25 जून 2026
अविभाजित आन्ध्रप्रदेश के समय से ही उस वक्त के मुख्यमंत्री चन्द्राबाबू नायडू ने बड़ी कोशिशें करके माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी कंपनी का भारत का मुख्यालय हैदराबाद लाने में कामयाबी पाई थी, और उसके बाद अटल सरकार चन्द्राबाबू की फरमाइशों को विविध भारती के फरमाइशी कार्यक्रम की तरह पूरा करती थी। हैदराबाद को अंतरराष्ट्रीय विमानतल बनाने से लेकर उसके विशाल शहरीकरण तक बहुत से काम नायडू ने अपने उस कार्यकाल में करवा लिए थे। आन्ध्र की राजधानी हैदराबाद को साइबराबाद भी कहा जाता था, और एक-एक करके प्रमुख अमरीकी टेक-कंपनियों के दफ्तर हैदराबाद आते रहे। बाद में चन्द्राबाबू की सत्ता गई, तेलंगाना राज्य बनने से राजधानी हैदराबाद भी आन्ध्र के हाथ से चले गया, और अब यह शहर तेलंगाना की राजधानी है। यहां अभी दो दिन पहले अमरीका की 250वीं सालगिरह के सम्मान में अमरीकी वाणिज्य दूतावास से लगी हुई एक प्रमुख सडक़ का नाम डॉनल्ड ट्रम्प एवेन्यू किया गया है। इसी सडक़ पर माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, और अमेजान जैसी प्रमुख अमरीकी कंपनियों के दफ्तर हैं। इस नामकरण के लिए वाणिज्य दूतावास में एक कार्यक्रम किया गया जिसमें राज्य के उपमुख्यमंत्री भी मौजूद थे। दिलचस्प बात यह है कि तेलंगाना में कांग्रेस सरकार है, और बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने एक सोशल पोस्ट में लिखा है कि एक तरफ तो राहुल गांधी कहते हैं कि राष्ट्रपति ट्रम्प भारतीय हितों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, तो फिर तेलंगाना में उनकी सरकार सडक़ का नामकरण ट्रम्प के नाम पर क्यों कर रही है? सीपीएम ने भी कांग्रेस की इस बात के लिए आलोचना की है।
देश और प्रदेश के हित कैसे अलग-अलग हो सकते हैं, कैसे इनके बीच आपस में टकराव हो सकते हैं, यह इसकी एक बड़ी शानदार मिसाल है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी लगातार राष्ट्रपति ट्रम्प की आलोचना कर रही है, और उसके सबसे मुखर नेता, राहुल गांधी हर हफ्ते ट्रम्प को कोसने का काम करते ही हैं। राहुल अकेले नेता नहीं हैं, देश के बहुत सारे और दलों के नेता भी ईरान को लेकर, इजराइल को लेकर ट्रम्प के खिलाफ हैं, और अब तो भारत में ट्रम्प की सबसे पसंदीदा पार्टी, भाजपा के नेताओं में भी ट्रम्प के पक्ष में बोलने लायक कुछ नहीं रह गया है। भारत सरकार भी ट्रम्प को लेकर एक असाधारण चुप्पी जारी रखे हुए है। ऐसे में ट्रम्प के नाम पर इस देश में अगर हवन-पूजन से परे कोई सरकारी नामकरण हो रहा है, तो वह कांग्रेस के राज वाले तेलंगाना में हुआ है।
आज जब ट्रम्प दुनिया में लाखों मौतों के लिए जिम्मेदार स्थापित हो चुका है, तब उसके नाम पर किसी प्रदेश की सरकार एक सडक़ का नाम रखे, यह शर्मनाक है। लेकिन हम तो तेलंगाना के बाहर बैठे हैं, और एक वैश्विक नजरिए की बात कर रहे हैं। एक राज्य के रूप में तेलंगाना के मुख्यमंत्री की पहली प्राथमिकता अपने राज्य का विकास है, जहां पर अमरीका की बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने भारतीय मुख्यालय लेकर बैठी हैं। तेलंगाना अमरीका में कम्प्यूटर से जुड़े हुए अच्छे-खासे पेशेवर भेजने वाला भारत का एक प्रमुख राज्य है। आन्ध्र-तेलंगाना की संस्कृति, और इन दोनों राज्यों का रिकॉर्ड एक जैसा रहा है, इसलिए यह याद रखने की जरूरत है कि अविभाजित आन्ध्र के समय से ही अमरीका जाकर काम करने वाले लोगों की गिनती इतनी बड़ी थी कि बीते एक-दो बरस में आन्ध्र के सीएम चन्द्राबाबू नायडू ने बार-बार लोगों से अपील की है कि उन्हें तीसरे और चौथे बच्चे भी पैदा करने चाहिए क्योंकि एक-दो बच्चे तो काम करने बाहर (मतलब अमरीका) चले जाते हैं। जिस राज्य की अर्थव्यवस्था, रोजगार अमरीका से इतने गहरे से जुड़े हुए हैं, यह जायज है कि वह ट्रम्प जैसे अहंकारी के अहंकार को सहलाने का काम करे क्योंकि यहां से गए हुए लाखों लोगों के वर्तमान और भविष्य ट्रम्प की सनक से जुड़े हुए हैं। एक सनकी के अहंकार को सहला देने में ही समझदारी है। और फिर यह दुनिया के इतिहास में चाहे एक सबसे बड़े मुजरिम की तरह दर्ज क्यों न होने वाला हो, भारत में तो केन्द्र सरकार ही ट्रम्प के दबदबे में दबी-सहमी चल रही है, ऐसे में तेलंगाना जैसे एक छोटे और नए राज्य ने कुछ चापलूसी कर दी, तो कौन सी ज्यादती कर दी?
लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों की बात कुछ अलग रहती है, किसी देश-प्रदेश की अर्थव्यवस्था को देखते हुए लोगों को कई तरह के गम खाने पड़ते हैं। जब सवाल रोजी-रोटी पर खतरे का रहता है, तो बहुत से लोगों को कम खाना पड़ता है, बहुत से लोगों को गम खाना पड़ता है। आज भारत के दूसरे प्रदेशों के मुकाबले तेलंगाना को अगर अमरीका का पसंदीदा प्रदेश बने रहना जारी रखना है, तो उसे ट्रम्प के खून सने हाथों को भी करकमल कहना होगा। हमें यह एक राष्ट्रीय शर्मिंदगी की बात लगती है कि दुनिया के एक सबसे बड़े युद्ध अपराधी के नाम पर भारत की एक सडक़ रहे, लेकिन अमरीका की आर्थिक गुंडागर्दी, मनमानी, तानाशाही, और ट्रम्पियापे की सनक के बीच कोई राज्य अगर अपने पापी पेट के लिए ऐसा अनैतिक काम भी कर रहा है, तो उससे सैद्धांतिक रूप से असहमत होते हुए भी हम उस मजबूरी को समझ सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय संबंध, कूटनीति, और विश्व व्यापार में नैतिकता बहुत दूर तक निभ नहीं पाती है। जिस इजराइल के हाथ लाखों बेकसूर फिलीस्तीनियों के लहू से सने हैं, उससे भारत न सिर्फ आज, बल्कि मनमोहन सिंह सरकार के समय से बड़े मनमोहक रिश्ते रखते आया है। दुनिया के सबसे बड़े जुल्मी देश का भारत सबसे बड़ा इम्पोर्टर है। ऐसे बहुत से अनैतिक काम अलग-अलग देश अलग-अलग समय पर करते हैं, और हर किसी में इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी जितना नैतिक साहस नहीं रहता कि जो ट्रम्प को सार्वजनिक रूप से कोस सके। भारत के अलग-अलग प्रदेशों से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति निभाने की उम्मीद कुछ ज्यादती होगी। पश्चिम बंगाल के बांग्लादेश से अच्छे या बुरे रिश्ते किसी समय भारत सरकार के नजरिए से कुछ अलग भी हो सकते हैं, श्रीलंका के तमिलों के मुद्दे पर तमिलनाडु भारत की श्रीलंका-नीति से कुछ परे भी चल सकता है। ऐसा ही हाल तेलंगाना का है जहां की सरकार ने खुद अपनी ही पार्टी की नीतियों से परे जाकर राजधानी की एक सडक़ का नाम दुनिया के एक सबसे घटिया इंसान, डॉनल्ड ट्रम्प के नाम पर रखा है।
देश और प्रदेश के अंतरराष्ट्रीय हितों में नैतिकता एक सीमा से अधिक नहीं निभ पाती है। इसी एक चापलूसी से खुश होकर अगर ट्रम्प वहां काम कर रहे हिन्दुस्तानी लोगों के लिए वीजा और दूसरे नियमों में कुछ रियायत कर दे, तो तेलंगाना जैसे राज्य का सबसे अधिक भला होगा। और फिर हैदराबाद में बसे हुए ट्रम्प विरोधी कम तो हैं नहीं, उनके घरों में रखे कालिख के डिब्बों को इस्तेमाल करने का एक मौका भी मिलेगा, और डॉनल्ड ट्रम्प एवेन्यू की तख्तियों पर कालिख पोतने का एक लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शन हैदराबाद में चलते ही रहना चाहिए। अमरीका चाहे तो इन तख्तियों की हिफाजत के लिए अपने कुछ फौजियों को तैनात कर सकता है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें