सुनो-सुनो ओ दुनिया वालों..., असली रोजगार जानो, और जानो कारीगर-अकाल आने को

जून 2026  

 

कनाडा में बसे हुए एक भारतवंशी की कंपनी बाज़ार के रुख़ के रिसर्च का काम करती है। उसके संस्थापक रितेश जैन ने अभी यह लिखा है कि दुनिया में सफेदपोश डिग्रीधारियों की अधिकता है, लेकिन ब्लू-कॉलर कहे जाने वाले कारीगरों और कामगारों की कमी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखी अपनी भविष्यवाणी में कहा है कि अगले 5 सालों में भारत से प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, बढ़ई, ड्राइवर, नर्स, और देखरेख-रखरखाव करने वाले लोग संपन्न देशों में जाएंगे, और भारत में ऐसे कामगारों की भारी कमी हो सकती है। यह उनका निजी पूर्वानुमान है, लेकिन दुनिया में अलग-अलग कई किस्म के जो तथ्य सामने आते हैं, वे भी कुछ इसी किस्म की तस्वीर बताते हैं। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम इन दोनों बातों को बहुत लंबे समय से लिखते आ रहे हैं कि भारत में कॉलेज की किताबी पढ़ाई करवाकर लोगों को बेरोजग़ार बनाने के बजाय उन्हें तकनीकी हुनर सिखाना चाहिए, और दुनिया के जिन देशों में उनके लिए भविष्य में जगह बन सकती है, वहां की ज़ुबान सिखानी चाहिए, वहां की तहज़ीब सिखानी चाहिए। हम लंबे समय से राज्य सरकारों के लिए भी यह बिन मांगी सलाह लिखते आए हैं, और अब एक रिसर्च संस्था चलाने वाले ने तकऱीबन ऐसी ही बात लिखी है। 

इस बारे में बड़ी सामान्य जानकारी यह है कि दुनिया के संपन्न देशों में आबादी गिरती चल रही है, और आबादी में बुजुर्गों का अनुपात बढ़ते जा रहा है। ऐसे लोग ख़ुद बहुत सारे तकनीकी काम नहीं कर सकते, और उन्हें तो ख़ुद की भी देखरेख के लिए लोग लगते हैं। दुनिया की कुछ दूसरी सलाहकार संस्थाओं का यह अंदाज़ है कि 2030 तक विकसित देशों में ही 4-5 करोड़ कामगारों की कमी आने जा रही है। और यह 2047 तक बढ़ती चलेगी, और विकसित अर्थव्यवस्थाओं में डिमांड और सप्लाई का यह फासला 20-25 करोड़ लोगों तक पहुँच जाएगा। एक अंदाज यह है कि कामगारों की कमी का कऱीब 50 फीसदी हिस्सा ड्राइवर, बढ़ई, प्लंबर, निर्माण-मजदूर जैसे लोगों का रहेगा। इसके अलावा 20 फीसदी रोजग़ार नर्सों के, और बुजुर्गों, बीमारों, और बच्चों की देखरेख के रहेंगे। एक अध्ययन बतलाता है कि अमरीका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, और दक्षिण कोरिया जैसे 20 प्रमुख देश मिलकर ही रोजगारों की ऐसी 90 फीसदी कमी झेलेंगे। यहां पर बुजुर्ग आबादी बढ़ती जा रही है, जन्मदर घटती जा रही है। इसलिए इनमें से बहुत से देश बहुत रफ्तार से अपनी प्रवासियों संबंधी नीतियां बदल रहे हैं, और हुनरमंद कामगारों के आने की बाधाओं को दूर करते जा रहे हैं। 

ऐसे में भारत एक बड़ा स्वाभाविक निर्यातक देश हो सकता है क्योंकि यहां की औसत उम्र 30 साल के नीचे हैं, और कऱीब 60 करोड़ आबादी 18-40 बरस की कामकाजी उम्र वाली है। दुनिया के कई विकसित देशों में कामकाजी लोगों की औसत उम्र 40 बरस से ऊपर है। आज भी भारत से बाहर गए हुए कामगार और दूसरे कामकाजी लोग हर बरस बहुत बड़ी विदेशी मुद्रा कमाकर घर और देश भेजते हैं। विश्लेषकों का यह मानना है कि भारत अगर अंतरराष्ट्रीय कामगार-कमी के मौके पर अपने-आपको तैयार रखता है, तो यहां से बाहर जाने वाले लोग 2030 तक दोगुना हो सकते हैं, और आज भारतीय कामगारों से दूसरे देशों से कऱीब 130 बिलियन डॉलर देश आता है, वह बढक़र 300 बिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है। भारत से किस तरह लोग बाहर जा सकते हैं इसका सबसे बड़ा उदाहरण केरल है जहां से पिछले दशकों में शायद लाखों नर्सें योरप, खाड़ी के देशों, और अमरीका चली गई हैं। जर्मनी, जापान, ब्रिटेन, कनाडा, और ऑस्ट्रेलिया पहले से भारतीय नर्सों, केयरवर्करों और हेल्थकेयर सहायकों की भर्ती बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा पूरे योरप में वेल्डर, इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, और मैकेनिक किस्म के कामगारों की भारी कमी चल रही है। 

अब इसके साथ भारत की हकीकत को जोडक़र देखें तो भारत में हर साल दसियों लाख बीए, बीकॉम, एमए, एमबीए, इंजीनियर वगैरह तैयार हो रहे हैं। भारत का ही एक सर्वे कहता है कि ग्रेजुएट लोगों में बेरोजगारी 30 फीसदी है, जबकि हुनरमंद-कामगारों, और अशिक्षित मजदूरों में बेरोजगारी 3 फीसदी से कम है। आज भी भारत में अच्छे हुनरमंद कारीगर ढूंढना कुछ मुश्किल है, और शहरों में इसीलिेए अर्बन कंपनी जैसी सेवाएं लोकप्रिय हो रही हैं। हम लगातार इस बात को उठाते आए हैं कि भारत को ग्रेजुएट-बेरोजगार पैदा करना बंद करना चाहिए। मिडिल स्कूल, या हाईस्कूल की पढ़ाई के बाद वहीं की इम्तिहान में ऐसे बहुत से बच्चों को छाँट लेना चाहिए जो कि आगे किताबी पढ़ाई में बहुत आगे नहीं बढ़ सकते। इनके लिए बहुत अच्छी ट्रेनिंग का इंतज़ाम करना चाहिए जो कि उन्हें किसी न किसी हुनरमंद काम की तरफ ले जाए। इस तकनीकी शिक्षण-प्रशिक्षण के साथ-साथ उनका रुख़ देखकर उन्हें विदेशी भाषाएं भी सिखानी चाहिए, ख़ासकर उन 20 देशों में से किसी की, जिनका जिक्र हमने ऊपर किया है, जो कि लगातार कामगारों की कमी का शिकार हैं, संपन्न हैं, और जहां कामगारों को अच्छा मेहनताना मिल सकता है। इन देशों का हाल यह है कि यहां कुशल-कारीगरों को ग्रेजुएट कर्मचारियों के मुकाबले अधिक कमाई होती है। 

अब कनाडा में बसे हुए एक भारतवंशी बाज़ार-विश्लेषक की बात का वजन हमारी बात से अधिक होना तय है, इसलिए हम अपनी ही पुरानी बात को इस नए ब्रांड-नेम के साथ एक बार फिर पेश कर रहे हैं। हमने इस बात को भी पहले कई बार लिखा था कि भारत के ही दूसरे प्रदेशों में जाकर काम करने के लिए लोगों को अंग्रेजी सीखनी चाहिए। भारत के कई प्रदेश अपनी क्षेत्रीय बोली, या भाषा के आक्रामक-मोह में ऐसे उलझे हुए हैं कि किसी को अंग्रेजी से परहेज़ है, और किसी को हिंदी से। ऐसे लोगों की देश के भीतर ही बेहतर भुगतान वाले प्रदेशों में जाकर काम करने की संभावनाएं सीमित रहेंगी। लोगों को आज अपनी बोली, अपनी भाषा से मोहब्बत के बजाय यह देखना होगा कि देश और दुनिया की कौन सी बोली, या भाषा उनके लिए भविष्य की बेहतर संभावनाएं रखती हैं। ख़ुद के कामयाब होने से ही लोग अपनी मातृबोली, या मातृभाषा का गौरव भी बढ़ा सकते हैं। केरल के लोग अगर मलियाली भाषा से परे कुछ नहीं सीखते, आंध्र-तेलंगाना के लोग तेलुगु से परे कुछ नहीं सीखते, तमिलनाडु के लोग तमिल, और महाराष्ट्र के लोग मराठी तक सीमित रहते, तो वे अपने प्रदेश की सरहदों तक ही सीमित रहते। इन सबने अपनी स्थानीय भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी को सीखा, और उसी से उनका दुनिया का आसमान खुला। 

भारत में उन्हीं प्रदेशों का भविष्य बेहतर रहेगा जो अपनी बेरोजग़ार फ़ौज, अपनी नौजवान पीढ़ी को ऐसी अंतरराष्ट्रीय  चुनौतियों और संभावनाओं के लिए तैयार करने की ज़हमत उठाएंगे। हम पूरी धार्मिक भावना से हर तीन महीनों में अपनी इसी बात को दोहराते हैं, जो कि नक्कारखाने में तूती की तरह अनसुनी रह जाती है। ख़ैर, अनसुना रह जाने का कोई मलाल हमें नहीं रहता, हम अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करते, तो उसका मलाल ज़रूर रहता।

(Daily Chhattisgarh)   

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