बस्तर की ताजा शहादत को लेकर कुछ नई-पुरानी बातें

संपादकीय
2 दिसंबर 2014
छत्तीसगढ़ के बस्तर में कल फिर एक नक्सल हमले में दर्जन भर से अधिक सुरक्षा कर्मचारियों-अधिकारियों की शहादत हो गई। हर बरस ऐसे कुछ मामले सामने आते हैं, और एक-दो दिन सुर्खियों में रहने के बाद सब कुछ फिर उसी तरह चलने लगता है। इस मौके पर हम एक रणनीति-विशेषज्ञ की तरह सरकार और सुरक्षा बलों को कोई राह सुझाना नहीं चाहते, लेकिन एक साधारण समझबूझ के आधार पर हम मंजिल सुझाना जरूर चाहते हैं। मंजिल यह है कि न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि देश के दूसरे आधा दर्जन प्रदेशों से भी नक्सल हिंसा खत्म होनी चाहिए। अब जिस तरह चिकित्सा विज्ञान में कैंसर को खत्म करने के लिए जांच के बाद जरूरत के मुताबिक दवा, रेडिएशन-सिंकाई, और सर्जरी, तीनों में से किसी एक-दो का, या तीनों का इस्तेमाल किया जाता है, उसी तरह किसी देश के भीतर उग्रवाद या आतंकवाद को सुलझाने के लिए बंदूकों के मोर्चे के साथ-साथ बातचीत भी जरूरी होती है, और जमीन पर ऐसा विकास भी जरूरी होता है जिसके न रहने की वजह से ऐसे उग्रवाद या आतंकवाद के उपजने और पनपने का मौका आता है। 
छत्तीसगढ़ का नक्सल मोर्चा ऐसी तमाम बातों वाला है कि यहां पर अविभाजित मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से दूरी सबसे अधिक होने की वजह से यहां प्रशासन सबसे कमजोर रहा, विकास सबसे कम रहा, और शोषण सबसे अधिक रहा। कुल मिलाकर बस्तर की हालत ने नक्सलियों को न्यौता दिया कि आओ और दबे-कुचले लोगों के हक के लिए लड़ाई लड़ो, क्योंकि बस्तर में सरकारी मशीनरी और राजनीतिक पार्टियां, इन दोनों ने दशकों तक, आजादी से लेकर राज्य के निर्माण तक वहां के लोगों को लूटने का ही काम किया था। इसलिए विरासत में मिली हुई नक्सल हिंसा आज भी जारी है। छत्तीसगढ़ के बस्तर जैसे इलाके जिन-जिन राज्यों में हैं, वहां राज्य सरकारों को अपने भ्रष्टाचार को घटाना होगा, और सरकारी कामकाज को बेहतर और संवेदनशील बनाना होगा। विकास और जनकल्याण के बिना वहां की जनता की हमदर्दी सरकार के साथ नहीं रहेगी, और ऐसे साथ के बिना सरकार अपने कितने भी खजाने से वहां काम नहीं कर पाएगी। इसलिए बस्तर जैसे इलाके को महज पुलिसिया-समस्या मानकर चलना ठीक नहीं है, और वहां पर आदिवासियों के साथ हमदर्दी रखने वाले बेहतर अफसरों की जरूरत है। 
यह तो एक बात हुई, लेकिन कल सुरक्षा बलों पर नक्सलियों ने जिस तरह से हमला किया, और जितने लोगों को मारा, उससे एक सवाल यह भी खड़ा होता है कि केन्द्र और राज्य की सरकारें अपने लोगों की मौतों को और कितना बर्दाश्त करेंगी, कब तक शहीदों के ताबूतों को सलामी देते रहेंगी, और अगर ऐसा नहीं करेंगी, तो उनके पास विकल्प क्या है? बस्तर के नक्सल मोर्चे पर पिछले डेढ़ दशक से केन्द्र और राज्य के सुरक्षा बल मिलकर लड़ाई लड़ रहे हैं, और मानवाधिकार हनन की कुछ शिकायतों को छोड़ दें, तो सुरक्षा बलों ने ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की है जैसी कि हथियारबंद उग्रवाद को खत्म करने के लिए मिजोरम जैसे उत्तर-पूर्वी राज्य में भारत की फौज ने की थी। जिन लोगों को देश के भीतर, देश के उग्रवादी या आतंकी लोगों पर फौजी कार्रवाई बस्तर जैसे मामले में जरूरी लगती है, उनको ऐसी कार्रवाई में बड़ी संख्या में मारे जाने वाले बेकसूर लोगों का अंदाज नहीं है। कुसूरवार आतंकियों के साथ-साथ उस इलाके के लोग उनसे कहीं अधिक गिनती में मारे जा सकते हैं, इसीलिए समझदार सरकारें फौजी कार्रवाई से बचती हैं। लेकिन क्या आज बस्तर में सुरक्षा बलों की तैनाती जरूरत के मुकाबले कम है? क्या आधे-अधूरे मन से यह लड़ाई लड़ी जा रही है? क्या और अधिक तैनाती से नक्सल हिंसा खत्म हो सकेगी? ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब ऐसे मोर्चों के जानकार लोग बेहतर दे सकते हैं, हम इस मुद्दे को महज उठा रहे हैं। 
अब कैंसर के तीसरे किस्म के इलाज की तरह एक आखिरी इलाज है बातचीत का। जब देश के बाहर के आतंकी देशों, या विमान हाईजैक करने वाले लोगों से भी भारत सरकार बात करती है, तो देश के भीतर के उग्रवादियों और आतंकियों से बात करने में कोई नुकसान नहीं है। लेकिन यह बात करना मोर्चे से परे भी हो सकता है, और हमको इस बात पर कुछ निराशा भी है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बाद भाजपा सरकार, देश में एनडीए के बाद यूपीए सरकार के करीब डेढ़ दशक में भी नक्सलियों से बातचीत की कोई जमीन नहीं बन पाई। हमारा यह मानना है कि बाकी मोर्चों पर सरकार जो ठीक हो वह तो करे, लेकिन साथ-साथ बातचीत का रास्ता भी निकाले। और यह रास्ता नक्सली नहीं निकालेंगे, क्योंकि उनको बातचीत में भरोसा नहीं है, लोकतंत्र पर भरोसा नहीं है। यह रास्ता तो लोकतांत्रिक सरकारों को ही निकालना होगा। 
यह घटना ताबूतों के उठने के साथ ही फिर आई-गई हो जाएगी, ऐसा ही खतरा हमको अधिक दिखता है। कुछ समय पहले जब छत्तीसगढ़ के एक कलेक्टर का नक्सल-अपहरण हुआ था, और उसके रिहाई के लिए नक्सलियों और सरकार के बीच कुछ लोगों की एक कमेटी बनी थी, वैसी ही कमेटी को बातचीत की एक जमीन तैयार करनी चाहिए। वह कमेटी आज भी अस्तित्व में है, और उसके लोगों पर इन दोनों पक्षों का भरोसा भी है। उसके बाद भी उस कमेटी का एक बेहतर और अधिक इस्तेमाल क्यों नहीं हो पाया, क्यों नहीं किया गया, यह हमारी समझ से परे है। छत्तीसगढ़ सरकार को चाहिए कि नक्सल समस्या से निपटारे के बाकी तरीकों के साथ-साथ वह एक वैचारिक पहल और करे, जिससे कि बातचीत का कोई रास्ता खुल सके। ऐसा अगर हो सकेगा, तो वह इस राज्य से परे भी, बाकी देश के अमन-चैन के लिए एक बड़ी बात होगी। 

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