रोजगार न मिला तो भगवान की प्रतिमाएं कीं चूर-चूर, यह सोच समझने की जरूरत

28 अगस्त 2026  

 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शहर के बीच घनी बस्ती में दो दिन पहले एक बड़ा तनाव खड़ा हो गया जब शिव और हनुमान के मंदिर में प्रतिमाओं को तोडफ़ोड़ दिया गया। पथरीली प्रतिमाओं को तोडऩा आसान भी नहीं था, लेकिन सीसीटीवी फुटेज की जांच से पुलिस को मुजरिम का पता लग गया, वह उसी इलाके का एक अधेड़, हेमंत अग्रवाल था, जो भगवान से इस बात से खफा था कि वह उसे रोजगार में साथ नहीं दे रहा है, और वह बेरोजगार बना हुआ है। यह व्यक्ति मंदिर के पास ही अपनी माँ के साथ रहता है, और अपनी बेरोजगारी से हताश होकर उसने ईश्वर से हिसाब चुकता करना तय किया। यह तो गनीमत कि यह मामला धर्मान्धता या साम्प्रदायिकता तक नहीं पहुंच पाया, और सीसीटीवी कैमरों की मेहरबानी से पुलिस ने आनन-फानन आरोपी को पकड़ा, और उसके घर से छेनी और हथौड़ी बरामद भी कर लिए। 

अब एक बुनियादी सवाल यह उठता है कि 42 साल का एक आदमी शहर के बीच रहते हुए बेरोजगार बना हुआ है, और इसके लिए वह ईश्वर को जिम्मेदार ठहरा रहा है। उसके हाथ-पैर कम से कम इतने तो चल ही रहे हैं कि वह बजरंग बली की प्रतिमा और शिवलिंग को छेनी-हथौड़ी से तोड़ रहा है। छेनी-हथौड़ी से पत्थर तोडक़र बहुत से मजदूर जिंदगी भर अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। सडक़ों के किनारे हर शहर में साल में कुछ हफ्ते ऐसे सिलबट्टे बेचने वाले परिवार बैठकर पत्थर तोड़ते, दागते, उस पर निशान लगाते बैठे रहते हैं, और हर कुछ हफ्तों में वे शहर बदल लेते हैं। यह काम करते हुए आदमी भी दिखते हैं, और औरतें भी। राजस्थान या गुजरात तरफ के दिखने वाले ऐसे जोड़े सडक़ किनारे धौंकनी लगाकर लोहे को तपता लाल करके, घन के वार से आकार देते दिखते हैं, और अमूमन घन चलाने का काम घाघरा पहनी महिला ही करती है। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की एक विख्यात कविता है जिसकी शुरूआत ही इन शब्दों से होती है- वह तोड़ती पत्थर, देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर.., चढ़ रही थी धूप, गर्मियों के दिन, दिवा का तमतमाता रूप, उठी झुलसाती हुई लू, रुई ज्यों जलती हुई भू, गर्द जिनगीं छा गईं, प्राय: हुई दुपहर, वह तोड़ती पत्थर। 

नौकरी न मिलने, रोजगार न चलने, इम्तिहान में कामयाब न होने जैसी बातों को लेकर धर्म लोगों को भाग्यवादी बना देता है। लोग पिछले जन्म और अगले जन्म की धार्मिक सोच की कैद में आ जाते हैं कि पिछले जन्म के कुकर्मों का नतीजा है कि इस जन्म में तकलीफ मिल रही है। धर्म के प्रवचनकर्ता यह भी सिखा देते हैं कि अधिक कामना, लालसा, वासना नहीं रखनी चाहिए, और इससे स्वर्ग के रास्ते खुलते हैं। मतलब यह कि मरने के बाद स्वर्ग का लालच दिखाकर जीते जी किसी भी सुख से दूर रखने की कोशिश होती है। वजह यह है कि अगर लोगों के मन में वैराग्य और संन्यास भाव पैदा नहीं किया जा सकेगा, तो लोग अपने हक की लड़ाई लडऩे लगेंगे, सत्ता से उसे अपना जायज हक न मिलने की बात उठाने लगेंगे, मतलब यह कि वे इंसानों से तिलचट्टे भी बनने लगेंगे। धर्म नाम का औजार लोगों को भाग्यवादी इंसान बनाने में ओवरटाइम करते रहता है, और इसीलिए जिसके हाथ में हथौड़ी-छेनी की ताकत है, वह भी कोई काम तलाशने के बजाय ईश्वर को जिम्मेदार मानकर उसकी प्रतिमाओं को चूर-चूर कर रहा है। 

दक्षिण के एक महान समाजसुधारक पेरियार का तर्क था कि यदि समाज अन्याय को ईश्वर की इच्छा कहकर स्वीकार कर ले, तो शोषण कभी समाप्त नहीं होगा। भगत सिंह ने अपने प्रसिद्ध लेख, मैं नास्तिक क्यों हूँ, में लिखा था कि मनुष्य को अपनी समस्याओं का समाधान अपने साहस, बुद्धि, और संघर्ष से खोजना चाहिए, किसी दैवीय हस्तक्षेप की प्रतीक्षा में नहीं रहना चाहिए। राहुल सांकृत्यायन ने बार-बार यह लिखा है कि मनुष्य को अपनी दुर्दशा का कारण भाग्य या पिछले जन्म में नहीं, बल्कि वर्तमान सामाजिक, और आर्थिक परिस्थितियों में खोजने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी लिखा था कि अंधविश्वास मनुष्य को कर्मशीलता से दूर ले जाता है। कार्ल माक्र्स ने धर्म को जनता के लिए अफीम की तरह करार दिया था, और कहा था कि धर्म मनुष्य को वास्तविक कारणों से लडऩे के बजाय सांत्वना देकर शांत भी कर सकता है। कहने के लिए किसी-किसी धर्म में कर्म के लिए भी कुछ कहा गया है, गीता में कर्म पर जोर दिया गया है, बुद्ध ने कहा है कि दुख के कारणों को समझो, और उनका समाधान खुद ढूंढो, सिक्ख परंपरा ने मेहनत, और सेवा पर जोर दिया है, लेकिन धर्म के जो प्रचलित रूप आज चलन में हैं, उनमें धर्म का प्रचार और गुणगान करने वाले लोग यही सिखाते हैं कि बेलपत्र पर शहद लगाकर किसी खास धर्म की प्रतिमा पर चढ़ाने से ऐसा करने वाले के बच्चों को बिना पढ़े भी इम्तिहान में पास करने से कोई नहीं रोक सकते। धर्म के भीतर समझदारी की थोड़ी-बहुत गूढ़ बातें अगर हैं भी, तो उन्हें कपड़े में लपेटकर उपासना स्थलों की ताक पर धर दिया जाता है, और चलन में सबसे मूढ़ बातों को फैलाया जाता है जो कि लोगों को अंधविश्वासी और भाग्यवादी बना सकें। जिन्हें धर्म का गुणगान करना रहता है वे धर्मग्रंथों से कुछ चुनिंदा गूढ़ बातों को निकालकर पेश कर देते हैं, जो कि चलन में जमीन पर नहीं रहतीं। दूसरी तरफ ऐसी मूढ़ बातें जिनसे ईश्वर के एजेंटों की अपनी दुकानदारी चलती है, उन बातों को ही फैलाया जाता है, और उनसे लोगों को ऐसी दिमागी हालत में लाया जाता है कि वे सामाजिक, और आर्थिक शोषण के खिलाफ, सामाजिक अन्याय के खिलाफ लडऩे की सोच भी न सकें। अब भला आज उनके साथ जो इंसाफ पिछले जन्म के उनके कर्मों की वजह से हो रहा है, उसके खिलाफ वे इस जन्म में किससे लड़़ सकते हैं? इस तरह धर्म अपने उस बुनियादी मकसद को पूरा करने में बड़ा कामयाब रहता है जिसके लिए कबीलों के वक्त से वहां के सरदारों ने बैगा-गुनिया बनाए थे, बाद में समाज व्यवस्था विकसित होने के साथ-साथ वे अलग-अलग धर्मों के पुजारियों, और धर्मगुरुओं के चोगों में तरक्की पाते गए, और अपने वक्त के राजा, और कारोबारियों को उनके मकसद में मदद करते रहे। यह भूलना नहीं चाहिए कि मानव सभ्यता के इतिहास में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बसे हुए, एक-दूसरे से कोई भी संपर्क न रखने वाले समुदायों में भी राजा को ईश्वर का प्रतीक मानने का काम होते रहा। प्राचीन मिस्र में राजा को ईश्वर का दूत ही नहीं, बल्कि देवता माना जाता था, और उसकी आज्ञा का उल्लंघन धार्मिक अपराध। राज्य और धर्म घुले-मिले थे। कुछ पुरानी संस्कृतियों, जैसे मेसोपोटामिया में राजाओं को देवताओं द्वारा नियुक्त शासक माना जाता था। चीन में राजा को स्वर्ग का प्रतिनिधि माना जाता था। मध्यकालीन योरप में माना जाता था कि राजा सीधे ईश्वर द्वारा नियुक्त है, और उसके विरुद्ध विद्रोह ईश्वर के विरुद्ध माना जा सकता था। कई इस्लामी साम्राज्यों में खलीफा या सुल्तान को अल्लाह का प्रतिनिधि, या धरती पर अल्लाह की छाया कहा जाता था। हिन्दू धर्म के अलग-अलग हिस्सों में राजा को अलग-अलग देवताओं के अंशों से बना हुआ बताया जाता था। जापानी सम्राट को सूर्यदेवी का वंशज माना जाता है। इस तरह धर्म ने सिर्फ मनुष्य और ईश्वर का रिश्ता तय नहीं किया, उसने राजा और प्रजा के संबंध भी तय कर दिए जिसके तहत बेरोजगार होने, या असफल होने पर ईश्वर को जिम्मेदार मानकर उसे निशाना बनाने की दिमागी हालत आती है। दुनिया के इतिहास में आधुनिक लोकतंत्र राजा की दैवीय सत्ता की सोच से ऊपर उठकर जनता द्वारा निर्वाचित शासन व्यवस्था में तब्दील हुआ। लेकिन धर्मों के मूढ़ हिस्सों ने जनता को राजा को चुनते हुए भी अपनी बदहाली के लिए राजा को जिम्मेदार ठहराने की सोच से वंचित रखा, धर्म की गूढ़ बातों वाले ग्रंथों से परे, धर्म की मूढ़ बातों के व्यापक असर के बारे में बात की जानी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

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