साइबर-सेंधमारी से दुनिया को ब्लैकमेल करना इतना आसान?

18 दिसंबर 2014
संपादकीय
अमरीका की एक बड़ी फिल्म कंपनी सोनी के कम्प्यूटरों पर साइबर-सेंधमारों का हमला हुआ और उन्होंने वहां से फिल्में चुरा लीं, लोगों की चि_ियां चुरा लीं, और सोनी को धमकी दी कि उसने अगर अपनी एक फिल्म जारी की, तो ठीक नहीं होगा। द इंटरव्यू नाम की इस फिल्म में उत्तर कोरिया के तानाशाह-शासक की हत्या की कहानी है, और इन हैकरों के बारे में माना जा रहा है कि उनके पीछे उत्तर कोरिया की सरकार है, जिसका कि अमरीकी सरकार से लंबे समय से टकराव चले आ रहा है। यह फिल्म आने वाली क्रिसमस पर रिलीज होने वाली थी, लेकिन सेंधमारों ने यह धमकी भी दी है कि इस फिल्म को देखने जाने वाले लोग 11 सितंबर के न्यूयॉर्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर के हमलों को भी याद रखें। इसे देखते हुए पहले तो कुछ सिनेमाघरों ने फिल्म का प्रदर्शन रद्द कर दिया था, लेकिन अब खुद सोनी ने इसकी रिलीज रोक दी है। इसे अमरीका के इतिहास की सबसे बड़ी साइबर-धमकी माना जा रहा है, और कुछ विश्लेषकों का यह कहना है कि आज अगर मनोरंजन-कारोबार की एक काल्पनिक कहानी पर खफा होकर अमरीका की एक सबसे बड़ी कंपनी पर ऐसा हमला हो सकता है तो कल के दिन किसी समाचार टीवी या अखबार में छपी बातों से असहमत होकर उन पर भी ऐसे हमले हो सकते हैं।
अमरीकी सरकार ने इस मामले को बड़ी गंभीरता से लिया है क्योंकि यह एक दुश्मन देश, उत्तरी कोरिया, से जुड़ा हुआ मामला तो है ही, अमरीकी कारोबार की दुनिया पर भी यह दबाव का सबसे बड़ा हमला है। और जो कंपनी कम्प्यूटरों के ही कारोबार में है, उसके नेटवर्क पर इतनी बड़ी साइबर-सेंध लगाना, और उसकी आपसी चि_ियों को उजागर करके एक सार्वजनिक शर्मिंदगी पैदा करना, एक नए किस्म का आधुनिक हमला है। लेकिन इससे यह भी साबित होता है कि उत्तर कोरिया जैसा एक देश साइबर-हमले की अपनी ताकत से किस तरह किसी को झुका सकता है। उसके पास के परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की नौबत तो अभी नहीं आई है, लेकिन उसके साइबर-हथियार जरूर अपनी ताकत दिखा गए हैं।
जो लोग अमरीकी फिल्में देखते हैं, उनको यह मालूम है कि किस तरह कहानियों में साइबर-हमले दिखाकर पूरी अमरीका के ट्रैफिक को, बैंकों और जिंदगी के बाकी तमाम मामलों को सेंधमार कब्जे में कर सकते हैं, और किसी देश की व्यवस्था को कैसे पल भर में चौपट कर सकते हैं। हमारे पाठकों को यह याद होगा कि बरसों पहले हमने भारत को साइबर-सुरक्षा को लेकर आगाह किया था कि अगर भारत के बैंकों पर, ट्रेन और प्लेन के रिजर्वेशन पर, हवाई उड़ानों पर साइबर-हमले होते हैं, तो भारत उस तबाही से कैसे उबरेगा? आज अमरीका की सोनी कंपनी इस बात पर मजबूर हो गई है कि उसके कर्मचारी कागज और कलम लेकर बरसों पहले के अंदाज में काम कर रहे हैं, क्योंकि इस साइबर-सेंधमारी के हफ्ते भर बाद भी सोनी अपने कम्प्यूटरों को हमलों से बचा नहीं पाया है। कम्प्यूटरों के मामले में दुनिया के सबसे सुरक्षित देश की एक सबसे बड़ी कंपनी आज जिस तरह बेबस हो गई है, उससे यह बात साफ है कि गोला-बारूद से लेकर परमाणु हथियारों तक की जरूरत आने वाले दिनों में हो सकता है न पड़े, और हमलावर घर बैठे सेंधमारी करके किसी देश को पल भर में तबाह कर दें।
आने वाले दिन भारत के लिए ऐसी कोई तबाही ला सकते हैं, और वैसे हमलों से बचने के लिए इस देश को तैयार रहना चाहिए। आज जिंदगी की छोटी से छोटी जरूरतें जिस तरह कम्प्यूटरों और इंटरनेट की मोहताज होते जा रही हैं, उनको देखते हुए सरहद की लड़ाई अब पुराने फैशन की साबित होगी, और बिना बंदूक थामे लोग किसी देश की जिंदगी को मुर्दा कर देने की ताकत रखेंगे। भारत सरकार के बार-बार कहने के बाद भी इस देश के मंत्री, अफसर, और यहां के सांसद भी अपने ई-मेल खाते ऐसे सर्वरों पर रखे हुए हैं, जो कि दूसरे देश में हैं। भारत सरकार और भारत की संसद से, यहां की अदालत से, यहां की राज्य सरकारों से जुड़े हुए कामकाज भारत सरकार की ई-मेल सुविधाओं पर न रखने से तस्वीर कुछ ऐसी बनती हैं कि भारत की गोपनीयता अमरीका के फुटपाथों पर रखी हुई है। ऐसा भी नहीं कि भारत सरकार के अपने कम्प्यूटर विदेशी सेंधमारी से बचे हुए होंगे, लेकिन फिर भी वे देश के भीतर तो हैं।
उत्तर कोरिया सरकार की तरफ से, या उसकी हिमायत में सोनी पर हुआ यह हमला लोकतंत्र, सरकार, कारोबार, विदेशी संबंध, और कम्प्यूटरों के नाजुक होने के कई सवाल खड़े करता है, और लोगों को अपने-अपने घर बचाने की सोचना चाहिए। और इसके साथ-साथ एक सवाल यह भी है कि आज जिनके हाथ में साइबर-ताकत है, ऐसे लोग क्या दुनिया को अपनी शर्तों पर इस तरह झुकाते रहेंगे? कल के दिन और कौन-कौन से कारोबार, कौन-कौन सी सरकारें इस तरह की ब्लैकमेलिंग का शिकार रहेंगे?

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