28 जून 2026
मैक्सिको की एक दिलचस्प खबर है कि वहां एक शहर में रात में कोई अनजान व्यक्ति मोटरसाइकिल चोरों का पीछा करता है, उन्हें पकड़ता है, और फिर उन्हें किसी खंभे के साथ टेप से बांध देता है, बगल में चोरी की मोटरसाइकिल छोड़ देता है, और चले जाता है। एक ही शहर में पिछले दस दिनों में पांच लोग ऐसे मिले हैं, जिन्हें बांध दिया गया था, कुछ के मुंह पर भी टेप लगा दिया गया था, थोड़ी-बहुत पिटाई-ठोकाई भी हुई थी, और उनके पास चोरी की गई मोटरसाइकिलें भी रखी थीं। जनता के बीच इस अनजान व्यक्ति को मैक्सिकन-बैटमैन कहा जा रहा है। बैटमैन के बारे में कॉमिक्स पढऩे वाले लोगों को पता होगा कि यह नकाब लगाया हुआ, लबादा ओढ़ा हुआ एक ऐसा चित्रकथा-किरदार रहता है जो कि दिन में बहुत अमीर कारोबारी और समाजसेवक रहता है, और रात में अपराधों से लड़ता है। उसके माता-पिता की हत्या बचपन में उसकी आंखों के सामने हो गई थी, इसलिए वह जिंदगी भर जुर्म से लडऩे की कसम खाया हुआ रहता है। बैटमैन करीब एक सदी पहले का किरदार है, उसकी शुरूआत कॉमिक्स से हुई थी, बाद में उस पर फिल्में, टीवी सीरियल, कार्टून, वीडियोगेम, और उपन्यास भी बने।
अब मैक्सिको के इस ताजा ‘बैटमैन’ को देखें, तो यह लगता है कि इस तरह के सुपरमैन, स्पाइडरमैन जैसे कई और किरदार भी कॉमिक बुक्स से लेकर फिल्मों तक आ, और छा चुके हैं, जो कि मुजरिमों से लड़ते हैं। हिन्दुस्तानी बच्चों ने हिन्दी में महाबलि वेताल, और जादूगर मैनड्रेक को पढ़ा है, जो पुलिस और कानूनी एजेंसियों से परे रहकर अपने अंदाज में जुर्म से लड़ते हैं, अपराधियों को पकडक़र कानून के हवाले करते हैं। ऐसे किरदार आमतौर पर मुजरिमों को सजा नहीं देते हैं, लेकिन उन्हें रोकने का काम जरूर करते हैं। मैक्सिको में भी इस बैटमैन ने लोगों को बांधकर यही किया है, यह एक अलग बात है कि पुलिस अभी बंधे मिले इन लोगों को मुजरिम तो नहीं मान रही है, उन्हें इस तरह बांधने के जुर्म का शिकार मान रही है। एक तरफ पुलिस अज्ञात बैटमैन को ढूंढ रही है, और दूसरी तरफ यह भी देख रही है कि क्या ये मोटरसाइकिलें चोरी की हैं?
इस बारे में सोचते हुए हमें कुछ दशक पहले मिजोरम के एक मुख्यमंत्री की वहां देश भर से पहुंचे संपादकों से कही हुई एक बात याद पड़ती है कि वहां के यंग मिजो एसोसिएशन ने प्रदेश में नशा रोकने को अपनी जिम्मेदारी मान लिया है, और कोई नशे का धंधा करते मिलते हैं, नशा लेकर चलते मिलते हैं, तो उन्हें सार्वजनिक खम्भों से बांधकर पीटा जाता है। इस कार्रवाई के चलते मिजोरम नशे से बचा हुआ है, ऐसा उन्होंने दो-ढाई दशक पहले बताया था। मैक्सिको का यह नया सिलसिला उसी किस्म का है जिसमें लोगों के बीच से कुछ लोग कानून को लागू करने की जिम्मेदारी खुद उठा लेते हैं, वे छोटी-मोटी जबर्दस्ती, ज्यादती करते हुए भी अधिक बड़े जुर्म रोकते हैं। अलग-अलग देश, काल, और परिस्थितियों में कानून हाथ में लेने का यह सिलसिला नैतिक, अनैतिक, जायज या नाजायज, कानूनी या जुर्म, कुछ भी हो सकता है। ऐसे हर मामले में विश्लेषण अलग-अलग होगा, और सरकारें ऐसी कोशिशों को आमतौर पर अपनी सत्ता को एक चुनौती मानेंगी। लेकिन कई मामलों में जहां सरकारें ऐसी संविधानेत्तर ताकतों को मंजूरी दे देती हैं, वहां बात कुछ अलग हो जाती है।
लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर में कुछ दशक पहले भारी हिंसा के बीच कांग्रेस के एक सबसे बड़े बस्तरिया नेता महेन्द्र कर्मा ने उस वक्त की राज्य की डॉ.रमन सिंह की भाजपा सरकार के साथ मिलकर जनता को हथियारबंद करके एक नक्सल विरोधी आंदोलन छेड़ा था, सलवा जुड़ूम। इस आंदोलन को शुरू में हमारे सहित बहुत से लोगों ने नक्सलियों का स्वस्फूर्त आंदोलन माना था, जो कि हिंसा के खिलाफ था। बाद में यह दिखा कि यह आंदोलन अपने आपमें बस्तर के आदिवासियों के खिलाफ ही इतना हिंसक हो गया कि नक्सल-समर्थक होने की तोहमत लगाकर सलवा जुड़ूम ने बड़े पैमाने पर कत्ल किए, गांव के गांव जला दिए, और शायद लाखों लोग प्रदेश छोडक़र पड़ोस के प्रदेश में जाने को मजबूर हो गए थे। बाद में सुप्रीम कोर्ट को दखल देकर सलवा जुड़़ूम को गैरकानूनी करार देना पड़ा, और जनता को हथियारबंद करके किसी मोर्चे पर उतारने की कांग्रेस पार्टी और भाजपा सरकार की इस मिलीजुली योजना को खत्म करना पड़ा।
आज भी अगर देखें तो गायों को बचाने के नाम पर देश में अधिकतर भाजपा-प्रदेशों में सरकार और पुलिस ने कथित गौ-तस्करों को रोकने का अघोषित जिम्मा, स्वघोषित गौरक्षकों को दे रखा है। ऐसे गौरक्षक पुलिस की खुली छूट से सडक़ों पर हिंसा करते हैं, पूरी तरह से कानूनी पशु व्यापार करने वाले व्यापारियों को भी मार डालते हैं। कुछ ऐसा ही सिलसिला कई प्रदेशों में अल्पसंख्यकों की उपासना सभाओं को लेकर चल रहा है, प्रार्थना सभाओं पर धर्मांतरण का आरोप लगाते हुए, या सडक़ों पर नमाज पढऩे को गैरकानूनी करार देते हुए अल्पसंख्यकों पर पुलिस मौजूदगी में, या पुलिस के साथ मिलकर भी हमले होते हैं, और यह सिलसिला सत्ता की कानूनी ताकत के गैरकानूनी विस्तार का है। मानो कानून लागू करने की सरकार की जिम्मेदारी को आऊटसोर्स कर दिया गया है।
एक-दो अपराधकथाओं में ऐसे ही गैरसरकारी समूह द्वारा जुर्म को रोकने की अपने स्तर की कोशिशों को खबरदार-शहरी का नाम दिया गया था, जिसमें जुर्म को समझने वाले, उसे रोकने के लिए कुछ करने की क्षमता रखने वाले जिम्मेदार और ईमानदार नागरिकों का एक समूह हो चुके जुर्म के मुजरिम तलाशता है, या न हुए जुर्म को रोकने की कोशिश करता है। यह भी जरूरी नहीं है कि जिन देश-प्रदेशों में ऐसे खबरदार-शहरी, जागरूक नागरिक, या समाजरक्षक किस्म के लोग सक्रिय रहते हों, वहां पर सरकारें कमजोर रहती हों। कई बार सत्ता अपने राजनीतिक, धार्मिक, या साम्प्रदायिक रूझान के चलते भी ऐसे संविधानेत्तर समूहों को ढील और छूट देती है। मिजोरम तकरीबन सौ फीसदी ईसाई राज्य है, और वहां चर्च से जुड़े हुए नौजवानों के संगठन यंग मिजो एसोसिएशन को नशे के खिलाफ सीधी कार्रवाई करने की छूट सरकार और चर्च दोनों की तरफ से दी गई थी, जो कि आज देश के कई दूसरे प्रदेशों में स्वघोषित गौरक्षकों को दी गई छूट सरीखी है। अब मैक्सिको में भी यह कहा जा सकता था कि बैटमैन चाहे जो हो, वह कुल मिलाकर तो मुजरिमों को पकड़ रहा है, इसलिए उसे क्यों पकड़ा जाए? एक वक्त जब मुम्बई पर अंडरवल्र्ड डॉन दाऊद इब्राहिम का राज चलता था, उस वक्त अगर अंडरवल्र्ड के मुजरिमों को ऐसा ही कोई खबरदार-शहरी गोली मारने लगता, तो हो सकता है कि पुलिस भी ऐसी हत्याओं को अनदेखा कर देती कि काम तो कुल मिलाकर पुलिस का ही हो रहा है, और मारे जा रहे लोग तो निर्विवाद रूप से मुजरिम और गुंडे हैं ही। अपना काम हल्का करने के लिए सरकारों को जनता के बीच के ऐसे, कानून हाथ में लेने वाले समूह सुहा भी सकते हैं, लेकिन उनके साथ सलवा जुड़ूम जैसा खतरा भी जुड़ा रहता है, यह नहीं भूलना चाहिए।
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