहते हुए जिन लोगों ने भ्रष्टाचार किया है, उनको या उनके घरवालों के वोट न देकर शहरी मतदाता सार्वजनिक जीवन से, और स्थानीय शासन से गंदगी दूर कर सकते हैं। हमारा ऐसा मानना है कि म्युनिसिपल चुनाव में ईमानदारी को ही अगर पहला और सबसे बड़ा पैमाना मान लिया जाए, तो भी शायद आने वाले पांच बरस लोग अपने शहर में बेहतर काम होते देख सकते हैं। 
और पार्टियां समझौते करते हुए ऐसे लोगों को भी उम्मीदवार बना देती हैं, जो कि पहले किसी कुर्सी पर रहते हुए भ्रष्टाचार के लिए जाने जाते हैं, ऐसे उम्मीदवारों को हराकर जनता को पार्टियों को भी सबक सिखाना चाहिए। शहरी स्थानीय संस्थाओं में भ्रष्टाचार का मतलब आने वाले पांच बरस तक मुहल्ले का घूरा बन जाना, नलों से गंदा पानी आना, सड़कों का अंधेरा रहना तो होगा ही, इसके अलावा म्युनिसिपल की संपत्ति जिन जमीनों और इमारतों की शक्ल में हैं, वहां पर भी नेता-अफसर-ठेकेदार मिलकर सब लूट खाएंगे। इसलिए इस चुनाव में लोगों को पहला पैमाना ईमानदारी को ही रखना चाहिए। कई भ्रष्ट लोग अधिक सक्रिय दिख सकते हैं, क्योंकि उनके पास सक्रियता का खर्च उठाने के लिए बेईमानी का पैसा रहता है। कई लोग इस बार की उम्मीदवारी से परे की किसी दूसरी कुर्सी से, किसी दूसरी निर्वाचित या मनोनीत जगह से भ्रष्टाचार करके इस बार के चुनाव में उतरे हुए हो सकते हैं, लेकिन जनता को ऐसे लोगों को ठिकाने लगाना चाहिए। 
ईमानदारी सीधे विधानसभा और संसद में संभव नहीं भी हो सकती, क्योंकि ऐसे चुनावों में कई बार सारे प्रमुख उम्मीदवार भ्रष्ट होते हैं। लेकिन वार्ड के चुनाव इतने छोटे होते हैं कि कोई शरीफ, कोई ईमानदार, कोई अच्छी साख वाले लोग भी बिना किसी पार्टी टिकट के, बिना अधिक खर्च किए एक गंभीर चुनौती बन सकते हैं। और हमारा मानना है कि भले लोगों को मुहल्लों के इन चुनावों में जरूर हिस्सा लेना चाहिए, उनके जीतने की संभावना भी उनकी साख की वजह से हो सकती है, या कम से कम वे दुष्ट और भ्रष्ट लोगों की अक्ल ठिकाने ला सकते हैं। लोकतंत्र में म्युनिसिपल और पंचायत के चुनाव सबसे छोटे होते हैं, और यहीं से ईमानदारी खड़ी होने की गुंजाइश रहती है। लोगों को अपने आसपास इस मुद्दे पर चर्चा करके अपने मोहल्ले के उम्मीदवारों में से सबसे बेहतर को छांटना चाहिए, और तुरंत यह कोशिश भी करनी चाहिए कि अपने वार्ड से किसी बहुत अच्छे और ईमानदार का हौसला बढ़ाकर इस चुनाव में खड़ा भी करवाना चाहिए।

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