8 दिसंबर 2014
संपादकीय
दिल्ली में हुए एक बलात्कार को लेकर एक बार फिर देश की राजधानी की सड़कें और देश का मीडिया उबल रहे हैं। और यह सिलसिला साल में दो-चार बार का हो गया है, और हम भी इस मुद्दे पर साल में दो-चार बार इस जगह पर लिख देते हैं। लेकिन सरकारी इंतजाम से परे कुछ और चीजों पर भी बात करने की जरूरत है जो कि हो नहीं पा रही है।
भारत में महिलाओं की जो हालत है, उसे समाज में सुधारे बिना ये बलात्कार थमने वाले नहीं हैं। पुलिस हर बलात्कारी को पहचान कर जुर्म के पहले नहीं रोक सकती। और आज के कामकाजी जमाने में महानगरों में महिलाओं को काम करके देर रात लौटना पड़ता है, शहरी जिंदगी में पार्टियों से देर रात आवाजाही होती है, और शहरों से दूर गांव-जंगल में लड़कियों और महिलाओं को रात-बिरात अंधेरे में पखाने जाने के लिए गांव के बाहर सुनसान जगहों पर जाना पड़ता है। स्कूलों में लड़कियां और बच्चियां वहां के शिक्षकों और कर्मचारियों के हवाले रहती हैं, आते-जाते बस के ड्राइवर और कंडक्टर के साथ रहती हैं, और घर पर पड़ोसियों और रिश्तेदारों की पहुंच के भीतर रहती हैं। ऐसे में पूरी दुनिया की पुलिस मिलकर भी हिन्दुस्तान के बलात्कारों को नहीं रोक सकतीं। केवल एक ही चीज बलात्कारों को कम कर सकती है, वह यह कि भारतीय महिलाओं के अधिकार पुख्ता किए जाएं, समाज में उनको सम्मान दिया जाए। और यह काम किसी कानून को लागू करने के मुकाबले हजार गुना अधिक मुश्किल है, बल्कि नामुमकिन सा है।
हम देखते हैं कि भाजपा और हिन्दू संगठनों के कई कट्टरपंथी भगवाधारी लोग महिलाओं के खिलाफ जिस तरह की अवैज्ञानिक बातें करते हैं, वैसी अवैज्ञानिक सोच देश के लोगों को महिला-सम्मान से परे ले जा रही हैं। लेकिन दूसरी तरफ हम ममता बैनर्जी जैसी पढ़ी-लिखी और आधुनिक-लड़ाकू महिला को देखते हैं तो वह भी बलात्कार के मामलों में महिला विरोधी बयान देती हैं, पश्चिम बंगाल के कई वामपंथी नेता भी दकियानूसी और कट्टरपंथी बयान देते हैं। महिला के सम्मान को लात मारते हुए जब बलात्कार के एक आरोपी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपना मंत्री बनाते हैं, तो देश भर में यह संदेश जाता है कि बलात्कार बुरा नहीं है, और उससे अधिक कोई नुकसान नहीं होता। यह नौबत बदलने के लिए देश के हर ताकतवर तबके और इंसान को समाज की जुबान, समाज की कहावतें, सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए सम्मान और अनुपात की जगह, ऐसे सैकड़ों काम करने पड़ेंगे। किसी औरत को हिन्दुस्तानी समाज में इज्जत दिलाना आसान काम नहीं है, जहां कि उसे पांव की जूती समझा जाता है, जहां उसे पैदा होने के पहले मार डालने लायक पाया जाता है, जहां उसे बचपन में शादी करके बिदा कर देने, कम दहेज लाने पर प्रताडि़त करने और मार डालने तक को जायज माना जाता है।
हम बात को सिर्फ बलात्कार तक सीमित रखना नहीं चाहते और देश की सोच को वैज्ञानिक बनाने की तरफ बढ़ाने की वकालत करते हैं। आज भारत में जिस अंदाज में पौराणिक काल और वैदिक काल के नामौजूद विज्ञान को स्थापित करने की पाखंडी कोशिश चल रही है, उस तरह की भारत सरकार की कोशिशों के चलते हुए इस देश में महिलाओं का दर्जा वही बने रहेगा जो कि वैदिक काल में था। समाज में वैज्ञानिक और सुधारवादी सोच किस्तों और टुकड़ों में नहीं आती, वह एकमुश्त ही आती है। और भाजपा की अगुवाई वाली मोदी सरकार के बहुत से लोगों को यह गलतफहमी हो रही है कि वैदिक धर्मान्धता की पाखंडी बातों को करने से वोटर हिन्दुत्व के साथ जुड़े रहेंगे। आज हकीकत यह है कि देश के वोटरों का एक बड़ा हिस्सा शहरी जिंदगी के चलते हुए ऐसे पाखंड से बाहर आ चुका है, और भाजपा को पिछले आम चुनाव में अपनी जीत को ऐसे किसी पाखंड की वजह से हुई जीत नहीं मानना चाहिए। वह जीत यूपीए की बदहाली और उसके दीवालियापन की हार थी, उसे अपनी जीत मानकर अगर पूरे देश में कट्टरता और पाखंड का एक एजेंडा अगर बढ़ाया जाएगा, तो वह आगे जाकर भाजपा को चुनावी नुकसान भी देगा। आज देश में सभी को मिलकर पाखंड से उबरने की जरूरत है।

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