24 जून 2026
तमाम सावधानियों के बावजूद चिकित्सा दाखिले के लिए होने वाले नीट इम्तिहान का जो तोड़ बिहार के नकल गिरोह ने निकाला है, उससे पूरी परीक्षा की विश्वसनीयता पर एक बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है। अगर ये पकड़ में नहीं आए होते, तो नकल गिरोह के शायद दो सौ लोग तो अकेले बिहार में ही असली परीक्षार्थियों की जगह इम्तिहान दे रहे थे। जो नौजवान मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे हैं, उनमें से होशियार लोगों को छांटकर, उन्हें नीट में बैठे कम उम्र अनुभवहीन बच्चों की जगह बिठाने की बायोमैट्रिक जालसाजी से नीट की पूरी सुरक्षा ही खत्म हो गई है। अब कहां-कहां पर, किस-किस प्रदेश में बिहार मॉडल खप गया है, कहां पकड़ में आ गया है, यह समझना आसान नहीं है। जहां यह जालसाजी खप गई, वहां इम्तिहान में कामयाबी पाने वाले बच्चों का क्या पता लगेगा? कुल मिलाकर यह कि नीट के बाद हुई यह री-नीट भी एक अलग किस्म से कमजोर निकली है।
देश के किसी भी चिकित्सा शिक्षा दाखिले के लिए होने वाली यह इम्तिहान पहली और आखिरी रहती है। इसे बार-बार दिया जा सकता है, लेकिन उसके लिए पूरे साल भर इंतजार करना पड़ता है। और संपन्न परिवारों के बच्चे कई बरस तक ऐसा बार-बार इंतजार करते हुए महंगे कोचिंग सेंटरों में तैयारी कर सकते हैं, और गांव-देहात से आए हुए, या कमजोर परिवारों के बच्चे भला क्या खाकर इनका मुकाबला कर सकते हैं? यह इम्तिहान राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसी दाखिला परीक्षा है जो भारत की आर्थिक और सामाजिक असमानता की बहुत बुरी तरह शिकार है। पिछली बार नीट के पर्चे आऊट होने, और इस बार उसमें बायोमैट्रिक जालसाजी की वजह से नकली परीक्षार्थियों के बैठने से यह सवाल भी उठता है कि क्या इस परीक्षा को एक अकेली परीक्षा रखना चाहिए, या यूपीएससी की तरह इसे दो चरणों की लिखित परीक्षा रखना चाहिए, जिसमें सबसे कमजोर बच्चे पहले इम्तिहान में ही बाहर हो जाएं, और बचे हुए बच्चों में दूसरे इम्तिहान में मुकाबला हो। आदर्श तो यह भी हो सकता था कि यूपीएससी की तरह इंटरव्यू भी किए जाते, लेकिन जब दसियों लाख बच्चे इस इम्तिहान में बैठते हैं, तो उनके इंटरव्यू संभव भी नहीं हैं, दूसरी तरफ इंटरव्यू लेने वालों के भ्रष्ट न होने की क्या गारंटी हो सकती है? वह एक अलग स्कैंडल होने लगेगा।
फिर एक बुनियादी सवाल यह उठता है कि बच्चे 12 बरस की स्कूली पढ़ाई करते हैं। इसके बाद वे दाखिला इम्तिहान देते हैं। स्कूली पढ़ाई में उन्हें किसी भी तरह खींचतान कर पास भर होना पड़ता है, उनका असली मुकाबला तो दाखिला-परीक्षा रहती है। अब ऐसे में पढ़ाई का महत्व क्या है? 12 बरस साल में शायद सवा सौ या डेढ़ सौ दिन, हर दिन चार-छह घंटे की पढ़ाई धरी रह जाती है। स्कूल के आखिरी एक-दो बरसों में दाखिला इम्तिहान के लिए कोचिंग ही सब कुछ रह जाती है। तो फिर देश में स्कूली पाठ्यक्रम, किताबें, किसी विषय को रखना, किसी को निकालना, इतिहास के किसी खास संस्करण को हटाना, किसी को छांटकर लाना, इतनी जहमत क्यों उठाई जाए? ऐसी पढ़ाई क्यों करवाई जाए जिस पढ़ाई का आगे के बड़े कॉलेज में दाखिले से कुछ भी लेना-देना न हो? क्यों न पहली क्लास से ही कोचिंग सेंटरों की ही स्टाइल शुरू कर दी जाए, और हर बरस पढ़ाई पर आधारित परीक्षा के बजाय मुकाबला-कोचिंग पर आधारित मुकाबला-इम्तिहान लिया जाए!
एक तो स्कूली पढ़ाई का पूरा सिलसिला इस देश में रटने पर केन्द्रित हो चुका है। बच्चों की कल्पनाशीलता, और रचनात्मकता का कोई काम स्कूली पढ़ाई में नहीं रह गया है, बल्कि अधिकतर स्कूलों में तो बच्चों के लिए किताबी पढ़ाई से परे दूसरी गतिविधियों की कोई संभावना भी नहीं रहती। जबकि आज हम देखें कि पूरी दुनिया में सुंदर पिचाई, या इस किस्म के दूसरे जो भी लोग अलग-अलग कंपनियों में, अलग-अलग पेशों में आसमान पर पहुंचे हुए हैं, जो बहुत कामयाब कारोबारी हैं, वे सारे के सारे अपनी कल्पनाशीलता, और रचनात्मकता की वजह से वहां तक पहुंचते हैं, रटने से नहीं पहुंचते। आज छोटे-छोटे से नौजवान लडक़े, नई कंपनी खड़ी करके इतना मौलिक काम करते हैं, कि कुछ बरस के भीतर ही उनमें से हर कोई कंपनी बेचकर हजारों करोड़ रूपए पाते हैं। इस ऊंचाई तक पहुंचने के लिए रटना कोई सीढ़ी नहीं होती, और न ही किसी तरह का दाखिला इम्तिहान लोगों को कल्पनाशीलता दे सकता है।
भारत की शिक्षा व्यवस्था के साथ कई दिक्कतें हैं। उनका जो भी समाधान सोचा जाए, उसके साथ कुछ अलग किस्म की दिक्कतें दिखती हैं। अब सिर्फ दाखिला इम्तिहान, और उसके लिए भारी लोकप्रिय कोचिंग-प्रणाली से परे का कोई रास्ता देखें, तो ऐसा लगता है कि स्कूलों की कम से कम बोर्ड इम्तिहानों के नंबरों का भी कुछ वजन आगे के ऐसे दाखिले में होना चाहिए। क्या 5वीं, 8वीं, 10वीं, और 12वीं में मिले नंबरों का भी कुछ महत्व दाखिला इम्तिहान में मिले नंबरों के साथ-साथ होना चाहिए? क्या दाखिला इम्तिहान अपने आपमें एक से अधिक हिस्सों में होना चाहिए? क्या ऐसा करने से आज जो दाखिला-माफिया भारत में सक्रिय है, उसका महत्व घटेगा, प्रश्नपत्रों के दाम घटेंगे, और जालसाजी कम होगी? इसकी कोई गारंटी तो है नहीं क्योंकि इस देश में लोग सौ रूपए का भी नकली नोट बनाते हैं, हो सकता है कि दोनों दाखिला इम्तिहानों के पर्चे अलग-अलग आऊट होने लगें, अलग-अलग बिकने लगें, और यह भी हो सकता है कि फर्जी परीक्षार्थी भी दोनों इम्तिहानों के लिए जुटा लिए जाएं। जब लोग जुर्म पर आमादा रहेंगे, तो वे रास्ते कई तरह के निकाल लेंगे। फिर भी नीट जैसी इम्तिहान का विकेन्द्रीकरण होना जरूरी है। एक दूसरा तरीका यह हो सकता है कि साल में एक बार के बजाय दो या तीन बार यह इम्तिहान करवाई जाए, और इसमें बैठने वाले बच्चे हर बार बैठ सकें, और अपने सबसे अच्छे नंबरों वाले इम्तिहान को मुकाबले के लिए छांट सकें।
भारत दोहरी चुनौती झेल रहा है। पहली तो यह कि स्कूली शिक्षा का महत्व एकदम ही अप्रासंगिक हो चुका है, और कोचिंग-दाखिला इम्तिहान का महत्व ही सब कुछ रह गया है। इससे पढ़ाई के 12 बरस अधिक काम के नहीं रह गए। बहुत से कोचिंग सेंटर तो फर्जी स्कूल भी चलाते हैं, और लाखों रूपए फीस देने वाले अपने बच्चों को स्कूलों में फर्जी हाजिरी दे देते हैं, और उन्हें खींचतान कर पास भी करवा देते हैं। बच्चों की जिंदगी के पहले 12 बरस की पढ़ाई इतनी महत्वहीन हो जाना इस देश के सामने एक बहुत बड़ा खतरा है। दूसरी बात यह कि एक अकेला दाखिला इम्तिहान पूरा भविष्य तय करे, यह भी गड़बड़ बात है। तीसरी चुनौती यह है कि सरकार चाहे एयरफोर्स का इस्तेमाल कर ले, चाहे आर्मी का, जालसाजी-धोखाधड़ी करने वाले लोग सरकार से चार कदम आगे चल रहे हैं। हमारे पास इस खराब नौबत का कोई समाधान नहीं है, लेकिन अगर सरकार और समाज को जिंदगी के असल मुद्दों पर बात करने का साहस हो, तो इस पर भी बात करनी चाहिए कि पढ़ाई, कोचिंग, और दाखिला इम्तिहान में क्या-क्या सुधार और फेरबदल हो सकता है। यह भी हो सकता है कि सरकार कोई सार्वजनिक चर्चा न चाहे, तो जनसंगठन, सामाजिक संगठन, या कोई शिक्षा संस्थान भी ऐसी बहस छेड़ सकते हैं। कुल मिलाकर इस मुद्दे पर बात होनी चाहिए, क्योंकि हिन्दुस्तान में नौजवान पीढ़ी का अनुपात आबादी में दुनिया में सबसे ज्यादा है, यह बात तसल्ली की नहीं है। अगर यह नौजवान पीढ़ी देश और दुनिया में काम करने के मुकाबले के लायक नहीं हैं, तो यह देश की संपत्ति न होकर देश पर बोझ है। इसलिए नीट के बहाने, इन सारे पहलुओं पर और भी चर्चा होनी चाहिए। क्या प्री-नीट इम्तिहान में सबसे कमजोर साबित होने वाले बच्चों को नीट में बैठने से रोका जा सकता है, ताकि वे किसी और कोर्स की तरफ ध्यान दें? इस सबके लिए शिक्षा विशेषज्ञों की जरूरत होगी, जो कि इसके अलग-अलग पहलुओं को जनता की जुबान में समझा सकें।
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