झारखंड और जम्मू-कश्मीर के चुनावी नतीजों के मायने

23 दिसंबर 2014
संपादकीय
आज सुबह से हिंदुस्तान झारखंड और जम्मू-कश्मीर के चुनावी नतीजे देख रहा है। इन दोनों ही जगहों पर कांगे्रस या उसकी भागीदार पार्टियों के जीतने के आसार छोड़कर बाकी कुछ भी होने की उम्मीद थी, और वैसा ही हो भी रहा है। झारखंड में भाजपा के जिस तरह के बहुमत की भविष्यवाणी की जा रही थी, वह उससे कुछ पीछे जरूर है, लेकिन वह सत्ता के करीब है, और ऐसे आसार दिख रहे हैं कि वहां वह अपनी खुद की, या किसी गठबंधन से एक स्थाई सरकार बना पाएगी। यह बात इस नए राज्य के लिए इसलिए भी मायने रखेगी कि इसने चौदह बरसों की अपनी जिंदगी में नौ मुख्यमंत्री, और दो बार का राष्ट्रपति शासन सब देख लिया है। अल्पमत की सरकार देखी है, और मुख्यमंत्री को जेल में देख लिया है। ऐसे में मतदाताओं के फैसले से अगर एक मजबूत सरकार वहां बनती है, तो यह बात कम महत्वपूर्ण है कि वह किस पार्टी या गठबंधन की बनती है। दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर में भी नौबत यही है कि वहां किस पार्टी की सरकार बनती है, या कौन सा गठबंधन सत्ता पर आता है, उसके बजाय महत्वपूर्ण यह है कि वहां एक मजबूत सरकार बने, जो अच्छी तरह काम करे। 
आज दोपहर इस संपादकीय को लिखे जाते कश्मीर में जो नौबत दिख रही है, वह कुनबापरस्ती पर टिकी पार्टियों की वापिसी की है। भाजपा को छोड़ दें, तो कश्मीर में पीडीपी, नेशनल कांफे्रंस, और कांगे्रस, ये तीनों पार्टियां एक कुनबे वाली पार्टियां हैं, और वहां की अगली सरकार में इनमें से कोई न कोई शामिल रहना तय है। इसलिए जम्मू-कश्मीर की राजनीति से कुनबापरस्ती इस चुनाव में भी खत्म नहीं हुई है, और दमखम के साथ डटी हुई है। लेकिन जम्मू-कश्मीर में सबसे बड़ी बात भाजपा की बहुत दमदार जीत है, जो बहुमत से दूर है, लेकिन पहली बार इस विधानसभा में वह इतनी ताकत के साथ पहुंच रही है। दूसरी तरफ झारखंड में भी झारखंड मुक्तिमोर्चा एक कुनबे वाली पार्टी के रूप में चुनाव लड़ रही थीं, और जेल काट रहे भूतपूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने भी अपनी पत्नी के साथ मिलकर एक पार्टी बना ली थी। कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला दो सीटों से लड़े थे, दोनों पर हार गए, वहां पर घाटी में भाजपा का चेहरा कही जाने वाली बड़बोली नेता हीना भट के वोटों की गिनती हजार तक भी नहीं पहुंच पाई, और वे तीसरे नंबर पर रहीं। झारखंड में भ्रष्टाचार के मामले में जेल काट रहे भूतपूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा चुनाव हार गए, और भूतपूर्व मुख्यमंत्री, और संभावित भावी मुख्यमंत्री समझे जा रहे अर्जुन मुंडा सहित कुछ बड़े नामों के हार के आसार दिख रहे हैं। 
कांगे्रस और भाजपा के बीच यह जुबानी जंग चल रही है कि पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले भाजपा को इस बार कितने विधानसभा क्षेत्रों में लीड मिली है, और उसके वोट कम या ज्यादा क्या हुए हैं? लेकिन विवादों से परे जो बात है वह यह है कि इन दोनों जगहों पर भाजपा बड़ी पार्टी की तरह उभरी है, झारखंड में वह सत्ता तक पहुंच गई है, और कश्मीर में भी वह या तो किंगमेकर रहेगी, या विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी रहेगी। देश के अकेले मुस्लिम बहुसंख्यक राज्य में भाजपा की ऐसी घुसपैठ मामूली नहीं समझी जानी चाहिए, और कम से कम देश भर में भाजपा के मुकाबले पार्टी के रूप में जो सबसे अधिक राज्यों में मौजूदगी वाली पार्टी है, उस कांगे्रस के लिए तसल्ली की कहीं कोई बात नहीं है। ये वोट भाजपा के बढ़ते हुए दबदबे और कब्जे की एक निरंतरता है, और चाहे उसकी सरकार कश्मीर में न बन सके, कश्मीर विधानसभा में उसकी मौजूदगी दमदार रहेगी, और हो सकता है कि कल तक वह वहां की सत्ता में भागीदार भी हो।
इन दो राज्यों के चुनावी नतीजे देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की राजनीति और रणनीति की निरंतरता वाले हैं, और इनके खिलाफ जिन लोगों को राजनीति में कोई महत्वाकांक्षा है, उनको अगले दो-तीन दिन टीवी पर मनचाहे बयान देने के बाद, घर बैठकर आत्मचिंतन करना चाहिए, उसके बिना उनका कोई भविष्य खुद होकर आकर दरवाजा नहीं खटखटाएगा।

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