23 जून 2026
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने जिस अंदाज में सत्ता खोई है, वह तो छोटी हार थी। चुनावी नतीजे निपट जाने के बाद जिस तरह इस पार्टी की संस्थापक, और सुप्रीमो ममता बैनर्जी अपने ही लोगों से हारती चली जा रही है, वह चुनावी हार से अधिक बड़ी है। और इसमें तो चुनाव आयोग का भी कोई योगदान नहीं है। ममता के विधायक, सांसद, पार्टी के पदाधिकारी, और तो और महापौर, और शायद नीचे के पंच-पार्षद भी, जिस तरह उन्हें छोडक़र जा रहे हैं, उससे एक कार्टून सूझता है कि बंगाल की शेरनी किस तरह अब भीगी बिल्ली ही रह गई है। किसी हारते हुए पर कार्टून बनाना तो नहीं चाहिए, लेकिन ममता बैनर्जी ने अपने तानाशाह राज में जिस अंदाज में विपक्षियों, विरोधियों, और आलोचकों के खिलाफ कार्रवाई की थी, कार्टूनिस्टों को जेल डाला था, एक-एक सोशल मीडिया पोस्ट पर गिरफ्तारी करवाई थी, तो अब उन पर कार्टून न बनाने, या तंज न कसने जैसी दरियादिली बरतने की जरूरत नहीं है। आज सुबह की खबर है कि ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के बागी विधायकों ने कल की बैठक में ममता को पार्टी अध्यक्ष पद से हटा दिया है, और उनके मंत्रिमंडल में रहे एक नेता को नया अध्यक्ष चुन लिया है। संगठन के बाकी पदाधिकारी भी इस बैठक में तय कर दिए गए हैं, और विधायक दल के नेता ने कहा है कि सब कुछ चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक कानूनी तरीके से किया गया है। ये बागी विधायक अपने को ही असली तृणमूल कांग्रेस कह रहे हैं, और ममता के साथ अब गिनती के सांसद-विधायक रह गए हैं ऐसा लगता है।
हम अभी तृणमूल कांग्रेस की घरेलू नौबत की बारीकियों पर जाना नहीं चाहते, लेकिन भारत में क्षेत्रीय दलों की दुर्गति क्यों हुई है, उस बारे में सोचने के लिए आज का ममता का बुरा हाल एक मौका देता है। बंगाल के साथ-साथ ही महाराष्ट्र में एक वक्त की असली शिवसेना, और आज की उद्धव सेना के सांसद भी उन्हें उजाडक़र शिंदे-सेना में जा रहे हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना छोडक़र, तोडक़र, भाजपा के साथ सरकार बनाने वाले एकनाथ शिंदे अब तक शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे को अपना नेता मानते हैं, और अपने को उनका वारिस। लेकिन बंगाल में तृणमूल के बागी विधायक और सांसद ममता के अस्तित्व को ही नहीं मानते। इन दो पार्टियों को देखें, तो दोनों ही बाकी तमाम क्षेत्रीय पार्टियों की तरह घरेलू और एक कुनबे की पार्टियां रही हैं। ममता के बाद उनकी पार्टी पर उनका भतीजा काबिज दिखता है, और बाल ठाकरे की शिवसेना पर उनके बाद बेटा उद्धव, और फिर उद्धव का बेटा दिखता है। लेकिन देश में बाकी क्षेत्रीय पार्टियों का हाल बहुत अलग नहीं है। तमिलनाडु में भी एक-एक कुनबे की पार्टियां घर के भीतर से चलती हैं, और एक पार्टी तो ऐसी भी रही जो कि अपने संस्थापक नेता के बाद पत्नी के बजाय प्रेमिका के पास चली गई। उधर कर्नाटक देखें तो वहां देवेगौड़ा की पार्टी उनके साथ-साथ बेटे की, और फिर बलात्कारी पोते की पार्टी होकर रह गई। आंध्र आएं, तो यहां भी एनटीआर के दामाद चन्द्राबाबू टीडीपी पर काबिज हुए, और चन्द्राबाबू का बेटा, नारा लोकेश भी अब उनका वारिस होने के साथ-साथ बाप के मंत्रिमंडल में मंत्री भी है। आंध्र-तेलंगाना में इस तरह की और भी पार्टियां रहीं, हैं, जो कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चल रही हैं। लेकिन सिर्फ दक्षिण को कोसना काफी नहीं होगा।
उत्तर भारत में सबसे बड़ी समाजवादी पार्टी बाप के बाद बेटे के कब्जे में है, और चाचा ने कोशिश कर देखी, वे किसी किनारे नहीं पहुंचे। यूपी जैसे राज्य में सपा भी अब हाशिए की पार्टी हो गई है, सबसे बड़ी पार्टी चाहे बनी हुई है। मुलायम सिंह यादव के बाद अखिलेश यादव, और अखिलेश के बाद चाचा, पत्नी, कितने लोग राज्य विधानसभा, या संसद में हैं, यह याद रखना बड़ी चुनौती का काम है। ठीक इसी तरह बगल के बिहार में लालू यादव की आरजेडी है, जो कि लालू, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, दोनों बेटों, और बेटियों के बीच कई किस्म से चर्चा में रहती है, लेकिन मुलायम-लालू का सारा समाजवाद कुनबापरस्ती तक सीमित रह गया, और इन्होंने साम्प्रदायिकता विरोध के नाम पर अपने परिवार की मिनी बस को राज्य और देश की राजधानी तक दौड़ाने के अलावा किसी और नेता को आगे नहीं बढऩे दिया। कांग्रेस पर कुनबापरस्ती की तोहमत लगाने वाले समाजवादी नेताओं का यह हाल रहा कि आज नीतीश कुमार को पटना से हटाए जाने, और दिल्ली ले जाने पर विरासत के लिए अपना बेटा ही सूझा, जो कि दिखने में किसी जिम्मेदारी के काम के लिए सक्षम भी नहीं दिख रहा है। अब उत्तर भारत से थोड़ा बाहर चलें, तो कश्मीर की दोनों पार्टियां कुनबों के भीतर दूसरी-तीसरी पीढ़ी की लीडरशिप में हैं। पंजाब में देखें, तो बादल कुनबा केन्द्र और राज्य दोनों जगह परिवार के जाने किन-किन लोगों की सत्ता देखते आया है, और बाप-बेटे, बहू, शायद दामाद भी सत्ता को हांकते रहे। पंजाब के बगल के हरियाणा को देखें, तो राज्य की शायद हर पार्टी एक-एक कुनबे की पार्टी है, और राष्ट्रीय पार्टियां भी इस प्रदेश में आकर कुनबे तक सीमित रह जाती हैं।
यह सिलसिला राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस में सबसे मजबूत दिखता है, और नेहरू, इंदिरा, राजीव, सोनिया, राहुल, प्रियंका तक कांग्रेस की लीडरशिप एक ही घर में रहती आई है। पूरे देश में कांग्रेस की हालत पिछले तीन चुनावों में जैसी दुर्गति झेल चुकी है, कमोबेश उसी तरह की दुर्गति अलग-अलग प्रदेशों में क्षेत्रीय पार्टियों ने झेली है, और इन सबके बीच एक सरीखी तो एक ही बात दिखती है कि इन सब पार्टियों पर एक-एक कुनबे के राज कायम हैं। तो क्या एक परिवार या एक व्यक्ति की लीडरशिप की पार्टियों के दिन लद गए? बंगाल के साथ-साथ तमिलनाडु के चुनाव हुए, और इन दोनों ही जगहों पर सत्तारूढ़ कुनबा खारिज कर दिया गया। कांग्रेस ने तो बीते एक-डेढ़ दशक में जितने चुनाव हारे हैं, उसके बाद हैरानी होती है कि उसके मौजूदा नेता राहुल गांधी किस हौसले के साथ देश का सामना करते हैं।
एक कुनबे का राज राजनीतिक पार्टियों पर कामयाब नहीं दिख रहा है। कोई ऐसा वक्त रहा होगा जब जनता के बीच ऐसे कुनबे की किसी करिश्माई लीडरशिप की कामयाबी बार-बार हो जाती रही होगी, लेकिन आज देश में चुनावों में जो सबसे कामयाब पार्टी है, उस भाजपा में एक-दो नेताओं का राज जरूर दिख रहा है, लेकिन पूरे संगठन पर किसी एक कुनबे का राज नहीं दिख रहा। मोदी और शाह संगठन पर अपने संपूर्ण एकाधिकार के बावजूद अपने परिवार के किसी और को स्थापित करने जैसी कमजोरी से मुक्त हैं। जहां तक भाजपा की राजनीति है, इन दोनों के किसी दूर के रिश्तेदार के भी संगठन में किसी छोटी सी जगह पर भी होने की खबर नहीं है। क्या इसलिए भाजपा आज देश में बाकी पार्टियों को कुनबापरस्त कहने का कुछ अधिक हक रखती है? क्या आज देश की जनता अपने बाद सिर्फ अपने भतीजे को देखने वाली मायावती को देखना भी नहीं चाहती? क्या आज क्षेत्रीय दल अपने-अपने इलाकों में लंबे दबदबे के बाद हाशिए पर चले जा रहे हैं?
जिस तरह कोई बहुत तेज आंधी आती है, तो उसमें जो होर्डिंग सबसे पहले मुड़ते या गिरते हैं, वे यूनीपोल रहते हैं, यानी एक खंभे पर खड़े हुए। भारतीय चुनावी राजनीति में जो पार्टियां एक कुनबे पर खड़ी हुई यूनीपोल कही जाने वाली होर्डिंग जैसी हैं, वे भाजपा की आंधी के सामने सबसे जल्दी ध्वस्त हो रही हैं। क्षेत्रीय पार्टियां एक-एक करके मटियामेट होती जा रही हैं, और राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस किसी किनारे नहीं पहुंच पा रही है। आज यह समझने की जरूरत है कि वे पार्टियां चौपट हो रही हैं, विभाजन का जख्म झेल रही हैं, जिन्होंने कुनबे से परे कोई लीडरशिप पनपने नहीं दी है। ऐसी पार्टियां सत्ता के भी बाहर हो चली हैं, और उनके ढांचे में भी दरारें पड़ चुकी हैं। राजनीति सिर्फ सत्ता के लिए हो यह तो जरूरी नहीं है, लेकिन अपनी विचारधारा को जमीन पर उतारने के लिए सत्ता की जरूरत भी होती है, और राहुल गांधी की कन्याकुमारी से कश्मीर तक की लोकप्रिय पदयात्रा चुनाव जीतने का विकल्प नहीं हो सकती। भारतीय राजनीति के विश्लेषकों को यह सोचना चाहिए कि क्या इस सदी के इस हिस्से में अब कुनबों के राज के सूरज डूब रहे हैं?
चलते-चलते यह बात सूझ रही है कि जिस तरह एक ही समुदाय के भीतर होने वाली शादियों और जन्म की वजह से वर्णसंकर होने का खतरा हो जाता है, खून से जुड़ी बीमारियों से अगली पीढिय़ां कमजोर हो सकती हैं, कुछ उसी तरह का खतरा भारत के ये राजनीतिक दल भी झेल रहे हैं।
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