भुखमरी-कुपोषण के शिकार ओडिशा राज्यपाल की रईसी

संपादकीय
7 जुलाई 2018


ओडिशा सरकार ने वहां के राज्यपाल गणेशी लाल के दफ्तर से पूछा है कि राजभवन ने राज्यपाल के गृहप्रदेश हरियाणा जाने के लिए विशेष विमान और हेलीकॉप्टर किराये पर लेने की मंजूरी ली थी क्या, और इस पर जमा किए गए 46 लाख रूपए के बिल का भुगतान कैसे किया जाएगा? राज्य सरकार ने विमान-हेलीकॉप्टर किराये पर लेने की वजहें और परिस्थितियों के बारे में भी पूछा है। पिछले महीने राज्यपाल ने हरियाणा के अपने शहर सिरसा का हवाई सफर किया था, और इसके लिए एक जेट विमान और हेलीकॉप्टर किराये पर लिए थे। अभी इस पर राजभवन का कोई जवाब सामने नहीं आया है, लेकिन ओडिशा की भाजपा ने सरकार की इस पूछताछ का विरोध किया है। राज्यपाल गणेशी लाल भाजपा के नेता रहे हैं, और मोदी सरकार ने उन्हें अभी मई में ही राज्यपाल बनाया है। वे पहले आरएसएस और भाजपा के नेता रह चुके हैं। 
ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से दिल्ली के लिए सुबह, दोपहर और रात, नौ उड़ानें हैं, सभी बिना रूके दिल्ली जाती हैं, और जिनका आज की तारीख का अधिकतम भाड़ा 32 सौ रूपए से लेकर 55 सौ रूपए तक है। यह उड़ान दो-ढाई घंटे की है और भाड़े पर लिया गया विशेष विमान इससे कम सुरक्षित रहता है, और इससे अधिक समय लेता है। ऐसे में सादगी के लिए जाने जाने वाले आरएसएस से आए हुए गणेशी लाल ने भुखमरी के शिकार ओडिशा का आधा करोड़ रूपया दिल्ली आने-जाने पर क्यों खर्च किया? आज देश में वैसे भी लोगों के बीच सरकारी फिजूलखर्ची को लेकर बहुत बड़ी नाराजगी है। सोशल मीडिया पर संसद की कैंटीन के सस्ते रेट को लेकर लोग सांसदों के खिलाफ हिकारत की जुबान में लिखते हैं। देश के बहुत से समझदार मुख्यमंत्री दिल्ली आने-जाने का काम आम मुसाफिर-विमानों की टिकट खरीदकर करते हैं जिससे राज्य पर लंबा-चौड़ा बोझ नहीं पड़ता। और राज्यपाल का ओहदा तो किसी भी इमरजेंसी कामकाज से परे का है। इस सजावटी ओहदे पर बैठे हुए एक नेता को कुपोषण के शिकार इस प्रदेश का इतना पैसा बर्बाद करते हुए कुछ लगा नहीं? 
लेकिन हकीकत यही है कि एक बार सरकारी खर्च वाली कुर्सियों पर जो लोग बैठ जाते हैं, वे चाहे मंत्री हों, जज हों, अफसर हों, या दूसरे किस्म के ओहदों वाले लोग हों, वे अपने पर, अपने कुनबे पर, इस बेरहमी से खर्च करते हैं कि जनता का जी जलता है। लेकिन दिक्कत यह है कि ऐसे फिजूलखर्च नेताओं को, उनकी पार्टियों को हरा भी दिया जाए, तो भी उनकी जगह आने वाले दूसरे नेताओं से भी किसी किफायत की उम्मीद नहीं की जा सकती। हम ओडिशा की तरफ देखने के बजाय जब अपने करीब के छत्तीसगढ़ को देखते हैं, तो यहां भी जनता के खर्च पर जीने वाले तमाम लोग अपने लिए इतनी बड़ी-बड़ी सहूलियतें जुटाते हैं जितनी कि अपने निजी खर्च पर कल्पना भी नहीं कर सकते। 
हमारा ख्याल है कि जनता के बीच से ऐसे मुद्दों को लेकर सवाल उठने चाहिए, और ऐसे खर्चीले लोगों के खिलाफ एक जनमत तैयार होना चाहिए। उनके खिलाफ सड़कों पर आंदोलन छिडऩा चाहिए, और सोशल मीडिया पर उनके राजसी ठाठबाट की खबरें फैलानी चाहिए। सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करके अधिक से अधिक जानकारी निकालनी चाहिए, और अगर परंपरागत मीडिया इसे छूना न चाहे, तो भी लोग आज सोशल मीडिया में इसे फैला सकते हैं। जनता को अपने आपको जनता के खजाने का मालिक मानना चाहिए, और उससे होने वाले खर्च का बेरहमी से हिसाब लेना चाहिए। दूसरी तरफ हमारा यह भी ख्याल है कि राष्ट्रपति को राज्यपालों की ऐसी फिजूलखर्ची रोकने के लिए पहल करनी चाहिए और यह काम उन्हें सार्वजनिक रूप से करना चाहिए।  (Daily Chhattisgarh)

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