7 फरवरी 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के आर्थिक सर्वेक्षण में राज्य की जो विकास दर बताई गई है, वह राष्ट्रीय विकास दर से खासी अधिक है, दो गुना से कुछ कम। कृषि विकास दर राष्ट्रीय कृषि विकास दर से चार-पांच गुना अधिक है। औद्योगिक विकास दर राष्ट्रीय औसत से छह गुना अधिक है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने वित्त मंत्री की हैसियत से 2013-14 का आर्थिक सर्वेक्षण आज विधानसभा में पेश किया और इसमें प्रदेश की औसत आय 2011-12 के मुकाबले 44 हजार 505 से बढ़कर 2012-13 में 50 हजार 691 हो गई है और 2013-14 में इसके करीब 57 हजार तक पहुंचने का अनुमान सामने रखा गया है। पिछले करीब 8 बरस से मुख्यमंत्री ही प्रदेश के वित्त मंत्री भी हैं, और इसलिए किसी भी तरह की आर्थिक उपलब्धि, उसके लिए सम्मान और पुरस्कार, केन्द्र सरकार या योजना आयोग से तारीफ के लिए वे अपनी सरकार के साथ-साथ व्यक्तिगत रूप से भी तारीफ के हकदार हैं। इन बरसों में लगातार रिजर्व बैंक ने भी छत्तीसगढ़ को वित्तीय अनुशासन वाला राज्य पाया है, और यूपीए सरकार के पिछले दस बरसों में छत्तीसगढ़ को अनगिनत मोर्चों पर तारीफ मिली है।
प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय अपने आप में बहुत बड़ा पैमाना नहीं होती। क्योंकि प्रदेश की कमाई का बंटवारा अगर गैरबराबर होता है, तो उससे गरीबों का कुछ भला नहीं होता। लेकिन इस राज्य की हालत कुछ अलग है। यहां पर राज्य सरकार ने रियायती अनाज से लेकर, रियायती बिजली तक, और दर्जनों किस्म की दूसरी ऐसी रियायतें पिछले बरसों में लागू की हैं, जिनका सीधा फायदा गरीबों को पहुंचा है। आमतौर पर जनकल्याणकारी और लोकलुभावनी, रियायतों की योजनाएं देश या प्रदेश की अर्थव्यवस्था को चौपट करने वाली रहती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में इसका एक बहुत ही कामयाब संतुलन देखने मिला है जिसके तहत राज्य का ढांचा भी विकसित हुआ है, शहरी विकास भी हुआ है, और जनकल्याणकारी योजनाओं पर बजट का खासा बड़ा हिस्सा खर्च भी हुआ है। और यह तब हुआ है जबकि देश में कोयला घोटाले के बाद कोयला खदानों से लेकर बिजली और फौलाद के कारखानों की हालत खराब है, दुनिया और देश मंदी की अर्थव्यवस्था से गुजर रहे हैं, और औद्योगिक उत्पादन, पूंजी निवेश, सब कुछ मंदा है। ऐसे में छत्तीसगढ़ जैसा राज्य, जो कि मोटे तौर पर खनिजों की अर्थव्यवस्था पर टिका हुआ है, उस पर भारी उल्टा असर पडऩा तय था, और इस राज्य में ही कारखानों का लगना इसलिए रूक सा गया है, क्योंकि कोयले को लेकर देश में एक अनिश्चितता बनी हुई है।
ऐसे में छत्तीसगढ़ में आर्थिक मोर्चे पर एक अभूतपूर्व और अविश्वसनीय सी कामयाबी दिखाई है। अगर बिना रियायतों को दिए यह राज्य सिर्फ कमाई करके दिखा देता, तो वह अधिक बड़ी बात नहीं होती। इसी तरह अगर वह भारी घाटा झेलकर, प्रदेश की अर्थव्यवस्था चौपट करके, सिर्फ लोकलुभावनी रियायतें बांट देता, तो भी वह गैरजिम्मेदारी होती। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कई बड़े विभागों के मंत्री रहने के साथ-साथ वित्त मंत्री की हैसियत से आज जो आर्थिक सर्वेक्षण सामने रखा है, वह प्रभावशाली है। राज्य में सत्ता की इस तीसरी पारी में उन्होंने जनकल्याण की रियायती योजनाओं को आगे ही बढ़ाया है, और देश के दूसरे राज्यों में इतने लंबे समय तक मंदी के बीच ऐसी कामयाबी आमतौर पर देखने नहीं मिलती है।
अर्थशास्त्रियों के दो अलग-अलग सोच वाले खेमे होते हैं। एक खेमा पूंजीवादी विकास का हिमायती होता है, जो कि रियायतों की लुभावनी अर्थव्यवस्था को तबाही मानता है। दूसरा खेमा जनकल्याणकारी रियायतों का, गरीबों का हिमायती होता है, जो कि सामाजिक पैमानों पर इंसानों के विकास के लिए रियायतों को जरूरी मानता है। छत्तीसगढ़ में इन दोनों खेमों को शिकायत का कोई मौका न मिलना एक बड़ा अविश्वसनीय संतुलन है। इसका एक सुबूत यह है कि सुप्रीम कोर्ट तक में छत्तीसगढ़ की खाद्यान्न नीति, और उस पर अमल की तारीफ बरसों से चली आ रही है। और दूसरी तरफ इस राज्य में अधिक फसल के राष्ट्रीय पुरस्कार मिल रहे हैं, फसल की रिकॉर्ड खरीदी दर्ज हो रही है। अब अगर देश में औद्योगिक माहौल बदलता है, कोयले की खदानों पर मंडराता कानूनी खतरा टलता है, तो यह राज्य कारखानों से भी और अधिक कमाई कर सकेगा।









