19 दिसंबर 2014
संपादकीय
राजस्थान के सत्तारूढ़ भाजपा विधायक ने जिले के चिकित्सा अधिकारी के साथ फोन पर अपने एक रिश्तेदार के तबादले को लेकर जिस तरह की गाली-गलौज की, जिस तरह की धमकियां दीं, उसके रिकॉर्डिंग इंटरनेट पर तैर जाने के बाद अब भाजपा शर्मिंदगी झेल रही है, और कहने के लिए इस विधायक ने भी अफसर से माफी मांगी है, लेकिन यह मामला एक सजा के लायक, और कैद के लायक जुर्म का मामला है, माफी का नहीं। और इस अफसर ने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया है, साथ ही पुलिस में रिपोर्ट भी कर दी है। राजस्थान का यह ताजा मामला देश में कई जगहों पर भाजपा के मंत्रियों, सांसदों-विधायकों, पदाधिकारियों, और संघ परिवार का हिस्सा कहे जाने वाले संगठनों के हमलावर तेवरों की एक ताजा कड़ी ही है। आज सुबह का टीवी शुरू करते ही एक हिन्दू संगठन का नेता कैमरे पर चीख-चीखकर गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की स्तुति कर रहा था, और गांधी को गालियां दे रहा था। दूसरी तरफ दिल्ली में ऐसे ही कुछ घोर साम्प्रदायिक हिन्दू संगठन लगातार यह कोशिश कर रहे हैं कि गोडसे को एक महान देशभक्त के रूप में स्थापित करके सार्वजनिक जगहों पर उसकी प्रतिमाएं लगाई जाएं।
लोगों को याद होगा कि नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे पहले लालकिले के अपने भाषण में शौचालयों की जरूरत और सफाई अभियान के नारे लगाते हुए गांधी का जिक्र किया था, कि गांधी के सपनों को पूरा करने के लिए वे यह बीड़ा उठा रहे हैं। आजादी के सालगिरह के भाषण में इन बहुत आम लगते मुद्दों को उठाने के लिए नरेन्द्र मोदी ने अमरीका से ऑस्ट्रेलिया तक, और हिन्दुस्तान के कोने-कोने में मंच और माईक से अपनी ही तारीफ की, और बार-बार गांधी का नाम लिया। अब आज अगर उनके ही संगी-साथी गांधी के हत्यारे गोडसे को महिमामंडित करने में ओवरटाईम कर रहे हैं, और प्रधानमंत्री संसद में मौजूद रहते हुए भी इस मुद्दे पर बोलने से बच रहे हैं, और सरकार अपनी यह नीति घोषित कर रही है, कि इस पर सिर्फ गृहमंत्री ही जवाब देंगे, तो मोदी के गांधीप्रेम में एक बड़ा विरोधाभास दिख रहा है। यह नौबत इस देश के लिए बहुत खतरनाक है कि आज कट्टर साम्प्रदायिक ताकतें देश में एक बार फिर गांधी की हत्या जैसा जुनून खड़ा कर रही हैं, और भाजपा के करीबी संगठन इस तरह के भड़काऊ और देशद्रोही भाषण दे रहे हैं कि अगले कुछ बरसों में इस देश में किसी को ईसाई या मुसलमान नहीं रहने दिया जाएगा।
यह मौका किसी गृहमंत्री के बयान के लायक नहीं है, और प्रधानमंत्री को खुद होकर संसद के भीतर और संसद के बाहर अपने मन की बात बोलनी चाहिए। वे रेडियो पर जनता से बात करते हुए जिंदगी के छोटे-छोटे पहलुओं पर अपने मन की बात बोलते रहें, और देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंक देने की जो बड़ी साजिशें उन्हीं के साथ के लोग कर रहे हैं, उस पर वे चुप रहें, तो इतिहास इसको भी दर्ज कर रहा है। हमने यूपीए सरकार के वक्त भी बार-बार यह लिखा था कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के जलते-सुलगते मुद्दों पर चुप रहना भारतीय प्रधानमंत्री का हक नहीं हो सकता। इस देश के प्रधानमंत्री को सार्वजनिक रूप से सार्वजनिक मुद्दों पर बोलना ही होगा, और आज नरेन्द्र मोदी संसद के भीतर, सवालों के कटघरों में मनमोहन सिंह की तरह चुप बने हुए हैं, और वे उसी भाजपा के प्रधानमंत्री हैं जो कि मनमोहन सिंह को मौनी बाबा कहते हुए थकती नहीं थी।
देश की आज की नौबत बहुत ही भयानक है, और हमने पाकिस्तान के संदर्भ में लिखते हुए भारत को सचेत भी किया है कि साम्प्रदायिकता को बढ़ाना, धर्मान्धता को बढ़ाना, लोकतंत्र को किस तरह खत्म करता है, इसकी एक जलती हुई मिसाल सरहद के बगल में पाकिस्तान में दिख रही है। भारत में पिछली पौन सदी में गांधी ने अपनी जिंदगी भी देकर देश के भीतर साम्प्रदायिक एकता रखने की कोशिश की थी, और बहुत से दूसरे नेताओं ने, राजनीतिक दलों और संगठनों ने इसके लिए कुर्बानियां दी हैं। बहुत मुश्किल से विविधताओं से भरा हुआ यह देश एक साथ रहना सीख पाया था, और अब उसकी सीखी हुई गंगा-जमुनी सभ्यता को खत्म करने के लिए साम्प्रदायिक ताकतें ऐसा दिखा रही हैं कि मानो हैवानियत के अच्छे दिन आ गए हैं।
यह मौका भारत के प्रधानमंत्री की चुप्पी का नहीं है, और हाथ पर हाथ धरे देश भर में साम्प्रदायिक हिंसा फैलाने की कोशिशों को चुपचाप देखते रहने का भी नहीं है। ऐसी चुप्पी भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत महंगी साबित हो रही है, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इतिहास में यह दर्ज भी हो रही है। उनको यह बात भी सोचनी चाहिए कि आर्थिक विकास से लेकर रोजगार तक, और सफाई से लेकर शौचालयों तक जितने किस्म की उनकी योजनाएं हैं, वे सब की सब इस हिंसा के बीच घूरे पर जा गिरी हैं। आज देश में कोई मोदी की सोच का नाम भी नहीं ले रहा, और देश के ऐसे बड़े-बड़े लेखक-पत्रकार, स्तंभकार और विचारक जो कि आम चुनाव के पहले से मोदी में संभावना देख रहे थे, और चुनाव के बाद मोदी में एक बड़ा नेता देख रहे थे, वे तमाम लोग आज घोर निराश होकर मोदी सरकार, मोदी की पार्टी, और मोदी के सहयोगी संगठनों के खिलाफ आलोचना से भरे लेख लिख रहे हैं। हिन्दुस्तान में आज का वक्त मोदी के सोचने और करने की मांग कर रहा है। पता नहीं क्यों वे संसद में मुंह भी नहीं खोल पा रहे हैं।

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