सियासी समझ बढऩे के दौर से गुजर रहा है देश
संपादकीय
12 जनवरी 2012
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री गिलानी वहां के सुप्रीम कोर्ट के कटघरे में खड़े हुए हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह हिंदुस्तान में कानून मंत्री सलमान खुर्शीद चुनाव आयोग और राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री के कटघरे में खड़े हैं। पाकिस्तान से भी अधिक अभी हिंदुस्तान में सरकार के लोग कानूनी शिकंजों में फंसे हुए हैं। अपने देश के राष्ट्रपति के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के मामले में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री वहां की सबसे बड़ी अदालत की अवमानना के दोषी ठहराए जाते हंै, या नहीं, और उसके बाद पाकिस्तान में क्या होता है इस पर दुनिया की नजरें टिकी हंै। परमाणु हथियारों वाले, एक बहुत संवेदनशील भौगोलिक स्थिति वाले देश में सरकार पर मंडरा रही इस मुसीबत पर गिलानी को ही नहीं, उनसे मनमुटाव रखती फौज, दूसरी सियासी पार्टियों के अलावा पाकिस्तान की सरहदों के बाहर, दूसरे मुल्कों को भी है। उसके पड़ोसी देश भारत में अदालतें आए दिन सरकार की बखिया उधेड़ ही रही हैं। दूसरी तरफ देखें तो अमरीका जैसे देश में जहाँ पर लोगों में कानूनी जागरूकता हिंदुस्तान के मुकाबले बहुत अधिक है, वहां भी सरकारों के लोग इस तरह फंसे हुए नहीं दीखते। इस फर्क को समझने की जरूरत है। और समझने के लिए हिंदुस्तान के भीतर की पश्चिम बंगाल सरकारों को समझ लेना भी कुछ हद तक काफी होगा।
आज तामिलनाडू में हर कुछ दिनों के बाद एक या दूसरा मंत्री गिरफ्तार हो रहा है। यह तो ठीक है कि जयललिता का अंदाज अपने विरोधियों के खिलाफ कानूनी कारवाई का रहता ही आया है, लेकिन जिस तरह के मामले इन भूतपूर्व मंत्रियों के खिलाफ आ रहे हैं उससे लगता है कि उन्होंने गलत काम तो किए ही हुए है। दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल को देखे तो सिद्धार्थ शंकर रे की कांग्रेस की आखिरी सरकार के बाद से अब तक, वहां वामपंथी दलों के सरकार में रहते हुए, उनकी संस्कृति के कारण राज्य में राजनीतिक जागरुकता काफी रही है। वामपंथी मोर्चे की नीतियों या राज्य में उसकी प्रशासनिक काबीलियत पर तो सवाल उठते रहे, लेकिन तीन दशकों के वाम मोर्चे के राज मे इसके किसी भी मंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार की कोई बड़ी शिकायत सामने नहीं आई, ना कोई इसलिए जेल गया। तमिलनाडु में जयललिता जैसे आए दिन डीएमके सरकार के मंत्रियों को जेल भेज रही है, जैसे कर्नाटक में नेता जेल भेजे गए हैं, जैसे केन्द्र सरकार के आला अफसर मंत्रियों के खिलाफ आए दिन आपाराधिक मामले चलते दिख रहे हंै, वैसा वाम मोर्चा सरकार के साथ कभी नहीं हुआ। चूंकि सरकार ऐसी थी, विपक्ष भी ऐस ही उभरा ममता बैनर्जी और उनकी पार्टी पर वामपंथी हिंसा का आरोप तो लगाते है,लेकिन उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई आरोप कभी नही लगा सके। दूसरी तरफ ममता बैनर्जी और वाम मोर्चे के बीच सांप-नेवले जैसे संबंध होते हुए भी दोनों ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा कर किसी को जेल भेजने की मांग नहीं की। इसका कारण वामपंथी दलों द्वारा बरती गई राजनीतिक जागरुकता है। वहां जनता देखती है कि बड़े-बड़े मंत्री कैसे छोटे मकानों में सादगी से रहते हंै, कैसे उनके घर वाले सार्वजनिक साधनों और ऑटोरिक्शा में घूमते हैं।
दूसरी तरफ हमारे सामने मायावती सरकार की मिसाल है जिसके 20-22 मंत्री बर्खास्त हो चुके हंै। वाम पंथी दलों की सरकारें देख चुके राज्यों से परे देश के तमाम हिस्सों में, लोगों का राजनीतिक परिपक्वता और जागरुकता से वास्ता नहीं होना ही वह कारण है जिसके चलते नेता, अफसर, और व्यापारी कायदे कानून के लिए घोर अपमान दिखाते रहे हंै, और जनता भी उनसे ऐसे ही बर्ताव की आदी बनी रही है। लेकिन देश में अब माहौल जैसा बदल रहा है। सूचना अधिकार के कारण आम नागरिक जब यह जान सकता है कि कहां, क्या गलत हो रहा है, तो हालात अब पहले जैसे नहीं रह सकते। एक बार कहीं कुछ गलत होने की जानकारी सामने आने पर संचार साधन, गलत कामों पर रोक के लिए जि़म्मेदार एजेंसियां सब एक साथ हरकत में आ सकती हैं, और बहुत से मामलों में आती भी है।
लेकिन अब भी पुराने ढर्रे पर चलने की कोशिश कर रहे रसूखदार लोग, अपने हिसाब से कायदे कानून के मतलब निकालने वाले, उन्हें अपने फायदे के लिये इस्तेमाल करने या उन्हें तोडऩे वाले लोगों को वक्त के बदलते रुख के हिसाब से बदलने में या तो तकलीफ हो रही है, या वह इस बदलाव को समझ पाने लायक अक्लमन्द नहीं है, या वह इस बदलाव को आने से रोकने के लिए अपनी पूरी ताकत लगाना चाहते हैं। अपने पैसों और ताकत के बूते सरकार को प्रभावित करने वाले यह समझ नहीं पा रहे हंै कि बस एक अर्जी लगाने भर से उनकी गलतियां जनता के सामने आ सकती हंै। बरसों तक अपनी हरकतों को फाईलों में दबाकर उन पर कुंडली मारकर बैठने वाले इस तबके को अब भी यह समझ में नहीं आ रहा है कि सूचना अधिकार के तहत दायर अर्जी को वह अंतकाल तक नहीं अटका सकते। उसके कारण जानकारी सामने आ जाने पर वह कानून के डंडे से अपने रसूख के दम पर नहीं बच सकते। सरकार की कठपुतली एजेंसियां उन्हें छोड़ भी दें, तो सीवीसी, सीआईसी, कैग जैसी संवैधानिक एजेंसियां उन्हें नहीं छोड़ेंगी, और उनसे बच भी जाए, तो अदालतें उन्हें कानून के दायरे में रहने पर मजबूर करेंगी। सूचना का अधिकार और सूचना का आसानी से हासिल हो जाना, यह दोनों बातें ऐसी हंै, जिन्होंने देश में पारदर्शिता और राजनीतिक जागरुकता की नींव मजबूत करना शुरू कर दिया है।
लेकिन देश चलाने वाले नेताओं , नौकरशाहों, और कार्पोरेट जगत के लोग बदलाव की इस लहर का अन्दाज लगा कर जागने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। यही कारण है कि आज संगठित अपराधों, माफिया डॉनो,अंडर्वल्र्ड सरगनाओं, यहां तक कि आतंकवादियों के भी मुकाबले, इस तबके के गुनाहों के किस्से ज्यादा सुनने में आ रहे हैं। हम मानते हैं कि यह पारदर्शिता की तरफ बढऩे के रास्ते पर संक्रमण का दौर है, जिससे देश गुजर रहा है, और आने वाले दो पांच सालों तक नेताओं अफसरों के इस तरह संवैधानिक संस्थाओं, अदालतों से फटकार खाने, और अदालतों से सज़ा पाने के वाकये और देखने मिलेंगे। चुनाव में अपराधी तत्वों का सहारा लेना तो राजनीतिक दलों ने बंद नहीं किया, लेकिन पहली बार उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में भी राजनीतिक दलों के अपराधियों से किनारा करने की बात भी की गई। यह सच है कि यह बदलाव बहुत देर से आ रहा है और इसकी राह में रोड़े अटकाने की जितनी कोशिशें हो सकती हैं, स्वार्थी तत्व कर रहे हंै, लेकिन जितनी ही ऐसी कोशिशे होंगी उतने ही ज्यादा वक्त तक ऊंचे रसूखदार पदों पर बैठे लोगों और उनके लिऐ अपने बटुवे खाली करने वालों को अदालतों में सजा पाते देखते रहेंगे। भारत में वामपंथी दलों ने जैसी राजनीतिक जागरुकता अपने शासन वाले इलाकों में फैलाई है, वह मंथर चाल से ही सही, सूचना अधिकार, संवैधानिक संस्थाओं, एजेंसियों, और अदालतों के जरिये आहिस्ता-आहिस्ता दूसरे इलाकों में भी फैल रही है।
विकास से बदलती तस्वीर की संभावनाएं देखना जरूरी
संपादकीय
11 फरवरी 12
पुडुचेरी के सरकारी स्कूलों में बारहवीं की परीक्षा में 75 फ़ीसदी या उससे ज़्यादा अंक लाने पर छात्रों को मुफ्त में लैपटॉप कंप्यूटर दिए जाएंगे। इसके पहले अलग-अलग राज्यों के चुनाव में स्कूलों के बच्चों को लैपटॉप देने का वादा चुनावी घोषणा पत्र में हो ही रहा है। केंद्र सरकार ने दुनिया का सबसे सस्ता टेबलेट कम्प्यूटर बनवाकर स्कूल-कॉलेज में देना शुरू कर ही दिया है। मतलब यह कि आने वाले दिनों में देश के घर-घर तक संचार तकनीक से वाईफाई इंटरनेट पहुंच जाएगा और कम्प्यूटर भी शायद आधी आबादी तक तो किसी न किसी रास्ते पहुंच जाएंगे। लेकिन यह पूरा सिलसिला सिर्फ टेक्नॉलॉजी का नहीं है। इससे पढऩे वाले निजी और सामाजिक, सार्वजनिक और सरकारी असर को भी देखना होगा।
हम टेक्नॉलॉजी के विस्तार और विकास के ऐसे मौके पर कोई दकियानूसी बात नहीं कर रहे हैं लेकिन तकनीक के सामाजिक असर का अंदाज कई बार पहले न तो लगाया जाता है, और कई मामलों में लगाना मुमकिन भी नहीं होता है। मिसालन मोबाईल फोन की बात करें। इसके आने से गरीब भी अपने घर से जुड़े रह पा रहे हैं और मजदूरों को भी काम पाने का, रोजी कमाने का एक बेहतर तरीका मिल पा रहा है। इससे लोगों की जिंदगी में एक नए किस्म की सामाजिक समानता आई है और टेलीफोन रखने वाले कल तक के एक लगभग संपन्न तबके का एकाधिकार टूटा है। लेकिन हिंदुस्तान के संदर्भ में देखें तो मोबाईल फोन के आने के बाद से जिस अंदाज में लोगों के बीच इसका इस्तेमाल बढ़ा है, उतना शायद दुनिया के कम ही देशों में होता होगा। और लोग अपने खर्च का एक काफी बड़ा हिस्सा फोन पर गैर जरूरी बातों पर गंवा भी रहे हैं। तकनीक के आसानी से मिल जाने से जिंदगी के अंदाज पर इतना बड़ा फर्क पड़ेगा, और लोग इतने किस्म के लोगों से इतने किस्म की बातें इतनी-इतनी देर तक करने लगेंगे, ऐसा किसी ने सोचा नहीं था। इससे पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों में एक फर्क आया है, और जिंदगी में काम के जो सीमित आठ-दस घंटे रोज के रहते हैं, उनमें से कितनी देर लोग फोन पर बातें करने लगे हैं, कितनी देर एक-दूसरे को संदेश भेजने लगे हैं, यह मामला कुछ परेशानी का भी लगता है। कल तक बिना फोन जो जिंदगी गुजर रही थी, वह आज अचानक इस फोन पर काफी कुछ खर्च हो रही है।
अब तक मध्यम वर्ग और उसके ऊपर के भारतीय तबके में कम्प्यूटर और इंटरनेट की पहुंच मोटे तौर पर है। इसके नीचे का इससे कई गुना बड़ा तबका अगर सरकारी तोहफों में मिलने वाले करोड़ों कम्प्यूटरों को पा लेगा, और उसे इंटरनेट की सुविधा भी मिल जाएगी, तो उस दिन की तस्वीर में बाजार तो अपने-आपको बहुत रफ्तार से फिट कर लेगा, पढ़ाई और सरकार की दूसरी योजनाओं, जिंदगी के दूसरे पहलुओं को उस टेबलेट-जिंदगी में फिट करने के बारे में सरकार में किसी स्तर पर सोच हो रहा हो, इस पर हमको शक है। आज ही एक दूसरी खबर इस अखबार में बन रही है कि किस तरह छत्तीसगढ़ की जेलों में लगाए गए जैमर टू-जी सिग्नलों को रोक पाते हैं, और जेलों में बंद बड़े अपराधी 3-जी मोबाईल फोन का इस्तेमाल करके इस जैमर को बेअसर पा रहे हैं। मतलब यह कि अपराधी और बाजार-व्यवस्था, इनकी रफ्तार हमेशा ही अधिक होगी, और जब तक देश के भीतर के संचार-ढांचे और कम्प्यूटर क्षमता का जनहित में इस्तेमाल सरकार सोचेगी तब तक तो बाजार इन तमाम घरों और बच्चों तक गुटखे की पुडिय़ा की तरह पहुंच चुका होगा।
हमने छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में यह भी देखा है कि राज्य सरकार की जो रियायत चावल पर घर-घर पहुंच रही है, उससे होने वाली बचत का परिवार किस तरह अपनी सेहत पर खर्च करें, इसका कोई अभियान इस प्रदेश में नहीं चला। नतीजा यह है कि घर-घर में लोग शराब पर खर्च अधिक करने लगे हैं और गांव-गांव से नशा बढ़ जाने की शिकायतें आ रही हैं। गरीबों की अर्थव्यवस्था में राज्य सरकार की मदद से जो राहत मिली है, उसके साथ-साथ एक नसीहत नहीं पहुंची तो एक जागरूकता भी नहीं फैल पाई। लोगों के पेट तो भरने लगे लेकिन लोग अधिक पीने भी लगे, क्योंकि चावल खरीदने में अब एक दिन की मजदूरी एक घर के लिए काफी होने लगी। इसलिए सरकार को अपने तमाम व्यापक जनकल्याण कार्यक्रमों के असर का अंदाज लगाकर उनका सामाजिक मोर्चे पर एक बेहतर उत्पादक उपयोग साथ-साथ सोचना चाहिए। ऐसे काम के लिए देश भर में सरकार से परे के कुछ कल्पनाशील विशेषज्ञों को भी जोडऩा चाहिए जो कि विकास से बदलने वाली तस्वीर सोचकर उसमें संभावनाओं के रंग भर सकें।
गांधी-नेहरू के देश का यह हाल, तांगे के घोड़े सी तंग नजर
संपादकीय
10 फरवरी 12
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई ने कहा कि पश्चिमी फौजी संगठन नाटो ने पूर्वी अफगानिस्तान में एक हवाई हमले में 8 बच्चों को मार डाला। अमरीका की अगुवाई में कई देशों में आतंक विरोध के नाम पर चलाए जा रहे फौजी अभियान में आए दिन बेकसूर मारे जा रहे हैं। अफगानिस्तान के अलावा इराक और पाकिस्तान लगातार अपने नागरिकों की जिंदगियां अमरीकी हमलावर विमानों और हथियारों के हाथों खो रहे हैं। यह सिलसिला इतना भयानक है कि रोज-रोज इसे देखकर अब लोग थक चुके हैं और शायद ही किसी को यह याद पड़ता है कि ऐसे मौकों पर इस विशाल लोकतंत्र हिन्दुस्तान के गांधी और नेहरू सरीखे नेताओं का क्या रूख रहता था। हम नेहरू के बाद के वक्त को भी याद करते हैं जब इंदिरा ने भी काफी अर्से तक तो अंतरराष्ट्रीय मामलों में अपनी दखल रखी थी। आज भारत की हालत पहला मौका मिलते ही अमरीकी कदमों को चूमने की है, और एक वक्त के गौरवशाली रहे इस लोकतंत्र के आज के शर्मनाक प्रधानमंत्री दुनिया के सबसे बड़े हमलावर गुंडे जॉर्ज बुश को भारतीय जनता की तरफ से यह फर्जी सर्टिफिकेट देते हैं कि भारत के लोग बुश से बहुत प्यार करते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार व्यवस्था की कठपुतलियों की तरह काम करते मनमोहन-मोंटेक जैसे लोग जरूर बुश को प्यार करते होंगे क्योंकि हमला और युद्ध, बाजार का सबसे बड़ा कारोबार रहता है।
लेकिन हम मुर्दा हो चुके इस भारतीय लोकतंत्र से परे की अगर बात करें, तो संयुक्त राष्ट्र मुर्दा हो चुका है या उसका बर्ताव ऐसा है मानो अमरीकी जमीन पर राष्ट्रसंघ के लिए जो पट्टा दिया गया था, उसके चलते राष्ट्रसंघ अमरीका के मुफ्त के किराएदार की तरह वफादारी दिखा रहा है। आज यह अमरीका लाखों परमाणु बमों का तखत बनाकर उस पर बैठा है, और ईरान के एक भी परमाणु बम बनाने, परमाणु बम की तकनीक तक बनाने के मुद्दे पर उस पर हमला करने को तैयार खड़ा है। लेकिन इस अंतरराष्ट्रीय विरोधाभास पर उंगली उठाने वाली गांधी और नेहरू की उंगली अब दफन हो चुकी है। अब हिन्दुस्तान की ऐतिहासिक और गौरवशाली अंतरराष्ट्रीय भूमिका इतिहास का सामान रह गई है और आए दिन जब हवाई हमले बेकसूर लोगों को, छोटे-छोटे बच्चों को मार रहे हैं तो एक देश के रूप में भारत का मुंह भी नहीं खुलता।
यह पूरी दुनिया आज लोकतंत्र से परे, मानवीयता नाम के एक शब्द के गढ़े गए अर्थ से बिल्कुल परे, हैवानियत की राह पर चल रही है और बेकसूर मौतों को रोकने का कोई रास्ता नहीं रह गया है। रास्ता भी तब निकलता है जब किसी की दिलचस्पी राह ढूंढने की हो। अफगानिस्तान में तरह-तरह की आर्थिक मदद की बात तो हिन्दुस्तान सोचता है, लेकिन अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री और उनकी बेसमझ सरकार को अब यह भूल भी गया है कि बिना अंतरराष्ट्रीय भूमिका के दुनिया का कोई बड़ा देश कोई असर नहीं रखता। और एक देश के रूप में भारत की सरकार की कुछ अघोषित मजबूरियां हो सकती हैं, हम तो भारत के राजनीतिक दलों का हाल देख रहे हैं, जिनके ऊपर सरकार चलाने, अंतरराष्ट्रीय अनुबंध करने और कूटनीति का रिश्ता निभाने की मजबूरियां नहीं हैं, ऐसे राजनीतिक दल भी पड़ोस के देशों पर चल रहे ऐसे लगातार हमलों को इस तरह अनदेखा कर रहे हैं मानो वह पड़ोस किसी दूसरे ग्रह का हो। आज भारत के वामपंथी दलों को कौन देखता है कि ऐसे हर साम्राज्यवादी, पूंजीवादी, विस्तारवादी और गुंडागर्दी के हमलों पर भारत की जनता के राजनीतिक शिक्षण के लिए बयान जारी करें? भारतीय लोकतंत्र नोटतंत्र की तरह हो गया है, यह बुरी तरह से आत्मकेन्द्रित हो गया है और तंग नजरिए का शिकार है जिसे तांगे की घोड़े की तरह सिर्फ जरा सा सामने दिखता है, बाकी कुछ नहीं दिखता। ऐसे में भारत में जिन लोगों को लोकतंत्र की फिक्र है उन तमाम लोगों को सरकार या पार्टियों का मुंह देखना बंद करना चाहिए और जगह-जगह हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और जनता को सहमत कराने की कोशिश करनी चाहिए। जनजागरण के बिना इस देश की चुनावी-पार्टियों और मदमस्त सरकारों पर भी कोई दबाव नहीं पड़ेगा। जब पड़ोस के देशों में बच्चे थोक में मारे जा रहे हैं, तो उसे भी अनदेखा करने वाले देश कतार में अपनी बारी का अंदाज भी लगा लें।
एक अफसर की तारीफ में
9 फरवरी 12
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के नए मुख्य सचिव सुनील कुमार से इस राज्य के लोगों की उम्मीदें, संभावनाओं के मुकाबले बहुत अधिक हैं, और ऐसे में किसी के नाकामयाब हो जाने का खतरा अधिक रहता है। एक अफसर के बदल जाने से उम्मीदों में इतना बदलाव आना तो नहीं चाहिए लेकिन असलियत यही है कि एक इंसान और दूसरे इंसान में बहुत फर्क भी हो सकता है, ओहदा एक ही रहते हुए।
एक अफसर के बारे में इस जगह लिखना कुछ अटपटा भी लग सकता है लेकिन पिछले करीब तीस बरस में छत्तीसगढ़ के लोगों ने जब-जब सुनील कुमार का काम देखा, उनसे बिना रूबरू हुए भी उनके बारे में पढ़ा, सुना, उनके बारे में एक अलग तस्वीर लोगों के मन में बनी। उनकी ही आईएएस विरादरी में उनके जितने ईमानदार और लोग भी जरूर होंगे, उनके जितने काबिल लोग भी और होंगे, कुछ लोगों में उनके जितनी दूर की सोच भी होगी, कई और लोग भी उनके जितनी मेहनत करते होंगे, उनके जैसी सादगी, किफायत और गांधीवादी सोच भी कुछ दूसरे लोगों में होगी, लेकिन इतनी तमाम खूबियां जब किसी एक पैकिंग में एक साथ रहती हैं, तो फिर लोग उस सामान के रामबाण दवा होने की उम्मीद भी लगा लेते हैं। इनमें से कई बातों पर सुनील कुमार असंभव किंतु सत्य दर्जे के कट्टर हैं, और उनके साथ काम करना बहुत से लोगों के लिए दिक्कत का काम भी होता है। लेकिन ऐसे में वे इस राज्य के प्रशासनिक मुखिया के तौर पर एक बड़े चुनौती ढोकर आए हैं।
भारतीय लोकतंत्र में पिछले एक-दो बरस, एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक पारदर्शिता के रहे। देश की सबसे बड़ी अदालत, सबसे बड़ी पंचायत से परे भी कुछ और संवैधानिक संस्थाओं ने जनहित के काम किए और सूचना के अधिकार ने सरकार के भीतर गंदगी से धुंधले पानी को साफ किया। अन्ना हजारे के आंदोलन से देश का कोई दीर्घकालीन भला हुआ हो या नहीं, सरकारी भ्रष्टाचार खबरों में आया और भ्रष्टाचार के खिलाफ लोग सड़कों पर आए, सरकारें बेचैन हुईं। बहुत से अदालती फैसलों से देशभर में सरकारी अधिकारी-कर्मचारी घेरों में आए, और हमारा अंदाज है कि गलत काम के पहले सरकारी कलम अब कुछ हिचकाने लगी है। ऐसे में छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सुनील कुमार को मुख्य सचिव बनाकर यह बात भी साफ कर दी है कि वे प्रशासन के इस स्तर पर सिर्फ ईमानदारी के काम की उम्मीद करेंगे। इस अफसर की नौकरी पूरी होने के पहले राज्य में चुनाव हो चुके होंगे, इसलिए अब से चुनाव तक ऐसे अफसर को मुख्य सचिव बनाना एक कड़ा राजनीतिक फैसला भी है क्योंकि नीतियों, नियमों और सिद्धांतों का मामले में सुनील कुमार बेमिसाल अफसर हैं। हमारा मानना है कि छत्तीसगढ़ सरकार में अच्छा काम करने वाले, ईमानदार और मेहनती तमाम लोग इस नए प्रशासनिक मुखिया के आने से खुश भी होंगे।
मौजूदा राज्यपाल शेखर दत्त जब रायपुर संभाग के कमिश्नर थे, तब सुनील कुमार रायपुर में कलेक्टर थे। उन्होंने साथ में लंबा कामकाज किया है और वे शेखर दत्त के पसंदीदा अफसरों में से एक थे। मुख्यमंत्री रमन सिंह अपने कार्यकाल के शुरू से ही इस कोशिश में थे कि सुनील कुमार प्रतिनियुक्ति पर केन्द्र सरकार में न जाएं, और बाद में भी वे लगातार यह चाहते रहे कि वे लौटकर राज्य में काम करें। अर्जुनसिंह से लेकर रमन सिंह तक वे मप्र और छत्तीसगढ़ के सभी मुख्यमंत्रियों की पसंद के बेदाग, निष्पक्ष और काबिल अफसर बने रहे। अजीत जोगी के सचिव रहते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण की ईंटें ढोई हैं और वे इसके हर पहलू से किसी भी दूसरे के मुकाबिले अधिक वाकिफ हैं।
मुख्यमंत्री रहते हुए अजीत जोगी ने एक से अधिक बार यह कहा था कि उनकी किस्मत थी कि वे इस राज्य के मुख्यमंत्री बने, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि उनकी किस्मत थी कि उन्हें सुनील कुमार जैसा सचिव मिला। ऐसी ही उम्मीदें आज छत्तीसगढ़ में उन तमाम लोगों की हैं जो कि इस अफसर के काम और/या इसकी साख से वाकिफ हैं। इतने करिश्मों की उम्मीदें अधूरी होने के खतरे ही अधिक रहते हैं, लेकिन सुनील कुमार और इस राज्य को हमारी शुभकामनाएं।
अब लंगोट में गांठ कुछ अधिक मजबूती से लगाने की जरूरत
8 फरवरी 2012
सुनील कुमार
मजा और सजा, इसकी इससे बड़ी और कोई मिसाल हमें याद नहीं पड़ती, जो कि कल कर्नाटक विधानसभा में सामने आई। दो मंत्री वहां अपने मोबाईल फोन की स्क्रीन पर सेक्स फिल्म देखते कैमरों में कैद हो गए और बात की बात में उनकी रिकॉर्डिंग टीवी चैनलों पर छा गई। उत्तर भारत और मणिपुर में चुनावों में उलझी भारतीय जनता पार्टी को इन सवालों का सामना करना पड़ा कि आर्थिक भ्रष्टाचार के साथ-साथ इस हद तक का नैतिक भ्रष्टाचार उसके मंत्रियों में फैला हुआ है। नतीजा यह हुआ कि आज सुबह का सूरज इस पोर्नोगेट कांड से जुड़े तीन मंत्रियों के इस्तीफे लेकर आया है जबकि अभी तीसरे मंत्री के बारे में खबरें भी सामने नहीं आई हैं कि सदन के भीतर अश्लील सेक्स फिल्म से उसका क्या रिश्ता था। खबर के भी पहले इस्तीफा आ जाने का यह मामला देश में चुनाव की गर्मी के चलते ही हुआ क्योंकि भाजपा कोई नई शर्मिंदगी झेलना नहीं चाहती और इन इस्तीफों के साथ वह अब जनता का सामना कर सकती है कि वह किसी भी गलत काम पर इतनी कड़ी कार्रवाई करती है। और यह बात आज की तारीख में चाहे चुनावी-मजबूरियों के चलते की गई हो, सही तो है ही कि मंत्रियों के इस्तीफे ले लिए गए।
चूंकि यह मामला राजनीति, सेक्स, अश्लीलता और नैतिकता जैसे कई पहलुओं वाला एक चटपटा मामला है इसलिए यह खबरों में बना हुआ है और लोग इस पर जरूरत से थोड़ी अधिक बहस करेंगे भी। लेकिन यही मौके रहते हैं जब लोगों को अपने तर्कों को लेकर सावधान रहने की जरूरत रहती है क्योंकि किसी को कोसते हुए आपा खो देना आसान बात होती है और यह जिस तरह का नैतिक पतन का मामला है उसके चलते लोग पहले से नफरत के घेरे में खड़े नेताओं को अब पत्थर खाने का हकदार आसानी से करार दे सकते हैं। हम इस पूरे मामले को दो-तीन अलग-अलग कसौटियों पर कसना चाहेंगे। ये मंत्री वयस्क होने के नाते, वैधानिक और नैतिक रूप से सेक्स-फिल्म देखने के हकदार हैं और भारतीय कानून के तहत यह अपराध नहीं है। गड़बड़ दो बातों को लेकर हुई है। यह काम वे विधानसभा में चल रही एक गंभीर बहस के दौरान, सदन के भीतर बैठकर कर रहे थे। फिर कैमरों में कैद हो जाने के बाद एक मंत्री ने सिरे से यह झूठ कहा कि वह कर्नाटक में अभी हुई एक विवादास्पद रेव पार्टी की रिकॉर्डिंग देख रहा था कि उसमें किस तरह की अश्लील हरकतें हुई हैं। टेक्नॉलॉजी इतनी काबिल हो गई है कि विधानसभा में लगे टीवी कैमरों ने छत पर से नीचे देखते हुए मंत्री के मोबाईल फोन पर चल रही पोर्नो-फिल्म को इतनी बारीकी से कैद किया कि उस पूरी फिल्म के बारे में कर्नाटक के अखबारों में खुलासे यह खबर भी बन गई है कि यह चार मिनट बारह सेकंड की कौन सी पोर्नो-फिल्म है जो कि इन दिनों किस नाम से चारों तरफ फैली हुई है। इंटरनेट पर इसे देखकर हम भी आसानी से तय कर सकते हैं कि यह किसी पार्टी की फिल्म न होकर एक बंद कमरे की सेक्स फिल्म है। तीसरी गलती इस मंत्री की यह हुई कि उसने अपनी इस हरकत में कुछ भी गलत न होने की बात कही और इस्तीफे से इंकार कर दिया। इंटरनेट का आजाद मीडिया कर्नाटक विधानसभा के भीतर मंत्रियों की इस शर्मनाक हरकत को लेकर भरा हुआ है और पिछले साल भर से भारत के नेताओं के खिलाफ निकल रही लोगों की भड़ास को एक और मौका इससे मिला है।
कर्नाटक की राजनीतिक और सरकारी संस्कृति लंबे समय से लोगों की नफरत पा रही है। मुख्यमंत्री से लेकर दूसरे मंत्रियों तक ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को ऐसी बदनामी दिलाई है जैसी कि भाजपा के इतिहास में किसी दूसरे राज्य में पार्टी को कभी नहीं मिली थी। लेकिन चौराहे पर बांधे गए इन गुनहगारों पर कुछ और पत्थर चलाने के साथ-साथ आज हम यहां यह भी बात उठाना चाहेंगे कि क्या एक नंगी फिल्म ही इस देश के लोगों को इस कदर विचलित करेगी? इसी कर्नाटक मेें सोलह हजार करोड़ रूपए का लौह खनिज घोटाला वहां के लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े ने सामने रखा है। इसी कर्नाटक में सोने की खदान वाले इलाके हैं और उन्हीं इलाकों में एक-दो बरस में कई हजार बच्चों के कुपोषण से मर जाने के तथ्य इसी भाजपाई राज्य सरकार की एक रिपोर्ट में है, अपने ही कार्यकाल के बारे में। हमारा मानना है कि भूखे, दम तोड़ते बदन देखते हुए जनता की दौलत को हजारों-लाखों करोड़ लूटना कहीं अधिक अश्लील, हिंसक और अनैतिक, अपराध है। ऐसी तमाम नौबत के चलते हुए भी कर्नाटक में कभी इस रफ्तार से इस्तीफे नहीं हो पाए थे और पिछले मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और उनके खरबपति लोहा चोर मंत्री रेड्डी बंधु कुर्सियों से इस तरह चिपके हुए थे कि मानो वे इंसान न होकर अचार बनाने वाले लसूड़े हों।
कल की यह घटना हमें अधिक विचलित इसलिए भी कर रही है क्योंकि इसमें फंसने वाले मंत्री जो कि सदन में चल रही गंभीर बहस के दौरान सेक्स फिल्म देख रहे थे उनमें कर्नाटक के महिला और बाल विकास मंत्री सी.सी. पाटिल भी शामिल हैं। पाटिल का ही वह विभाग है जो कर्नाटक में कुपोषण से मरने वाले हजारों बच्चों के लिए जिम्मेदार है और सदन में चलती गंभीर बहस के दौरान वे सेक्स का मजा ले रहे थे। जाहिर है कि ऐसे राज्य में बच्चों का मरना तो होना ही था। पाठकों को यह भी याद दिलाना मुनासिब होगा कि पिछले दिनों इसी मंत्री ने एक बयान दिया था कि महिलाएं जब उत्तेजक कपड़े पहनती हैं तो बलात्कार और सेक्स हमलों का कारण बन जाती हैं। उन्होंने महिलाओं से कहा था कि वे अपना बदन कितना उघाड़ें इस बारे में उन्हें सोचना चाहिए। इसी कर्नाटक में बच्चों के अधिकारों को लेकर और बाल मजदूरी के खिलाफ साठ से अधिक जनसंगठन काम कर रहे हैं और वहां पर बच्चों की हालत, सोने और लोहे की खदानों के बावजूद बहुत बुरी बताई जा रही है।
जिस समय विधानसभा में इस बात को लेकर बहस चल रही थी कि वहां किस तरह कुछ लोगों ने पाकिस्तानी झंडा फहराकर साम्प्रदायिक दंगा फैलाने की कोशिश की, और किस तरह वहां की भाजपा सरकार की पुलिस ने ही श्रीराम सेना नाम के एक बहुत आक्रामक और हमलावर, हिंसक और साम्प्रदायिक संगठन के लोगों को गिरफ्तार किया है, उस वक्त यह मंत्री सेक्स के मजे ले रहा था। वैसे तो पोर्नोग्राफी की एक फिल्म देखने के लिए तीन मंत्रियों की कुर्सियां ऐसे कमाऊ प्रदेश में चले जाना छोटी बात नहीं है, लेकिन जो विधानसभा अपने सदस्यों को इतने विशेषाधिकार देती है उनका जरा सा अपमान होने पर भी, उनकी अनदेखी होने पर भी किसी भी अफसर या नागरिक को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है, जेल भेजा जा सकता है, वहां पर बैठकर यह काम करना भारतीय लोकतंत्र में बहुत ही शर्मनाक माना जा रहा है। देश भर में इसे लेकर लोगों के मुंह का स्वाद बिगड़ गया है।
भारतीय संसद और देश की विधानसभाओं को लेकर एक बहस पहले से चल रही है कि इनके विशेषाधिकारों को कुछ कम नहीं किया जाए? अदालत की अवमानना और सदन के विशेषाधिकार लोगों को उनके काम की जरूरतों के मुकाबले बहुत अधिक लगते हैं। हमारा भी यही ख्याल है कि लोकतंत्र की इन दोनों शाखाओं को ऐसी किसी पवित्रता-आधारित रियायत की जरूरत नहीं है। और यहां के कामकाज को जनता के प्रति अधिक हद तक जवाबदेह होना भी चाहिए। कल कर्नाटक की राजधानी में इस फिल्म-पे्रमी मंत्री के घर पर पथराव भी हुआ, और कर्नाटक के बाहर बैठे बहुत से और लोगों के मन में भी ऐसी हसरत जरूर हुई होगी। इससे भारत के तमाम लोगों को सावधान हो जाने की जरूरत है कि अब टेक्नॉलॉजी की घुसपैठ निजी जिंदगी में इतनी अधिक हो गई है कि आपके हाथ के भीतर छुपे हुए फोन की स्क्रीन को सिर्फ आप नहीं देखते, ऊंची छत पर लगा कैमरा भी देख लेता है और कैद करके आनन-फानन दुनिया भर को दिखा देता है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम इस अखबार में 'छोटी सी बातÓ में लगातार यह लिखते हैं कि आप अपने फोन पर से आपत्तिजनक फिल्में या संदेश हटाते चलें। हम तो इस बात को फोन गुम जाने या बच्चों के हाथ लग जाने के सिलसिले में कहते रहते हैं, लेकिन विधानसभा में बैठा मंत्री साम्प्रदायिकता की साजिश पर चर्चा को सुनने के बजाय अगर वयस्क मनोरंजन की उत्तेजना अधिक जरूरी पा रहा है, तो अब लोगों को लंगोट में गांठ कुछ अधिक मजबूती से लगाने की जरूरत है। तन और मन दोनों की लंगोट में।
अंडमान के आदिवासियों के लिए ब्रिटिश संसद से निकली फिक्र
संपादकीय
7 फरवरी
भारत में आदिवासियों के बहुत पुराने समुदाय वाले अंडमान द्वीप समूह को लेकर ब्रिटिश संसद में एक प्रस्ताव पेश हुआ है। इसमें भारत सरकार से मांग की गई है कि वह अंडमान को इंसानी नुमाइश वाले पर्यटन केंद्र बनने से रोके। दरअसल पिछले कुछ हफ्तों में ब्रिटिश मीडिया से ऐसी वीडियो रिकॉर्डिंग दुनिया भर के सामने आई जिसमें अद्र्धनग्न जीने वाले इन आदिवासियों को सैलानियों के सामने नाचते-गाते पेश किया जाता है और मजदूरों जैसी मजदूरी देकर उनकी नग्न तस्वीरें उतारी जाती हैं। ब्रिटिश संसद अब भारत से यह मांग करने जा रही है कि भारत की सरकार भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक आदेश को लागू करे और इन आदिवासियों के इलाकों के बीच से निकलने वाली एक सड़क को रोके।
इस तरह की बातों को लेकर एक दूसरा देश भारत की सरकार को अपने आदिवासियों के प्रति संवेदनशील होने की नसीहत दे, यह अपने-आपमें बहुत ही शर्म की बात है। और यहां पर हम इस नसीहत को इस बात से जोडऩा नहीं चाहते कि पश्चिमी देश खुद भी दुनिया भर के मूल निवासियों के साथ तरह-तरह की ज्यादतियां करते हैं, पूरी दुनिया के कमजोर तबकों के मानवाधिकार कुचलते हैं, देशों पर हमले करते हैं और लोकतंत्र थोपने के नाम पर सत्ता-पलट करवाकर अपनी कठपुतलियां बिठाते हैं। इस किस्म के तर्क-वितर्क और आरोप-जवाबी आरोप, किसी किनारे नहीं पहुंचाएंगे, इसलिए हम किसी और के दिखाए आइने को देखकर अपने को दुरूस्त करना बेहतर समझेंगे।
पाठकों को याद होगा कि हॉलीवुड की एक फिल्म अवतार ने बहुत सीधे-सीधे तरीके से एक दूसरे ग्रह के मूल निवासियों पर धरती के कारोबारियों के फौजी हमले की कहानी बताई थी। आज भारत में जगह-जगह कई किस्म से बेजुबान आदिवासियों के हकों पर हमले होते हैं, और इनमें से एक बड़ा हमला उनकी संस्कृति पर हो रहा है जिसे कि पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर किया जा रहा है। नेता और अफसर, पर्यटन कंपनियां चलाने वाले कारोबारी और उनके ग्राहक कैमराधारी पर्यटक, इनके बीच शायद ही आदिवासी संस्कृति के नाजुक पहलुओं की कोई समझ रहती है। इनके परंपरागत कपड़ों और हुलिए, गहनों और साज-सज्जा, नृत्य और संगीत, घर और दीवारों की अच्छी तस्वीरें खींची जा सकती हैं इसलिए यहां तक देशी-विदेशी पर्यटकों को उसी अंदाज में लाया जाता है जिस अंदाज में कान्हा में हाथी और जिप्सी पर चढ़ाकर पर्यटकों को शेर दिखाया जाता है। कई बरस पहले छत्तीसगढ़ में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए देश भर से नामी-गिरामी लोगों को लाकर वहां तंबुओं में ठहराया गया था। यह संपादकीय लिखने वाले अखबारनवीस को भी उस वक्त इन लोगों के साथ बस्तर घूमने का मौका मिला था और वहां आंखों देखा, कानों सुना यह था कि भारत सरकार से मान्यता प्राप्त गाईड बाहरी लोगों को बता रहा था कि लोग बस्तर की आदिवासी संस्कृति को बेस्ट-कल्चर (सर्वश्रेष्ठ-संस्कृति) कहते हैं, जबकि बस्तर असल में ब्रेस्ट-संस्कृति (स्तन-संस्कृति) है। वह पर्यटकों को समझाते चल रहा था कि बस्तर में अगर किसी महिला के स्तनों को छुआ जाए तो उसका बुरा नहीं माना जाता। यह राज्य सरकार के पर्यटन विभाग के इंतजाम के तहत और भारत सरकार के लाईसेंस प्राप्त गाईड का दिया गया ब्यौरा था। इसका हमने उस वक्त भी विरोध किया था और बाद में उस गाईड पर कार्रवाई भी हुई थी।
अंडमान को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं वे भयानक हैं और वे यह भी बताती हैं कि आधुनिक लोकतंत्र की शहरों में बसी सरकारों को जंगलों में जीने वाले आदिवासियों के नाम पर भ्रष्टाचार करने में तो पूरी दिलचस्पी है, आदिवासी मुद्दों को समझने की जरा भी नहीं है। हम छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्य के बारे में यह चाहेंगे कि यहां पर सरकार आदिवासी जनजीवन और संस्कृति के जानकार कुछ गैरसरकारी विद्वानों को सलाहकार बनाकर रखे और आदिवासियों के प्रति सरकारी नजरिए को इंसानियत की कसौटी पर कसने का काम करे। इसके बिना सरकारी आंकड़ों और बाजार की कमाई को बढ़ाने की नीयत से आज जो रूख आदिवासियों के साथ चल रहा है वह आने वाले बरसों में हर देश-प्रदेश में एक-एक अवतार नाम की फिल्म पैदा करते चलेगा।
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