28 जुलाई 2014
सुप्रीम कोर्ट के जज रहकर रिटायर होने वाले और आज के पे्रस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने पिछले दिनों खबरों में जगह बनाई, जब उन्होंने लिखा कि तमिलनाडु की एक पार्टी के दबाव में मनमोहन सरकार ने एक भ्रष्ट जज को पदोन्नति दी। उन्होंने लोगों के नाम नहीं लिखे, लेकिन तमाम नाम जाहिर हो गए, उस पर बहस चली, और झाग की तरह बैठ गई। इसलिए कि ऐसा पहला मामला सामने नहीं आया था, और काटजू ने पहली बार खबरें गढऩे का सामान मौजूद नहीं कराया था। वे पहले भी कुछ-कुछ लिखकर और बोलकर खबरों में आते रहे हैं, और जहां तक मेरी याद साथ देती है, इनमें से शायद ही कोई बात उनकी मीडिया की संवैधानिक जिम्मेदारी से जुड़ी हुई रही हो।
जब किसी को उसके जज रहे होने की वजह से देश के एक ऐसे बड़े संवैधानिक पद पर सरकार मनोनीत करती है जो कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को लेकर बनाया गया हो, तो ऐसे इंसान को अपने काम को गंभीरता से लेना चाहिए, और पे्रस काउंसिल के अध्यक्ष को किसी और मामले पर बोलने का वक्त तभी मिलना चाहिए, जब देश में मीडिया से जुड़े हुए सभी सवालों पर बहस हो चुकी हो, और संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी हो चुकी हो। जस्टिस काटजू ने आज तक शायद ही भारतीय मीडिया के सबसे सुलगते हुए सवालों पर कोई बहस छेड़ी हो।
भारत के आम पाठकों और टीवी खबरों के आम दर्शकों को भी अच्छी तरह याद है कि महाराष्ट्र के एक भूतपूर्व कांगे्रसी मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के खबरें खरीदकर चुनाव जीतने का मामला कानून की बहुत सी सीढिय़ों तक चढ़कर चीखकर बोल रहा है, अशोक चव्हाण इस मामले में अदालत से रोक-टोक पाने की कोशिश में लगे हुए हैं, लेकिन पे्रस काउंसिल के अध्यक्ष ने इस मुद्दे को लेकर किसी बहस की कोशिश नहीं की। अभी पिछले महीने ही यह मामला सामने आया कि किस तरह देश का सबसे बड़ा उद्योगपति मुकेश अंबानी देश के एक सबसे बड़े मीडिया कारोबार का मालिक बन बैठा, वहां से अनगिनत पत्रकारों को पिछले एक बरस में इसी नई मालिकाना हैसियत की परदे के पीछे की ताकत से, हटने को बेबस किया गया, लेकिन मार्कंडेय काटजू को इस पर कुछ भी नहीं कहना था।
भारत में टीवी की खबरें अखबारों के मुकाबले बहुत नई हैं, और उनके तौर-तरीकों से लेकर उनकी विश्वसनीयता तक, बहुत से पहलुओं पर सवाल उठ रहे हैं। लेकिन पे्रस काउंसिल के इस बड़बोले अध्यक्ष ने इन सवालों पर न खुद कहा, न लोगों को कहने के लिए उकसाया। इसी तरह देश में इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट दोनों तरह के मीडिया में समाचारों और विचारों के बीच फासला खत्म होते चल रहा है, और इश्तहारों और खबरों के बीच भी फासले खत्म हो चुका है। इस खतरनाक सिलसिले के चलते हुए भारतीय मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने का अब कोई मतलब नहीं रह गया है, लेकिन इस पहलू पर पे्रस काउंसिल ने कोई बहस नहीं छेड़ी।
भारत की मीडिया में मानो पिछले कुछ बरसों में मुद्दे उबलते हुए तेजाब सरीखे हैं, और भारतीय पे्रस परिषद का अध्यक्ष एक अभिनेता संजय दत्त की जमानत और पैरोल की वकालत करते हुए खबरों में बना रहता है। अपनी उस बुनियादी जिम्मेदारी को छोड़कर, जिसके लिए कि जस्टिस काटजू खासी तनख्वाह पा रहे होंगे, खासे ऐशोआराम की जिंदगी के कई बरस पा चुके हैं, वे अगर अपने काम को छोड़कर, हिंदुस्तानी मीडिया पर आज मंडराते खतरों को छोड़कर, दुनियाजहान की बातें करते हैं, तो वे बेमतलब हैं।
लेकिन कुछ देर के लिए हम अपने ऊपर उठाए गए मुद्दे को छोड़ दें, और इस बात पर आएं कि जस्टिस काटजू मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर फेंकने के बाद अब उससे दूर भाग रहे हैं और कह रहे हैं कि वे अदालत की कालिख के बारे में कुछ और कहना नहीं चाहते, तो हम इसे उनके अदालत के दिनों की भी गैरजिम्मेदारी मानेंगे।
सुप्रीम कोर्ट का जज रह चुका एक इंसान, आज जुबानी जंग से भी डरकर अगर अपने कार्यकाल में अपने सामने आए जुर्म पर भी चुप्पी रखना चाहता है, तो हम इसे सरकारी ओहदे की जिम्मेदारी के खिलाफ एक जुर्म से कम कुछ नहीं मानते। जब लोग जनता के पैसों की किसी कुर्सी पर बैठते हैं, तो वहां बैठकर कुछ गलत बातों को अनदेखा करना, कुछ गलत बातों पर चुप रहना, सरकारी या सार्वजनिक जिम्मेदारी के खिलाफ होता है। जज रहते हुए काटजू को अगर अदालती कामकाज की खामियां दिखीं, तो उनकी पहली जिम्मेदारी उसी वक्त उनके बारे में अपने से ऊपर के सही ओहदे को लिखकर बतलाना था। यह न सिर्फ सरकार या अदालत में होता है, बल्कि किसी निजी कारोबार में भी किसी भी कर्मचारी से यह सहज उम्मीद की जाती है कि कोई गड़बड़ी नजर में आने पर वे उसे मैनेजमेंट को बताएं। ऐसे में काटजू ने कल भी कई बातें छुपाईं, और आज भी कह रहे हैं कि वे न्यायपालिका के उन काले चेहरों का खुलासा नहीं करने वाले हैं, क्योंकि भांड़ाफोड़ के बाद जो बवाल मचेगा उसे वे खुद भी नहीं झेल पाएंगे।
काटजू हिंदुस्तान की उसी अदालत का जिंदगी भर हिस्सा रहे हैं जहां से दो दिन पहले ही यह खबर आई है कि किस तरह एक बस कंडक्टर पांच पैसे कम लेने के लिए बर्खास्त किया गया, और उस लड़ाई को लड़ते हुए उसे इसी देश की अदालत में चालीस बरस हो गए हैं। ऐसे अनगिनत मामले हैं जिनमें बहुत ही कमजोर, बेबस और असहाय लोग अदालत में लड़ते हुए पूरी जिंदगी खो बैठते हैं, और उन्हें इंसाफ नहीं मिल पाता। अनगिनत ऐसे लोग हैं जिनको पुलिस या जांच एजेंसियां ताकतवर लोगों के खिलाफ गवाह बनाकर अदालत में खड़ा कर देती है और कहीं सलमान खान के खिलाफ तो कहीं अंबानी की कार के खिलाफ फुटपाथ पर सोने वालों से गवाही की उम्मीद करती है, और अरबपति वकीलों के सामने ऐसे बेजुबान लोगों को झोंक देती है। हिंदुस्तानी न्यायपालिका सबसे कमजोर से भी यह उम्मीद करती है कि वे सबसे ताकतवर मुजरिमों का भी भांड़ाफोड़ करते हुए इंसाफ में मदद करें। ऐसे में उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंचा हुआ देश का एक सबसे ताकतवर आदमी बेमतलब की फिजूल बातों को खुद होकर लिखने का शौक तो रखता है, लेकिन अपने इर्दगिर्द की कालिख का भांड़ाफोड़ करने की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी को भी पूरा करने से कतराता है, बचता है, और मुनादी करता है कि वह ऐसे भांड़ाफोड़ के बाद का हंगामा नहीं झेल पाएगा।
अंबानी और सलमान खान के खिलाफ गवाही देने वाले बेघर फुटपाथी लोग उनके लिए दिक्कत खड़ी करने के बाद नतीजे झेलने को तैयार हैं। जस्टिस मार्कंडेय काटजू को कम से कम फुटपाथ से ही कुछ हौसला मांगकर लाना चाहिए।



इस सिलसिले की शुरुआत कहां से हुई यह याद करना तो मुमकिन नहीं है, लेकिन किसी सिरे तक पहुंचने के लिए गिरिराज सिंह के बयान से शुरू करते हैं, जिसमें उन्होंने नरेन्द्र मोदी के राज में उनके आलोचकों को पाकिस्तान चले जाने की चेतावनी दी थी। बाद में मानो इन्हीं रेल टिकटों के लिए उनके घर से रहस्यमय तादाद में एक करोड़ से अधिक की अघोषित नगदी चोरी होकर बरामद हुई थी, जिसे पहले दिन उन्होंने राजनीतिक साजिश कहा था, लेकिन दो दिन बाद उन्होंने एक भाई खड़ा करके उस रकम पर दावा भी कर दिया। गिरिराज सिंह के उस बयान के बाद से अब तक भाजपा और उसके साथी दलों की ओर से बहुत से ऐसे बयान आए हैं जो हिन्दुस्तान में हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच एक तनाव और कड़वाहट पैदा कर रहे हैं। जाहिर तौर पर ऐसे हमलों के शिकार हिन्दुस्तान के वे मुस्लिम हैं, जो किसी भी हिन्दू जितने ही भारतीय हैं। चुनाव अभियान खत्म होने के बाद नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर उनसे यह उम्मीद की जाती थी कि साम्प्रदायिकता भड़काने वाली बातें उनके मातहत लोगों की तरफ से नहीं होंगी, क्योंकि अब सरकार चलाने के जिम्मेदार भी हैं। लेकिन ऐसी बातें रोज कहीं न कहीं से उठ रही हैं।