अब लंगोट में गांठ कुछ अधिक मजबूती से लगाने की जरूरत


विशेष संपादकीय
8 फरवरी 2012
सुनील कुमार

मजा और सजा, इसकी इससे बड़ी और कोई मिसाल हमें याद नहीं पड़ती, जो कि कल कर्नाटक विधानसभा में सामने आई। दो मंत्री वहां अपने मोबाईल फोन की स्क्रीन पर सेक्स फिल्म देखते कैमरों में कैद हो गए और बात की बात में उनकी रिकॉर्डिंग टीवी चैनलों पर छा गई। उत्तर भारत और मणिपुर में चुनावों में उलझी भारतीय जनता पार्टी को इन सवालों का सामना करना पड़ा कि आर्थिक भ्रष्टाचार के साथ-साथ इस हद तक का नैतिक भ्रष्टाचार उसके मंत्रियों में फैला हुआ है। नतीजा यह हुआ कि आज सुबह का सूरज इस पोर्नोगेट कांड से जुड़े तीन मंत्रियों के इस्तीफे लेकर आया है जबकि अभी तीसरे मंत्री के बारे में खबरें भी सामने नहीं आई हैं कि सदन के भीतर अश्लील सेक्स फिल्म से उसका क्या रिश्ता था। खबर के भी पहले इस्तीफा आ जाने का यह मामला देश में चुनाव की गर्मी के चलते ही हुआ क्योंकि भाजपा कोई नई शर्मिंदगी झेलना नहीं चाहती और इन इस्तीफों के साथ वह अब जनता का सामना कर सकती है कि वह किसी भी गलत काम पर इतनी कड़ी कार्रवाई करती है। और यह बात आज की तारीख में चाहे चुनावी-मजबूरियों के चलते की गई हो, सही तो है ही कि मंत्रियों के इस्तीफे ले लिए गए।
चूंकि यह मामला राजनीति, सेक्स, अश्लीलता और नैतिकता जैसे कई पहलुओं वाला एक चटपटा मामला है इसलिए यह खबरों में बना हुआ है और लोग इस पर जरूरत से थोड़ी अधिक बहस करेंगे भी। लेकिन यही मौके रहते हैं जब लोगों को अपने तर्कों को लेकर सावधान रहने की जरूरत रहती है क्योंकि किसी को कोसते हुए आपा खो देना आसान बात होती है और यह जिस तरह का नैतिक पतन का मामला है उसके चलते लोग पहले से नफरत के घेरे में खड़े नेताओं को अब पत्थर खाने का हकदार आसानी से करार दे सकते हैं। हम इस पूरे मामले को दो-तीन अलग-अलग कसौटियों पर कसना चाहेंगे। ये मंत्री वयस्क होने के नाते, वैधानिक और नैतिक रूप से सेक्स-फिल्म देखने के हकदार हैं और भारतीय कानून के तहत यह अपराध नहीं है। गड़बड़ दो बातों को लेकर हुई है। यह काम वे विधानसभा में चल रही एक गंभीर बहस के दौरान, सदन के भीतर बैठकर कर रहे थे। फिर कैमरों में कैद हो जाने के बाद एक मंत्री ने सिरे से यह झूठ कहा कि वह कर्नाटक में अभी हुई एक विवादास्पद रेव पार्टी की रिकॉर्डिंग देख रहा था कि उसमें किस तरह की अश्लील हरकतें हुई हैं। टेक्नॉलॉजी इतनी काबिल हो गई है कि विधानसभा में लगे टीवी कैमरों ने छत पर से नीचे देखते हुए मंत्री के मोबाईल फोन पर चल रही पोर्नो-फिल्म को इतनी बारीकी से कैद किया कि उस पूरी फिल्म के बारे में कर्नाटक के अखबारों में खुलासे यह खबर भी बन गई है कि यह चार मिनट बारह सेकंड की कौन सी पोर्नो-फिल्म है जो कि इन दिनों किस नाम से चारों तरफ फैली हुई है। इंटरनेट पर इसे देखकर हम भी आसानी से तय कर सकते हैं कि यह किसी पार्टी की फिल्म न होकर एक बंद कमरे की सेक्स फिल्म है। तीसरी गलती इस मंत्री की यह हुई कि उसने अपनी इस हरकत में कुछ भी गलत न होने की बात कही और इस्तीफे से इंकार कर दिया। इंटरनेट का आजाद मीडिया कर्नाटक विधानसभा के भीतर मंत्रियों की इस शर्मनाक हरकत को लेकर भरा हुआ है और पिछले साल भर से भारत के नेताओं के खिलाफ निकल रही लोगों की भड़ास को एक और मौका इससे मिला है।
कर्नाटक की राजनीतिक और सरकारी संस्कृति लंबे समय से लोगों की नफरत पा रही है। मुख्यमंत्री से लेकर दूसरे मंत्रियों तक ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को ऐसी बदनामी दिलाई है जैसी कि भाजपा के इतिहास में किसी दूसरे राज्य में पार्टी को कभी नहीं मिली थी। लेकिन चौराहे पर बांधे गए इन गुनहगारों पर कुछ और पत्थर चलाने के साथ-साथ आज हम यहां यह भी बात उठाना चाहेंगे कि क्या एक नंगी फिल्म ही इस देश के लोगों को इस कदर विचलित करेगी? इसी कर्नाटक मेें सोलह हजार करोड़ रूपए का लौह खनिज घोटाला वहां के लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े ने सामने रखा है। इसी कर्नाटक में सोने की खदान वाले इलाके हैं और उन्हीं इलाकों में एक-दो बरस में कई हजार बच्चों के कुपोषण से मर जाने के तथ्य इसी भाजपाई राज्य सरकार की एक रिपोर्ट में है, अपने ही कार्यकाल के बारे में। हमारा मानना है कि भूखे, दम तोड़ते बदन देखते हुए जनता की दौलत को हजारों-लाखों करोड़ लूटना कहीं अधिक अश्लील, हिंसक और अनैतिक, अपराध है। ऐसी तमाम नौबत के चलते हुए भी कर्नाटक में कभी इस रफ्तार से इस्तीफे नहीं हो पाए थे और पिछले मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और उनके खरबपति लोहा चोर मंत्री रेड्डी बंधु कुर्सियों से इस तरह चिपके हुए थे कि मानो वे इंसान न होकर अचार बनाने वाले लसूड़े हों।
कल की यह घटना हमें अधिक विचलित इसलिए भी कर रही है क्योंकि इसमें फंसने वाले मंत्री जो कि सदन में चल रही गंभीर बहस के दौरान सेक्स फिल्म देख रहे थे उनमें कर्नाटक के महिला और बाल विकास मंत्री सी.सी. पाटिल भी शामिल हैं। पाटिल का ही वह विभाग है जो कर्नाटक में कुपोषण से मरने वाले हजारों बच्चों के लिए जिम्मेदार है और सदन में चलती गंभीर बहस के दौरान वे सेक्स का मजा ले रहे थे। जाहिर है कि ऐसे राज्य में बच्चों का मरना तो होना ही था। पाठकों को यह भी याद दिलाना मुनासिब होगा कि पिछले दिनों इसी मंत्री ने एक बयान दिया था कि महिलाएं जब उत्तेजक कपड़े पहनती हैं तो बलात्कार और सेक्स हमलों का कारण बन जाती हैं। उन्होंने महिलाओं से कहा था कि वे अपना बदन कितना उघाड़ें इस बारे में उन्हें सोचना चाहिए। इसी कर्नाटक में बच्चों के अधिकारों को लेकर और बाल मजदूरी के खिलाफ साठ से अधिक जनसंगठन काम कर रहे हैं और वहां पर बच्चों की हालत, सोने और लोहे की खदानों के बावजूद बहुत बुरी बताई जा रही है।
जिस समय विधानसभा में इस बात को लेकर बहस चल रही थी कि वहां किस तरह कुछ लोगों ने पाकिस्तानी झंडा फहराकर साम्प्रदायिक दंगा फैलाने की कोशिश की, और किस तरह वहां की भाजपा सरकार की पुलिस ने ही श्रीराम सेना नाम के एक बहुत आक्रामक और हमलावर, हिंसक और साम्प्रदायिक संगठन के लोगों को गिरफ्तार किया है, उस वक्त यह मंत्री सेक्स के मजे ले रहा था। वैसे तो पोर्नोग्राफी की एक फिल्म देखने के लिए तीन मंत्रियों की कुर्सियां ऐसे कमाऊ प्रदेश में चले जाना छोटी बात नहीं है, लेकिन जो विधानसभा अपने सदस्यों को इतने विशेषाधिकार देती है उनका जरा सा अपमान होने पर भी, उनकी अनदेखी होने पर भी किसी भी अफसर या नागरिक को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है, जेल भेजा जा सकता है, वहां पर बैठकर यह काम करना भारतीय लोकतंत्र में बहुत ही शर्मनाक माना जा रहा है। देश भर में इसे लेकर लोगों के मुंह का स्वाद बिगड़ गया है।
भारतीय संसद और देश की विधानसभाओं को लेकर एक बहस पहले से चल रही है कि इनके विशेषाधिकारों को कुछ कम नहीं किया जाए? अदालत की अवमानना और सदन के विशेषाधिकार लोगों को उनके काम की जरूरतों के मुकाबले बहुत अधिक लगते हैं। हमारा भी यही ख्याल है कि लोकतंत्र की इन दोनों शाखाओं को ऐसी किसी पवित्रता-आधारित रियायत की जरूरत नहीं है। और यहां के कामकाज को जनता के प्रति अधिक हद तक जवाबदेह होना भी चाहिए। कल कर्नाटक की राजधानी में इस फिल्म-पे्रमी मंत्री के घर पर पथराव भी हुआ, और कर्नाटक के बाहर बैठे बहुत से और लोगों के मन में भी ऐसी हसरत जरूर हुई होगी। इससे भारत के तमाम लोगों को सावधान हो जाने की जरूरत है कि अब टेक्नॉलॉजी की घुसपैठ निजी जिंदगी में इतनी अधिक हो गई है कि आपके हाथ के भीतर छुपे हुए फोन की स्क्रीन को सिर्फ आप नहीं देखते, ऊंची छत पर लगा कैमरा भी देख लेता है और कैद करके आनन-फानन दुनिया भर को दिखा देता है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम इस अखबार में 'छोटी सी बातÓ में लगातार यह लिखते हैं कि आप अपने फोन पर से आपत्तिजनक फिल्में या संदेश हटाते चलें। हम तो इस बात को फोन गुम जाने या बच्चों के हाथ लग जाने के सिलसिले में कहते रहते हैं, लेकिन विधानसभा में बैठा मंत्री साम्प्रदायिकता की साजिश पर चर्चा को सुनने के बजाय अगर वयस्क मनोरंजन की उत्तेजना अधिक जरूरी पा रहा है, तो अब लोगों को लंगोट में गांठ कुछ अधिक मजबूती से लगाने की जरूरत है। तन और मन दोनों की लंगोट में।


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