हिन्दुस्तान के हिंसक प्रदर्शनों पर हवाई नजर की तकनीक

27 जुलाई 2014
संपादकीय

उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में दो समुदायों के बीच हिंसक संघर्ष की खबरों से बाकी देश में तनाव फैलने का खतरा हमने कल ही इस जगह लिखा, इसलिए आज उस पर दुबारा लिखने का कोई मकसद नहीं है, लेकिन उससे जुड़ी हुई एक छोटी बात है कि वहां पर पुलिस प्रदर्शनों और संघर्ष पर नजर रखने के लिए ड्रोन विमानों में कैमरा लगाकर उनका इस्तेमाल कर रहे हैं। खिलौनों की तरह के ये छोटे विमान दूर से नियंत्रित किए जाते हैं, और कुछ ऊंचाई पर उड़ते हुए ये नीचे की तस्वीरें रिकॉर्ड भी कर सकते हैं, और उन्हें उसी वक्त प्रसारित भी कर सकते हैं। ऐसे वीडियो सुबूत पुलिस के काम आ सकते हैं, और अदालतों से लेकर मानवाधिकार आयोग तक कई जगहों पर पुलिस को ऐसे हर मौके के बाद कटघरे में खड़ा किया ही जाता है। ऐसे में हिंसा में लगे हुए समुदायों से लेकर राजनीतिक दलों तक बहुत से पक्ष होते हैं जो अपने-अपने नजरिए से मौके का ब्यौरा बताते हैं। ऐसे में अगर हवाई फोटोग्राफी से पुलिस कोई सुबूत जुटा सकती है, तो वह इंसाफ में बहुत मददगार हो सकते हैं। 
दुनिया में आज ड्रोन का तरह-तरह से इस्तेमाल हो रहा है। अमरीका और इजराईल ड्रोन से पाकिस्तान-अफगानिस्तान, और फिलीस्तीन पर बमबारी कर रहे हैं, और दर्जनों लोगों को एक बार में मार रहे हैं। दूसरी तरफ सामानों की घर पहुंच बिक्री करने वाली बड़ी कंपनियां खाने-पीने के सामान तक ड्रोन से डिलीवर करने की तैयारी कर चुकी हैं। अभी-अभी उत्तरप्रदेश में ही कुछ विदेशी डॉक्यूमेंट्री निर्माताओं को पकड़ा गया जो कि गंगा आरती की हवाई शूटिंग के लिए ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे थे। अमरीका में मानवाधिकारवादी लोग लगातार इस बात पर आशंका जाहिर कर रहे हैं कि सार्वजनिक जगहों पर ड्रोन से पुलिस की निगरानी से जनता के बुनियादी हक कुचले जाएंगे। किसी भी नई टेक्नालॉजी के साथ ऐसी आशंकाएं और ऐसे खतरे जुड़े ही रहते हैं, लेकिन उनकी वजह से टेक्नालॉजी का आना नहीं थमता। एक तरफ तो मोबाइल फोन की वजह से दुनिया में हजारों-लाखों मरीजों और घायलों की जिंदगियां बच रही हैं, तो दूसरी तरफ अमरीका पर यह ताजा आरोप लगा है कि वहां बना हुआ एप्पल का आईफोन अपने इस्तेमाल करने वालों की हर जानकारी एप्पल को भेजने की तकनीकी क्षमता वाला है, और अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए इस जानकारी का इस्तेमाल कर रही है। ऐसा ही ड्रोन के साथ भी हो सकता है, एक तरफ हिंसा पर नजर रखने के लिए हवा में पुलिस के ड्रोन उड़ सकते हैं, तो दूसरी तरफ कोई मुजरिम भी किसी घर पर आसमान से नजर रखने के लिए ऐसे ड्रोन कुछ हजार में ही खरीदकर इस्तेमाल कर सकते हैं। 
लोगों को आज इस नई टेक्नालॉजी के साथ जीना सीखना होगा। और इसमें अधिक दिक्कत अभी उन हिंसक प्रदर्शनकारियों को आएगी जो कि किसी राजनीतिक दल, किसी धर्म, या संगठन के झंडे तले सड़कों पर भीड़ का कानून लागू करते हैं, और जिंदगियां खतरे में डालते हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ जब पुलिस के हवाई कैमरे रिकॉर्डिंग जुटाकर अदालत के सामने पेश करेंगे, तो मुजरिमों का बचना मुश्किल हो जाएगा। हमारा मानना है कि हिंसा और उपद्रव के मौके पर इस तकनीक का इस्तेमाल किसी तरह के बुनियादी अधिकार को नहीं कुचलता, और धीरे-धीरे पूरे देश में हिंसा पर निगरानी के औजार के रूप में इसका इस्तेमाल करना चाहिए। भारत के लोकतांत्रिक कानून में बिना हिंसा प्रदर्शन करने की काफी गुंजाइश है, और यहां की सरकारें भी बहुत हद तक इसकी इजाजत देती हैं। और फिर ड्रोन से की जा रही रिकॉर्डिंग तो पुलिस की कार्रवाई पर भी नजर रखेगी, और हिंसा के बाद पुलिस ऐसी रिकॉर्डिग को आसानी से खत्म भी नहीं कर सकेगी। ऐसे नियम जरूर बनने चाहिए कि सार्वजनिक जगहों के ड्रोन की ऐसी रिकॉर्डिंग बिना छेड़छाड़ सम्हालकर रखी जाए, इससे प्रदर्शनकारियों को भी ऐसे आरोपों को साबित करने में मदद मिलेगी कि दूसरे तबके ने, या कि पुलिस ने उनके साथ ज्यादती की। आगे चलकर यह भी हो सकता है कि भारत के मीडिया के ड्रोन और आंदोलनकारियों के अपने ड्रोन भी अपने-अपने मकसद से उड़कर रिकॉर्ड कर सकें, और तब सुबूतों के साथ छेड़छाड़ नामुमकिन हो जाएगी।

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