21 दिसंबर 2014
संपादकीय
देश भर में चारों तरफ जिस तरह की हिंसा की खबरें आ रही हैं, महिलाओं से, और छोटी बच्चियों से जिस तरह बलात्कार हो रहा है, जिस तरह सत्ता की ताकत में मदमस्त नेता अपनी पार्टी के राज में सरकारी अफसरों को धमका रहे हैं, गालियां दे रहे हैं, पीट रहे हैं, जिस तरह प्रेम में निराश होकर लोग आत्महत्या कर रहे हैं, सामाजिक मंजूरी न मिलने पर प्रेमी जोड़े ट्रेन तले कट जा रहे हैं, पंचायतों से बलात्कार के हुक्म जारी हो रहे हैं, धर्मान्धता और धर्मांतरण के नारे उठ रहे हैं, देश में रहने वाले हर नागरिक को हिन्दू बनाने की घोषणा हो रही है, सरकार की कुर्सियों पर बैठे लोग भ्रष्टाचार करते पकड़ा रहे हैं, ऐसी हर किस्म की खबरों को पढऩे के बाद उनके बारे में सोचें, तो यही लगता है कि इस देश में लोकतंत्र बड़ी दूर तक नाकामयाब हो गया है, और इसके तीनों स्तंभ अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा पा रहे हैं। सरकारें पकड़ में आने के पहले तक के दर्जे के भ्रष्टाचार में डूबी हैं, चुनावों में जीत को खरीदकर लोग संसद और विधानसभा पहुंच रहे हैं, कई जगहों पर जीते हुए सांसदों और विधायकों को खरीदकर सरकारें बन या बच रही हैं, और ऐसे में अदालतों के हाथ-पैर बांधकर रखे गए हैं ताकि वे सत्ता के जुर्म का तेजी से निपटारा न कर सकें। इसके साथ-साथ यह भी है कि अदालतें अपने आपमें भ्रष्टाचार का हिस्सा हो गई हैं, और बहुत सी अदालतों पर अधिकतर लोगों का कोई भरोसा नहीं है। लोकतंत्र में चौथा स्तंभ कहा जाने वाला, या होने का दावा करने वाला मीडिया भी जनता के सर्वे में सबसे भ्रष्ट पेशों में गिना जाने लगा है, और एक बड़े संपादक विनोद मेहता ने हाल ही में अपनी किताब में लिखा है कि मीडिया से देश की जनता का आदर्श का मोह किस तरह भंग हो गया है।
हमारा यह सोचना है कि लोकतंत्र में एक जुर्म दूसरे कई किस्म के जुर्मों को बढ़ावा देता है और ऐसे दो मामलों के बीच जरूरी नहीं है कि कोई रिश्ता दिखाई भी पड़े। जब छत्तीसगढ़ में किसी महिला को टोनही कहकर उसकी हत्या की जाती है, तो इससे उन मुजरिमों को भी बढ़ावा मिल सकता है जो कि किसी और महिला की दहेज प्रताडऩा करते हैं, या किसी और बच्ची के साथ बलात्कार करते हैं। जुर्म के लिए धड़क खुलना बड़ी बात होती है, और जब एक जुर्म बिना सजा रह जाता है, तो तमाम किस्म के दूसरे जुर्म के लिए लोगों का हौसला बढ़ता है। फिर जब देश में ऊंचे ओहदों पर बैठे हुए लोग मुजरिम साबित होते हैं, अदालत के रास्ते जेल पहुंचते हैं, या इन सबसे बचकर भी लोगों की नजरों में गिर जाते हैं, तो फिर लोगों के लिए कोई प्रेरणा नहीं बच जाती। लोगों को एक किस्म से यह नैतिक इजाजत मिल जाती है कि जब बड़े-बड़े लोग बड़े-बड़े गलत काम करते हैं, तो फिर छोटे-छोटे लोग छोटे-छोटे गलत काम क्यों नहीं कर सकते?
और जब तरह-तरह के मुजरिम चुनाव जीतकर सत्ता में आ जाते हैं, और पुलिस के हाथ हथकडिय़ों के बजाय वे उन हाथों से सलामी पाने लगते हैं, तो फिर देश में नैतिकता के पैमाने और अच्छे चाल-चलन की प्रेरणा, इन दोनों का मटियामेट हो जाना तय रहता है, और भारत में वही हो रहा है। बड़े-बड़े ओहदे वाले लोग जब वीडियो कैमरों पर अफसरों को मां-बहन की गालियां देते कैद होते हैं, तो सार्वजनिक जीवन से शिष्टाचार और अच्छे चाल-चलन की संभावना घटने लगती हैं। भारत की आज की संस्कृति में सत्ता की मंजूरी से गहरे तक पैठ गई इन बातों का रातों-रात कोई इलाज भी नहीं हो सकता, लेकिन यह देश ऐसे माहौल में गड्ढे की तरफ बढ़ रहा है। कोई नासमझ लोग देश की आर्थिक तरक्की के आंकड़े गिनाकर यह साबित कर सकते हैं कि वह ऊपर जा रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि अगर कोई मामूली बेहतरी हुई भी है, तो वह देश की तरक्की की संभावनाओं के मुकाबले कहीं नहीं टिकती। यह देश बड़ी हिंसा की आदत वाला हो चुका है, और अब विचारों की हिंसा, सत्ता की बददिमागी की हिंसा, सरकारी ताकत की हिंसा, इन सबको लगातार बढ़ते देखना बहुत भयानक है। और इन तमाम बातों को जोड़कर एक खतरनाक तस्वीर सामने रखने की कोशिश भी नहीं हो रही है, क्योंकि ऐसी हिंसाओं के शिकार लोग महज अपने-अपने तबकों को बचाने की कोशिश करते हुए, बाकी के हक महत्वहीन मान लेते हैं।

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