जिम्मा निभाने से डरे जस्टिस काटजू फुटपाथ से ही कुछ हौसला मांग लाएं

28 जुलाई 2014
सुप्रीम कोर्ट के जज रहकर रिटायर होने वाले और आज के पे्रस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने पिछले दिनों खबरों में जगह बनाई, जब उन्होंने लिखा कि तमिलनाडु की एक पार्टी के दबाव में मनमोहन सरकार ने एक भ्रष्ट जज को पदोन्नति दी। उन्होंने लोगों के नाम नहीं लिखे, लेकिन तमाम नाम जाहिर हो गए, उस पर बहस चली, और झाग की तरह बैठ गई। इसलिए कि ऐसा पहला मामला सामने नहीं आया था, और काटजू ने पहली बार खबरें गढऩे का सामान मौजूद नहीं कराया था। वे पहले भी कुछ-कुछ लिखकर और बोलकर खबरों में आते रहे हैं, और जहां तक मेरी याद साथ देती है, इनमें से शायद ही कोई बात उनकी मीडिया की संवैधानिक जिम्मेदारी से जुड़ी हुई रही हो। 
जब किसी को उसके जज रहे होने की वजह से देश के एक ऐसे बड़े संवैधानिक पद पर सरकार मनोनीत करती है जो कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को लेकर बनाया गया हो, तो ऐसे इंसान को अपने काम को गंभीरता से लेना चाहिए, और पे्रस काउंसिल के अध्यक्ष को किसी और मामले पर बोलने का वक्त तभी मिलना चाहिए, जब देश में मीडिया से जुड़े हुए सभी सवालों पर बहस हो चुकी हो, और संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी हो चुकी हो। जस्टिस काटजू ने आज तक शायद ही भारतीय मीडिया के सबसे सुलगते हुए सवालों पर कोई बहस छेड़ी हो।
भारत के आम पाठकों और टीवी खबरों के आम दर्शकों को भी अच्छी तरह याद है कि महाराष्ट्र के एक भूतपूर्व कांगे्रसी मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के खबरें खरीदकर चुनाव जीतने का मामला कानून की बहुत सी सीढिय़ों तक चढ़कर चीखकर बोल रहा है, अशोक चव्हाण इस मामले में अदालत से रोक-टोक पाने की कोशिश में लगे हुए हैं, लेकिन पे्रस काउंसिल के अध्यक्ष ने इस मुद्दे को लेकर किसी बहस की कोशिश नहीं की। अभी पिछले महीने ही यह मामला सामने आया कि किस तरह देश का सबसे बड़ा उद्योगपति मुकेश अंबानी देश के एक सबसे बड़े मीडिया कारोबार का मालिक बन बैठा, वहां से अनगिनत पत्रकारों को पिछले एक बरस में इसी नई मालिकाना हैसियत की परदे के पीछे की ताकत से, हटने को बेबस किया गया, लेकिन मार्कंडेय काटजू को इस पर कुछ भी नहीं कहना था।
भारत में टीवी की खबरें अखबारों के मुकाबले बहुत नई हैं, और उनके तौर-तरीकों से लेकर उनकी विश्वसनीयता तक, बहुत से पहलुओं पर सवाल उठ रहे हैं। लेकिन पे्रस काउंसिल के इस बड़बोले अध्यक्ष ने इन सवालों पर न खुद कहा, न लोगों को कहने के लिए उकसाया। इसी तरह देश में इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट दोनों तरह के मीडिया में समाचारों और विचारों के बीच फासला खत्म होते चल रहा है, और इश्तहारों और खबरों के बीच भी फासले खत्म हो चुका है। इस खतरनाक सिलसिले के चलते हुए भारतीय मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने का अब कोई मतलब नहीं रह गया है, लेकिन इस पहलू पर पे्रस काउंसिल ने कोई बहस नहीं छेड़ी।
भारत की मीडिया में मानो पिछले कुछ बरसों में मुद्दे उबलते हुए तेजाब सरीखे हैं, और भारतीय पे्रस परिषद का अध्यक्ष एक अभिनेता संजय दत्त की जमानत और पैरोल की वकालत करते हुए खबरों में बना रहता है। अपनी उस बुनियादी जिम्मेदारी को छोड़कर, जिसके लिए कि जस्टिस काटजू खासी तनख्वाह पा रहे होंगे, खासे ऐशोआराम की जिंदगी के कई बरस पा चुके हैं, वे अगर अपने काम को छोड़कर, हिंदुस्तानी मीडिया पर आज मंडराते खतरों को छोड़कर, दुनियाजहान की बातें करते हैं, तो वे बेमतलब हैं। 
लेकिन कुछ देर के लिए हम अपने ऊपर उठाए गए मुद्दे को छोड़ दें, और इस बात पर आएं कि जस्टिस काटजू मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर फेंकने के बाद अब उससे दूर भाग रहे हैं और कह रहे हैं कि वे अदालत की कालिख के बारे में कुछ और कहना नहीं चाहते, तो हम इसे उनके अदालत के दिनों की भी गैरजिम्मेदारी मानेंगे।
सुप्रीम कोर्ट का जज रह चुका एक इंसान, आज जुबानी जंग से भी डरकर अगर अपने कार्यकाल में अपने सामने आए जुर्म पर भी चुप्पी रखना चाहता है, तो हम इसे सरकारी ओहदे की जिम्मेदारी के खिलाफ एक जुर्म से कम कुछ नहीं मानते। जब लोग जनता के पैसों की किसी कुर्सी पर बैठते हैं, तो वहां बैठकर कुछ गलत बातों को अनदेखा करना, कुछ गलत बातों पर चुप रहना, सरकारी या सार्वजनिक जिम्मेदारी के खिलाफ होता है। जज रहते हुए काटजू को अगर अदालती कामकाज की खामियां दिखीं, तो उनकी पहली जिम्मेदारी उसी वक्त उनके बारे में अपने से ऊपर के सही ओहदे को लिखकर बतलाना था। यह न सिर्फ सरकार या अदालत में होता है, बल्कि किसी निजी कारोबार में भी किसी भी कर्मचारी से यह सहज उम्मीद की जाती है कि कोई गड़बड़ी नजर में आने पर वे उसे मैनेजमेंट को बताएं। ऐसे में काटजू ने कल भी कई बातें छुपाईं, और आज भी कह रहे हैं कि वे न्यायपालिका के उन काले चेहरों का खुलासा नहीं करने वाले हैं, क्योंकि भांड़ाफोड़ के बाद जो बवाल मचेगा उसे वे खुद भी नहीं झेल पाएंगे। 
काटजू हिंदुस्तान की उसी अदालत का जिंदगी भर हिस्सा रहे हैं जहां से दो दिन पहले ही यह खबर आई है कि किस तरह एक बस कंडक्टर पांच पैसे कम लेने के लिए बर्खास्त किया गया, और उस लड़ाई को लड़ते हुए उसे इसी देश की अदालत में चालीस बरस हो गए हैं। ऐसे अनगिनत मामले हैं जिनमें बहुत ही कमजोर, बेबस और असहाय लोग अदालत में लड़ते हुए पूरी जिंदगी खो बैठते हैं, और उन्हें इंसाफ नहीं मिल पाता। अनगिनत ऐसे लोग हैं जिनको पुलिस या जांच एजेंसियां ताकतवर लोगों के खिलाफ गवाह बनाकर अदालत में खड़ा कर देती है और कहीं सलमान खान के खिलाफ तो कहीं अंबानी की कार के खिलाफ फुटपाथ पर सोने वालों से गवाही की उम्मीद करती है, और अरबपति वकीलों के सामने ऐसे बेजुबान लोगों को झोंक देती है। हिंदुस्तानी न्यायपालिका सबसे कमजोर से भी यह उम्मीद करती है कि वे सबसे ताकतवर मुजरिमों का भी भांड़ाफोड़ करते हुए इंसाफ में मदद करें। ऐसे में उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंचा हुआ देश का एक सबसे ताकतवर आदमी बेमतलब की फिजूल बातों को खुद होकर लिखने का शौक तो रखता है, लेकिन अपने इर्दगिर्द की कालिख का भांड़ाफोड़ करने की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी को भी पूरा करने से कतराता है, बचता है, और मुनादी करता है कि वह ऐसे भांड़ाफोड़ के बाद का हंगामा नहीं झेल पाएगा। 
अंबानी और सलमान खान के खिलाफ गवाही देने वाले बेघर फुटपाथी लोग उनके लिए दिक्कत खड़ी करने के बाद नतीजे झेलने को तैयार हैं। जस्टिस मार्कंडेय काटजू को कम से कम फुटपाथ से ही कुछ हौसला मांगकर लाना चाहिए।

लोगों में अपने बदन के लिए नफरत पैदा कर चलती बाजार की साजिश

21 जुलाई 2014
बाकी दुनिया की तरह हिन्दुस्तान के पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों पर रात-दिन ऐसे ईश्तहार आते रहते हैं जो महिलाओं को अधिक खूबसूरत बनाने, मर्दों को अधिक गठीला और आकर्षक बनाने का रास्ता तो दिखाते ही हैं, वे इन दोनों को अधिक गोरा बनाने के सामान भी बेचते हैं। दुबलों को मोटा, और मोटों को दुबला, कम ऊंचाई वालों को अधिक ऊंचा, और कम भरे हुए बदन को अधिक भरने के लिए तरह-तरह के सामान और तरह-तरह की डॉक्टरी-गैरडॉक्टरी सेवाएं बेचते हैं। 
कुल मिलाकर अपने बदन से नफरत करने, लगातार हीनभावना में जीने, और एक असंभव को पाने की लगातार कोशिश पर दुनिया का खरबों का कारोबार टिका हुआ है। पूरी दुनिया को देखें, या पूरी दुनिया को देखने की जरूरत भी नहीं है, सिर्फ कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिन्दुस्तान को ही देख लें, तो बदन के रंग की अलग-अलग कितनी ही किस्में दिखती हैं। नाक-नक्श अलग-अलग कई तरह के दिखते हैं, और कद-काठी का फर्क भी अलग-अलग इलाकों के हिसाब से, अलग-अलग नस्लों और डीएनए के हिसाब से दिखता है। इस खूबसूरत विविधता को खत्म करके कुछ खास तरह के पैमाने बना दिए गए हैं, जिनको पाने के लिए लोग लगे रहते हैं। 
लेकिन यह सिलसिला नया नहीं है, और न ही सिर्फ गोरा बनने के लिए है। दुनिया में बेचैनी बेचने का कारोबार खासा पुराना है, और कुछ पुराने अमरीकी ईश्तहार अगर देखें, तो गालों में गड्ढे बनाने के लिए कुछ किस्म के उपकरण एक सदी पहले से अमरीकी बाजार में थे, दुबले बदन को भरने का कारोबार उस समय था, और हिन्दुस्तान में शायद अभी से तीस-चालीस बरस पहले महिलाओं का सीना अधिक भरा हुआ बनाने के लिए किसी एक तकनीक या सामान के विज्ञापन अनगिनत पत्रिकाओं में भरे पड़े रहते थे। 
यह पूरा सिलसिला गरीबों के खिलाफ है, क्योंकि उनके पास इनमें से किसी झांसे को खरीदने की ताकत नहीं है। और जब उनके मन में उनके रंग-रूप को लेकर, कद-काठी या आकार को लेकर हीनभावना भर दी जाती है, तो फिर वे खुद उदास रहते हैं, निराश रहते हैं, और खूबसूरती के बाजारू पैमानों पर सोचने वाली दुनिया उन लोगों को हिकारत से देखती है। यह बात तो बुनियादी बदन की हुई, बाकी फैशन के कपड़ों और सामानों, चेहरे पर लेपने वाले सामानों की बात तो बची हुई ही है, लेकिन वह बदन की न होकर, ऊपर की ओढ़ी हुई बात है, इसलिए वह कम खतरनाक है। 
दुनिया के कुछ ऐसे देशों को देखें, जो कि ठंडे हैं, और जहां लोगों का रंग अधिक गोरा है। वहां पर ऐसे लोग ही अपने रंग को सांवला कर पाते हैं, जो कि गर्म देशों तक जाकर वहां धूप सेंककर लौटते हैं। वहां भी ऐसा न कर पाने वाले लोगों के लिए खास किस्म की रौशनी में लेटकर अपने बदन की चमड़ी को कुछ सांवला करने के क्लीनिक मौजूद हैं, और रंग का कारोबार वहां रंग को गाढ़ा करने से कमाई करता है, जैसे कि हिन्दुस्तान में रंग को गोरा करने के लिए शाहरूख खान जैसे लोग मॉडलिंग करते हैं। 
बाजार की हिंसा का कोई अंत नहीं है। और यह समाज की सोच को ढालते चलती है, या समाज की मौजूदा सोच को दुहते चलती है। बाजार रोज नए तरीके निकालता है कि लोगों को कैसे-कैसे अपने आपसे नफरत करना सिखाया जाए, और फिर उस नफरत की वजहों को दूर करने के सामान बेचे जाएं। यह सिलसिला कुछ उसी तरह का है कि किसी हिन्दी फिल्म में कोई पहले से तय किया गया गुंडा आकर पहले तो किसी सुंदरी का बैग छीनकर भागता है, और फिर फिल्म का हीरो आकर गुंडे को पीटकर बैग छीनकर लाकर सुंदरी को देता है, और एवज में उसका दिल जीतने की कोशिश करता है। बाजार लोगों के मन में हीनभावना भरते चलता है, ताकि खुद उसका पेट चलता रहे।
लोग बाजार की फैशन के शिकार इस हद तक हो जाते हैं कि हिन्दुस्तान का गृहमंत्री शिवराज पाटिल मुंबई आतंकी हमले के दिन दिनभर में चार बार अलग-अलग किस्म के कपड़े पहनकर, फैशन परेड की तरह मीडिया के सामने आता है। बाजार लोगों को जिंदगी में आगे बढऩे के लिए महंगे कपड़ों का रास्ता बताता है, और लोग इस झांसे में आ जाते हैं कि महंगे सामानों के बिना कामयाब नहीं हुआ जा सकता। 
जिस अमरीका में बाजार घरेलू मोर्चे पर भी बहुत हिंसक और आक्रामक है, और बाकी दुनिया के देशों में भी अमरीकी कंपनियां लोगों के आत्मविश्वास पर हिंसक हमले करती हैं, खुद वहां पर बाजार इस बात पर बेचैन है कि अमरीकी राष्ट्रपति की पत्नी मिशेल ओबामा बहुत ही सस्ते कपड़े पहनती हैं। वे इतने सस्ते हैं कि अमरीका की कोई मध्यमवर्गीय महिला भी उन्हें खरीदकर पहन सकती है। अब अगर अमरीका की प्रथम महिला महंगे कपड़े पहनती, तो बाजार ऊंचे दामों में अपनी ऊंची कमाई भी कर पाता। लेकिन अगर राष्ट्रपति की पत्नी किसी मामूली औरत की तरह, आम लोगों की पहुंच के भीतर के कपड़े पहन लेती है, तो इससे बाजार का कारोबार मंदा होता है। 
भारत में गोरेपन की क्रीम के खिलाफ कुछ समझदार लोग आवाज उठाते हैं, लेकिन हिन्दुस्तानी सामाजिक सोच शादी के बाजार में गोरेपन के लिए जिस तरह की बावली है, उसे देखते हुए लोग फिर गोरे रंग पर गुमान करने लगते हैं, उसकी चाह में लगे रहते हैं, और यह हसरत रखते हैं कि घर में गोरी बहू आए तो अगली पीढिय़ां गोरी निकलें। 
इस सिलसिले को खत्म करना हिन्दुस्तान जैसे देश में शुरू भी नहीं हो सकता, क्योंकि अभी तो बाजार की हिंसा को समझना भी शुरू नहीं हुआ है। अभी लोग यह जान और मान भी नहीं रहे हैं कि वे एक कारोबार की साजिश के तहत हीनभावना में जीते हैं। लेकिन इस बारे में बात जब तक नहीं होगी, तब तक समाज की आर्थिक असमानता भी लोगों की हीनभावना को बढ़ाते चलेगी, क्योंकि जिस तबके के पास पेट भरने को भी मुश्किल से जुटता है, वह तबका चेहरे पर पोतने के लिए गोरेपन की क्रीम कहां से खरीदेगा? लेकिन समाज का जो जागरूक तबका है, उसे यह चर्चा शुरू करनी पड़ेगी, उसे बहस तक ले जाना पड़ेगा, और बाजार की साजिश का भांडाफोड़ करना पड़ेगा। 

हिन्दुस्तान के हिंसक प्रदर्शनों पर हवाई नजर की तकनीक

27 जुलाई 2014
संपादकीय

उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में दो समुदायों के बीच हिंसक संघर्ष की खबरों से बाकी देश में तनाव फैलने का खतरा हमने कल ही इस जगह लिखा, इसलिए आज उस पर दुबारा लिखने का कोई मकसद नहीं है, लेकिन उससे जुड़ी हुई एक छोटी बात है कि वहां पर पुलिस प्रदर्शनों और संघर्ष पर नजर रखने के लिए ड्रोन विमानों में कैमरा लगाकर उनका इस्तेमाल कर रहे हैं। खिलौनों की तरह के ये छोटे विमान दूर से नियंत्रित किए जाते हैं, और कुछ ऊंचाई पर उड़ते हुए ये नीचे की तस्वीरें रिकॉर्ड भी कर सकते हैं, और उन्हें उसी वक्त प्रसारित भी कर सकते हैं। ऐसे वीडियो सुबूत पुलिस के काम आ सकते हैं, और अदालतों से लेकर मानवाधिकार आयोग तक कई जगहों पर पुलिस को ऐसे हर मौके के बाद कटघरे में खड़ा किया ही जाता है। ऐसे में हिंसा में लगे हुए समुदायों से लेकर राजनीतिक दलों तक बहुत से पक्ष होते हैं जो अपने-अपने नजरिए से मौके का ब्यौरा बताते हैं। ऐसे में अगर हवाई फोटोग्राफी से पुलिस कोई सुबूत जुटा सकती है, तो वह इंसाफ में बहुत मददगार हो सकते हैं। 
दुनिया में आज ड्रोन का तरह-तरह से इस्तेमाल हो रहा है। अमरीका और इजराईल ड्रोन से पाकिस्तान-अफगानिस्तान, और फिलीस्तीन पर बमबारी कर रहे हैं, और दर्जनों लोगों को एक बार में मार रहे हैं। दूसरी तरफ सामानों की घर पहुंच बिक्री करने वाली बड़ी कंपनियां खाने-पीने के सामान तक ड्रोन से डिलीवर करने की तैयारी कर चुकी हैं। अभी-अभी उत्तरप्रदेश में ही कुछ विदेशी डॉक्यूमेंट्री निर्माताओं को पकड़ा गया जो कि गंगा आरती की हवाई शूटिंग के लिए ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे थे। अमरीका में मानवाधिकारवादी लोग लगातार इस बात पर आशंका जाहिर कर रहे हैं कि सार्वजनिक जगहों पर ड्रोन से पुलिस की निगरानी से जनता के बुनियादी हक कुचले जाएंगे। किसी भी नई टेक्नालॉजी के साथ ऐसी आशंकाएं और ऐसे खतरे जुड़े ही रहते हैं, लेकिन उनकी वजह से टेक्नालॉजी का आना नहीं थमता। एक तरफ तो मोबाइल फोन की वजह से दुनिया में हजारों-लाखों मरीजों और घायलों की जिंदगियां बच रही हैं, तो दूसरी तरफ अमरीका पर यह ताजा आरोप लगा है कि वहां बना हुआ एप्पल का आईफोन अपने इस्तेमाल करने वालों की हर जानकारी एप्पल को भेजने की तकनीकी क्षमता वाला है, और अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए इस जानकारी का इस्तेमाल कर रही है। ऐसा ही ड्रोन के साथ भी हो सकता है, एक तरफ हिंसा पर नजर रखने के लिए हवा में पुलिस के ड्रोन उड़ सकते हैं, तो दूसरी तरफ कोई मुजरिम भी किसी घर पर आसमान से नजर रखने के लिए ऐसे ड्रोन कुछ हजार में ही खरीदकर इस्तेमाल कर सकते हैं। 
लोगों को आज इस नई टेक्नालॉजी के साथ जीना सीखना होगा। और इसमें अधिक दिक्कत अभी उन हिंसक प्रदर्शनकारियों को आएगी जो कि किसी राजनीतिक दल, किसी धर्म, या संगठन के झंडे तले सड़कों पर भीड़ का कानून लागू करते हैं, और जिंदगियां खतरे में डालते हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ जब पुलिस के हवाई कैमरे रिकॉर्डिंग जुटाकर अदालत के सामने पेश करेंगे, तो मुजरिमों का बचना मुश्किल हो जाएगा। हमारा मानना है कि हिंसा और उपद्रव के मौके पर इस तकनीक का इस्तेमाल किसी तरह के बुनियादी अधिकार को नहीं कुचलता, और धीरे-धीरे पूरे देश में हिंसा पर निगरानी के औजार के रूप में इसका इस्तेमाल करना चाहिए। भारत के लोकतांत्रिक कानून में बिना हिंसा प्रदर्शन करने की काफी गुंजाइश है, और यहां की सरकारें भी बहुत हद तक इसकी इजाजत देती हैं। और फिर ड्रोन से की जा रही रिकॉर्डिंग तो पुलिस की कार्रवाई पर भी नजर रखेगी, और हिंसा के बाद पुलिस ऐसी रिकॉर्डिग को आसानी से खत्म भी नहीं कर सकेगी। ऐसे नियम जरूर बनने चाहिए कि सार्वजनिक जगहों के ड्रोन की ऐसी रिकॉर्डिंग बिना छेड़छाड़ सम्हालकर रखी जाए, इससे प्रदर्शनकारियों को भी ऐसे आरोपों को साबित करने में मदद मिलेगी कि दूसरे तबके ने, या कि पुलिस ने उनके साथ ज्यादती की। आगे चलकर यह भी हो सकता है कि भारत के मीडिया के ड्रोन और आंदोलनकारियों के अपने ड्रोन भी अपने-अपने मकसद से उड़कर रिकॉर्ड कर सकें, और तब सुबूतों के साथ छेड़छाड़ नामुमकिन हो जाएगी।

उत्तरप्रदेश की साम्प्रदायिक हिंसा से पूरे देश के सामने खतरे खड़े

26 जुलाई 2014
संपादकीय
उत्तरप्रदेश में आज फिर साम्प्रदायिक तनाव भड़क उठा है, और अभी जो खबर है उसके मुताबिक सेना को बुलाया गया है। भारत में आंतरिक तनाव को लेकर कफ्र्यू लगने के बाद यह सबसे बड़ी कार्रवाई रहती है, और सेना को बुलाना, इलाके को उसके हवाले करना, यह एक किस्म से लोकतांत्रिक सरकार का नाकामयाब होना, और हालात को बंदूकों के हवाले करना रहता है। उत्तरप्रदेश में यह नौबत नई नहीं है, और इसका केन्द्र में मोदी सरकार के आने से भी कोई लेना-देना नहीं है। उत्तरप्रदेश के भीतर भारतीय जनता पार्टी के लोग, या हिन्दू संगठनों के लोग ऐसे तनाव के कुछ मामलों के पीछे रहे हैं, लेकिन उनके बिना भी वहां की समाजवादी पार्टी की अखिलेश सरकार ऐसे तनाव के मौके देते आई है। अभी हम इस तनाव की जिम्मेदारी तय करने के पचड़े में पडऩा नहीं चाहते, लेकिन फौजी बूटों के साथ-साथ आने वाले खतरे को हम उत्तरप्रदेश की सरहद के बाहर भी बाकी देश में खतरा मानते हैं, और इसीलिए एक प्रदेश की नाकामयाबी, या वहां पर की साजिशें, बाकी देश को भी आग में झोंक सकती हैं। 
कल ही हमने देश भर में जगह-जगह साम्प्रदायिकता को बढ़ाने वाली बातों के खिलाफ लिखा था, और आज फिर उत्तरप्रदेश की इस ताजा आग को देखते हुए इस बारे में लिखना जरूरी लग रहा है। भारत का ताजा इतिहास इस बात का गवाह है कि पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक, और श्रीलंका से लेकर म्यांमार तक, जहां-जहां भी दो धर्मों के लोगों के बीच टकराव हुआ है, हिंसा हुई है, उसका बहुत बुरा असर हिन्दुस्तान पर भी पड़ा है। क्योंकि हिन्द महासागर के इस हिस्से में देशों के बीच सरहदें तो हैं, लेकिन धर्मों का बंटवारा नहीं है। इसलिए म्यांमार में जब बौद्ध समुदाय मुस्लिमों को मारता है, तो उसके खिलाफ भारत में कुछ आतंकी मुस्लिम लोग बोधगया को निशाना बनाते हैं। ऐसे ही मामले श्रीलंका में तमिलों पर हुई हिंसा को लेकर भारत में होते हैं, ऐसा ही पाकिस्तान या बांग्लादेश में हिन्दुओं के साथ हुई ज्यादती को लेकर होता है, और ऐसा ही तब भी होता है जब भारत में मुस्लिमों के साथ ज्यादती होती है, और उसका दाम पाकिस्तान या बांग्लादेश के हिन्दुओं को चुकाना पड़ता है। हिंसा से परे भी बहुत से देशों की अर्थव्यवस्था में हिन्दुस्तानियों की जगह को लेकर ऐसे खतरे साम्प्रदायिक तनाव के बाद खड़े होते हैं। 
हम एक बार फिर उत्तरप्रदेश की बात करें, तो वहां की नालायक और बददिमाग सरकार ने एक ऐसी नौबत खड़ी की है जिसमें मुलायम सिंह ब्रांड के समाजवाद की सबसे बड़ी कामयाबी यही मानी जा रही है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर मुलायम सिंह का कुनबा काबिज रहे। और उसके बाद प्रदेश का चाहे जो हो, उसके बाद लोकतांत्रिक परंपराओं का चाहे जो हो। यह नौबत भारत की राजनीति और समाज व्यवस्था में धर्मनिरपेक्षता नाम के शब्द की इज्जत मिट्टी में मिला रही है। उत्तर भारत के दो बड़े राज्यों में साम्प्रदायिकता के खिलाफ धर्मनिरपेक्षता का झंडा लेकर चलने वाले दो बड़े ओबीसी नेताओं का हाल यह है कि वे कुनबापरस्ती, अनुपातहीन संपत्ति, भ्रष्टाचार, और बददिमागी का लंबा इतिहास दर्ज कर चुके हैं। ऐसे लालू यादवों, और मुलायमों के चलते साम्प्रदायिकता का विरोध एक गंदा शब्द लगता है, और वह अपनी साख खो बैठा है। लोगों को लगता है कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर ये लोग जब सिर्फ अपना कुनबा पालने में सैकड़ों बरस पहले के राजवंशों की तरह लगे हुए हैं, तो इनकी लोकतंत्र में कोई जगह क्यों होनी चाहिए? 
लेकिन ऐसी राजनीतिक बात से परे अगर उत्तरप्रदेश के शासन-प्रशासन की बात करें तो मुलायम-अखिलेश के राज में पूरे राज्य की पुलिस और वहां के अफसर-तबके को जातिवाद और पसंद के पैमानों पर अलग-अलग करके शासन-प्रशासन को तबाह कर दिया है। देश के सबसे बड़े राज्य को आज जिस तरह एक बच्चे का खिलौना बनाकर रख दिया गया है, उससे सिर्फ वहीं साम्प्रदायिकता नहीं बढ़ी है, बल्कि उसका असर बाकी देश में भी हो रहा है, कहीं पर आग लग रही है, और कहीं पर अभी दबे-दबे सुलग रही है। इस बारे में पूरे देश को, और लोकतंत्र की तमाम राजनीतिक ताकतों को गंभीरता से सोचना चाहिए। 

बात की बात, Bat ke bat,

26 july 2014

26 july 2014

देश में खाई खोदते बयानों पर कड़ी रोक की जरूरत

25 जुलाई 2014
संपादकीय

 इस सिलसिले की शुरुआत कहां से हुई यह याद करना तो मुमकिन नहीं है, लेकिन किसी सिरे तक पहुंचने के लिए गिरिराज सिंह के बयान से शुरू करते हैं, जिसमें उन्होंने नरेन्द्र मोदी के राज में उनके आलोचकों को पाकिस्तान चले जाने की चेतावनी दी थी। बाद में मानो इन्हीं रेल टिकटों के लिए उनके घर से रहस्यमय तादाद में एक करोड़ से अधिक की अघोषित नगदी चोरी होकर बरामद हुई थी, जिसे पहले दिन उन्होंने राजनीतिक साजिश कहा था, लेकिन दो दिन बाद उन्होंने एक भाई खड़ा करके उस रकम पर दावा भी कर दिया। गिरिराज सिंह के उस बयान के बाद से अब तक भाजपा और उसके साथी दलों की ओर से बहुत से ऐसे बयान आए हैं जो हिन्दुस्तान में हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच एक तनाव और कड़वाहट पैदा कर रहे हैं। जाहिर तौर पर ऐसे हमलों के शिकार हिन्दुस्तान के वे मुस्लिम हैं, जो किसी भी हिन्दू जितने ही भारतीय हैं। चुनाव अभियान खत्म होने के बाद नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर उनसे यह उम्मीद की जाती थी कि साम्प्रदायिकता भड़काने वाली बातें उनके मातहत लोगों की तरफ से नहीं होंगी, क्योंकि अब सरकार चलाने के जिम्मेदार भी हैं। लेकिन ऐसी बातें रोज कहीं न कहीं से उठ रही हैं।
पिछले दो दिनों में ही कम से कम चार ऐसी बातें सामने आई हैं, जो हिन्दुस्तान में हिन्दू और मुस्लिम के बीच तनाव खड़ा करने की सोची-समझी कोशिश साबित करती हैं, या फिर रोजा रखे हुए मुस्लिम के मुंह में एक बिल्कुल ही लापरवाही से रोटी ठूंसती है। शिवसेना के सांसदों का खड़ा किया हुआ इस साम्प्रदायिक तनाव पर प्रधानमंत्री जाहिर तौर पर तो चुप रह सकते हैं, क्योंकि अभी तक न तो पुलिस में रिपोर्ट हुई है, और न ही हिन्दुस्तान के अंधे कानून ने रोजा-रोटी में अब तक कोई खोट देखी है। लेकिन सवाल यह है कि प्रधानमंत्री ऐसी बातों को अनदेखा करते हुए क्या विविधताओं से भरे हुए इस विशाल देश पर राज कर सकेंगे? खुद उनकी पार्टी के मंत्री गोवा में घोर दकियानूसी बयान देते हैं, और उनका खंडन गोवा के ही भाजपाई मुख्यमंत्री को करना पड़ता है, अपने मंत्री के सार्वजनिक बयान के खिलाफ सरकार का रूख बताना पड़ता है। और उसी गोवा में कल भाजपा की अगुवाई वाली सरकार के एक सहयोगी-दल मंत्री बयान देते हैं कि मोदी की अगुवाई में भारत एक हिन्दू राष्ट्र बनेगा। और यह बयान विधानसभा के भीतर सामने आता है।
कल की ही बात है कि हैदराबाद में भाजपा विधायक दल के नेता का एक बयान सामने आता है कि तेलंगाना राज्य सरकार का सानिया मिर्जा को प्रदेश का ब्रांड एम्बेसडर बनाना गलत है, क्योंकि अब वह पाकिस्तान की बहू है। यह बयान लोगों को याद दिलाता है कि सोनिया गांधी इटली की बेटी थीं, लेकिन उनको भारत की बहू मानने से भाजपा के नेता अभी कुछ बरस पहले तक इंकार करते थे, और सोनिया के प्रधानमंत्री बनने की नौबत आने पर सिर मुंडाने के बयान देते थे, आज उसी तरह सानिया मिर्जा एक पाकिस्तानी से शादी करने के बाद, भारतीय नागरिक बने रहने परभ भी भारत की बेटी नहीं मानी जा रही है। यह तो अच्छा हुआ कि शाम होते-होते भाजपा के केन्द्रीय मंत्री और कल तक प्रवक्ता रहे प्रकाश जावड़ेकर ने इस बयान का विरोध किया और कहा कि पार्टी ऐसा नहीं सोचती है।
और यह भी कल की ही बात है कि संसद में दिल्ली से भाजपा के एक सांसद ने रोजा-रोटी पर बहस के दौरान शिवसेना के बर्ताव का विरोध करने वाले सांसदों को पाकिस्तान जाने की नसीहत दे दी। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी की चुप्पी लोगों को कुछ तो चौंका रही है, और कुछ इस मजाक का मौका दे रही है कि पीएम की कुर्सी सबको मौनी बाबा बना देती है। लेकिन चुप रहकर भी वे अपनी पार्टी के, अपने गठबंधन के, और अपने हमखयालों के किए जा रहे हमलों के लिए संवैधानिक, राजनीतिक, और नैतिक रूप से जिम्मेदार, या जवाबदेह तो हैं ही। देश में आज अगर हिन्दू और मुस्लिम के बीच एक खाई खोदी जा रही है, तो इसका नुकसान सिर्फ सामाजिक मोर्चे पर नहीं होगा, आर्थिक मोर्चे पर भी इसका नुकसान होगा। दोनों समुदायों के बीच यह तनाव बढ़ेगा, तो घोषित साम्प्रदायिक हिंसा से जूझने में देश की बहुत सी ताकत जाएगी, और अघोषित आतंकी साजिशों से बचाव की तैयारी में भी देश की बहुत सी ताकत लगेगी, बेहिसाब खर्च लगेगा, और देश की साख दुनियाभर के कारोबारियों के बीच भी गिर जाएगी।
भाजपा को एक पार्टी के रूप में, एनडीए को एक गठबंधन के रूप में, और नरेन्द्र मोदी एक प्रधानमंत्री के रूप में ऐसी गैरजरूरी बयानबाजी पर रोक लगाने की जरूरत है, अगर इसके पीछे कोई सोची-समझी बात न हो तो।

नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा, मेरी आवाज ही पहचान है गर याद रहे...

24 जुलाई 2014
संपादकीय

तेलंगाना में दिक्कतें दूर होने में बरसों लगेंगे, और आंध्र में भी। लेकिन इस बीच कुछ नई दिक्कतें भी खड़ी हो रही हैं। नया राज्य बने तेलंगाना में मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने अंतरराष्ट्रीय टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा को राज्य का ब्रांड एंबेसडर बनाया, तो भाजपा विधायक दल के नेता ने कहा कि सानिया तो अब पाकिस्तान की बहू है, इसलिए उसे ब्रांड एंबेसडर बनाना ठीक नहीं है। कांगे्रस ने इस तर्क से परे सानिया के नाम का यह कहकर विरोध किया कि वह तेलंगाना की नहीं, आंध्र की है। लेकिन मुख्यमंत्री की बेटी ने यह मिसाल देकर पिता का बचाव किया कि मोदी के गुजरात में अमिताभ बच्चन ब्रांड एंबेसडर हैं, और वे वहां न पैदा हुए हैं, न उन्होंने वहां काम किया है। 
आज की बाजार व्यवस्था के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र संघ के संगठनों से लेकर दूसरे समाजसेवी संगठनों तक ने अपने-अपने ब्रांड एंबेसडर बनाए हैं। हॉलीवुड के अभिनेता-अभिनेत्रियों से लेकर खिलाडिय़ों तक  को किसी देश-प्रदेश, संगठन, अभियान, या मुद्दे के प्रचार के लिए ब्रांड एंबेसडर बनाया जाता है। लेकिन हम भारत के राज्यों की बात करें, तो क्या सचमुच ही राज्यों को पहले से चर्चित चेहरों का इस्तेमाल करने की जरूरत पडऩी चाहिए? 
भारत की आजादी के दिनों को याद करें, तो महात्मा गांधी पूरी दुनिया में भारत के विकल्प के रूप में समझे जाते थे। कोई हिंदुस्तान कहे, या गांधी कहे, उसका एक ही मतलब होता था। गांधी के ठीक बाद जवाहर लाल नेहरू अपनी अंतरराष्ट्रीय सोच, इंसानियत के लिए दरियादिली, और दुनिया भर से दोस्ती की वजह से भारत के सबसे बड़े ब्रांड एंबेसडर रहे, और कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि भारत को अपनी कामयाबी के लिए, प्रचार के लिए, सैलानी जुटाने के लिए किसी और चेहरे या नाम की जरूरत हो सकती है। इंदिरा के वक्त तक भी यही हाल रहा, और अपने अंतरराष्ट्रीय फैसलों की वजह से इंदिरा दुनिया के मोर्चो पर एक किस्म से इंडिया मानी गईं, खासकर तब तक, जब तक कि अपने बेटे संजय गांधी के फेर में उन्होंने लोकतंत्र की हत्या करके इमरजेंसी लागू की। इंदिरा के अच्छे दौर के बाद से इस देश में राष्ट्रीय स्तर पर कोई ऐसे नाम नहीं आए, जिनकी कि दुनिया में कोई साख रही हो, और जो भारत के ब्रांड एंबेसडर बन सकते हों।
किसी कलाकार, संगीतकार, खिलाड़ी, या समाजसेवी को ब्रांड एंबेसडर बनाने की नौबत तभी पड़ती है, जब देश या प्रदेश के मुखिया अपने काम को जिम्मेदारी से नहीं करते। पश्चिम बंगाल की बात करें, तो दशकों तक वहां मुख्यमंत्री रहे, माक्र्सवादी ज्योति बसु का नाम और चेहरा उस राज्य का सबसे बड़ा ब्रांड एंबेसडर था। उनके रहते राज्य को किसी और नाम की जरूरत नहीं थी, और वामपंथी नीतियों से सहमत या असहमत जो भी हों, ज्योति बाबू के बारे में यह बात साफ थी कि वे पश्चिम बंगाल का समानार्थी शब्द बने हुए थे। आज अगर ममता बैनर्जी किसी शाहरूख खान को राज्य का ब्रांड एंबेसडर बनाती है तो यह राज्य सरकार के मुखिया की एक नाकामयाबी रहेगी।
हमारा यह मानना है कि लोकतंत्र में शासन का मुखिया रहते हुए किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री  को अपने अच्छे कामों से ही देश-प्र्रदेश की पहचान बनने का मौका मिलता है, और ऐसे लोग ही जब देश-प्रदेश का चेहरा बन सकें, तो ही उनका काम कामयाब साबित होता है। यह अफसोस की बात है कि सरकार चला रहे लोग किसी दूसरे दायरे के कामयाब लोगों की कामयाबी को अपने राज्य या देश की पहचान बनाने और बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करें। लोगों को याद रखना चाहिए कि हिंदुस्तान के इतिहास में समाजसेवा का सबसे बड़ा काम करने वाली मदर टेरेसा को दान जुटाने के लिए, अपने मुद्दों को लोगों तक पहुंचाने के लिए उनको कभी किसी सितारा चेहरे की जरूरत नहीं पड़ी, बल्कि हिंदुस्तान की एक पहचान यह भी बनी कि मदर टेरेसा यहां पर काम करती थीं, और उन्होंने दूर देश से आकर इसको अपना घर बना लिया था। जहां लोग खुद काम नहीं करते हैं, वहीं उन्हें मशहूर बैसाखियां लगती हैं। महान काम करने वालों को इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाने की कोशिश भी नहीं करनी पड़ती, और उनके काम ही उनके दायरे की पहचान हमेशा बने रहते हैं। ऐसे में एक गाना याद पड़ता है-नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा, मेरी आवाज ही पहचान है गर याद रहे...

Bat ke bat,


24 Jully, 2014

कैमरे पर रिकॉर्ड शिवसेना सांसदों की बदसलूकी पर कार्रवाई हो...

23 जुलाई 2014
संपादकीय
दिल्ली में महाराष्ट्र सरकार के भवन में शिवसेना के सांसदों ने खाने से नाराज होकर वहां के कर्मचारियों के साथ बदसलूकी की, और एक मुस्लिम कर्मचारी के मुंह में यह बताने पर भी जबर्दस्ती रोटी ठूंसी कि वह रोजा रख रहा है। रमजान के महीने में मुस्लिम समाज के धर्मालु लोग दिन भर बिना कुछ खाए-पिए रहते हैं, और वे इस बात को बहुत गंभीरता से मानते हैं। ऐसे में कर्मचारी के बार-बार बताने पर भी उसके मुंह में रोटी ठूंसना, एक बड़ा गंभीर अपराध है, जो कि हिंसक तो नहीं है, लेकिन हिंसा से कम भी नहीं है। इसके बाद दूसरी गंभीर बात यह हुई कि यह शिकायत होने पर शिवसेना सांसदों ने इस पूरी घटना को झूठा करार दिया, और यह कहा कि धर्म का इस्तेमाल करके, उसकी आड़ में ऐसे झूठे आरोप लगाना एक बड़ा अपराध है। इसके बाद इस घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग सामने आ गई जिसमें सांसद जबर्दस्ती एक कर्मचारी के मुंह में रोटी ठूंस रहा है।
हम इसे सिर्फ शिवसेना तक सीमित रखकर बात करना नहीं चाहते। दूसरी पार्टियों के सांसद और विधायक भी जहां-जहां उनसे बन पड़ता है, वहां-वहां अपने ओहदे की बददिमागी दिखाते हैं, और लोगों से बदसलूकी करते हैं। फिर बात को कुछ और आगे बढ़ाएं, तो सिर्फ सांसदों और विधायकों को क्यों कोसें, हिन्दुस्तान में जिस किसी के हाथ में ताकत आ जाती है, उसका दिमाग सिर के ऊपर चले जाता है, फिर ऐसे लोगों में बड़े अफसर हों, मीडिया के लोग हों, पैसों की ताकत वाले लोग हों। आज दरअसल बदन की ताकत तो बहुत छोटी रह गई है, दूसरे कमजोर लोगों को नुकसान पहुंचाने की ताकत अधिक मायने रखने लगी है।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम पहले भी कई बार यह लिखते हैं कि जब समाज में ताकत रखने वाला कोई तबका किसी कमजोर के खिलाफ कोई जुर्म करे, तो उसकी तेज सुनवाई के इंतजाम के साथ-साथ उस पर अधिक कड़ी सजा का इंतजाम भी होना चाहिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि कमजोर की सुनवाई भारतीय न्यायव्यवस्था में बहुत ही कम संभावना रखती है। ताकतवर की बच निकलने की संभावना ही अधिक होती है। शिकायत से लेकर जांच तक, और सुबूत से लेकर गवाह तक, वकील से लेकर जज तक, कमजोर तबका मानो कोई हक ही नहीं रखता। आज अगर दिल्ली के महाराष्ट्र सदन में रेल मंत्रालय के कर्मचारियों द्वारा चलाई जा रही यह केंटीन वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं दिखा पाती, तो हमें कोई हैरानी नहीं होती, अगर शिवसेना के सांसद संसद में विशेषाधिकार भंग का मामला लाकर छोटे कर्मचारियों को सजा दिलवाने पर उतारू हो जाते।
भारतीय लोकतंत्र एक बहुत ही गैरबराबरी की व्यवस्था बन चुका है। किसी खरबपति की कार से जब मुंबई के फुटपाथ पर लोग कुचल जाते हैं, और मारे जाते हैं, तो मीडिया से लेकर पुलिस के रिकॉर्ड तक में ड्राइवर को लेकर एक धुंध छा जाती है, और ऐसा ही तब होता है जब संजय दत्त जैसे ताकतवर लोग जेल से बार-बार लंबी पैरोल पर बाहर आते हैं। ऐसा तब भी दिखता है जब सुब्रत राय जैसे लोगों की जमानत के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट अंतहीन घंटे खर्च करते चलती है, और सहारा का वकील सुप्रीम कोर्ट के जजों को बदलवाने की तरकीबें निकालते रहता है, जज बदलते रहते हैं, और सुप्रीम कोर्ट अपने आपको असहाय बताते हुए अपना वक्त खर्च करते चलता है।
भारत में ताकत की बददिमागी को रोकने के लिए आज वीडियो रिकॉर्डिंग एक बड़ा औजार बन गया है, और जब तक किसी की रिकॉर्डिंग सामने नहीं आ जाती है, तब तक ताकतवर लोग चोरी और सीनाजोरी दिखाते रहते हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और शिवसेना के ऐसे सांसदों को सजा मिलनी चाहिए, जिससे कि बाकी लोगों को एक सबक मिल सके। अपनी आक्रामक हिन्दुत्ववादी विचारधारा के चलते शिवसेना के सांसद जब किसी मुस्लिम कर्मचारी पर साजिश का ऐसा आरोप लगाते हैं, और जब आरोप को झूठा साबित करने वाली वीडियो रिकॉर्डिंग आ जाती है, तो उसे कैसे छोड़ा जा सकता है?

आज जरूरत है हिंसक हमलावर अमरीका-इजराईल के बहिष्कार की

22 जुलाई 2014
संपादकीय

फिलीस्तीन के अस्पतालों तक पर हवाई बमबारी करके इजराईल जितने लोगों को अब तक मार चुका है, उनमें से पांच सौ से अधिक की लाशें मिल चुकी हैं। और दुनिया के मामलात में दिलचस्पी रखने वाले कुछ लोगों को छोड़कर बाकी लोग इससे बेखबर हैं, ऐसा इसलिए भी है कि हिन्दुस्तान जैसी संसद इस पर बात करने से भी कतरा रही है क्योंकि इजराईल के साथ भारत के कारोबारी रिश्ते खासे भारी-भरकम हैं। लेकिन जागरूक लोगों को यह समझना चाहिए कि गांधी के दिनों से लेकर आज तक, किसी जगह बेकसूर के साथ हो रही हिंसा पर जो लोग चुप रहते हैं, वे शायद अपनी अगली पीढ़ी के लिए हिंसा को न्यौता देते हैं। दुनिया की एक विख्यात कविता है कि हत्यारे एक पड़ोसी को लेने आए, तो मैं चुप रहा, क्योंकि वे मुझे लेने नहीं आए थे, फिर वे किसी और को लेने आए, तो भी मैं चुप रहा..., और आखिर में एक दिन वे मुझे लेने आए...।
आज वक्त है कि इजराईल और अमरीका की अंतरराष्ट्रीय गुंडागर्दी और हिंसा के खिलाफ दुनिया में आवाज उठे। भारत की कारोबारी पार्टियां न संसद में इस ऐतिहासिक हिंसा के खिलाफ बोलेंगी, और न ही भारत की सरकार इस पर मुंह खोलेगी। इस बारे में हमने दो-तीन दिन पहले ही लिखा था। लेकिन आज फिर इस मुद्दे पर लिखने की वजह यह है कि सरकार से परे जनता भी कुछ कर सकती है, सरकार के बिना भी कुछ कर सकती है। आज लोगों को चाहिए कि अमरीका और इजराईल के बनाए हुए सामानों के खिलाफ एक अभियान छेड़ा जाए, और ऐसी कंपनियों के सामानों का बहिष्कार किया जाए जिनके पीछे कि अमरीका और इजराईल हैं। यह मामला आसान नहीं होगा, क्योंकि दुनिया के बाजार पर, कारोबार पर, अमरीका का दबदबा इतना अधिक है कि अमरीकी सामानों के बहिष्कार का मतलब जिंदगी से कई चीजों को बाहर कर देना, या जिंदगी की रफ्तार को रोक देना होगा। लेकिन फिर भी लोगों को यह सोचने की जरूरत है कि किस तरह अमरीकी और इजराईली सामानों के दूसरे विकल्प ढूंढे जा सकते हैं। ऐसा भी नहीं कि दुनिया के बाकी देश एकदम से शरीफ हैं, और हिंसा के खिलाफ हैं। लेकिन भारत के चुनाव हों, या दुनिया के मामले, लोगों के पास पसंद की गुंजाइश हमेशा ही सीमित रहती है। इसलिए आज सबसे बड़ा सबक अमरीका और इजराईल की गिरोहबंदी को सिखाने का ही हो सकता है, और जब तक इनके पेट पर लात नहीं पड़ेगी, तब तक ये अपनी कमाई से लोगों पर बम बरसाते रहेंगे। इन्होंने इराक में ऐसा किया, अफगानिस्तान में किया, पाकिस्तान में रोजाना कर रहे हैं, और अमरीका का इतिहास अगर देखें तो उन्होंने वियतनाम में एक पूरी पीढ़ी को खत्म करने का काम किया, और जिस दिन उनका बस चलेगा, उस दिन दिल्ली की संसद पर भी वे बम गिराएंगे। आज हिन्दुस्तान एक देश के रूप में तो भारी दब्बू और गैरजिम्मेदार साबित हो रहा है, लेकिन यहां की जनता अधिक जागरूक साबित हो सकती है।
भारत का आजादी का इतिहास भी विदेशी सामानों के बहिष्कार का रहा है, और उस वक्त भी गांधी का नजरिया यही था कि हिन्दुस्तान पर कब्जा करने वाले अंग्रेजों के पेट पर जब तक लात नहीं पड़ेगी, तब तक उन्हें समझ नहीं आएगी। आज भी लोगों को कम से कम ऐसे अमरीकी सामानों का बहिष्कार तो शुरू करना ही चाहिए, जिनसे कि हिन्दुस्तानी बाजार पटे हुए हैं। कोकाकोला और मैकडोनल्ड जैसे सामानों के बिना क्या जिंदगी चल नहीं सकती? क्या अमरीका से बाहर के मोबाइल फोन बाजार में कम हैं? अधिक से अधिक बहिष्कार जब अमरीकी सामानों का होगा, तो ही जाकर इन हमलावर देशों को समझ आएगी। और जब हिंसा के खिलाफ बहिष्कार की समझ भारतीय जनता में आएगी, तो वह जागरूकता इस देश के भीतर भी, और जिंदगी के दूसरे दायरों में भी काम आएगी।