संपादकीय
1 दिसंबर 2014
छत्तीसगढ़ में आज से सरकारी धान खरीदी शुरू हो रही है। पिछले बरसों में राज्य सरकार ने किसानों की उपज का एक-एक दाना खरीदा था, और उस भरोसे के चलते हुए किसान इस बरस भी वही उम्मीद कर रहे थे। हाल ऐसा था कि पड़ोस के ओडिशा से भी जगह-जगह से धान बिकने के लिए छत्तीसगढ़ आ जाता था, और इस राज्य को यूपीए सरकार की तरफ से धान के रिकॉर्ड उत्पादन का पुरस्कार भी मिला था। धान खरीदी के आंकड़े धान की उपज के आंकड़े मान लिए गए थे, और ओडिशा के योगदान से छत्तीसगढ़ को कृषि उत्पादन में बढ़ोत्तरी का पुरस्कार मिल गया था। लेकिन चुनाव में छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भाजपा ने जिस तरह के धान बोनस का वायदा किया था, वह वायदा पूरा करने में केन्द्र सरकार ने हाथ नहीं बंटाया, और राज्य सरकार की अपनी खुद की घाटा उठाने की ताकत चुक गई, और अब सरकार ने सीमित मात्रा में धान खरीदी की नीति घोषित की है। इसके चलते राज्य के किसान जगह-जगह आज धान की बिक्री न करके विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं, और कई जगहों पर उन्होंने धान न बेचना तय किया है।
आने वाले दिनों में नौबत सुधर जाए तो अच्छा है, वरना आज हाल यह है कि सरकार प्रति एकड़ 10 क्विंटल धान ही समर्थन मूल्य पर खरीद रही है, और उस पर ही किसानों को बोनस मिलेगा। इससे परे की उपज उनको खुले बाजार में मंडी के आढ़तियों या बिचौलियों को बेचनी होगी, और बाजार का दाम समर्थन मूल्य से कम भी है, और उस पर सरकारी बोनस का तो सवाल ही नहीं उठता। इस तरह किसान अपनी उपज का एक हिस्सा पांच-छह सौ रूपए प्रति क्विंटल के कम मुनाफे पर बाजार में बेचेगा, और अविभाजित मध्यप्रदेश के समय मंडी में जो हाल रहता था, वह हाल फिर से होने का एक खतरा खड़ा हो गया है।
छत्तीसगढ़ दरअसल सरकारी अनुदान की उस व्यवस्था में भी फंस गया है, जिसमें जनता को राहत देने के लिए या खुश करने के लिए तरह-तरह के फायदे दिए जाते हैं। छत्तीसगढ़ में धान पर नुकसान झेलकर सरकार ने कृषि अर्थव्यवस्था के लिए जो नौबत इन बरसों में ला खड़ी की है, उसे देखते हुए आज धान के किसान कुछ और करने के लायक भी नहीं बचे हैं, और शायद इतना घाटा झेलने के लायक भी नहीं। हमको याद पड़ता है कि जब यह राज्य बना था, तब फसल चक्र परिवर्तन की बात हुई थी और खेतों की उपज में विविधता लाने की बात भी हुई थी। छत्तीसगढ़ में ही कुछ हिस्सों में चने जैसी दूसरी फसलें कामयाबी के साथ ली जा रही हैं, और उनके किसान खासा फायदा कमा रहे हैं, और सरकार पर मोहताज नहीं हैं। अब हम इस जगह पर छत्तीसगढ़ की कृषि अर्थव्यवस्था की बारीकियों पर तो नहीं जा सकेंगे, लेकिन आज धान को लेकर जो नौबत आई है, उसे देखते हुए यह समझने की जरूरत है कि किस तरह धान से परे की दूसरी फसल लेने की जरूरत है, और सरकार को मेहनत करके किसानों के काम में, उनकी फसलों में फर्क लाना पड़ेगा। अगर किसान परंपरागत उपज धान पर ही टिके रहेंगे, तो वे सरकार की रियायत के मोहताज भी रहेंगे। सरकार को तकलीफ उठाकर, दिक्कत झेलकर भी लोगों को दूसरी फसलों की तरफ मोडऩा पड़ेगा, और वह सब्सिडी वाली खरीदी के मुकाबले बहुत अधिक मुश्किल काम भी होगा।
राज्य के दीर्घकालीन हित में यही है कि किसानों को अधिक फायदे वाली दलहन और तिलहन जैसी, और गेहूं या दूसरे किस्म की फसलों की तरफ ले जाया जाए, इसके लिए उन्हें अच्छे बीज, और अच्छी तकनीक भी दी जाए। आज डरे और सहमे किसान धान के अलावा कुछ छूना नहीं चाहते, क्योंकि बाकी बीजों को लेकर उनका भरोसा नहीं है, और राज्य के बीज विकास निगम का रिकॉर्ड नकली या घटिया बीज सप्लाई करने का भी रहा है। राज्य सरकार को धान के इस मोर्चे पर खरीदी से परे भी लंबी मेहनत करने की जरूरत है, और हम इस मुद्दे को आज छू भर रहे हैं, इससे जुड़ी हुई बाकी बातें यहां मुमकिन नहीं हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के लिए उन पर चर्चा करके एक रास्ता निकालना बहुत जरूरी है।

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