सेक्स के लिए दर्जनों लोगों को अपनी पत्नी पेश करने वाले, और दूसरे लोग

21 जून 2026

योरप के एक बड़े विकसित देश स्वीडन की खबर ऐसी दिल दहलाने वाली है कि मनोवैज्ञानिक भी इस मामले को पढक़र दहल जाएं। यहां एक  आदमी ने अपनी पत्नी को तरह-तरह की हिंसा की धमकियां देते हुए मजबूर किया कि वह अलग-अलग मर्दों से सेक्स करे, और उनसे उगाही भी करे। 61 साल के इस आदमी को करीब साढ़े चार साल की कैद सुनाई गई है, और उसने जिन 120 मर्दों के साथ सेक्स के लिए अपनी बीवी को धमका-धमकाकर मजबूर किया था, उनमें से 28 लोगों को अदालत ने कुसूरवार ठहराया है। अदालत ने पाया कि इस आदमी ने अपनी पत्नी का बेरहमी से शोषण किया, और उसने पत्नी को हिंसा की धमकियां दे-देकर जान-पहचान के लोगों और पड़ोसियों से भी सेक्स करने और वसूली करने, जगह-जगह कैमरे लगाकर इसकी रिकॉर्डिंग करने, और उसे ऑनलाईन प्रसारित करने के लिए भी मजबूर किया। अदालत ने इस जोड़े के नाम उजागर नहीं किए हैं। 

इस मामले से कुछ बरस पहले फ्रांस में सामने आए एक दूसरे मामले की याद ताजा होती है। उसमें भी डोमिनिक पेलिको नाम के यह आदमी अपनी पत्नी गिजेल पेलिको को करीब एक दशक तक नशीली दवाएं देकर बेहोश  करते रहा, और लोगों को ऑनलाईन छांटकर, ढूंढकर, उनसे संपर्क करके उन्हें बुलाते रहा, और अपनी पत्नी की बेहोशी की हालत उन लोगों से अपनी पत्नी से सेक्स करवाया, और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी यह शादीशुदा आदमी बेटियों वाला भी था, और उसके नाती-नातिन भी थे। जब पुलिस ने अश्लील फिल्मों के मामले में इस आदमी पर छापा मारा, और उसके डिजिटल उपकरणों से हजारों फिल्में मिलीं, तो पुलिस से पता लगने पर पत्नी को भी भरोसा नहीं हुआ कि उसके साथ इतने बरसों से ऐसा हो रहा है। 

अब मनोवैज्ञानिक इन दोनों मामलों का तरह-तरह से अध्ययन कर रहे हैं क्योंकि इंसानी सोच के कई पहलू इनमें सामने आए हैं, जो कि एक जटिल नौबत है, और विश्लेषण आसान नहीं है। ये दोनों ही मामले लंबी शादीशुदा जिंदगी के बाद के हैं, इन दोनों में कई किस्म के फर्क भी हैं, लेकिन कई किस्म की बातें एक सरीखी भी हैं। फर्क यह है कि फ्रांस के मामले में पति ने दस बरस तक पत्नी को नशा दे-देकर सुलाया, और उसकी बेहोशी की हालत में ही पहले से छांटकर रखे गए मर्दों को बुलाकर उनसे सेक्स करवाया। इनमें से कुछ मर्दों ने अदालत को यह भी कहा कि उन्हें पति ने यह कहकर बुलाया था कि पत्नी की इच्छा है कि वह बेहोश होने का नाटक करे, और वैसी हालत में कोई अनजान व्यक्ति उससे सेक्स करे। लेकिन स्वीडन की इस ताजा घटना में पति ने पत्नी को बेहोश करने की जहमत नहीं उठाई, हिंसा की धमकी दे-देकर, उंगलियां काट देने की बात कहकर, पूरे घर में जगह-जगह कैमरे लगाकर उसे एक मानसिक कैद में रखा था, और उसे अलग-अलग लोगों से सेक्स करने पर मजबूर करता था। 

इन दोनों ही मामलों में मनोवैज्ञानिकों का प्रारंभिक निष्कर्ष यह है कि ये इन पतियों की किसी यौन इच्छा का नतीजा नहीं है। उनका कहना है कि दोनों ही मामले पत्नी के शरीर पर, उसकी जिंदगी पर एक परले दर्जे का मालिकाना हक रखने की भावना के हैं, जिनमें पति को यह संतुष्टि मिलती है कि वे अपनी पत्नी की जिंदगी से, और उसकी देह से कुछ भी कर सकते हैं, कुछ भी करवा सकते हैं। दूसरे व्यक्ति पर पूर्ण अधिकार स्थापित करने की इच्छा। मनोविज्ञान में इसे ‘कोएर्सिव कंट्रोल’ यानी दमनकारी नियंत्रण कहते हैं। यह काबू शारीरिक हिंसा से भी अधिक खतरनाक होता है, और इसमें मुजरिम पीडि़त की स्वतंत्रता को धीरे-धीरे कम करता है, फिर निगरानी और धमकी का इस्तेमाल होता है, और आखिर में ऐसे हिंसक नियंत्रण के शिकार लगातार भय और असुरक्षा में जीने लगते हैं, और पूरी तरह समर्पण कर देते हैं। यह बात स्वीडन वाले मामले पर लागू होती है, लेकिन फ्रांस का मामला बेहोशी में करवाए गए बलात्कारों का था, और उस मामले में पति की इस हिंसा, और जुर्म की शिकार महिला ने अदालत में अपनी पहचान उजागर करने का फैसला खुद लिया। 

मनोवैज्ञानिक विश्लेषण यह कहते हैं कि इन दोनों ही मामलों में एक बात एक सरीखी है कि इस हिंसा और जुर्म की शिकार दोनों महिलाओं को इंसान की तरह मानना बंद कर दिया गया था। उनके पतियों ने उन्हें एक सामान की तरह देखना और इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, और बरसों तक, पकड़े जाने तक जारी रखा। मनोविज्ञान के कुछ दूसरे मामलों के विश्लेषण बताते हैं कि गुलामी के दौर से लेकर युद्ध अपराधों तक, हर जगह मुजरिम पहले अपने शिकार को इंसान मानना बंद कर देते हैं, और फिर सामान की तरह या साधन की तरह उनका इस्तेमाल करते हैं। 

इन दोनों ही मामलों का एक और पहलू दोनों ही देशों की अदालतों को परेशान करते रहा। वह यह कि इनके पति तो अपनी हिंसक सोच के चलते हुए इन्हें सामान की तरह इस्तेमाल करते रहे, लेकिन पतियों की जुटाए हुए दूसरे मर्द भी किसी दूसरे की पत्नी को उसी अमानवीय तरीके से इस्तेमाल करते रहे। इस सोच को समाज इंसानियत की इज्जत बचाने के लिए चाहे हैवानियत कह ले, चाहे कुछ और कह ले। सच तो यह है कि एक बेहोश या बेबस कैदी के साथ सेक्स के मौके को किसी ने नहीं छोड़ा। किसी को यह नैतिक रूप से गलत नहीं लगा, किसी की चेतना ने उसकी उत्तेजना को कम नहीं किया। पतियों की उत्तेजना पत्नियों पर पूरे काबू करने, और उनका सामान सरीखा इस्तेमाल करने से बढ़ रही थी, और पत्नियों के बेहोश या बेबस हाल में उनके साथ सेक्स करने वालों की उत्तेजना पर कोई नैतिक रोड़ा नहीं था। 

लोगों को याद होगा कि भारत के जम्मू में कठुआ नाम की जगह पर एक मंदिर के पुजारी को आठ बरस की एक खानाबदोश मुस्लिम लडक़ी हाथ लग गई, तो उसने खुद भी उससे बलात्कार किया, और अपने भतीजे सहित आधा दर्जन और लोगों से भी उससे बलात्कार करवाया। अदालत में यह साबित हुआ कि बच्ची का अपहरण किया गया, उसके साथ रेप हुआ, और उसका कत्ल कर दिया गया। आठ बरस की गरीब बच्ची के साथ बलात्कार, और हत्या करने वाले पुजारी सहित तीन लोगों को उम्रकैद हुई, और सुबूत मिटाने, और साजिश में भाग लेने के लिए तीन लोगों को पांच-पांच साल की कैद हुई जिसमें दो पुलिसवाले थे। मतलब यह कि किसी की नैतिकता देह-सुख में आड़े नहीं आती। हिन्दू पुजारी को मुस्लिम बच्ची से बलात्कार करते हुए जात-धरम का परहेज नहीं था, ईश्वर का नाम लेकर रोजी-रोटी कमाने वाले को इतनी कमउम्र बच्ची से सिलसिलेवार बलात्कार करवाने से परहेज नहीं था, और बाद में कत्ल करने से भी। देह-सुख तो पता नहीं आठ बरस की बच्ची से इन मर्दों को कितना मिला होगा, एक दूसरे इंसानी बदन पर इस हद तक अपना नियंत्रण करने की हवस शायद इसमें अधिक रही होगी, और यह भी कि ऐसे बदन को वे दूसरों में भी बांट सकते हैं। 

योरप जैसे विकसित इलाके के उच्च शिक्षित और संपन्न, बड़े लोकतांत्रिक समाजों में भी ये घटनाएं हुईं, और भारत जैसे सांप्रदायिकता से गुजरते देश में भी। लोगों को याद रखना चाहिए कि कठुआ के बलात्कारियों को बचाने के लिए जम्मू में राष्ट्रीय ध्वज के साथ रैलियां निकली थीं, और इस बच्ची की तरफ से मुकदमा लडऩे वाली एक हिन्दू महिला वकील का सामाजिक बहिष्कार सा हो गया था। आंदोलनकारियों का मुद्दा यह था कि एक खानाबदोश गरीब, बेचेहरा-बेनाम जैसी महत्वहीन लडक़ी से बलात्कार और उसकी हत्या जैसे महत्वहीन मामले में हिन्दू समाज के आधा दर्जन लोगों को फांसी के तख्ते तक क्यों ले जाया जाए? शायद उस वक्त आंदोलन में कोई हिन्दू मंत्री भी शामिल थे। 

लोगों को अपने आसपास के पड़ोसियों और परिवारों के इस तरह के जटिल, और हिंसक हालात की तरफ से आंखें खुली रखनी चाहिए। अगर लगे कि कोई जुर्म हो रहा है, तो पुलिस को खबर करनी चाहिए। फ्रांस और स्वीडन इन दोनों ही जगहों पर इन मामलों में जैसी हलचल चली होगी, किसी न किसी की नजरों में वह पहले आ जानी चाहिए थी, मामले के पुलिस तक पहुंचने के। लेकिन जिस तरह किसी भी तरह के मुफ्त या आसानी से हासिल सेक्स के लिए मर्द बिना किसी नैतिक बोझ के आनन-फानन तैयार हो जाते हैं, उसी तरह आसपास के लोग सामूहिक, सामुदायिक, या सामाजिक बचाव की जिम्मेदारी से मुक्त रहते हैं, फिर चाहे वह पड़ोस में किसी बंधुआ बाल मजदूर का मामला ही क्यों न हो। अभी चार दिन पहले ही मध्यप्रदेश में पति द्वारा गले में जंजीर-ताला डालकर बांधकर रखी गई एक महिला किसी तरह छूटकर थाने पहुंची थी। ऐसा तो हो नहीं सकता था कि परिवार या पड़ोस में किसी ने यह कैद पहले देखी न हो। 

(Daily Chhattisgarh)  

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