विशेष संपादकीय
9 दिसंबर 2014
सुनील कुमार
छत्तीसगढ़ में सरकार इस बरस से पहली बार एक साहित्य महोत्सव शुरू कर रही है। देश में जगह-जगह साहित्या महोत्सवों का सिलसिला शुरू हुआ है, और उनमें से अधिकतर अंगे्रजी जुबान के अधिक हिस्से वाले होते हैं। उनमें से जयपुर का गैरसरकारी समारोह पिछले बरस आशीष नंदी जैसे विख्यात और सम्मानीय समाजशास्त्री के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को लेकर खबरों में आया था, और एक दूसरा गैरसरकारी तहलका साहित्य समारोह गोवा में इसके आयोजक, अखबारनवीस तरूण तेजपाल पर लगे बलात्कार के आरोपों की वजह से महीनों तक खबरों में रहा। और फिर मानो विवाद से प्रचार पाने के लिए, टाईम्स ऑफ इंडिया ने अपने साहित्य समारोह में तरूण तेजपाल को बोलने के लिए न्यौता भेजकर ढेर सा प्रचार मुफ्त में पा लिया।
अब साहित्य, कला, और वैचारिक लेखन ऐसे तो होते नहीं कि उन्हें लेकर मतभेद न हों और विवाद न हों। देश के इतिहास लेखन से लेकर वर्तमान लेखन तक, भविष्य लेखन से लेकर रचनात्मक साहित्य तक देश में वामपंथी या समाजवादी सोच के लोगों की भरमार हमेशा से रही है। और आज देश में भाजपा और मोदी सरकार के आने के बाद से दक्षिणपंथी सोच के, हिंदूवादी लेखकों और इतिहासकारों का एक नया सैलाब ऊंचाई तक लहरा रहा है। ऐसे में एक साहित्य समारोह, और खासकर तब जबकि वह सरकार का आयोजित किया जा रहा हो, और खासकर तब जबकि वह भारत के मध्य हिस्से की सबसे बड़ी जुबान हिंदी में हो, तब उसे लेकर उत्सुकता तो रहनी ही है, और उसे लेकर विवाद के खतरे भी होने ही थे। लेकिन अगर विवाद महज विवाद के मकसद से न हो, तो वह बुरा भी नहीं होता, वह वाद को यह मौका भी देता है कि वह अपनी बात को दुहरा सके।
छत्तीसगढ़ में विपक्षी दल कांगे्रस पार्टी ने यह एक बहुत सही मुद्दा उठाया है कि जब प्रदेश में नसबंदी ऑपरेशनों में मौतें दर्जन से दर्जनों की तरफ बढ़ रही हैं, जब बस्तर के नक्सल मोर्चे पर दर्जन भर से अधिक शहादतें अभी-अभी हुई हैं, और दर्जनों जख्मी अस्पतालों में हैं, तब देश भर से दर्जनों साहित्यकारों और दर्जनों लेखकों को बुलाकर रायपुर साहित्य महोत्सव किया जाना चाहिए, या नहीं? कांगे्रस ने विपक्ष की अपनी जिम्मेदारी के तहत दोनों मुद्दे ऐसे उठाए हैं जिन्हें लेकर छत्तीसगढ़ विचलित चल रहा है, और सरकार सवालों के घेरे में है। अब सवाल उठता है कि इस साहित्य समारोह का बहिष्कार का, जिसके लिए प्रदेश कांगे्रस के अध्यक्ष ने प्रमुख साहित्यकारों से फोन पर यह अपील की है कि वे इस समारोह का बहिष्कार करें।
हम कांगे्रस के उठाए मुद्दों से सहमत हैं, लेकिन हम बहिष्कार से सहमत नहीं हैं। पिछले बरसों में हमारे पाठकों को यह याद होगा कि किसी भी पार्टी की सरकार रहे हमने विधानसभा और संसद, दोनों के बहिष्कार के खिलाफ लगातार लिखा है। इस बात पर हमारा एक मजबूत भरोसा है कि लोकतंत्र के भीतर विचार-विमर्श के, बहस और वाद-विवाद के किसी भी मौके को खोना नहीं चाहिए। क्योंकि यह लोकतंत्र ही तो है जो कि लोगों को असहमति सामने रखने का मौका देता है। और कोई भी बहिष्कार ऐसे मौके को खोने से कम कुछ नहीं होता। जब भी विधानसभा या संसद में विपक्ष सवाल उठाने या बहस करने के बजाय मौके को खोता है, तो वह देश या प्रदेश की जनता के हक की अनदेखी भी करता है।
हम साहित्य या विचार के किसी भी ऐसे आयोजन को लेकर यह मानते हैं कि यह विचारधाराओं और राजनीतिक दर्शन की विविधता के मौके लेकर आते हैं, और उनका इस्तेमाल किया जाना चाहिए। हम कांगे्रस के विरोध की एक बात से और असहमत हैं कि यह एक जश्न है। वैचारिक आयोजन लाशों के बीच भी जश्न नहीं कहे जा सकते, बल्कि वे सामाजिक विसंगतियों और हथियारबंद हिंसा के खिलाफ एक राजनीतिक चेतना खड़ी करने का मौका हो सकते हैं। इस साहित्य समारोह के नामों पर एक नजर डालें, तो इसमें बहुत सी अलग-अलग विचारधाराओं के लोग पहुंच रहे हैं, और यह सरकार भाजपा की होने के बावजूद गजानन माधव मुक्तिबोध को सबसे अधिक महत्व देते दिख रही है जो कि पूरी जिंदगी न सिर्फ वामपंथी रहे, बल्कि जिनका सारा लेखन भाजपा और संघ परिवार की विचारधारा से असहमति का रहा। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने पिछले ग्यारह बरसों के अपने राज में जिस तरह मुक्तिबोध के सम्मान को सरकारी और सार्वजनिक स्तर पर बढ़ाया है, वैसा देश के किसी भी दूसरे राज्य में किसी वामपंथी लेखक के साथ शायद ही हुआ हो। और साहित्य समारोह का यह मौका छत्तीसगढ़ सरकार के कामकाज से लेकर देश की अलग-अलग विचारधाराओं से असहमति को भी सामने रखने का रहेगा, और लोगों को इसका इस्तेमाल करना चाहिए।
हम शास्त्रीय कलाओं और शास्त्रीय साहित्य को जनसरोकारों से बिल्कुल ही कटा हुआ, और आभिजात्य तबके के ही काम का मानते हैं। ऐसे में उससे परे अगर जनसाहित्य, जनमुद्दों, जनकला, और जनसरोकारों पर कोई चर्चा हो रही है, होने जा रही है, तो वह जनता के काम की भी रहेगी। जहां तक सरकारी फिजूलखर्ची का सवाल है, तो जनता की नजरों में आए बिना भी सरकार की फिजूलखर्ची रात-दिन जारी रहती है। और अगर ऐसे में बिना किसी सरकारी नियंत्रण के, महज एक सरकारी मंच पर देश भर के लोग जुटते हैं, और प्रदेश के लोगों को इसमें भागीदारी मिलती है, तो हम इसे एक बेहतर और सार्थक फिजूलखर्ची मान सकते हैं। कुल मिलाकर हम इस आयोजन के बहिष्कार के बजाय इस आयोजन में अपनी-अपनी विचारधारा के मुद्दे उठाने की सलाह देंगे। कांगे्रस भी ऐसे बहुत से लेखक और रचनाकार पा सकती है जो कि उसकी विचारधारा से सहमति रखने वाले हों। बहिष्कार न संसद का होना चाहिए, न विधानसभा का, न म्युनिसिपल कौंसिल का, और न ही साहित्य समारोह का। इस पर होने वाला खर्च सत्तारूढ़ भाजपा की जेब से नहीं जा रहा है, यह प्रदेश की जनता का पैसा है। और विपक्षी दल कांगे्रस को इस मौके को आयोजन के पहले, आयोजन के बाहर रहते हुए, इसे अपनी सोच से प्रभावित करने की तरकीबें सोचनी चाहिए।

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