नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा, मेरी आवाज ही पहचान है गर याद रहे...

24 जुलाई 2014
संपादकीय

तेलंगाना में दिक्कतें दूर होने में बरसों लगेंगे, और आंध्र में भी। लेकिन इस बीच कुछ नई दिक्कतें भी खड़ी हो रही हैं। नया राज्य बने तेलंगाना में मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने अंतरराष्ट्रीय टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा को राज्य का ब्रांड एंबेसडर बनाया, तो भाजपा विधायक दल के नेता ने कहा कि सानिया तो अब पाकिस्तान की बहू है, इसलिए उसे ब्रांड एंबेसडर बनाना ठीक नहीं है। कांगे्रस ने इस तर्क से परे सानिया के नाम का यह कहकर विरोध किया कि वह तेलंगाना की नहीं, आंध्र की है। लेकिन मुख्यमंत्री की बेटी ने यह मिसाल देकर पिता का बचाव किया कि मोदी के गुजरात में अमिताभ बच्चन ब्रांड एंबेसडर हैं, और वे वहां न पैदा हुए हैं, न उन्होंने वहां काम किया है। 
आज की बाजार व्यवस्था के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र संघ के संगठनों से लेकर दूसरे समाजसेवी संगठनों तक ने अपने-अपने ब्रांड एंबेसडर बनाए हैं। हॉलीवुड के अभिनेता-अभिनेत्रियों से लेकर खिलाडिय़ों तक  को किसी देश-प्रदेश, संगठन, अभियान, या मुद्दे के प्रचार के लिए ब्रांड एंबेसडर बनाया जाता है। लेकिन हम भारत के राज्यों की बात करें, तो क्या सचमुच ही राज्यों को पहले से चर्चित चेहरों का इस्तेमाल करने की जरूरत पडऩी चाहिए? 
भारत की आजादी के दिनों को याद करें, तो महात्मा गांधी पूरी दुनिया में भारत के विकल्प के रूप में समझे जाते थे। कोई हिंदुस्तान कहे, या गांधी कहे, उसका एक ही मतलब होता था। गांधी के ठीक बाद जवाहर लाल नेहरू अपनी अंतरराष्ट्रीय सोच, इंसानियत के लिए दरियादिली, और दुनिया भर से दोस्ती की वजह से भारत के सबसे बड़े ब्रांड एंबेसडर रहे, और कोई यह सोच भी नहीं सकता था कि भारत को अपनी कामयाबी के लिए, प्रचार के लिए, सैलानी जुटाने के लिए किसी और चेहरे या नाम की जरूरत हो सकती है। इंदिरा के वक्त तक भी यही हाल रहा, और अपने अंतरराष्ट्रीय फैसलों की वजह से इंदिरा दुनिया के मोर्चो पर एक किस्म से इंडिया मानी गईं, खासकर तब तक, जब तक कि अपने बेटे संजय गांधी के फेर में उन्होंने लोकतंत्र की हत्या करके इमरजेंसी लागू की। इंदिरा के अच्छे दौर के बाद से इस देश में राष्ट्रीय स्तर पर कोई ऐसे नाम नहीं आए, जिनकी कि दुनिया में कोई साख रही हो, और जो भारत के ब्रांड एंबेसडर बन सकते हों।
किसी कलाकार, संगीतकार, खिलाड़ी, या समाजसेवी को ब्रांड एंबेसडर बनाने की नौबत तभी पड़ती है, जब देश या प्रदेश के मुखिया अपने काम को जिम्मेदारी से नहीं करते। पश्चिम बंगाल की बात करें, तो दशकों तक वहां मुख्यमंत्री रहे, माक्र्सवादी ज्योति बसु का नाम और चेहरा उस राज्य का सबसे बड़ा ब्रांड एंबेसडर था। उनके रहते राज्य को किसी और नाम की जरूरत नहीं थी, और वामपंथी नीतियों से सहमत या असहमत जो भी हों, ज्योति बाबू के बारे में यह बात साफ थी कि वे पश्चिम बंगाल का समानार्थी शब्द बने हुए थे। आज अगर ममता बैनर्जी किसी शाहरूख खान को राज्य का ब्रांड एंबेसडर बनाती है तो यह राज्य सरकार के मुखिया की एक नाकामयाबी रहेगी।
हमारा यह मानना है कि लोकतंत्र में शासन का मुखिया रहते हुए किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री  को अपने अच्छे कामों से ही देश-प्र्रदेश की पहचान बनने का मौका मिलता है, और ऐसे लोग ही जब देश-प्रदेश का चेहरा बन सकें, तो ही उनका काम कामयाब साबित होता है। यह अफसोस की बात है कि सरकार चला रहे लोग किसी दूसरे दायरे के कामयाब लोगों की कामयाबी को अपने राज्य या देश की पहचान बनाने और बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करें। लोगों को याद रखना चाहिए कि हिंदुस्तान के इतिहास में समाजसेवा का सबसे बड़ा काम करने वाली मदर टेरेसा को दान जुटाने के लिए, अपने मुद्दों को लोगों तक पहुंचाने के लिए उनको कभी किसी सितारा चेहरे की जरूरत नहीं पड़ी, बल्कि हिंदुस्तान की एक पहचान यह भी बनी कि मदर टेरेसा यहां पर काम करती थीं, और उन्होंने दूर देश से आकर इसको अपना घर बना लिया था। जहां लोग खुद काम नहीं करते हैं, वहीं उन्हें मशहूर बैसाखियां लगती हैं। महान काम करने वालों को इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाने की कोशिश भी नहीं करनी पड़ती, और उनके काम ही उनके दायरे की पहचान हमेशा बने रहते हैं। ऐसे में एक गाना याद पड़ता है-नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा, मेरी आवाज ही पहचान है गर याद रहे...

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