20 दिसंबर 2014
संपादकीय
भारतीय संसदीय लोकतंत्र सरकार बदलने के साथ-साथ कई तरह के विरोधाभास देखने लगता है। पूरे देश में एक जैसा टैक्स लगाकर सामानों के दाम एक करने के केंद्र सरकार के आज के प्रस्तावित विधेयक पर गैर एनडीए राज्य साथ नहीं दे रहे हैं। गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स को लेकर लंबे अरसे से कोशिश चल रही थी, अटल सरकार के समय इसकी शुरूआत हुई थी, और यूपीए के पूरे कार्यकाल में एनडीए के राज वाले प्रदेश लगातार इसका विरोध करते रहे, और छत्तीसगढ़ से भी ऐसा विरोध दिल्ली में लगातार दर्ज होते रहा। इस विरोध में मोदी का गुजरात बढ़-चढ़कर सबसे आगे था, और लोकतंत्र की विसंगति यह है कि आज उसी एनडीए के, मोदी के ही वित्त मंत्री अरूण जेटली इसे आजाद भारत का सबसे क्रांतिकारी टैक्स सुधार करार दे रहे हैं, लेकिन संसद में उसके पास होने का आसार नहीं है, और गैर एनडीए राज्य उसका साथ नहीं दे रहे। कल तक जो सत्ता थी, आज वह विपक्ष है, और कल का विपक्ष आज सत्ता में है, और इनके संसदीय टकराव के चलते इसका नुकसान देश झेल रहा है।
दरअसल भारत जैसी संसदीय, और संघीय व्यवस्था एक अंधाधुंध टकराव के साथ जिंदा रहने लायक व्यवस्था नहीं है। इसमें सहमत से लेकर बहुमत तक की कोशिशें जरूरी होती हैं, और देश में गैर आर्थिक मुद्दों को लेकर भी, सामाजिक और साम्प्रदायिक मुद्दों पर सत्ता और विपक्ष के बीच, एनडीए और गैर एनडीए के बीच इतना बड़ा टकराव है कि संसदीय कामकाज पर सहमति के आसार नहीं बन पा रहे। और भाजपा के वित्त मंत्री की जुबान में आज अधिक दम इसलिए नहीं रह जाता कि कल तक उन्हीं की अगुवाई में एनडीए के मुख्यमंत्री, एनडीए के सांसद, यूपीए की जीएसटी की पहल का विरोध कर रहे थे।
आज चूंकि देश पर भाजपा का राज है, इसलिए संसद में सहमति और बहुमत की कोशिश की जिम्मेदारी भी उसी की है। आज इंटरनेट पर ऐसे कई वीडियो तैर रहे हैं जिनमें कल तक लोकसभा में विपक्ष की नेता रही सुषमा स्वराज सदन के बहिष्कार को लोकतंत्र का एक हिस्सा बताते दिख रही हैं। खराब परंपराएं शुरू करना आसान होता है, उनको खत्म करना नामुमकिन हो जाता है, क्योंकि वे मिसाल बनकर दूसरों के हाथ का हथियार भी बन जाती हैं। लेकिन हम यहां पर एक दूसरी बात भी कहना चाहते हैं, इस बार संसद में संसदीय काम न होने के पीछे, विपक्ष के हंगामे के पीछे जो वजहें हैं, उनके बारे में प्रधानमंत्री और एनडीए को सोचना चाहिए। एनडीए के मंत्रियों, सांसदों, नेताओं, और सहयोगी संगठनों ने देश के भीतर एक निहायत गैरजरूरी और नाजायज तनाव खड़ा किया है, और संसद के बाहर का यह तनाव संसद सत्र को खा गया। लोकतंत्र में संसद की इमारत के स्तंभ बाहर की आंधी के झोंकों को रोक नहीं सकते, और वहां का अंधड़ भीतर आकर काम चौपट कर जाता है। मोदी सरकार को यह अंदाज रहना चाहिए था कि जिस तरह का तनाव सोच-समझकर बाहर खड़ा किया गया, उसका शिकार सरकार के हिस्से का संसदीय कामकाज भी होगा। तो एक तरफ तो बहिष्कार की एनडीए की परंपरा आज उसके विरोधियों के हाथ का औजार या हथियार है, और दूसरी तरफ एक निहायत खतरनाक तनाव जो संसद सत्र के ठीक पहले देश भर में फैलाया गया, उसने सबसे अधिक नुकसान मुसलमानों या ईसाईयों का नहीं किया, उसने सबसे अधिक नुकसान नरेन्द्र मोदी का किया है, जो कि अपनी सरकार के विधेयकों को संसद में पास नहीं करवा पा रहे। चुनावी सभाओं के नारे अलग होते हैं, और सरकार चलाने की जिम्मेदारी अलग होती है, मोदी को अब भी आने वाले संसद-सत्रों के लिए अपनी टोली के तौर-तरीकों को बदलवाना होगा, वरना न सिर्फ संसद का समय इसी तरह खराब होते रहेगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, देश की सद्भावना, और देश की साख भी खराब होते रहेगी। संसद के इस सत्र को संसद के बाहर की भड़काऊ बातों, और बाहर की साजिशों के शिकार के रूप में दर्ज किया जा चुका है।

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