28 जून 2026
किसी नए काम की सोच, कल्पना, और तैयारी एक नए उत्साह से भर देती हैं। मारूति के एक पुराने इश्तहार की तरह पेट्रोल खत्म ही नहीं होता है। अभी दो दिन पहले पड़ोस के एक जिले की दो खबरंप आईं कि किस तरह एक नाबालिग लडक़े ने अपनी कुछ घंटे पहले बालिग हुई प्रेमिका को इसलिए मार डाला कि वह बालिग होते ही शादी की जिद कर रही थी। मारते-मारते भी उसने एक बार और सेक्स तो कर ही लिया था, जो कि बहुत सारे लडक़ों और आदमियों का खास मकसद होता है। उसके बाद फिर मार डालने से दोनों काम एक साथ हो लिए, मजा भी पा लिया, और छुटकारा भी पा लिया। थोड़ी सी अक्ल होती तो कैद पा लेने की भी कल्पना कर ली होती। इसी जिले में एक बाप-चाचा ने लडक़ी को एक दलित से शादी करने के एवज में मार डाला। इन दो खबरों से, और इस तरह की हर दिन आने वाली दूसरे प्रदेशों की दर्जनों खबरों से बार-बार यह सोचने को मजबूर हो रहा था कि क्या शादी के पहले कुछ ऐसा नहीं किया जा सकता कि बाद में न नीले ड्रम में बंद करना पड़े, न ही पहाड़ी से धकेलना पड़े?
ऐसा सोचते-सोचते लगा कि शादी के पहले लडक़े-लडक़ी, और उनके परिवारों की सारी उम्मीदों और उनके तौर-तरीकों पर खुलकर अगर एक बात हो जाती, तो हो सकता है कि कई रिश्ते बनने से ही रह जाते, और बाद में खून फैलने से बच जाता। ऐसा लगा कि कुछ बुनियादी सवालों पर दोनों पक्षों की बात पहले हो जानी चाहिए, लडक़े-लड़कियों की आपस में अलग बातचीत, और दोनों परिवारों के साथ बैठकर फिर अलग से बातचीत। इससे वे मामले तो सामने आ जाते जो बाद में एक बड़े टकराव का मुद्दा बन सकते हैं। सवालों की एक ऐसी लंबी फेहरिस्त मैं सोच रहा था जिसे लोगों को सुझा सकूं, और जो हिंसा की आशंका और उसके खतरे को कम कर सके। यह सोचते-सोचते मैंने चैटजीपीटी के सामने यह बात रखी कि मैं ऐसा एक कॉलम लिखना चाहता हूं, और इसके लिए मुझे कुछ ऐसे सवाल सुझाइए जिसकी लिस्ट मैं छाप सकूं। मैंने अपने मन की बातें इस एआई को बताईं, और कहा कि सौ से अधिक सवाल बताएं जिन्हें दोनों पक्षों से पूछा जा सके। मैंने यह भी कहा कि कुछ सवाल सिर्फ लडक़े से पूछने लायक हो सकते हैं, और कुछ सिर्फ लडक़ी से पूछने के लायक क्योंकि भारतीय समाज व्यवस्था में इन दोनों की कई किस्म की भूमिकाएं अलग-अलग हैं, उनसे उम्मीदें अलग-अलग रहती हैं।
इस पर करीब दो घंटे तक चैटजीपीटी से बात होती रही। मेरे सुझाए हुए अलग-अलग पहलुओं पर उसने करीब 110 सवालों की पहली लिस्ट दी, जिसमें पुराने प्रेमसंबंधों के बारे में भी सवाल थे। हमने यह तय किया था कि ये सवाल दोनों से अलग-अलग किए जाएंगे, और बाद में जवाबों को मिलाकर देखा जाएगा कि ये दोनों एक जोड़ा बनने लायक हैं या नहीं। एआई समझदार तो होता है, उसने तुरंत यह मान लिया कि भारत में कुंडली मिलाने से अधिक जरूरी जिंदगी को लेकर नजरिए का मिलान है। उसने कहा कि इन 110 में से 25-30 सवाल ऐसे हैं जिनमें गहरा मतभेद होने पर भविष्य में गंभीर संकट आ सकता है, विवाहेत्तर संबंध हो सकते हैं, अलगाव हो सकता है, या बात हिंसा तक जा सकती है।
फिर हमने आगे बात बढ़ाई, और चर्चा की कि ये सवाल इन दोनों का एक-दूसरे से पूछना इसलिए ठीक नहीं होगा कि पहले के जवाब सुनकर दूसरे के जवाब प्रभावित होने का खतरा रहेगा। इसलिए इन दोनों से अलग-अलग कोई और पूछे, तो ही ठीक रहेगा, और इस सवाल-जवाब के दौरान परिवार के कोई लोग मौजूद भी न रहें। हमने यह सोचा कि परिवार से परे के किसी गंभीर, परिपक्व, शुभचिंतक को यह जिम्मा दिया जा सकता है। अगला आधा-पौन घंटा हमने सवालों को और बढ़ाने, उनका क्रम तय करने पर लगाया। चैटजीपीटी ने बड़े नाजुक पहलुओं के सवाल शुरू में रख दिए थे, और मेरे सुझाने पर उसने तुरंत ही सुधार मान लिया, और हल्के सवालों से शुरूआत करके सबसे आखिर में सबसे गंभीर सवाल रखे। फिर हमने यह तय किया कि इन सवालों में से हर किसी पर एक जैसे नंबर रखना ठीक नहीं है। कई सवाल ऐसे रहेंगे जो दूसरे सवालों के मुकाबले अधिक नाजुक और अधिक महत्वपूर्ण रहेंगे। लेकिन एक सवाल काफी देर तक हम दोनों के बीच बने रहा कि ये इंटरव्यू कौन करें? चूंकि पिछली प्रेम या सेक्स लाईफ को लेकर भी सवाल थे, बच्चों को लेकर क्या सोच है, शादीशुदा सेक्स लाईफ को लेकर दोनों की क्या उम्मीदें हैं, ऐसे भी सवाल थे, इसलिए यह खतरनाक लग रहा था कि इनके जवाबों को बाद में कोई मजे की अफवाह में इस्तेमाल न करे। बहुत देर तक सवालों, उनके अलग-अलग वजन पर चर्चा करने के बाद जब मुझे इस पूरे सिलसिले का खतरा समझ आया, तो मैंने चैटजीपीटी से कहा कि डॉक्टर और मनोचिकित्सक तो सैद्धांतिक शपथ से बंधे रहते हैं, वकीलों को भी अपने मुवक्किल की गोपनीयता बनाए रखने की शर्त रहती है, लेकिन जो लोग इस तरह के सवाल संभावित जोड़े से करेंगे, उन पर तो नैतिकता का कोई बोझ भी नहीं रहेगा। इसलिए गोपनीयता बनाए रखने की कोई उम्मीद इनसे नहीं की जा सकती। हमारी बातचीत में सवाल बढक़र दो सौ पार कर चुके थे, और इनमें कई ऐसे सवाल थे जिनके ईमानदार जवाब उस लडक़े या लडक़ी को बदनाम करने का सामान जुटाकर दे सकते थे।
यहां पर आकर मैंने हथियार डाल दिए, चैटजीपीटी से कहा कि मैं इंसानों पर इतनी नाजुक बातचीत का भरोसा नहीं कर सकता। इसके लिए क्या एआई कोई मदद कर सकता है? क्या एआई सवाल पूछे, उसी को जवाब दे दिया जाए, और वह जोड़े की सोच का मिलान करके अपनी राय दे दे? चैटजीपीटी इसके लिए तैयार तो हुआ, लेकिन सवाल-जवाब के कुछ ऐसे पहलू उसने गिनाए जिनमें मशीन से परे इंसानी सामाजिक समझ से भी काम लेने की जरूरत पड़ेगी। लेकिन हमने इंसानों से पूरी तरह परे रखने के भी खतरे सोचे, तो एआई का कहना था कि इंटरनेट पर जो भी जवाब दिया जाएगा, वह कहीं न कहीं तो दर्ज होगा ही, और बाद में वैसी जानकारी जवाब देने वालों के खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकती है। इस पर हमने एक ऐसी तरकीब निकाली, हम कहना नाजायज होगा, चैटजीपीटी ने ही यह तरकीब सुझाई कि एक ऑफलाईन प्रोग्राम ऐसा बनाया जा सकता है जिसमें बिना इंटरनेट और वाईफाई से जुड़े हुए किसी कम्प्यूटर पर पहले से डले हुए एक प्रोग्राम में दोनों पक्ष अलग-अलग अपने जवाब दाखिल कर दें, और उसी कम्प्यूटर पर वह प्रोग्राम मिलान करके नतीजा दे दे, और इस विश्लेषण को तैयार करते ही दोनों पक्षों के भरे हुए सारे जवाब अपने-आप मिट जाएं, उनका कोई भी रिकॉर्ड न रह जाए।
अब सवाल यह उठा कि एक बार पूरे जवाब आ जाने के बाद जिंदगी के जिन पहलुओं पर दोनों पक्षों के बीच गहरी असहमति है, क्या इन दोनों को अलग-अलग उन पहलुओं पर दुबारा विचार करने का मौका देना चाहिए कि क्या वे उन्हें लेकर कुछ लचीले हो सकते हैं, या उन मुद्दों पर वे बिल्कुल भी समझौता नहीं कर पाएंगे? इसके लिए फिर यह रास्ता निकालना पड़ा कि यह कम्प्यूटर प्रोग्राम ही गंभीर और वजनदार असहमति के मुद्दों को अलग करके उन्हें फिर से दोनों पक्षों को अलग-अलग बता सकेगा कि क्या वे इन पर दुबारा गौर करना चाहेंगे?
इस तरह मेरे जैसे एक इंसान ने दो लोगों के बीच रिश्तों की संभावना तौलने की जो बात एआई के साथ शुरू की, वह बढ़ते-बढ़ते यहां तक आई कि मुझे इंसानों को उससे अलग कर देना पड़ा, क्योंकि इंसान मुझे खतरनाक लग रहे थे, एआई ने इस सिलसिले को इंटरनेट से अलग कर दिया क्योंकि उसे इंटरनेट पर भरी गई कोई भी जानकारी गोपनीयता के लिहाज से खतरनाक लग रही थी, और हम लोग बाहरी दुनिया से कटे हुए किसी एक कम्प्यूटर पर आकर टिके कि उसमें डला हुआ प्रोग्राम, दोनों पक्षों को एक-दूसरे के जवाब बताए बिना, उनके बीच की सहमति और असहमति की शिनाख्त कर सकेगा, उन्हें टटोल भी सकेगा कि वे कितनी असहमति के साथ जीने के लिए तैयार होंगे। फिलहाल ऐसे किसी जोड़े की मैचमेकिंग का जिम्मा मेरे सामने नहीं है, लेकिन चैटजीपीटी के साथ मिलकर मैंने सवालों की ऐसी लंबी लिस्ट, दो सौ से अधिक, तैयार की है, उनके वजन तैयार किए हैं, दो लोगों के जवाबों को जोडक़र कैसे देखा जाए, यह तय किया है। अब सरकार और समाज को चाहिए कि वे ऐसी कोई तरकीब लोगों को मुहैया कराए जो कि लोगों की निजता और गोपनीयता बनाए रखकर भी उनकी पसंद की तुलना कर सके। हिंसा और बेवफाई की खबरों को पढ़-पढक़र थके हुए दिमाग ने एक एआई के साथ यहां तक की योजना बनाई है, जो कि बिना किसी लागत के, मामूली कम्प्यूटर-जानकार भी पूरी कर सकते हैं। यह बात हर कुछ दिनों में मेरे भीतर उबलने वाली किसी नई कल्पना में से एक है, जिसका कोई ओर-छोर नहीं रहता, और अगर मैं नशा करता होता, तो यह चंडूखाने की गप्प कहलाती, बिना नशे अभी जो कह रहा हूं वह सच्ची और खरी बातचीत है। आज यह कॉलम वैसे भी लंबा हो गया है, इसलिए इसमें दो सौ सवालों को और जोडऩा मुमकिन नहीं है। वह कहानी, फिर कभी।
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