27 दिसंबर 2014
संपादकीय
अगले हफ्ते मुंबई में भारतीय विज्ञान कांग्रेस का पांच दिनों का एक कार्यक्रम होने जा रहा है, और इसमें वैदिक काल में भारत में विमानों के बारे में एक सत्र रखा गया है। पिछले कुछ महीनों से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद से लगातार भारतीय पौराणिक काल की कहानियों को इतिहास का दर्जा देने की होड़ लगी हुई है, और आज की विकसित दुनिया की बहुत सी वैज्ञानिक खोजों को, आविष्कारों को, भारतीय वैदिक काल की भारतीय उपलब्धि होने का दावा किया जा रहा है। इसमें कारों का आविष्कार भारत में होने से प्लास्टिक सर्जरी, कृत्रिम गर्भाधान जैसी बहुत सी वैज्ञानिक तकनीकों को भारत में खोजा हुआ बताया जा रहा है। यह दावा किया जा रहा है कि बीच की सदियों में विदेशी हमलावरों के राज की वजह से भारतीय इतिहास खो गया और उसकी गौरवशाली उपलब्धियां दबा दी गईं। अब पुराण कथाओं को लेकर उसी तरह वैज्ञानिक उपलब्धियों का दावा किया जा रहा है जिस तरह कि आज कोई विज्ञान कथा को लेकर अपने देश को कई तरह की खोजों की वाहवाही दे दे।
मुंबई में होने वाली भारतीय साईंस कांग्रेस के एक वक्ता कैप्टन आनंद जे. बोडस भी हैं, और उन्होंने अभी मुंबई में कहा कि विमानों की खोज भारत में वैदिक काल में कर ली गई थी और ये विमान एक देश से दूसरे देश ही नहीं, एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर भी जाते थे। उन्होंने कहा कि उस समय के विमान आकार में बहुत बड़े होते थे और आज तो विमान सिर्फ आगे उड़ान भरते हैं, उस समय के भारतीय विमान दाएं-बाएं भी उड़ सकते थे, और पीछे भी उड़ान भर सकते थे। आज इस तरह के कई लोग केन्द्र सरकार के शोध संस्थानों पर बिठाए गए हैं, जो कि इतिहास लेखन की किसी भी वैज्ञानिक पद्धति को खारिज करते हुए पौराणिक कहानियों को ही इतिहास करार देने पर उतारू हैं।
खैर, हिन्दुस्तान का इतिहास महज हिन्दुस्तान में ही दर्ज नहीं है, यह दुनिया के कई देशों के लोगों ने लिखा है, और हिन्दुस्तान के ही जाने-माने इतिहासकार काम कर चुके हैं। इसलिए दर्ज हो चुके इतिहास को आज सरकारी कुर्सियों पर बैठकर भी खारिज नहीं किया जा सकता, और न ही अवैज्ञानिक बातों को सरकारी स्कूलों में किताबों में डालकर दुनिया का इतिहास बदला जा सकता है। इससे देश का नुकसान होने के अलावा और कुछ नहीं होने जा रहा। ऐसा कोई भी देश या समाज, जो कि एक काल्पनिक अतीत पर गौरव करते हुए अपने आपको दूसरों से बेहतर समझता है, उसके आगे बढऩे की संभावनाएं बुरी तरह बर्बाद होती हैं। ऐसे देश या समाज के मन में अपनी पौराणिक कथाओं को लेकर जो एक झूठी आत्मसंतुष्टि घर कर जाती है, वह लोगों को बाकी दुनिया के मुकाबले आज काम करने, खोज और आविष्कार करने, और आगे बढऩे से रोक देती है। काल्पनिक कहानियां हमेशा ही बहुत सुखद होती हैं, क्योंकि उनको किसी वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतरकर कुछ साबित करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन देश की वैज्ञानिक सोच को अगर स्कूलों के स्तर से इस आधार पर बर्बाद करना है कि विदेशी शासकों ने कुछ सदियों तक भारत का वैदिक काल का इतिहास दबा दिया था, तो उससे आज भारी नुकसान छोड़, कोई नफा नहीं होने वाला है। एक झूठी शान में जीना आज के लिए तो मजे की बात होती है, लेकिन उसके पीछे न तो बीते इतिहास में की गई कोई मेहनत होती, और न ही आने वाले भविष्य में उससे कोई फायदा होता।
देश में एक अलग तरह की भावनात्मक, सांस्कृतिक धर्मान्धता बढ़ाने से किसी चुनाव में वोटों का थोड़ा-बहुत फायदा शायद होता होगा, लेकिन देश का उससे बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है। आज जब जनता के बीच, स्कूली बच्चों के बीच, वैज्ञानिक सोच खत्म की जा रही है, तो फिर उनके बीच लोकतांत्रिक न्यायप्रिय सोच भी खत्म होती है, और कट्टरता बढ़ती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के लोगों को एक तरफ तो आर्थिक विकास की ओर ले जाना चाहते हैं, दुनिया के मुकाबले खड़ा करना चाहते हैं, और दूसरी तरफ वे एक काल्पनिक इतिहास के नर्म गद्दे पर मौजूदा पीढ़ी को सुलाकर जिंदगी की कड़ी जमीन पर मुकाबले से दूर भी करने का माहौल खड़ा कर रहे हैं। एकाएक भारत का ऐसा सांस्कृतिक फेरबदल कई पीढिय़ों की सोच का बड़ा नुकसान कर रहा है, और जो इतिहास कभी रहा नहीं, उसके झंडे बनाकर नारों के साथ आज कोई देश या समाज किसी कामयाबी तक नहीं पहुंच सकते।

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