26 जून 2026
कल फिर छत्तीसगढ़ में जमीन के राजस्व नक्शे में किसी रकबे के कई मालिकों में से एक का बटांकन करने के लिए रिश्वत लेते हुए एक पटवारी गिरफ्तार किया गया है। एसीबी की टीम ने हर कुछ हफ्तों में किसी न किसी पटवारी को लोगों की शिकायत पर गिरफ्तार किया है। फिर भी सरकार के इस सबसे छोटे दफ्तर में भ्रष्टाचार उसी तरह चलते रहता है। ऐसा भी नहीं कि किसी सरकार को इसका पता न हो, ऐसा भी नहीं कि सरकार ने यह इंतजाम किया हो कि पटवारी ईमानदार रहकर भी काम कर सके। पटवारी की व्यवस्था को ही इस तरह बनाया गया है कि वे भ्रष्ट तो होंगे ही, और उन्हें काम के लिए जरूरी सरकारी सुविधा देने की जरूरत नहीं है, वे अपना इंतजाम खुद कर लेंगे। जिस तरह मीडिया के बहुत से संस्थानों में शहर या कस्बे के रिपोर्टरों को तनख्वाह नहीं दी जाती, कि वे अपना इंतजाम खुद कर लेंगे, ठीक उसी तरह पटवारी का दफ्तर चलाने के लिए कुछ भी स्वीकृत नहीं रहता। नतीजा यह होता है कि हर पटवारी दफ्तर किराए से लेते हैं, कई कर्मचारी नियुक्त करते हैं, कम्प्यूटर लगाते हैं, और अपने इलाके में सर्वे के लिए, किसी सरकारी दफ्तर में जाने के लिए, बड़े अफसरों के जमीनों के शौक के लिए जो भाग-दौड़ करते हैं, उसके लिए गाड़ी-पेट्रोल, यह सब इंतजाम भी खुद ही करते हैं। नतीजा यह होता है कि यह पूरा खर्च उठाने के नाम पर हर काम के लिए वे जो वसूली करते हैं, उसे अघोषित रूप से जायज ठहराते रहते हैं। उनके ऊपर के बड़े से बड़े अफसर भी यह जानते हैं कि सरकार ने तो पटवारियों के ढांचे के लिए कुछ मंजूर किया नहीं है, उन्हें अपना इंतजाम किसी न किसी तरह तो करना ही है। नतीजा यह होता है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर और इसके आसपास लंबे समय तक बने रहने वाले पटवारियों से कोई काम पडऩे पर हमें खुद उनके करोड़ों के फॉर्महाउस देखने मिले, उनकी बड़ी-बड़ी गाडिय़ां देखने मिलीं, और बहुत बड़ी-बड़ी करोड़ों की जमीन उनकी होने का पता चला।
लेकिन महज पटवारी को कोसना ठीक नहीं है, नायब तहसीलदार या तहसीलदार के दफ्तर देखें, तो वहां भी बहुत से निजी कर्मचारी रखे जाते हैं, और अमूमन सारा काम फाइलों पर भी ये निजी कर्मचारी करते हैं। कभी-कभी इस निजी इंतजाम से कुछ लोग नाखुश होते हैं, तो वे इनका भांडाफोड़ करते हैं, कुछ दिनों के लिए इन कर्मचारियों को किसी और कमरे में बिठा दिया जाता है, लेकिन जल्द ही सामंजस्य स्थापित हो जाता है, और फिर से ये लोग सारा काम करने लगते हैं। इसी तरह आरटीओ दफ्तर में अगर निजी कर्मचारी न रहें, तो सिर्फ सरकारी कर्मचारियों के भरोसे काम नहीं चल सकता। और यह विभाग अधिक कर्मचारी मांगता भी नहीं है, क्योंकि ऐसे अघोषित टकसाल के पास अपना इंतजाम खुद करने की ताकत रहती है। सरकार के बहुत सारे दफ्तर जहां पर नियमित मोटी कमाई रहती है, वहां नियमित कर्मचारियों के कोई मोहताज नहीं रहते, अघोषित कर्मचारियों से काम आसानी से चलता है।
अब अगर पटवारियों पर लौटें, तो इनकी बड़ी दिलचस्प ताकत अविभाजित मध्यप्रदेश के एक मुख्य सचिव रहे, आर.पी.नरोन्हा ने अपनी मशहूर आत्मकथा, अ टेल टोल्ड बाई एन इडियट, में खुलासे से लिखी है। उन्होंने लिखा था- भारत में सिर्फ तीन ही ताकतें हैं जो राज करती हैं, ऊपर भगवान, नीचे पटवारी, और बीच में जो थोड़ा-बहुत बच जाता है वह मुख्यमंत्री। उनका मानना था कि एक आम ग्रामीण या किसान के लिए मंत्री, कमिश्नर तो दूर, कलेक्टर भी बहुत दूर की कौड़ी होते हैं। उनका सीधा वास्ता सिर्फ पटवारी से पड़ता है, और उसके एक दस्तखत पर लोगों की जिंदगी टिकी रहती है। इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था और समाज में उसका प्रभाव असीमित होता है। नरोन्हा ने बड़े अफसरों की आलोचना भी की थी कि वे सचिवालय की फाइलों में खोए रहते हैं, और सरकार के असली पहिए पटवारी, सिपाही, और बाबू कैसे जमीनी स्तर पर लोगों को घुमाते रहते हैं। वे खुद लंबे समय तक मध्यप्रदेश के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में काम कर चुके थे, इसलिए वे जानते थे कि किसी प्राकृतिक विपदा के समय पटवारी की दी गई रिपोर्ट को ही अंतिम सत्य मान लिया जाता है। उन्होंने लिखा था कि रिटायर होने के बाद जब वे मध्यप्रदेश में ही अपने फॉर्महाऊस पर खेती करने लगे, तो उन्हें समझ आया कि जमीन के रिकॉर्ड दुरूस्त रखने, और रोजमर्रा के सरकारी काम के लिए पटवारी की कितनी अहमियत होती है। उन्होंने इस व्यावहारिक हकीकत को मंजूर करते हुए लिखा था कि वे अपनी खेतों में होने वाली फसल, अनाज, और सब्जियों का एक हिस्सा खुशी-खुशी पटवारी को भी भेजते थे। उन्होंने इसे पारंपरिक रिश्वत या भ्रष्टाचार नहीं माना था, बल्कि भारत की पारस्परिक सामाजिक व्यवस्था माना था ताकि आपके काम बिना किसी अड़चन के चलते रहें। उन्होंने लिखा था कि जब एक भूतपूर्व मुख्य सचिव को भी अपनी जमीन और फसल के लिए पटवारी के साथ इस तरह का व्यावहारिक तालमेल बिठाना पड़ा, तो इससे यह साफ होता है कि भारत की जमीनी व्यवस्था सचिवालय के नियमों से कितनी अलग है।
हमने बड़े-बड़े कई अफसरों को देखा हुआ है जो जमीन के विवादों में लोगों को रास्ता सुझाते हुए भी पटवारी से मिलकर चलने की बात कहते हैं। पटवारी, नायब तहसीलदार, और तहसीलदार से लेकर राजस्व विभाग के एसडीएम तक के दफ्तर किसी भी चुनाव को सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ मोडऩे की ताकत रखते हैं। आबादी के एक बड़े हिस्से को इनमें से किसी न किसी दफ्तर तक जाना होता है, सिर्फ जमीनों के लिए नहीं, आय प्रमाणपत्र, जाति प्रमाणपत्र, ऐसे दर्जनों दस्तावेजों के लिए इन दफ्तरों के चक्कर लगाते लोग दिखते हैं। राजस्व विभाग के नियम-कायदों का जाल सबसे शातिर मकड़ी के जाल से भी अधिक घना और मजबूत रहता है, अगर इनमें से किसी कुर्सी की फरमाइश, हसरत, और हवस पूरी नहीं होती है, तो लोगों के कागज बरसों तक धक्के खा सकते हैं। पटवारी नक्शे में खींची गई एक लकीर करोड़ों की जमीन इधर से उधर कर सकती है। यही दोनों-तीनों दफ्तर सरकारी जमीन निजी नामों पर कर देते हैं, भारतमाला जैसे प्रोजेक्ट के घपले इन्हीं दफ्तरों की मदद से हो पाते हैं, और अधिक अफसर नरोन्हा की तरह खुलकर लिख तो नहीं पाते, लेकिन अपने नीचे के इस अमले की ताकत को जरूर जानते हैं। पटवारियों का इलाका बदलना कई बार जिला स्तर का न होकर राज्य स्तर का फैसला हो जाता है, अगर उनके हल्के में जमीनों के दाम बहुत अधिक हैं, विवाद बहुत अधिक हैं, या वहां पर कोई नई योजना-परियोजना आने वाली है। ऐसे इलाकों के पटवारी दफ्तर जाने पर वहां बड़े-बड़े बिल्डरों और कॉलोनाइजरों के कर्मचारी बैठे रहते हैं जो पटवारियों को पटवारी नक्शे सहित अपने मालिकों के दफ्तर ले जाने के लिए आए रहते हैं, और उसके बाद इन नक्शों का खेल शुरू होता है। किसी सत्तारूढ़ पार्टी को अपने पर मंडराते हुए खतरे को अगर कुछ कम करना है, तो उसके लिए पटवारी से लेकर राजस्व-एसडीएम तक के तीन-चार दफ्तर सबसे नाजुक जगह रहते हैं, जहां से सरकार के खिलाफ नाराजगी बढ़ती है, या घट भी सकती है। सरकार का बहुत सारा काम इन्हीं तीन-चार दफ्तरों में होता है, और छोटे और गरीब लोगों को तो इनसे ऊपर कहीं जाने की नौबत नहीं आती। कुल मिलाकर हम कहना इतना ही चाहते हैं कि सरकारों को चाहिए कि वे अपने नए अफसरों को अनिवार्य रूप से नरोन्हा की आत्मकथा पढ़वाएं। हो सकता है कि इस अघोषित और असंवैधानिक ताकत से जूझने का कोई रास्ता कोई अफसर निकाल सके।
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