16 दिसंबर 2014
संपादकीय
रोज इस वक्त किसी मुद्दे की तलाश रहती है कि किस पर अपनी बात लिखी जाए। लेकिन आज कुछ घंटे पहले ही पाकिस्तान से खबर आने लगी कि वहां पेशावर में एक स्कूल पर तालिबानी आतंकियों ने हमला कर दिया। शुरू में कुछ गोलीबारी की खबर रही, लेकिन फिर यह खबर आने लगी कि गोलियों से मौतों के बाद एक हमलावर ने आत्मघाती धमाका किया, और शायद डेढ़ दर्जन लोग मारे गए हैं। ऐसे आसार हैं कि मौतें बढ़ सकती हैं, और अभी की खबरों के मुताबिक मरने वाले अधिकतर बच्चे हैं।
कल ही ऑस्ट्रेलिया में इस्लाम के नाम पर दहशत फैलाने की एक हथियारबंद हरकत में मजहब से जुड़े रहे एक आतंकी ने दर्जनों लोगों को कब्जे में ले लिया था, और वहां पुलिस ने एक कमांडो कार्रवाई करके उसे मारा, और दो बंधक भी इस दौरान मारे गए। इस्लाम के नाम पर दुनिया के बहुत से देशों में आतंकी हमले हो रहे हैं, और ऐसा करने वाले लोग अलग-अलग देशों के मुस्लिम लोग हैं, जो कि इस्लाम की तरह-तरह की व्याख्या करते अपनी हिंसा को जायज ठहरा रहे हैं। लेकिन ऑस्ट्रेलिया भारत से कुछ दूर है, और पाकिस्तान एकदम लगा हुआ है, और भारत पर पाकिस्तानी मामलों का असर अधिक होता है। इसलिए पाकिस्तान में इतनी बड़ी आतंकी कार्रवाई को लेकर हिंदुस्तान के लिए भी एक बड़ी फिक्र पैदा होती है।
दरअसल अधिकतर धर्मों का हाल यह है कि उनके मन में इंसानियत के लिए, इंसाफ के लिए, या कि लोकतंत्र के लिए किसी किस्म की जगह नहीं है। यह हम हिंदुस्तान में भी मुस्लिमों के बीच, हिंदुओं के बीच, सिखों के बीच, हिंसा पर यकीन रखने वाले लोगों में देखते हैं। धर्म के नाम पर जब आतंकी हमले होते हैं, और लोगों को मारा जाता है, सार्वजनिक जीवन पर बलपूर्वक कब्जा किया जाता है, जबर्दस्ती की जाती है, तो सरकारों के लिए यह आसान भी नहीं होता कि ऐसे मामलों में कोई कड़ी कार्रवाई की जाए। किसी भी धर्म के भीतर के कुछ गिनेचुने लोगों की हिंसा ही सामने आती है, और उस धर्म के बाकी तमाम लोग चुपचाप तब तक घर बैठे रहते हैं, जब तक कि सरकार उस धर्म के आतंकियों और हिंसकों पर कार्रवाई न करे। और जब सरकार कार्रवाई करती है, तो अपने लोगों की हिंसा पर चुप रहकर तमाशा देखने वाले लोग भी उठकर धर्म के नाम पर एकजुट हो जाते हैं। जब स्वर्ण मंदिर में लगातार भिंडरावाले के हत्यारे आतंकी इक_ा हो रहे थे, वहां पर गोला-बारूद इक_ा हो रहा था, तब इस धर्म के अधिकतर लोग चुप रहे। लेकिन जब ऐसे आतंकियों को मारने के लिए फौजी कार्रवाई की गई, तो उसके जवाब में इस धर्म के कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ही मार डाला।
धर्म और लोकतंत्र का मिजाज बिल्कुल अलग-अलग होता है। जिस तरह इंसान के भीतर उसके दिल और दिमाग का तौर-तरीका अलग-अलग होता है, वैसा ही देश और समाज के भीतर भी होता है। लोग धर्म के मामले में तुरंत ही दिल और धार्मिक आस्था पर उतर आते हैं, लेकिन दूसरी तरफ जब लोकतंत्र की फिक्र करनी हो, तो दिमाग की जरूरत पड़ती है, जो कि धार्मिक और उन्मादी भीड़ के पास नहीं होता।
पाकिस्तान में आज जिस तरह का हमला हुआ है, वह बहुत तकलीफदेह है। लेकिन वहां की राजनीतिक ताकतों ने बीती आधी सदी में जिस तरह लोकतंत्र को कमजोर किया है, और जिस तरह फौजी तानाशाही या कि धर्मांधता को बढ़ाया है, जिस तरह धार्मिक आतंक को बढ़ाया है, यह उसी का नतीजा है कि आज वहां के हालात वहां की सरकार के काबू के बाहर हो गए हैं, और आज इतने बेकसूर और मासूम बच्चों की जिंदगी इस तरह से खत्म हुई है।
हम यह भी चाहते हैं कि पाकिस्तान से परे भी बाकी देश इस बात को समझ लें कि धर्मांधता, कट्टरता, साम्प्रदायिकता, को बढ़ावा देना इस कदर खतरनाक होता है कि एक दिन जाकर इस पर काबू करना भी नामुमकिन हो जाता है। खासकर आज पाकिस्तान के पड़ोस में बसे हुए हिंदुस्तान को यह बात समझना चाहिए जहां पर कि लगातार धर्मांधता को बढ़ाने की कोशिश हो रही है। तालिबानों को किसी भी धर्म में खड़ा करना आसान होता है, खत्म करना मुश्किल या नामुमकिन होता है। यह बात ओसामा बिन लादेन से लेकर भिंडरावाले तक जगह-जगह इतिहास में दर्ज है।

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