दीमक की खोखली की हुई सोच, अब ढांचा बड़ी तेजी से चरमरा और ढह रहा है

27 जून 2026  

 

भारत में आज चारों तरफ जिस भयानक दर्जे की अवैज्ञानिक बातें फैली हुई हैं, उनका नतीजा है कि धर्म और जाति की नफरत तो बढ़ी हुई है ही, तंत्र-मंत्र का झांसा देकर लोगों से उनकी जिंदगी भर की बचत भी ठग ली जा रही है। कहीं गड़ा खजाना दिलवाने का झांसा देकर, तो कहीं नोटों की बारिश करवाने के नाम पर लोग दसियों लाख ठग रहे हैं। दूसरी तरफ नौजवान, अधेड़, और बूढ़े मर्द नाबालिग, 5-7 बरस की, और तीन महीने तक की बच्ची से बलात्कार कर रहे हैं। पढ़ाई-लिखाई के बजाय लोगों को यह सिखाया जा रहा है कि किस तरह का एक मामूली सा धार्मिक रिवाज करने से बिना पढ़ाई भी बच्चे पास हो जाएंगे, और उन्हें कोई भी फेल नहीं कर पाएंगे। जातिवाद का हाल यह है कि अभी दो दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के महासमुंद में एक गैरदलित परिवार ने अपनी बेटी का कत्ल कर दिया क्योंकि उसने एक दलित से शादी कर ली थी। दूसरे धर्म के किसी कमजोर बूढ़े को अकेले घेरकर दर्जनों लोग मार-मारकर उसे अपने ईश्वर के नाम के नारे लगवा रहे हैं, और इसे गर्व समझ रहे हैं। यह पूरा सिलसिला बताता है कि लोगों की सोच किस दर्जे की अवैज्ञानिक हो चुकी है, और जब अंधविश्वास घर कर जाता है, तो लोकतांत्रिक सोच भी उसका शिकार हो जाती है, और लोग अपने ही घर की महिलाओं को, अपनी बहू-बेटी को दूसरे दर्जे की नागरिक मानने लगते हैं। जिस तरह कोरोना जैसा वायरस हवा में तैरते हुए एक मरीज से दूसरे स्वस्थ लोगों तक पहुंचकर संक्रमण फैलाता है, वैसे ही अवैज्ञानिक बातें दूर-दूर तक जाकर लोगों की वैज्ञानिक चेतना को खत्म करती है। 

भारत में आजादी के खासे बाद तक, अभी हाल के बरसों तक धर्म और पुराण के नाम पर गीता प्रेस जैसे प्रकाशन ने जितनी अवैज्ञानिक बातें फैलाई हैं, उसका भी भारतीय सोच को कुंद और मंद करने में बड़ा योगदान रहा है। गीता प्रेस को हिन्दू धर्म की किताबों को घर-घर तक पहुंचाने के लिए देश की कई सरकारों ने तरह-तरह से सम्मानित किया है, और दूसरी तरफ जो वैज्ञानिक चेतनासंपन्न लोग हैं, उन्होंने गीता प्रेस की लिखी गई नफरती और अंधविश्वासी बातों को खूब धिक्कारा भी है। आज जब भारतीय मानसिकता में अंधविश्वास और अवैज्ञानिक सोच लोगों की जिंदगी तबाह कर रही है, तब उन तमाम बातों पर एक नजर डालने की जरूरत है जिससे इस देश में लोगों की सोच बर्बाद हुई है। गीता प्रेस का 1953 का एक बालक अंक बहुत लंबा-चौड़ा है, और उसमें उस वक्त के हिसाब से भी कई बातें नफरती और जहरीली सिखाई गई थीं। उसमें बच्चों के लिए कहा गया था कि स्नान के बाद तहमद (लुंगी) बांधना पाप है, शास्त्र में लिखा है कि बिना लांग की धोती बांधकर चलना बड़ा पाप है, निक्कर (हाफपैंट), पतलून, या पाजामा भी नहीं पहनना चाहिए। इस वक्त भारत में आरएसएस की स्थापना के 25 से अधिक बरस हो चुके थे, और उसकी पोशाक में ही हाफपैंट था। आरएसएस और गीता प्रेस दोनों ही एक ही हिन्दू सोच को आगे बढ़ाने वाले थे, और गीता प्रेस का बालक अंक बच्चों को निक्कर और पतलून पहनने से मना कर रहा था। यह अंक बच्चों को सिखा रहा था कि सूर्य भगवान को जल दिए बिना जल पीना मूत्रपान के बराबर है। यह कहता है कि प्याज, लहसुन, शलजम, अंडे, मांस-मछली भूलकर भी नहीं खाने चाहिए, इनसे घोर पाप लगता है। होटल का बना भोजन भी नहीं करना चाहिए। चमार-भंगी, ईसाई, मुसलमानों के हाथ का कुछ भी खाना-पीना नहीं चाहिए। भूलकर भी बिस्कुट, डबलरोटी, चाय नहीं खाना-पीना चाहिए, चाय पीने से ब्रम्हचर्य नष्ट हो जाता है, धन, धर्म, शरीर सब कुछ स्वाहा हो जाता है, और मनुष्य सबकी चाय की झूठी प्यालियां चाटने वाला चटोकरा कुत्ता जैसा बन जाता है, और सब कुछ खोकर नरक की सैर करता है। भूलकर भी बर्फ इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, इसे हर जाति के लोग हर अपवित्र हालत में बनाते हंै, इसके पीने से धर्म नष्ट होता है, पाप लगता है। इसमें बच्चों के लिए कहा गया था कि यदि भूल से भी शराब में उंगली लग जाए, तो उंगली काट फेंकनी चाहिए। हर जाति के लडक़ों के साथ मत खेलो, अंग्रेजी खेल मत खेलो। 

मानो इतनी अवैज्ञानिक बातें, इतनी नफरत, और इतना जहर काफी न हो, गीता प्रेस के बच्चों के लिए कुछ दूसरे प्रकाशन बताते हैं कि ब्रम्हचर्य कितना महत्वपूर्ण होता है। इसके अंक कहते हैं कि 40 बूंद रक्त से एक बूंद वीर्य बनता है, और वीर्य का एक बूंद नष्ट होने पर 40 बूंद रक्त की हानि होती है। इसमें लिखा गया है कि वीर्य नष्ट करने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे सूख जाता है, उसकी तेजस्वीता और आयु कम हो जाती है। इसने एक वक्त बच्चों के लिए वीर्य रक्षा पर एक छोटी सी बुकलेट भी निकाली थी। अब इसे अगर गुप्त रोग विशेषज्ञों के दीवारों पर लिखे गए इश्तहारों के साथ जोडक़र देखें, तो बचपन से पैदा की गई इस दहशत को ऐसे डॉक्टर भुनाते हैं, और वे लिखते हैं कि बचपन की बुरी आदतों के कारण...। मतलब यह कि धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, चिकित्सा विज्ञान के किसी भी शोध निष्कर्ष के ठीक खिलाफ जाकर अंधविश्वास फैलाने का काम धार्मिक लबादा पहनकर गीता प्रेस जैसे संस्थान जाने आधी-पौन सदी कबसे करते आ रहे हैं। जिस तरह लकड़ी के बने हुए किसी ढांचे की बुनियाद को जब दीमक खोखला कर देती है, तो फिर उसे गिर जाने में अधिक वक्त नहीं लगता, उसे गिराने में अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती। आज हिन्दुस्तान में धर्म से आध्यात्म, आध्यात्म से एक काल्पनिक भारतीय संस्कृति, उससे योग की चमत्कारिक कल्पनाएं, विज्ञान के काल्पनिक इतिहास के किस्से, ऐसी बहुत सारी बातें जुड़ती चली गई हैं। धर्म और जाति की नफरत से लेकर तंत्र-मंत्र पर अंधविश्वास तक बहुत सी बातों के लिए ऐसी उपजाऊ हो चुकी जमीन बहुत काम आती है, और राह चलते लोग ईश्वर देखने के नाम पर लोगों को अपने पूरे गहने उतारकर भी दे देते हैं, और पति को भूतप्रेत से बचाने के नाम पर अभी चार दिन पहले ही एक महिला ने पौन करोड़ रूपए से अधिक तांत्रिक पर गंवा दिए हैं। आज जब दुनिया के बहुत से देश वैज्ञानिक और तकनीकी विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, एक तकरीबन पूरी तरह मांसाहारी प्रदेश, पश्चिम बंगाल की स्कूलों में दोपहर के भोजन में लंबे समय से बच्चों को दिया जा रहा अंडा बंद कर दिया गया है क्योंकि भाजपा सरकार ने यह खाना सप्लाई करने का काम इस्कॉन नाम के हिन्दू संगठन को दे दिया है, जो कि अंडे के साथ-साथ प्याज-लहसुन से भी परहेज करता है। बंगाल की अधिकतर आबादी के लिए ये खान-पान का अनिवार्य हिस्सा है, और अब एक हिन्दूवादी सोच ने बच्चों से खान-पान की उनकी सदियों की संस्कृति को छीन लिया है। आज चिकित्सा विज्ञान तो प्रोटीन की जरूरत के लिए अंडे खाने की सिफारिश करता है, और अब तो अंडे ऐसे आने लगे हैं जिनसे आगे चूजे पैदा नहीं होते। फिर भी प्रोटीन की इस जरूरत को जानते हुए भी हिन्दू धर्म के एक बड़े अल्पसंख्यक हिस्से की खान-पान की सोच को सारे धर्मों के मांसाहारी परिवारों के बच्चों पर भी लागू कर दिया जा रहा है। भारत सरकार का सर्वे, एनएफएचएस-5 (2019 से 21) बताता है कि बंगाल में मांस-मछली और अंडे खाने वाली आबादी 88 से 90 फीसदी है। यह भारत के सबसे अधिक मांसाहारी राज्यों में से एक है। लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा सत्ता में आने के पहले तक बंगाली मतदाताओं की आशंकाओं को हटाने के लिए हाथ में मछली लेकर प्रचार कर रही थी, उसके नेता बंगाल में मटन-मछली खाते हुए अपनी तस्वीरें खिंचवाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे थे। अब चूंकि चुनाव जीत लिया है, तो अब खान-पान तय करने का काम इस्कॉन को दे दिया गया है। 

किसी देश को वक्त की जरूरत के मुताबिक आगे बढऩे के लिए हजारों बरस पुरानी काल्पनिक कहानियों, और सैकड़ों बरस पुरानी रूढिय़ों से उबरने की जरूरत रहती है। आज भारत बीते दशकों के मुकाबले इनमें बहुत अधिक, और बहुत बुरी तरह उलझ गया है। इससे लोगों की तर्कशक्ति, न्यायशक्ति खत्म हो चली है। सभ्यता का विकास रिवर्स गियर लगा चुका है, देखते हैं टंकी का पेट्रोल खत्म होने तक यह कितना वापिस जा पाता है।

(Daily Chhattisgarh)   

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