20 जून 2026
चीन की एक दिलचस्प खबर है कि वह अपने नौजवानों में बेरोजगारी से निपटने के लिए पिछले चार बरस में 12 हजार से अधिक स्नातक पाठ्यक्रमों को बंद कर चुका है। वहां के विश्वविद्यालयों में ऐसे सारे पाठ्यक्रम बंद किए जा रहे हैं, जिन्हें पढक़र निकलने वाले लोगों को चीन या बाहर कोई काम न मिल सके। 12200 कोर्स बंद करने के साथ-साथ उसने 10200 नए कोर्स भी शुरू किए हैं, जो कि देश भर में बिखरे सभी चीनी विश्वविद्यालयों का आंकड़ा है। यह देश अब मानकर चल रहा है कि जो डिग्री कोई काम न दिला सके, वह कंधों पर लदे मुर्दों सरीखे बोझ ही हैं। कला, समाज विज्ञान, विदेशी भाषा, और मैनेजमेंट के कोर्स बड़े पैमाने पर ऐसी कार्रवाई का शिकार हुए हैं। ये सारे आंकड़े चीनी विश्वविद्यालयों के हैं, और वहां के सरकारी मीडिया ने इन्हें प्रकाशित किया है। आज वहां 16 फीसदी नौजवान बेरोजगार हैं, और इन्हीं महीनों में वहां सवा करोड़ से अधिक नए ग्रेजुएट बनने वाले हैं। चीनी सरकार और विश्वविद्यालय लगातार छात्रों को अनुत्पादक पाठ्यक्रमों से दूर कर रहे हैं, और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए ही पढ़ाई करवा रहे हैं। यह सिलसिला सिर्फ एआई की वजह से नहीं है, बल्कि कुछ दूसरी वजहें भी इसके पीछे हैं, यह एक अलग बात है कि एआई और रोबोटिक्स के बढ़ते हुए इस्तेमाल की वजह से अब कई तरह की पढ़ाई की कोई जरूरत नहीं रह गई है।
इस बारे में कुछ और शोध करने पर पता लगता है कि चीन के सामने मौजूदा बेरोजगारी से जूझने के साथ-साथ एक दूसरी चुनौती भी है, एआई, रोबोटिक्स, चिप निर्माण, डेटा विज्ञान जैसे क्षेत्रों में हुनरमंद लोगों की बड़ी जरूरत है, और वहां पर ऐसे कुशल लोग पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं है। इसलिए अब जो नए कोर्स शुरू किए गए हैं, वैसे दस हजार से अधिक पाठ्यक्रमों में एआई, डेटा साईंस, रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर, ब्रेन-कम्प्यूटर संबंध, भविष्य की इंजीनियरिंग, और मानव जैसी क्षमताओं वाले रोबोट, इनसे जुड़े हुए पाठ्यक्रम हैं। चीन भविष्य की दुनिया की जरूरतों को, और अपनी क्षमताओं-संभावनाओं को देखते हुए अपनी पूरी अर्थव्यवस्था को उच्च तकनीक वाले उद्योगों की तरफ मोड़ रहा है, और इसी के मुताबिक शिक्षण-प्रशिक्षण से वह कामगार तैयार कर रहा है। विश्वविद्यालयों के नए कोर्स बेरोजगार पैदा करने के बजाय जरूरत के कामगार खड़े करने जा रहे हैं।
विश्लेषक यह कहते हैं कि सरकारें आमतौर पर यह मानकर चलती हैं कि उन्हें दस-पन्द्रह साल बाद की बाजार की जरूरतों का अंदाज रहता है, लेकिन कई बार ऐसा अंदाज गलत निकलता है। 1990 के दशक में कई देशों को लगा था कि इंजीनियरों की भारी कमी होगी, लेकिन बाद में बहुत से देशों में इंजीनियरों की भरमार हो गई, और फिर देशों का ढर्रा एमबीए की तरफ मुड़ गया, धीरे-धीरे एमबीए इतने हो गए कि उनके लिए रोजगार नहीं रह गए। और अब तो एआई ऐसे बहुत सारे काम पलक झपकते कर लेता है जो एमबीए डिग्रीधारी लोगों के लायक माने जाते थे। यहीं पर भारत पर भी एक नजर डालने की जरूरत है। यहां के विश्वविद्यालय और कॉलेजों में बड़ी संख्या में ऐसे विषय पढ़ाए जा रहे हैं जिनके ग्रेजुएट का पूरी जिंदगी बेरोजगार रहना तय सरीखा है। बहुत से ऐसे लोग हो सकते हैं जो किसी विषय में अपनी दिलचस्पी के चलते बिना रोजगार-संभावनाओं वाले कोर्स भी करना चाहें, लेकिन इनमें पढऩे वाले लोग क्या सचमुच बिना रोजगार के जिंदा रह सकते हैं? क्या भारत के विश्वविद्यालयों को लेकर केन्द्र और राज्य सरकारों के स्तर पर पाठ्यक्रमों की छंटनी जैसा कोई काम सुनाई या दिखाई पड़ता है कि चल बसी संभावनाओं वाले कोर्स बंद किए जाएं? अगर खेत में जाकर किसान को ही कुछ देर सरकारें और विश्वविद्यालयों के कुलपति देखते बैठें, तो भी उन्हें यह दिख जाएगा कि नई फसल बोने के पहले किस तरह जंगली घास-फूस निकाल दिया जाता है ताकि काम की फसल के लिए डाला जा रहा खाद-पानी उन पर बर्बाद न हो। और तो और शहरों में जहां पर घास के लॉन लगाए जाते हैं, वहां भी लॉन की घास से परे की जंगली घास को निकाल दिया जाता है। इसी तरह जिन पाठ्यक्रमों से जिंदा रहना मुमकिन न हों, उन्हें सिर्फ अकादमिक दिलचस्पी से बनाए रखना विषय की विविधता के लिए तो ठीक है, लेकिन नौजवानों की संभावनाएं इस पर खत्म करना जायज नहीं है।
कहने के लिए भारत में राष्ट्रीय स्तर पर यूजीसी है, जो कि देश के सभी विश्वविद्यालयों से समन्वय के लिए एक संस्था है। दूसरी तरफ राज्यों के स्तर पर राज्यपालों की अगुवाई में विश्वविद्यालय समन्वय समिति रहती हैं। फिर देश भर में ऐसे उत्कृष्ट शिक्षण संस्थान हैं जिन्हें डीम्ड विश्वविद्यालयों का दर्जा मिला हुआ है, या निजी विश्वविद्यालयों का एक महंगा तबका और है। इन सबके बीच राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कोई कमेटी हो जो कि उद्योग-व्यापार की भविष्य की जरूरतों का अंदाज लगाकर यह बता सके कि कौन से कोर्स अब अजायब घरों में रख देने के लायक हो गए हैं। किसी भी जिम्मेदार देश को अपनी अगली पीढ़ी को भविष्य की संभावनाओं का विशेषज्ञों का अंदाज बता देना चाहिए। हम इसी कॉलम में कई बार यह लिखते हैं कि दुनिया भर के देशों में भारत सरीखे देशों से कामगारों के जाकर काम करने की अपार संभावनाएं हैं, जो कि बढ़ती चली जाएंगी। इसी सिलसिले में स्विटजरलैंड में अभी पिछले हफ्ते हुए एक जनमत संग्रह की चर्चा करनी चाहिए, जो कि वहां कि प्रवासियों की विरोधी एक पार्टी की पहल पर करवाया गया था। इसमें नागरिकों से राय ली गई थी कि क्या 95 लाख की वर्तमान आबादी के बढऩे पर एक करोड़ पर स्थाई रोक लगा दी जाए ताकि दूसरे देशों से लोगों का आना रूके। लेकिन इस सोच के विरोधी लोगों का यह मानना था कि अगर दूसरे देशों के लोग नहीं आएंगे, तो स्विटजरलैंड की बुजुर्ग आबादी की जरूरतों के काम कौन करेंगे, और देश की अर्थव्यवस्था में बड़ी रूकावट भी आएगी। बड़े स्पष्ट बहुमत से जनता ने आबादी पर सीलिंग लगाने के खिलाफ वोट दिया। मतलब यह है कि काबिल कामगारों की जरूरत दुनिया में सब जगह रहेगी, और हो सकता है कि उनके लायक काम हिन्दुस्तान के भीतर भी निकल जाएं। ऐसे में भारत सरकार को, या देश के जिम्मेदार प्रदेशों को विशेषज्ञों के मार्फत अगले कुछ दशकों के प्रोजेक्शन तैयार करवाने चाहिए कि किस-किस तरह की पढ़ाई, या ट्रेनिंग के लोगों की दुनिया में जरूरत रहेगी। ऐसा न करना अपनी अगली पीढ़ी के साथ बहुत बड़ी गैरजिम्मेदारी की बात होगी।
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