नक्सल इलाकों में ज्यादती पर सामाजिक समझ की जरूरत

संपादकीय
6 दिसंबर 2014
छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सल मोर्चे पर लड़ रहे और कई शहादत दे चुके सुरक्षा दस्तों के बर्ताव को लेकर कई तरह के संदेह हमेशा से हवा में रहते हैं। पहले कई मानवाधिकार संगठन और आंदोलनकारी उस इलाके में सक्रिय रहते थे, और वर्दीधारियों की ज्यादती के मुद्दे उठाते थे। ऐसे आंदोलनकारियों की नीयत और मकसद को लेकर सरकार की तरफ से, और कई राजनीतिक ताकतों की तरफ से यह शक किया जाता रहा है कि क्या वे नक्सलियों के मनोवैज्ञानिक-युद्ध में मददगार निहत्थे हमख्याल लोग हैं, या बस्तर में सचमुच मानवाधिकार का उतना बुरा हाल है? उनके अलावा मीडिया का एक तबका भी इस खतरनाक इलाके में पहुंचकर लोगों से बात करके दुनिया के सामने अपनी देखी हकीकत रखते आया है, और कुछ लोगों को ऐसा भी शक है कि उनकी देखी हकीकत दरअसल वही होती है जो कि उन इलाकों पर काबिज नक्सली दुनिया के सामने रखना चाहते हैं। हो सकता है कि सच इनमें से कोई भी बात हो, और यह भी हो सकता है कि कहीं पर इनमें से एक बात लागू होती हो, और कहीं पर दूसरी बात। 
शहरी मीडिया की अपनी प्राथमिकताएं हैं, और नक्सल खबरों को इश्तहार के बाजार के लोग कोई खास पसंद नहीं करते। इसलिए किसी वारदात के बाद की खबरों से परे बाद में अधिकतर मीडिया अधिक कुछ दिखता नहीं है। ऐसे में नक्सल बंदूकों और केन्द्र-राज्य सरकारों की वर्दीधारी बंदूकों के पीछे की गोलीबारी में फंसे हुए बस्तर के लगभग बेजुबान इन लोगों का सच इन्हीं के साथ दफन होने का खतरा अधिक दिखता है। राज्य में मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, बाल कल्याण परिषद जैसी संवैधानिक संस्थाएं बस्तर की किसी भी खूनी मुठभेड़ के बाद राजधानी में अपनी-अपनी आरामगाह में अपनी चुप्पी और अनदेखी जारी रखती हैं। और वहां के लिए जो न्यायिक जांच घोषित होती है, उसका बरसों बाद भी क्या हाल रहता है यह इसी जगह पर हम दो-चार बार लिख चुके हैं, और इतिहास उसे दर्ज भी कर चुका है। 
अब सवाल यह उठता है कि जब मानवाधिकार आंदोलनकारी या तो सरकारी रूख के चलते बस्तर से हट से गए हैं, और छत्तीसगढ़ में भी मानवाधिकार आंदोलन कई वजहों से अपनी साख खो चुका है, तब बेजुबान लोगों पर ज्यादती के मुद्दों को आखिर कौन उठाए? फिर इन इलाकों में मीडिया के लिए काम करने वाले लोगों के साथ भी कुछ किस्म की दिक्कतें रहती हैं। नक्सलियों ने मीडिया के लोगों को बहुत सीधे-सीधे तो निशाना नहीं बनाया है, लेकिन एक तरफ नक्सली और दूसरी तरफ पुलिस, इनके बीच किसी भी तरफ के मुखबिर होने की तोहमत का खतरा मीडिया पर रहता है, और गांव-जंगल की जिंदगी में वहां रहते हुए कौन किससे कितना बैर निभा सकता है, यह सोचना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन हम यह कोशिश करते हैं कि जब भी कोई भरोसेमंद अखबारनवीस इन इलाकों तक पहुंचकर वहां की खबर लेकर आए, और उसमें आदिवासियों का पक्ष हो, तो हम उसे छापना चाहते हैं, चाहे उस पर यह आरोप ही क्यों न लगे कि नक्सली दबाव में ग्रामीण पुलिस के खिलाफ बयान देते हैं। हमारा यह मानना है कि देश के प्रधानमंत्री को अपनी बात कहने का जितना हक है, उतना ही हक बस्तर के एक कमजोर आदिवासी को भी होना चाहिए, और उसकी बात पर अविश्वास की कोई वजह तब तक नहीं होनी चाहिए, जब तक कि वैसा सुझाने वाला कोई सुबूत सामने न हो। 
हम सरकार से यह उम्मीद करते हैं कि अपनी पुलिस को ही अकेला सच मानने के बजाय उसे सामाजिक और राजनीतिक लोगों से भी ऐसे गांव जंगल की हकीकत का अंदाज लगवाना चाहिए। वहां लड़ाई लड़ रही पुलिस की अपनी एक सोच हो सकती है, और पुलिस कई किस्म की कहानियां भी गढ़ सकती है, ठीक उसी तरह जिस तरह की नक्सली या उनके समर्थक भी गढ़ सकते हैं। इसलिए सरकार को अपनी मशीनरी से परे जाकर सूचना के कुछ स्वतंत्र और निष्पक्ष स्रोत भी विकसित करने चाहिए, जिससे कि उसे अपनी खुद की वर्दियों की हकीकत भी मालूम हो सके। सरकार के लिए यह काम तो आसान हो सकता है कि वारदात के बाद, हर मुठभेड़ के बाद, हर आरोप के बाद वह अपने लोगों के साथ जमकर खड़ी रहे, ताकि उनका मनोबल बना रहे। लेकिन अपनी वर्दियों के मनोबल को बनाए रखने के लिए अगर बस्तर के बेजुबान आदिवासियों की बात को भी राज्य और केन्द्र की सरकारें नहीं सुन पाएंगी, तो यह अपने आपमें नक्सल हिंसा के जारी रखने की एक वजह होगी। नक्सल आंदोलन सिर्फ पुलिस के सुलझाने वाला मुद्दा नहीं है, इस बारे में सरकार को एक सामाजिक समझ से ही काम लेना चाहिए, और प्रदेश के सबसे भले, सबसे सीधे आदिवासी तबके पर किसी भी तरफ से होती ज्यादती को रोकना चाहिए। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें