संपादकीय
10 फरवरी 12
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई ने कहा कि पश्चिमी फौजी संगठन नाटो ने पूर्वी अफगानिस्तान में एक हवाई हमले में 8 बच्चों को मार डाला। अमरीका की अगुवाई में कई देशों में आतंक विरोध के नाम पर चलाए जा रहे फौजी अभियान में आए दिन बेकसूर मारे जा रहे हैं। अफगानिस्तान के अलावा इराक और पाकिस्तान लगातार अपने नागरिकों की जिंदगियां अमरीकी हमलावर विमानों और हथियारों के हाथों खो रहे हैं। यह सिलसिला इतना भयानक है कि रोज-रोज इसे देखकर अब लोग थक चुके हैं और शायद ही किसी को यह याद पड़ता है कि ऐसे मौकों पर इस विशाल लोकतंत्र हिन्दुस्तान के गांधी और नेहरू सरीखे नेताओं का क्या रूख रहता था। हम नेहरू के बाद के वक्त को भी याद करते हैं जब इंदिरा ने भी काफी अर्से तक तो अंतरराष्ट्रीय मामलों में अपनी दखल रखी थी। आज भारत की हालत पहला मौका मिलते ही अमरीकी कदमों को चूमने की है, और एक वक्त के गौरवशाली रहे इस लोकतंत्र के आज के शर्मनाक प्रधानमंत्री दुनिया के सबसे बड़े हमलावर गुंडे जॉर्ज बुश को भारतीय जनता की तरफ से यह फर्जी सर्टिफिकेट देते हैं कि भारत के लोग बुश से बहुत प्यार करते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार व्यवस्था की कठपुतलियों की तरह काम करते मनमोहन-मोंटेक जैसे लोग जरूर बुश को प्यार करते होंगे क्योंकि हमला और युद्ध, बाजार का सबसे बड़ा कारोबार रहता है।
लेकिन हम मुर्दा हो चुके इस भारतीय लोकतंत्र से परे की अगर बात करें, तो संयुक्त राष्ट्र मुर्दा हो चुका है या उसका बर्ताव ऐसा है मानो अमरीकी जमीन पर राष्ट्रसंघ के लिए जो पट्टा दिया गया था, उसके चलते राष्ट्रसंघ अमरीका के मुफ्त के किराएदार की तरह वफादारी दिखा रहा है। आज यह अमरीका लाखों परमाणु बमों का तखत बनाकर उस पर बैठा है, और ईरान के एक भी परमाणु बम बनाने, परमाणु बम की तकनीक तक बनाने के मुद्दे पर उस पर हमला करने को तैयार खड़ा है। लेकिन इस अंतरराष्ट्रीय विरोधाभास पर उंगली उठाने वाली गांधी और नेहरू की उंगली अब दफन हो चुकी है। अब हिन्दुस्तान की ऐतिहासिक और गौरवशाली अंतरराष्ट्रीय भूमिका इतिहास का सामान रह गई है और आए दिन जब हवाई हमले बेकसूर लोगों को, छोटे-छोटे बच्चों को मार रहे हैं तो एक देश के रूप में भारत का मुंह भी नहीं खुलता।
यह पूरी दुनिया आज लोकतंत्र से परे, मानवीयता नाम के एक शब्द के गढ़े गए अर्थ से बिल्कुल परे, हैवानियत की राह पर चल रही है और बेकसूर मौतों को रोकने का कोई रास्ता नहीं रह गया है। रास्ता भी तब निकलता है जब किसी की दिलचस्पी राह ढूंढने की हो। अफगानिस्तान में तरह-तरह की आर्थिक मदद की बात तो हिन्दुस्तान सोचता है, लेकिन अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री और उनकी बेसमझ सरकार को अब यह भूल भी गया है कि बिना अंतरराष्ट्रीय भूमिका के दुनिया का कोई बड़ा देश कोई असर नहीं रखता। और एक देश के रूप में भारत की सरकार की कुछ अघोषित मजबूरियां हो सकती हैं, हम तो भारत के राजनीतिक दलों का हाल देख रहे हैं, जिनके ऊपर सरकार चलाने, अंतरराष्ट्रीय अनुबंध करने और कूटनीति का रिश्ता निभाने की मजबूरियां नहीं हैं, ऐसे राजनीतिक दल भी पड़ोस के देशों पर चल रहे ऐसे लगातार हमलों को इस तरह अनदेखा कर रहे हैं मानो वह पड़ोस किसी दूसरे ग्रह का हो। आज भारत के वामपंथी दलों को कौन देखता है कि ऐसे हर साम्राज्यवादी, पूंजीवादी, विस्तारवादी और गुंडागर्दी के हमलों पर भारत की जनता के राजनीतिक शिक्षण के लिए बयान जारी करें? भारतीय लोकतंत्र नोटतंत्र की तरह हो गया है, यह बुरी तरह से आत्मकेन्द्रित हो गया है और तंग नजरिए का शिकार है जिसे तांगे की घोड़े की तरह सिर्फ जरा सा सामने दिखता है, बाकी कुछ नहीं दिखता। ऐसे में भारत में जिन लोगों को लोकतंत्र की फिक्र है उन तमाम लोगों को सरकार या पार्टियों का मुंह देखना बंद करना चाहिए और जगह-जगह हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और जनता को सहमत कराने की कोशिश करनी चाहिए। जनजागरण के बिना इस देश की चुनावी-पार्टियों और मदमस्त सरकारों पर भी कोई दबाव नहीं पड़ेगा। जब पड़ोस के देशों में बच्चे थोक में मारे जा रहे हैं, तो उसे भी अनदेखा करने वाले देश कतार में अपनी बारी का अंदाज भी लगा लें।
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