आजकल
18 जुलाई 2011
सुनील कुमार
जब आसपास की जिंदगी कम दिलचस्प हो तो आज के जमाने में कस्बा बन चुकी दुनिया के बाकी हिस्सों में इंटरनेट से जाकर बहुत सी नई बातें देखी जा सकती हैं। जब आपके आसपास के लोग सिर्फ उन्हीं पुरानी बातों को करते रहें, जिनके बारे में कई-कई बार लिखा जा चुका हो तो फिर रौशनदान से बाकी दुनिया में झांकना ताजी हवा के एक झोंके जैसा होता है।
एक वेबसाईट पर लोगों से कहा गया कि वे अपना धर्म गढ़ें। हर मजहब कभी न कभी, किसी न किसी ने तो शुरू किया ही है। महावीर हों या बुद्ध, ईसा हों या गुरुनानक, हर धर्म की शुरुआत किसी एक इंसान की की हुई ही है। इसलिए इस वेबसाईट ने लोगों की हौसलाअफजाई की की वे भी एक नए धर्म की कल्पना करके उसके बारे में लिखें और हो सकता है कि लोगों को वह पसंद आ जाए और वे एक नए धर्म के संस्थापक बन जाएं!
इस पर करीब हजार लोगों ने लिखकर भेजा और फिर इस वेबसाईट को चलाने वाले ने इसे रोक दिया ताकि अब तक आई हुई कल्पनाओं को सामने रखा जा सके और उसके बाद फिर और लोगों की इंट्री को जगह मिले। इसमें धर्म के नाम, किस बात में इस धर्म की आस्था है, रीति-रिवाज और इसके त्यौहारों की जानकारी भेजना है। इसमें से कुछ कल्पनाओं को देखें।
धर्म का नाम आधुनिकता, आस्था यह कि आप खुद अपने ईश्वर हैं, आप अपने मूल्य, नैतिक-सिद्धांत, और दूसरे विश्वास खुद तय करते हैं। रीति-रिवाज-आपके जन्मदिन पर छुट्टी रहे और आप अपने-आपके लिए एक तोहफा खरीदें। प्रमुख छुट्टियां-पहला बड़ा त्यौहार आपका जन्मदिन रहेगा, दूसरी बड़ी छुट्टी शुक्रवार की रहेगी, हर कोई शुक्रवार को प्यार करता है (क्योंकि अगले दो दिन छुट्टी रहती है)। इस धर्म के मानने वाले अपनी छोटी-मोटी छुट्टियां खुद तय करेंगे।
मेरे हिसाब से यह एक बड़ी दिलचस्प दिमागी मशक्कत है कि लोग अपनी सोच से एक धर्म डिजाइन करें। जो लोग धर्म को गंभीरता से लेते हैं उनको भी अपने-अपने धर्मों में कोई खामी दिखती होगी या किसी खूबी की कमी लगती होगी। कोई रीति-रिवाज खटकता होगा और हो सकता है कि उस धर्म के त्यौहार की तारीखें अंगे्रजी कैलेंडर से तय होने वाली छुट्टियों के साथ मेल न खाती हों। हम हिंदुस्तान के ही अलग-अलग धर्मों को देखें तो ही इनके बहुत से बुरे रीति-रिवाज लोगों को खटक सकते हैं, खटकते हैं। जिन लोगों का धर्म पर भरोसा है और जिन्हें अभी तक अपने धर्म की मरम्मत करने की जरूरत नहीं लगी है, वे भी जब एक नया धर्म गढऩे की मशक्कत करेंगे तो उन्हें अपने मौजूदा धर्म के खराब हिस्सों और पुर्जों की समझ आने लगेगी।
मैं अपनी निजी सोच में एक खालिस नास्तिक हूं और इस नाते न तो मुझे कभी धर्म की जरूरत लगती और न ही ईश्वर की। इतनी सी बात को खुले-खुले कहकर मैं पिछले महीनों में ताजा-ताजा दोस्त बने बहुत से मुस्लिम फिलीस्तीनियों को खो भी चुका हूं। जब मैं ईश्वर के बारे में खुलकर कुछ कड़वी बातें लिख देता हूं तो उसके बाद फेसबुक पर या इंटरनेट की ऐसी दूसरी दोस्ती वाली साईटों पर कुछ दोस्तों की तरफ से सिर्फ चुप्पी मिलने लगती हैं। नास्तिक की जगह शायद बहुत किस्म की आस्थाओं में है ही नहीं। क्योंकि मैं किसी अलग किस्म के ईश्वर पर आस्था रखने को भी मुझे किसी खास किस्म के ईश्वर की तरफ खींचने की कोशिश कुछ धार्मिक प्रचारवादी लोग कर सकते हैं। लेकिन जो ईश्वर के अस्तित्व को ही न मानता हो उस पर तो ऐसे प्रचारवादी लोगों को पहली कमरतोड़ मेहनत तो आस्था पैदा करने के लिए करनी पड़ेगी। चट्टान पर फसल लगाना मुश्किल होता है। इसलिए मेरी आस्था से बेहतर एक कोई दूसरी आस्था मुझे टिकाने की गुंजाइश भी जब नहीं होती तो कुछ लोग मुझे बिल्कुल ही फि जूल का मान लेते हैं।
अब ऐसे में अगर मेरे जैसे कड़क नास्तिक को भी अगर एक धर्म डिजाइन करने को कहा जाए और शर्त यह हो कि यह करना ही है तो अभी यहां तक पहुंचकर मैं सोचना शुरू कर रहा हूं कि मेरा धर्म किस किस्म का होगा?
मुझे लगता है कि दुनिया की जो सबसे पुरानी बिरादरियां हैं, ऐसे मूल निवासी या आदिवासी लोगों की आस्था शायद मेरी सोच के अधिक करीब होगी जो कि प्रकृति से जुड़ी हुई है। ईश्वर की धारणा से परे, कुदरत पर मेरा अपार भरोसा है। कुदरत पूरी तरह वैज्ञानिक है और उसके तमाम फैसलों के पीछे न्यायसंगत और तर्कसंगत कारण नजर आते हैं। कुछ लोगों को लग सकता है कि बादल फटने, बाढ़ आने, भूकंप आने या कहीं सूखा पड़ जाने के पीछे कौन सी न्यायसंगत और तर्कसंगत, वैज्ञानिक वजह हो सकती है। कुदरत का अपना एक सिलसिला है और उसने कभी इंसानों को कोई गारंटी कार्ड नहीं दिया था कि उसके ज्वालामुखी कभी फटेंगे ही नहीं, या भूकंप कभी आएगा ही नहीं। उसकी धरती का ढांचा इसी किस्म का है कि वह ऐसी तमाम उथल-पुथल से गुजरता ही रहेगा और इंसान को इस बहुत ही कुदरती हलचल के बीच रहना सीखना होगा।
यह कुदरत की तरफ से एक ऐसी चुनौती भी इंसानों को है जिसका सामना करते हुए, जिससे बचने की तरकीबें निकालते हुए वह एक ऐसी तैयारी कर ले रहा है जिससे कि आगे जाकर किसी दूसरे ग्रह पर जाने या वहां के लोगों के यहां आने पर वह तमाम बड़ी हलचलों के लिए तैयार रहे। मतलब यह कि जिसे हम प्राकृतिक विपदा कहते हैं वह एक चुनौती अधिक है और सीखने का मौका अधिक है। अगर ज्वालामुखी की मार से बचना लोग नहीं सीख पाएंगे तो कल किसी दूसरे ग्रह से आए हुए लोगों के किसी किस्म के लावे से बचना वे कैसे सीखेंगे? और बाद सिर्फ किसी एक किस्म की नौबत से जूझने की न होकर, उस नौबत के चलते एक तकनीक बना लेने की भी है और उसे परख लेने की भी है।
तो बात हो रही थी कुदरत को लेकर मेरी समझ की, जिसके तहत आम बोने से आम हासिल होता है और बबूल लगाने से बबूल। यहां इन दोनों मिसालों का मतलब आम का बेहतर होना या बबूल का बेकार होना नहीं है, सिर्फ दो अलग-अलग किस्मों की चर्चा है। धर्म को लेकर या ईश्वर को लेकर अगर मुझे अनिवार्य रूप से कोई सोच बहस के लिए बनानी ही है तो मेरा ईश्वर अच्छे कामों का एक ऐसा प्रतीक होगा जो कि इसके अलावा किसी और तरह की आकाशवाणी करने वाला नहीं होगा। वह न तो आदमी होगा और न ही औरत। जिस तरह कुछ आदिवासी समाजों में पेड़, नदी, सूरज, चांद, जानवर और एक-दो और प्राकृतिक प्रतीक उपासना के केंद्र माने जाते हैं उसी तरह कुदरत का यह सिलसिला मेरे लिए एक प्रतीक रहेगा कि जैसा बोओ वैसा काटो।
अब जैसा कि इस वेबसाईट ने पूछा है कि ऐसे नए धर्म के रीति-रिवाज क्या होंगे? तो मुझे लगता है कि मेरे इस धर्म को मानने वाले लोगों के लिए उपासना के तरीके और रीति-रिवाज शायद ऐसे हों कि रोज के अपने काम करने की ताकत का एक हिस्सा अनिवार्य रूप से जो सबसे जरूरतमंद तबके या सार्वजनिक हित के लिए लगाए उसी को माना जाएगा कि उसने पूजा की है। हर किसी के चारों तरफ इतने कमजोर तबके रहते हैं कि उनके लिए बहुत कुछ करने की गुंजाइश उनसे अधिक ताकतवर हर किसी के पास होती है। इसलिए जो ऐसा करे उसी ने उपासना की है यह माना जाए।
जहां तक किसी खास दिन छुट्टी की बात है, तो आज के दुनिया के शहरी ढांचे में जिस जगह जो सबसे सहूलियत का दिन है उसी दिन छुट्टी रहनी चाहिए। आज भी भारत के सरकारी इंतजाम में साल के कुछ दिन किसी कमिश्नरी या किसी जिले में स्थानीय स्तर पर छुट्टियां तय होती हैं। यह सिलसिला तमाम छुट्टियों के लिए होना चाहिए और जिस जगह जो त्यौहार मनाए जाते हैं या जिस जगह जिन छुट्टियों का इस्तेमाल मजे के लिए हो सकता है, वैसी छुट्टियां उन दिनों पर रखना चाहिए। लेकिन मेरा यह भी मानना है कि धार्मिक रिवाजों की कट्टरता की तरह यह भी तय होना चाहिए कि छुट्टियों के हकदार वे ही लोग रहें जो कि उसके पहले के काम के तमाम दिनों में ईमानदारी से अपना काम कर चुके हों। जिस तरह हज पर जाने वाले लोगों के लिए शर्तों की एक लंबी फेहरिस्त रहती है कि ऐसे इंसान अपनी तमाम पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियां पूरी कर ली हैं या नहीं? उसके बाद ही किसी को हज पर जाने का हकदार माना जाता है। वैसा ही इंतजाम मेरी सोच के धर्म में हफ्तावार छुट्टी के लिए भी होना चाहिए कि उस बीच में लोगों ने ईमानदारी से काम के दिनों में अपना काम किया है या नहीं? और जिस तरह ताकत के एक हिस्से का, वक्त के एक हिस्से का इस्तेमाल कमजोर तबकों की भलाई के लिए किया है या नहीं? तो ऐसे काम और ऐसी उपासना कर लेने के बाद ही लोग छुट्टी मनाएं ऐसा मेरा मानना है।
लेकिन आज यहां की यह चर्चा मैंने अपनी सोच के लिए नहीं छेड़ी है। यह तो मैंने अलग-अलग आस्थावान और आस्थाहीन लोगों के सोचने के लिए शुरू की है कि वे अपनी मौजूदा आस्था और उससे जुड़े ईश्वर, रीति-रिवाज, उपासना और छुट्टियों के बारे में क्या सोचते हैं और उसमें क्या फेेरबदल उन्हें बेहतर लगेगा? इसके अलावा कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो कि एक बिल्कुल नए धर्म की कल्पना करें। लोगों के दिल-दिमाग को ऐसी कसरत में डालने के लिए यह बात यहां शुरू की गई और शायद कुछ लोग इसे आपसी बातचीत में या अपने मन में आगे भी बढ़ाएं।
18 जुलाई 2011
सुनील कुमार
जब आसपास की जिंदगी कम दिलचस्प हो तो आज के जमाने में कस्बा बन चुकी दुनिया के बाकी हिस्सों में इंटरनेट से जाकर बहुत सी नई बातें देखी जा सकती हैं। जब आपके आसपास के लोग सिर्फ उन्हीं पुरानी बातों को करते रहें, जिनके बारे में कई-कई बार लिखा जा चुका हो तो फिर रौशनदान से बाकी दुनिया में झांकना ताजी हवा के एक झोंके जैसा होता है।
एक वेबसाईट पर लोगों से कहा गया कि वे अपना धर्म गढ़ें। हर मजहब कभी न कभी, किसी न किसी ने तो शुरू किया ही है। महावीर हों या बुद्ध, ईसा हों या गुरुनानक, हर धर्म की शुरुआत किसी एक इंसान की की हुई ही है। इसलिए इस वेबसाईट ने लोगों की हौसलाअफजाई की की वे भी एक नए धर्म की कल्पना करके उसके बारे में लिखें और हो सकता है कि लोगों को वह पसंद आ जाए और वे एक नए धर्म के संस्थापक बन जाएं!
इस पर करीब हजार लोगों ने लिखकर भेजा और फिर इस वेबसाईट को चलाने वाले ने इसे रोक दिया ताकि अब तक आई हुई कल्पनाओं को सामने रखा जा सके और उसके बाद फिर और लोगों की इंट्री को जगह मिले। इसमें धर्म के नाम, किस बात में इस धर्म की आस्था है, रीति-रिवाज और इसके त्यौहारों की जानकारी भेजना है। इसमें से कुछ कल्पनाओं को देखें।
धर्म का नाम आधुनिकता, आस्था यह कि आप खुद अपने ईश्वर हैं, आप अपने मूल्य, नैतिक-सिद्धांत, और दूसरे विश्वास खुद तय करते हैं। रीति-रिवाज-आपके जन्मदिन पर छुट्टी रहे और आप अपने-आपके लिए एक तोहफा खरीदें। प्रमुख छुट्टियां-पहला बड़ा त्यौहार आपका जन्मदिन रहेगा, दूसरी बड़ी छुट्टी शुक्रवार की रहेगी, हर कोई शुक्रवार को प्यार करता है (क्योंकि अगले दो दिन छुट्टी रहती है)। इस धर्म के मानने वाले अपनी छोटी-मोटी छुट्टियां खुद तय करेंगे।
मेरे हिसाब से यह एक बड़ी दिलचस्प दिमागी मशक्कत है कि लोग अपनी सोच से एक धर्म डिजाइन करें। जो लोग धर्म को गंभीरता से लेते हैं उनको भी अपने-अपने धर्मों में कोई खामी दिखती होगी या किसी खूबी की कमी लगती होगी। कोई रीति-रिवाज खटकता होगा और हो सकता है कि उस धर्म के त्यौहार की तारीखें अंगे्रजी कैलेंडर से तय होने वाली छुट्टियों के साथ मेल न खाती हों। हम हिंदुस्तान के ही अलग-अलग धर्मों को देखें तो ही इनके बहुत से बुरे रीति-रिवाज लोगों को खटक सकते हैं, खटकते हैं। जिन लोगों का धर्म पर भरोसा है और जिन्हें अभी तक अपने धर्म की मरम्मत करने की जरूरत नहीं लगी है, वे भी जब एक नया धर्म गढऩे की मशक्कत करेंगे तो उन्हें अपने मौजूदा धर्म के खराब हिस्सों और पुर्जों की समझ आने लगेगी।
मैं अपनी निजी सोच में एक खालिस नास्तिक हूं और इस नाते न तो मुझे कभी धर्म की जरूरत लगती और न ही ईश्वर की। इतनी सी बात को खुले-खुले कहकर मैं पिछले महीनों में ताजा-ताजा दोस्त बने बहुत से मुस्लिम फिलीस्तीनियों को खो भी चुका हूं। जब मैं ईश्वर के बारे में खुलकर कुछ कड़वी बातें लिख देता हूं तो उसके बाद फेसबुक पर या इंटरनेट की ऐसी दूसरी दोस्ती वाली साईटों पर कुछ दोस्तों की तरफ से सिर्फ चुप्पी मिलने लगती हैं। नास्तिक की जगह शायद बहुत किस्म की आस्थाओं में है ही नहीं। क्योंकि मैं किसी अलग किस्म के ईश्वर पर आस्था रखने को भी मुझे किसी खास किस्म के ईश्वर की तरफ खींचने की कोशिश कुछ धार्मिक प्रचारवादी लोग कर सकते हैं। लेकिन जो ईश्वर के अस्तित्व को ही न मानता हो उस पर तो ऐसे प्रचारवादी लोगों को पहली कमरतोड़ मेहनत तो आस्था पैदा करने के लिए करनी पड़ेगी। चट्टान पर फसल लगाना मुश्किल होता है। इसलिए मेरी आस्था से बेहतर एक कोई दूसरी आस्था मुझे टिकाने की गुंजाइश भी जब नहीं होती तो कुछ लोग मुझे बिल्कुल ही फि जूल का मान लेते हैं।
अब ऐसे में अगर मेरे जैसे कड़क नास्तिक को भी अगर एक धर्म डिजाइन करने को कहा जाए और शर्त यह हो कि यह करना ही है तो अभी यहां तक पहुंचकर मैं सोचना शुरू कर रहा हूं कि मेरा धर्म किस किस्म का होगा?
मुझे लगता है कि दुनिया की जो सबसे पुरानी बिरादरियां हैं, ऐसे मूल निवासी या आदिवासी लोगों की आस्था शायद मेरी सोच के अधिक करीब होगी जो कि प्रकृति से जुड़ी हुई है। ईश्वर की धारणा से परे, कुदरत पर मेरा अपार भरोसा है। कुदरत पूरी तरह वैज्ञानिक है और उसके तमाम फैसलों के पीछे न्यायसंगत और तर्कसंगत कारण नजर आते हैं। कुछ लोगों को लग सकता है कि बादल फटने, बाढ़ आने, भूकंप आने या कहीं सूखा पड़ जाने के पीछे कौन सी न्यायसंगत और तर्कसंगत, वैज्ञानिक वजह हो सकती है। कुदरत का अपना एक सिलसिला है और उसने कभी इंसानों को कोई गारंटी कार्ड नहीं दिया था कि उसके ज्वालामुखी कभी फटेंगे ही नहीं, या भूकंप कभी आएगा ही नहीं। उसकी धरती का ढांचा इसी किस्म का है कि वह ऐसी तमाम उथल-पुथल से गुजरता ही रहेगा और इंसान को इस बहुत ही कुदरती हलचल के बीच रहना सीखना होगा।
यह कुदरत की तरफ से एक ऐसी चुनौती भी इंसानों को है जिसका सामना करते हुए, जिससे बचने की तरकीबें निकालते हुए वह एक ऐसी तैयारी कर ले रहा है जिससे कि आगे जाकर किसी दूसरे ग्रह पर जाने या वहां के लोगों के यहां आने पर वह तमाम बड़ी हलचलों के लिए तैयार रहे। मतलब यह कि जिसे हम प्राकृतिक विपदा कहते हैं वह एक चुनौती अधिक है और सीखने का मौका अधिक है। अगर ज्वालामुखी की मार से बचना लोग नहीं सीख पाएंगे तो कल किसी दूसरे ग्रह से आए हुए लोगों के किसी किस्म के लावे से बचना वे कैसे सीखेंगे? और बाद सिर्फ किसी एक किस्म की नौबत से जूझने की न होकर, उस नौबत के चलते एक तकनीक बना लेने की भी है और उसे परख लेने की भी है।
तो बात हो रही थी कुदरत को लेकर मेरी समझ की, जिसके तहत आम बोने से आम हासिल होता है और बबूल लगाने से बबूल। यहां इन दोनों मिसालों का मतलब आम का बेहतर होना या बबूल का बेकार होना नहीं है, सिर्फ दो अलग-अलग किस्मों की चर्चा है। धर्म को लेकर या ईश्वर को लेकर अगर मुझे अनिवार्य रूप से कोई सोच बहस के लिए बनानी ही है तो मेरा ईश्वर अच्छे कामों का एक ऐसा प्रतीक होगा जो कि इसके अलावा किसी और तरह की आकाशवाणी करने वाला नहीं होगा। वह न तो आदमी होगा और न ही औरत। जिस तरह कुछ आदिवासी समाजों में पेड़, नदी, सूरज, चांद, जानवर और एक-दो और प्राकृतिक प्रतीक उपासना के केंद्र माने जाते हैं उसी तरह कुदरत का यह सिलसिला मेरे लिए एक प्रतीक रहेगा कि जैसा बोओ वैसा काटो।
अब जैसा कि इस वेबसाईट ने पूछा है कि ऐसे नए धर्म के रीति-रिवाज क्या होंगे? तो मुझे लगता है कि मेरे इस धर्म को मानने वाले लोगों के लिए उपासना के तरीके और रीति-रिवाज शायद ऐसे हों कि रोज के अपने काम करने की ताकत का एक हिस्सा अनिवार्य रूप से जो सबसे जरूरतमंद तबके या सार्वजनिक हित के लिए लगाए उसी को माना जाएगा कि उसने पूजा की है। हर किसी के चारों तरफ इतने कमजोर तबके रहते हैं कि उनके लिए बहुत कुछ करने की गुंजाइश उनसे अधिक ताकतवर हर किसी के पास होती है। इसलिए जो ऐसा करे उसी ने उपासना की है यह माना जाए।
जहां तक किसी खास दिन छुट्टी की बात है, तो आज के दुनिया के शहरी ढांचे में जिस जगह जो सबसे सहूलियत का दिन है उसी दिन छुट्टी रहनी चाहिए। आज भी भारत के सरकारी इंतजाम में साल के कुछ दिन किसी कमिश्नरी या किसी जिले में स्थानीय स्तर पर छुट्टियां तय होती हैं। यह सिलसिला तमाम छुट्टियों के लिए होना चाहिए और जिस जगह जो त्यौहार मनाए जाते हैं या जिस जगह जिन छुट्टियों का इस्तेमाल मजे के लिए हो सकता है, वैसी छुट्टियां उन दिनों पर रखना चाहिए। लेकिन मेरा यह भी मानना है कि धार्मिक रिवाजों की कट्टरता की तरह यह भी तय होना चाहिए कि छुट्टियों के हकदार वे ही लोग रहें जो कि उसके पहले के काम के तमाम दिनों में ईमानदारी से अपना काम कर चुके हों। जिस तरह हज पर जाने वाले लोगों के लिए शर्तों की एक लंबी फेहरिस्त रहती है कि ऐसे इंसान अपनी तमाम पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियां पूरी कर ली हैं या नहीं? उसके बाद ही किसी को हज पर जाने का हकदार माना जाता है। वैसा ही इंतजाम मेरी सोच के धर्म में हफ्तावार छुट्टी के लिए भी होना चाहिए कि उस बीच में लोगों ने ईमानदारी से काम के दिनों में अपना काम किया है या नहीं? और जिस तरह ताकत के एक हिस्से का, वक्त के एक हिस्से का इस्तेमाल कमजोर तबकों की भलाई के लिए किया है या नहीं? तो ऐसे काम और ऐसी उपासना कर लेने के बाद ही लोग छुट्टी मनाएं ऐसा मेरा मानना है।
लेकिन आज यहां की यह चर्चा मैंने अपनी सोच के लिए नहीं छेड़ी है। यह तो मैंने अलग-अलग आस्थावान और आस्थाहीन लोगों के सोचने के लिए शुरू की है कि वे अपनी मौजूदा आस्था और उससे जुड़े ईश्वर, रीति-रिवाज, उपासना और छुट्टियों के बारे में क्या सोचते हैं और उसमें क्या फेेरबदल उन्हें बेहतर लगेगा? इसके अलावा कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो कि एक बिल्कुल नए धर्म की कल्पना करें। लोगों के दिल-दिमाग को ऐसी कसरत में डालने के लिए यह बात यहां शुरू की गई और शायद कुछ लोग इसे आपसी बातचीत में या अपने मन में आगे भी बढ़ाएं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें