दीवारों पर लिक्खा है, 10 जुलाई

पूरे देश में चुनाव एक साथ होने से सरकारों पर चुनावी दबाव घटने से फायदा होगा

संपादकीय
10 जुलाई 2018


छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ महीनों से रोज सड़कों पर होने वाले प्रदर्शन बढ़ गए हैं। राजनीतिक दलों के नेताओं को मालूम है कि कुछ महीने बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं, तो बहुत से नेताओं की नजरों में कोई न कोई सीट है, और पार्टियों के तो अपने मुद्दे हैं ही। ऐसे में दूरगामी प्रभाव वाले, या कि दीर्घकालीन हित वाले काम छेडऩे की कोई सोच भी नहीं रहे हैं। छत्तीसगढ़ सहित बाकी जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, वे सभी इसी तरह के चुनावी मोड में आ गए हैं, और लंबी सोच को फिलहाल ताक पर धर दिया गया है। लोगों को याद होगा कि मोदी सरकार ने आने के बाद यह चर्चा शुरू की थी कि क्या देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाए जाने चाहिए? हम यह भी सोचते हैं कि इसके साथ-साथ म्युनिसिपल और पंचायतों के चुनाव भी क्यों न करवाए जाएं? दरअसल मोदी की पिछले आम चुनाव में लोकप्रियता और कामयाबी साबित होने के बाद भाजपा और एनडीए का ऐसा सोचना जायज है कि विधानसभाओं के चुनाव भी साथ-साथ निपट जाएं। अगर ऐसा हुआ रहता तो पंजाब या गोवा या मणिपुर में भी भाजपा-एनडीए को शायद जीत मिल सकती थी। इसके साथ-साथ देश में चुनावी खर्च भी कम हो सकता था, और सरकारों के काम करने के तरीके में भी ऐसा फर्क आ सकता था कि बिना चुनावी दबाव के सरकारें बाद में पांच बरस काम कर सकतीं।
हम छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में देखते हैं कि छह-छह महीने में तीन चुनाव होते हैं, और सबसे पहले होने वाले विधानसभा चुनाव के साल भर पहले से सत्तारूढ़ पार्टी फूंक-फूंककर कदम रखने लगती है जो कि तीसरे चुनाव तक जारी रहता है। ऐसे में करीब ढाई बरस का समय सरकार चुनावी-दबाव में निकालती है, और उसके फैसले बहुत उत्पादक नहीं रह जाते। कुछ दूसरे राज्यों में ये चुनाव पांच बरसों में और अधिक बिखरे हो सकते हैं, और वहां पर राज्य सरकार अपना पूरा ही कार्यकाल चुनावी मोड में निकालती हो सकती है। इसलिए लोकतंत्र में यह एक अच्छी बात हो सकती है कि संसद, विधानसभा, और स्थानीय संस्थाओं के चुनाव एक साथ करवाए जाएं। अब यह देखें कि ऐसी सोच में दिक्कत क्या-क्या है।
पहली बात तो यह कि देश भर में जब एक तारीख तय की जाएगी तो कई राज्य ऐसे होंगे जहां की विधानसभाओं का कार्यकाल पूरा नहीं हुआ रहेगा। लेकिन ऐसे में चुनाव आयोग पर यह फैसला छोड़ा जा सकता है कि कौन सी ऐसी तारीख छांटी जाए जिसमें अधिकतर राज्यों के चुनाव एक साथ करवाए जा सकें, और फिर हो सकता है कि उसके लिए संसद का कार्यकाल कुछ कम करना पड़े। ऐसा एक ही बार करना पड़ेगा, और उसके बाद जब तक कोई विधानसभा भंग न हो, राज्य के चुनाव संसद के साथ ही होते रहेंगे। हमारा मानना है कि देश-प्रदेश को चुनावी दबावों से मुक्त होकर पांच बरस काम करने का मौका मिलना चाहिए, और वह देश-प्रदेश सभी के लिए अधिक उत्पादक स्थिति रहेगी। अब राज्यों में सरकारों को भंग करना करीब-करीब खत्म हो चुका है, और राज्यों में मध्यावधि चुनाव की नौबत भी नहीं आती है। ऐसे में एक साथ चुनाव करवाने के बारे में जरूर सोचना चाहिए, ताकि सरकारें लुभावनी राजनीति से परे एक लंबा कार्यकाल गुजार सकें। 
अभी इस पर छिड़ी हुई ताजा बहस में एनडीए और मोदी के साथ जो पार्टियां नहीं हैं, उनमें से भी समाजवादी पार्टी और टीआरएस ने खुलकर पूरे देश में सारे चुनाव एक साथ करवाने से सहमति जाहिर की है। कांगे्रस और भाजपा जैसी दोनों सबसे बड़ी, या फैली हुई पार्टियों ने अभी इस मुद्दे पर जुबान नहीं खोली है। और यह मामला इतना आसान भी नहीं है कि रातों-रात केंद्र सरकार इसे तय कर सके। लेकिन फिर भी बहस के लिए यह मुद्दा सार्वजनिक मंच पर आ गया है, मीडिया भी अलग-अलग राय सामने रख रहा है, आम आदमी पार्टी इसके खिलाफ है, और हमारा ख्याल है कि एक लंबे राजनीतिक विचार-विमर्श के बाद  इस मुद्दे पर बनी व्यापक सहमति संसद और विधानसभाओं के रास्ते होते हुए लागू हो सकती है। लोकतंत्र में जनमत का रूख देखने के लिए ऐसी बहस बहुत मायने रखती है। और फिलहाल हमें इस सोच में कोई सैद्धांतिक खामी नजर नहीं आ रही है। (Daily Chhattisgarh)

कारोबारी मुकाबले से ग्राहकों का मुनाफा...

संपादकीय
9 जुलाई 2018


भारत में मुकेश अंबानी की कंपनी, रिलायंस जियो ने अपने आने के बाद से भारत के दूरसंचार उद्योग में जिस तरह की खलबली मचाई है, वह देखने लायक है। किसी कंपनी की कारोबारी-कामयाबी पर आमतौर पर यहां लिखने की कोई वजह नहीं बनती, लेकिन टेलीकॉम कंपनियों के मुकाबले से देश की जनता को सस्ते रेट में टेलीफोन और डेटा सेवाएं मिल रही हैं, इसलिए यह मायने रखता है। रिलायंस ने लोगों को मुफ्त में बात करना सिखाया, और केवल डेटा इस्तेमाल करने का भुगतान लिया। इससे गरीब और मध्यमवर्ग तक के लोगों पर बहुत बड़ा असर पड़ा, और बाकी लोगों को भी एक बेहतर कनेक्टिविटी वाली सेवा मिली। अब हो सकता है कि बाजार में अपने दैत्याकार एकाधिकार को कायम करने के बाद मुकेश अंबानी भी लोगों से अपनी कमाई बढ़ाना शुरू करे, लेकिन तब तक हो सकता है कि बाजार में कोई और भी आ जाए, कोई और नई तकनीक भी आ जाए। आज का कारोबार समझ के साथ-साथ कल्पनाशीलता और तकनीक के इस्तेमाल दोनों से जुड़ा रहता है, और इसके साथ-साथ मार्केटिंग की जरूरत तो हर किसी को रहती ही है। 
अब रिलायंस ने घरों तक टीवी के सिग्नल पहुंचाने के कारोबार की घोषणा की है, और इन सिग्नलों के साथ-साथ लोगों को लैंडलाईन से फोन और इंटरनेट की सहूलियत भी मिलेगी। यह सब कुछ एक साथ घरों तक पहुंचाने का काम बाजार के तौर-तरीकों को बदलकर रख देगा। आज घरों तक टीवी सिग्नल पहुंचाने के लिए या तो स्थानीय केबल ऑपरेटरों का आमतौर पर स्तरहीन काम रहता है, या फिर जिन डीटीएच ऑपरेटरों का बाजार पर कब्जा है, उन्होंने ये सेवाएं बहुत ही महंगी कर रखी हैं। रिलायंस अपने आकार, अपनी तकनीक, और अपनी मार्केटिंग, इन तीनों की वजह से अब डीटीएच के कारोबार को उसी तरह झकझोरने जा रहा है जिस तरह उसने मोबाइल बाजार को हिलाया था। कुल मिलाकर यह ग्राहक के हित की बात है कि बाजार आपसी मुकाबले में अपना मुनाफा घटाए, और लोगों को कम दाम पर सामान या सेवा दे। इस हिसाब से अभी बाजार का यह मुकाबला लोगों को बेहतर और अच्छी सेवा देने जा रहा है। 
लेकिन इसके साथ-साथ एक बात और समझने की जरूरत है कि कारोबारी अगर अपने काम को नहीं सुधारेंगे, अपने सामान और अपनी सेवा को नहीं सुधारेंगे, तो वे किसी भी दिन बाजार से बाहर हो सकते हैं। भारत में अलग-अलग इलाकों में काम करने के लिए कितनी ही दूरसंचार कंपनियों ने लाइसेंस हासिल किए थे, लेकिन उनमें से एक-एक कर अधिकतर कंपनियों को अपना धंधा समेटना पड़ा, और दूसरी बड़ी कंपनियों को बेचना पड़ा। उन बड़ी-बड़ी बाकी बची कंपनियों को आज जब रिलायंस से मुकाबला करना पड़ रहा है, तो उनका भी पसीना निकल रहा है। इस मिसाल से सबक लेकर हर किस्म के कारोबारी को चाहिए कि वे किसी भी अनदेखे, अनसोचे मुकाबले के लिए भी तैयार रहें, और अपने काम को लगातार बेहतर बनाते रहें। आज रिलायंस को एक अच्छी सेवा लेकर आने के एवज में रातोंरात करोड़ों ग्राहक इसलिए मिले कि बाजार में मौजूद अधिकतर दूसरी कंपनियों ने ग्राहकों की सेवा इतनी खराब कर रखी थी कि लोग उनसे दूर जाने के चक्कर में थे। कुछ दूसरे कारोबार अगर देखें तो कुछ ब्रांड अगर अपनी साख और सेवा अच्छी रखते हैं, तो नया दैत्याकार मुकाबला भी उनको कुचल नहीं पाता। 
आज लोगों को घर पर टीवी का मनोरंजन जिंदगी की बाकी जरूरी सहूलियतों की तरह का एक अनिवार्य खर्च हो चुका है। मुकेश अंबानी की कंपनी ने पिछले कई बरस से लगातार हिन्दुस्तान और दुनिया की दूसरी फिल्म और टीवी कंपनियों से कार्यक्रम खरीदने का सिलसिला चला रखा था। और अब हो सकता है कि इस कंपनी की घोषणा के मुताबिक 11 सौ शहरों में घर-घर तक केबल पहुंचाकर टीवी-इंटरनेट के जरिये रिलायंस इन तमाम कार्यक्रमों की बिक्री भी शुरू करेगा, और उससे भी बाजार के आज के टीवी-इंटरनेट सेवा देने वाले कारोबारियों के सामने एक कड़ा मुकाबला खड़ा होगा। लेकिन मुकेश अंबानी मीडिया के कारोबार में एक सबसे बड़े मालिक बन जाने के बाद अब मनोरंजन, इंटरनेट, और दूरसंचार के कारोबार में सबसे बड़ा कारोबारी बनने की ओर चल पड़े हैं। ऐसे में मीडिया-मोनोपोली का भारत के लोकतंत्र पर कैसा असर होगा, इस पर इस देश में कोई चर्चा भी नहीं हो रही है। लेकिन इस मुद्दे के उस पहलू पर फिर कभी, और फिलहाल सस्ते टीवी सिग्नल की उम्मीद रखें। (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 9 जुलाई

जयंत, तुम तो ऐसे न थे...

संपादकीय
8 जुलाई 2018


केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा आमतौर पर कभी हिंसक और साम्प्रदायिक बयान देते नहीं देखे जाते जो कि कई केन्द्रीय मंत्रियों की अकेली पहचान बन चुकी है। लेकिन अब उन्होंने जो काम किया है उसने न सिर्फ भारत सरकार को शर्मनाक साबित किया है, बल्कि समूचे हिंदुस्तान का सिर झुका दिया है कि यह जनता के पैसों पर ताकत और ऐशोआराम करने वाले, संविधान की शपथ लेकर काम करने वाले इंसान की ऐसी हरकत झेलने के लिए मजबूर है। और ऐसे इंसान का खर्च ढोते रहना भी इस देश की जनता की मजबूरी है, इस देश का संविधान इतना लचीला हो गया है कि जिनके हाथ ताकत हो, वे उसे चुइंगगम की तरह चबा सकते हैं, और चबाकर थूक भी सकते हैं। दुनिया के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय हार्वर्ड से पढ़कर आए जयंत सिन्हा से बेहतर तो देश के वे अनपढ़ आम लोग हैं जो बेकसूरों के कत्ल के हिमायती नहीं है। 
झारखंड में कुछ वक्त पहले एक मुस्लिम मांस व्यापारी की गाड़ी रोकी गई और उसमें गोमांस होने की तोहमत लगाकर भीड़ ने गाड़ी जला दी थी, और उस मुस्लिम को दिनदहाड़े खुली सड़क पर पीट-पीटकर मार डाला था। कातिल भीड़ के चेहरों सहित इस कत्ल की तस्वीरें और वीडियो चारों ओर फैले थे जिन्होंने पूरे देश को बाकी दुनिया में बदनाम किया था। इससे परे ऐसी भीड़ हत्या ने देश के भीतर अल्पसंख्यकों में दहशत भर दी थी, जो कि शायद इस कत्ल का मकसद ही था। जिला अदालत ने इस भीड़-हत्या के दर्जन भर लोगों को उम्रकैद सुनाई थी और वे जेल में थे। झारखंड हाईकोर्ट ने इन लोगों की अपील पर इनकी सजा स्थगित कर दी और इन्हें जमानत दे दी। ये लोग जब जमानत पर छूटकर आए तो केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने अपने बंगले पर इनका स्वागत किया, इन्हें मालाएं पहनाईं और इन्हें बधाई देते हुए तस्वीरें खिंचवाईं, इस पर देश के जिम्मेदार और अमनपसंद लोग हक्का-बक्का रह गए। जयंत सिन्हा के पिता और निराशा में भाजपा छोड़ चुके पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने इस पर खुद ही ट्वीट करते हुए लिखा कि कल तक वे एक लायक बेटे के नालायक पिता थे लेकिन आज हालत उल्टी हो गई है। झारखंड के इस जिले के जिला भाजपा अध्यक्ष ने जमानत पर इस रिहाई पर खुशी मनाते हुए पार्टी दफ्तर में प्रेंस कांफ्रेंस की। 
अब सवाल यह उठता है कि ऐसे किसी जुर्म के लोगों को जमानत मिलने पर अगर केन्द्र और राज्य की सत्ता में बैठी पार्टी और उसके नेता-मंत्री सार्वजनिक खुशी मनाते हैं तो यह इस धर्मनिरपेक्ष देश की आत्मा पर जोरों की एक लात है और तकलीफ यह है कि ऐसी लात का खर्च देश की जनता उठा रही है। चारों तरफ से धिक्कार के बाद जयंत सिन्हा ने एक ढुलमुल सा बयान दिया है कि उन्हें देश के कानून पर पूरा भरोसा है।
अब अगर देश के कानून पर इतना ही भरोसा है, तो इस कानून ने आज की तारीख तक तो इन दर्जन भर लोगों को कातिल करार देकर इन्हें उम्रकैद दी है। इस सजा पर कुछ कहे बिना अदालत ने इनकी अपील पर महज सजा स्थगित करके उन्हें जमानत दी है,जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से उम्मीदें अभी बाकी हैं। ऐसे में भीड़-हत्या के कातिलों की जमानत पर माला पहनाकर उनका स्वागत करना क्या भारत के संविधान की शपथ है? जयंत सिन्हा अकेले नहीं हैं, उनकी तरह के बहुत से और मंत्री और दिग्गज नेता हैं लेकिन दिक्कत यह है कि जयंत सिन्हा तो ऐसे नहीं थे। तो अब क्या वे भी देश के ताजा माहौल में इसे जायज और जरूरत मान रहे हैं कि गैरगुंडों द्वारा की गई भीड़-हत्या की खुशी में हत्यारों को मालाएं पहनाएं? (Daily Chhattisgarh)

भुखमरी-कुपोषण के शिकार ओडिशा राज्यपाल की रईसी

संपादकीय
7 जुलाई 2018


ओडिशा सरकार ने वहां के राज्यपाल गणेशी लाल के दफ्तर से पूछा है कि राजभवन ने राज्यपाल के गृहप्रदेश हरियाणा जाने के लिए विशेष विमान और हेलीकॉप्टर किराये पर लेने की मंजूरी ली थी क्या, और इस पर जमा किए गए 46 लाख रूपए के बिल का भुगतान कैसे किया जाएगा? राज्य सरकार ने विमान-हेलीकॉप्टर किराये पर लेने की वजहें और परिस्थितियों के बारे में भी पूछा है। पिछले महीने राज्यपाल ने हरियाणा के अपने शहर सिरसा का हवाई सफर किया था, और इसके लिए एक जेट विमान और हेलीकॉप्टर किराये पर लिए थे। अभी इस पर राजभवन का कोई जवाब सामने नहीं आया है, लेकिन ओडिशा की भाजपा ने सरकार की इस पूछताछ का विरोध किया है। राज्यपाल गणेशी लाल भाजपा के नेता रहे हैं, और मोदी सरकार ने उन्हें अभी मई में ही राज्यपाल बनाया है। वे पहले आरएसएस और भाजपा के नेता रह चुके हैं। 
ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से दिल्ली के लिए सुबह, दोपहर और रात, नौ उड़ानें हैं, सभी बिना रूके दिल्ली जाती हैं, और जिनका आज की तारीख का अधिकतम भाड़ा 32 सौ रूपए से लेकर 55 सौ रूपए तक है। यह उड़ान दो-ढाई घंटे की है और भाड़े पर लिया गया विशेष विमान इससे कम सुरक्षित रहता है, और इससे अधिक समय लेता है। ऐसे में सादगी के लिए जाने जाने वाले आरएसएस से आए हुए गणेशी लाल ने भुखमरी के शिकार ओडिशा का आधा करोड़ रूपया दिल्ली आने-जाने पर क्यों खर्च किया? आज देश में वैसे भी लोगों के बीच सरकारी फिजूलखर्ची को लेकर बहुत बड़ी नाराजगी है। सोशल मीडिया पर संसद की कैंटीन के सस्ते रेट को लेकर लोग सांसदों के खिलाफ हिकारत की जुबान में लिखते हैं। देश के बहुत से समझदार मुख्यमंत्री दिल्ली आने-जाने का काम आम मुसाफिर-विमानों की टिकट खरीदकर करते हैं जिससे राज्य पर लंबा-चौड़ा बोझ नहीं पड़ता। और राज्यपाल का ओहदा तो किसी भी इमरजेंसी कामकाज से परे का है। इस सजावटी ओहदे पर बैठे हुए एक नेता को कुपोषण के शिकार इस प्रदेश का इतना पैसा बर्बाद करते हुए कुछ लगा नहीं? 
लेकिन हकीकत यही है कि एक बार सरकारी खर्च वाली कुर्सियों पर जो लोग बैठ जाते हैं, वे चाहे मंत्री हों, जज हों, अफसर हों, या दूसरे किस्म के ओहदों वाले लोग हों, वे अपने पर, अपने कुनबे पर, इस बेरहमी से खर्च करते हैं कि जनता का जी जलता है। लेकिन दिक्कत यह है कि ऐसे फिजूलखर्च नेताओं को, उनकी पार्टियों को हरा भी दिया जाए, तो भी उनकी जगह आने वाले दूसरे नेताओं से भी किसी किफायत की उम्मीद नहीं की जा सकती। हम ओडिशा की तरफ देखने के बजाय जब अपने करीब के छत्तीसगढ़ को देखते हैं, तो यहां भी जनता के खर्च पर जीने वाले तमाम लोग अपने लिए इतनी बड़ी-बड़ी सहूलियतें जुटाते हैं जितनी कि अपने निजी खर्च पर कल्पना भी नहीं कर सकते। 
हमारा ख्याल है कि जनता के बीच से ऐसे मुद्दों को लेकर सवाल उठने चाहिए, और ऐसे खर्चीले लोगों के खिलाफ एक जनमत तैयार होना चाहिए। उनके खिलाफ सड़कों पर आंदोलन छिडऩा चाहिए, और सोशल मीडिया पर उनके राजसी ठाठबाट की खबरें फैलानी चाहिए। सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करके अधिक से अधिक जानकारी निकालनी चाहिए, और अगर परंपरागत मीडिया इसे छूना न चाहे, तो भी लोग आज सोशल मीडिया में इसे फैला सकते हैं। जनता को अपने आपको जनता के खजाने का मालिक मानना चाहिए, और उससे होने वाले खर्च का बेरहमी से हिसाब लेना चाहिए। दूसरी तरफ हमारा यह भी ख्याल है कि राष्ट्रपति को राज्यपालों की ऐसी फिजूलखर्ची रोकने के लिए पहल करनी चाहिए और यह काम उन्हें सार्वजनिक रूप से करना चाहिए।  (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 6 जुलाई

तंत्र विद्या से विधानसभा को बांधने की हरकत अवमानना

संपादकीय
6 जुलाई 2018


छत्तीसगढ़ विधानसभा के इस आखिरी सत्र के आखिरी दिन खबरों में बाकी बातें तो कम छाई हुई हैं, एक ऐसे तांत्रिक की खबरें भरी पड़ी हैं जो कि एक भयानक और विचित्र हुलिए में, मालाओं का जखीरा गले में टांगे हुए, पूरे सिर पर लहू सा लाल रंग पोते हुए विधानसभा में घूम रहा है, इंटरव्यू दे रहा है। उसका खुद का दावा है कि वह विधानसभा को तंत्र-मंत्र से बांध रहा है, ताकि चौथी बार भी इसमें भाजपा ही जीतकर घुस सके। इस पर सदन के भीतर भी चर्चा हुई, और बाहर भी। विधानसभाध्यक्ष के सामने भी यह बात उठी तो उन्होंने कहा कि उन्हें भी इस तांत्रिक की जानकारी है और उन्होंने उसके साथ फोटो भी खिंचवाई है। कुछ लोगों ने इस बात को हंसी-मजाक में उड़ाने की कोशिश की, कुछ ने गंभीरता से लिया, कुछ ने याद दिलाया कि यह बाबा भाजपा का एक मंडल अध्यक्ष भी है। लेकिन इन सबसे परे एक बात अपनी जगह कायम है कि विधानसभा को तंत्र विद्या से बांधने का एक दावा इस आदमी ने किया, और वहां की मिट्टी भी लेकर गया। 
अब जिस छत्तीसगढ़ में हर बरस अनगिनत महिलाओं को टोनही साबित करने के लिए समाज के अंधविश्वासी या बदनीयत मर्द एकजुट हो जाते हैं, जहां पर लोग तंत्र-साधना के नाम पर सैकड़ों-हजारों लोगों को हर बरस बेवकूफ भी बनाते हैं, वहां की विधानसभा यह कैसा नजारा बर्दाश्त कर रही है? आज जब देश का कानून जादू-टोने को सजा के लायक मानता है, उस वक्त इस तरह के पाखंड को अगर ऐसी सरकारी, राजनीतिक, या संसदीय मंजूरी मिलती है, तो फिर आम जनता अगर अंधविश्वासी है तो फिर उसमें हैरानी की क्या बात है? विधानसभा का यह बहुत छोटा सा सत्र था, और इसमें अगर विधायकों से लेकर मीडिया का ध्यान ऐसी बेहूदी हरकत पर भटका है, तो यह प्रदेश की जनता के हितों का नुकसान है। इसके साथ-साथ यह भाजपा के लिए नुकसानदेह बात भी है क्योंकि जिस पार्टी की सरकार तीन बार सत्ता में रही, और लगातार विकास और जनकल्याण के नारे के साथ जीतती रही, आज अगर उस पार्टी के लोग ऐसे पाखंड को बढ़ावा देते मिलते हैं, तो उससे पार्टी के अगला चुनाव भी जीतने के आत्मविश्वास पर सवाल उठता है। 
यह बात मजाक में उड़ाने लायक बिल्कुल ही नहीं है। हमारा ख्याल है कि छत्तीसगढ़ और झारखंड में कहीं डायन और कहीं टोनही बताकर बेकसूर महिलाओं को प्रताडि़त करने का एक पुराना सिलसिला चले आ रहा है, और ऐसे राज्यों को अंधविश्वास खत्म करने के लिए खास कोशिशें करने की जरूरत है। अभी अधिक वक्त नहीं हुआ है जब छत्तीसगढ़ के एक लगभग पूरी तरह आदिवासी इलाके सरगुजा में राज्य के गृहमंत्री एक कम्बल वाले बाबा से इलाज करवाते देखे गए हैं, और जो इस बाबा के इलाज को सर्टिफिकेट भी देते हुए मीडिया में आए हैं। ऐसा बाबा जो महज कम्बल ओढ़ाकर उसके भीतर मरीज और खुद को ढांककर इलाज करता है, उसे राज्य का स्वास्थ्य मंत्री क्यों नहीं बना दिया जाता, अगर राज्य सरकार के मंत्रियों को भी उस पर भरोसा है। ऐसा करने पर राज्य का सारा सरकारी इलाज का ढांचा हटाया भी जा सकता है, और हर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में महज एक-एक कम्बल के साथ इलाज हो सकता है, बाकी मशीनों और दवाईयों की जरूरत क्या है? दूसरी बात यह कि अगर एक तांत्रिक विधानसभा को घेरकर कांग्रेस को उसके भीतर बहुमत के साथ घुसने से रोक सकता है, तो फिर ऐसे तांत्रिक की सेवा राज्य के गृहमंत्री बस्तर में भी ले सकते हैं जहां वह तांत्रिक नक्सलियों से छत्तीसगढ़ को बचा सके। उससे पूरे बस्तर की सरहद को बंधवा देना चाहिए कि वहां पर कोई नक्सली न आ सकें। 
विधानसभा में विधायकों ने चाहे इसे हंसी-मजाक में उड़ा दिया हो, लेकिन ऐसे अंधविश्वास को अगर विधानसभा बर्दाश्त भी करती है, तो उसे भी राज्य की कमसमझ जनता के बीच तंत्र और जादू-टोने पर अंधविश्वास बढ़ता है। एक तरफ तो राज्य में डॉ. दिनेश मिश्रा जैसे लोग रात-दिन कोशिश करके अंधविश्वास के खिलाफ खतरा उठाकर भी लड़ाई लड़ रहे हैं, और दूसरी ओर प्रदेश के विधायक अगर ऐसे अंधविश्वास को अपनी विधानसभा और अपने बीच अनदेखा भी करते हैं, तो भी वह ऐसे पाखंड को बढ़ावा देने के अलावा और कुछ नहीं है। विधानसभा में कम से कम कोई तो ऐसा विधायक होता जो कि इस तांत्रिक की इस हरकत को विधानसभा की अवमानना का मामला बनाता। (Daily Chhattisgarh)

यह कैसे मान लिया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में केजरीवाल को अराजक लिखा?

संपादकीय
5 जुलाई 2018


दिल्ली में केजरीवाल सरकार और एक के बाद दूसरे उपराज्यपाल का टकराव देश की राजधानी को जम्हूरियत की जंग में बदल चुका था। इस सरकार से आने से लेकर अब तक जिस तरह केन्द्र सरकार के मातहत लेफ्टिनेंट गवर्नर निर्वाचित सरकार के काम में दखल दे रहे थे, उसे रोक रहे थे, उसे सुप्रीम कोर्ट ने अपने कल के फैसले में निपटाया है। और पांच जजों की बेंच का यह सर्वसम्मत फैसला साफ करता है कि लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार ऊपर है, और उपराज्यपाल का काम अड़ंगे लगाना नहीं है। खबरों में इस फैसले जो हिस्से सामने आए हैं, वे साफ-साफ यह बताते हैं कि निर्वाचित सरकार के हक क्या हैं, और केन्द्र के मनोनीत एलजी की जिम्मेदारियां क्या हैं। यह फैसला इस मायने में जरूरी था कि एलजी नाम की संस्था ने दिल्ली की अब तक की पहली गैरकांग्रेस-गैरभाजपा सरकार का जीना हराम कर रखा था, और जिन दो पार्टियों को मटियामेट करके केजरीवाल सत्ता में आए थे, उन दोनों ही पार्टियों को उनकी फजीहत में बड़ा मजा भी आ रहा था। यह सिलसिला एकदम से खत्म हो जाएगा ऐसा भी नहीं है, लेकिन लोकतंत्र में निर्वाचित के मुकाबले मनोनीत की औकात साफ कर देने वाला यह फैसला बहुत अच्छा है। 
शासन के जानकार यह बताते आए हैं कि दुनिया के किसी भी देश में राजधानी का शहर एक म्युनिसिपल से थोड़ा ही ऊपर रहता है और उसे कभी भी पूर्ण राज्य का दर्जा इसलिए नहीं दिया जाता कि देश भर के तमाम राज्यों को ऐसी राजधानी में जमीन लगती है, उनके दफ्तर वहां रहते हैं, पूरी दुनिया के डिप्लोमेटिक दूतावास राजधानी में रहते हैं, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के दफ्तर, हर किस्म की केन्द्रीय एजेंसी के दफ्तर, उनकी कॉलोनियां राजधानी में रहती हैं, ऐसे में राजधानी का कम से कम कुछ कामकाज केन्द्र सरकार के मातहत रहना जरूरी रहता है। सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले में भी तीन बातों को स्पष्ट रूप से केन्द्र सरकार का अधिकार माना है जिसमें राजधानी की पुलिस, राजधानी की जमीनें, और राजधानी की कानून-व्यवस्था केन्द्र सरकार देखेगी, और दिल्ली के बाकी मामले राज्य सरकार देखेगी। 
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के एक शब्द को लेकर कल से चारों तरफ एक तबका यह प्रचार कर रहा है कि यह मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को झिड़की है। पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने यह लिखा है कि दिल्ली में निरंकुशता और अराजकता के लिए कोई जगह नहीं है। इस बात को लोग मान रहे हैं कि केजरीवाल अराजक हैं, और सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी उनके खिलाफ की है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन शब्दों के साथ किसी का नाम नहीं लिखा है, किसी का जिक्र नहीं किया है, और ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है कि यह आलोचना एलजी की नहीं है। सच तो यह है कि एलजी के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ लिखा है कि वे एक विघ्नकारक के रूप में काम नहीं कर सकते। यह पूरा का पूरा आदेश लगभग पूरी तरह एलजी नाम की संस्था को उसकी औकात दिखाने वाला है, और इसे उसी तरह लेना भी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने लिखा है कि संघीय ढांचे में राज्यों को स्वतंत्रता दी गई है, जनमत का महत्व है, इसे तकनीकी पहलुओं में नहीं उलझाया जा सकता है। 
इस फैसले के बारे में यह भी समझने की जरूरत है कि सुप्रीम कोर्ट की यह संविधान पीठ मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली थी, और पिछले महीनों में सुप्रीम कोर्ट के कुछ जजों ने दीपक मिश्रा पर सरकार के हिमायती होने का इशारा करते हुए कई किस्म की तोहमतें लगाई थीं। इस फैसले को इस ताजा इतिहास की रौशनी में और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। यह फैसला बहुत साफ-साफ केजरीवाल की जीत है, दिल्ली सरकार की जीत है, और दिल्ली की जनता की जीत है। यह केन्द्र सरकार की मनमानी को एक बड़ा झटका है जो दिल्ली सरकार को महज एक म्युनिसिपल की तरह मानकर चल रही थी, और वहां के उपराज्यपाल (लेफ्टिनेंट गवर्नर) को एक प्रशासक की तरह बिठाकर चल रही थी, मानो इस म्युनिसिपल में कोई निर्वाचित सभा ही न हो। ऐसा राज्यों के शहरों के म्युनिसिपलों में तो होता है, लेकिन तभी होता है जब निर्वाचित सभा नहीं होती है। 
अभी यह उम्मीद करना बेकार होगा कि इस फैसले के बाद एलजी पटरी पर आएंगे, और दिल्ली एक लोकतांत्रिक सत्ता पाएगी। अभी यह टकराव जारी रह सकता है, लेकिन यह लोकतंत्र के खिलाफ होगा। (Daily Chhattisgarh)

बात की बात, 5 जुलाई