5 सितम्बर 2021

 अमेरिका में अभी एक नई बहस छिड़ी है कि जिन लोगों ने कोरोना की वैक्सीन नहीं लगवाई है, उन्हें हवाई जहाज में चढऩे दिया जाए या नहीं? वहां सरकार ने वैक्सीन लगवाने का फैसला तो लोगों पर छोड़ा है, लेकिन वहां भारत जैसी हालत भी नहीं है कि विमान में चढऩे के पहले वैक्सीन सर्टिफिकेट दिखाना पड़े या कोरोना नेगेटिव होने का सर्टिफिकेट दिखाना पड़े। अमेरिका में लोग अपनी निजी स्वतंत्रता को लेकर अधिक जागरूक या, बेहतर होगा यह कहें कि, अधिक अडिय़ल है। उनमें से बहुत से लोग तो मास्क लगाने से भी इंकार कर देते हैं कि यह उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। वैक्सीन न लगवाने वाले भी बहुत से जिद्दी लोग हैं जिनका कई किस्म का तर्क रहता है। लेकिन महज अमेरिकी लोगों को ही जिद्दी क्यों कहें, हिंदुस्तान के इतिहास को देखें तो जब कस्तूरबा गांधी की तबीयत बहुत खराब हुई थी, और पुणे के आगा खान महल में वे महात्मा गांधी के साथ रखी गई थीं, तब अंग्रेज डॉक्टर उन्हें देखने आया था। उसने जब पेनिसिलिन का इंजेक्शन लगाने की तैयारी की तो गांधी उससे इस बहस में उलझ गए कि किसी दवा को इंजेक्शन से शरीर में डालना प्रकृति के खिलाफ है। और इनके बीच कुछ बातचीत के बाद वह इंजेक्शन नहीं लग पाया, और दवा मौजूद रहते हुए भी कस्तूरबा चल बसी थीं। तो गांधी की जिद ने कस्तूरबा की जान ले ली थी। आज भी गाँधी होते तो कोरोना वैक्सीन नहीं लगवाते क्योंकि वह प्रकृति के खिलाफ होती। उसी तरह अमेरिका में बहुत से लोग जिद पर अड़े हुए हैं कि वे वैक्सीन नहीं लगवाएंगे। लेकिन दूसरे लोगों का कहना है कि वैक्सीन न लगवाने वाले लोगों का नुकसान और खतरा वे लोग क्यों झेलें जो कि वैक्सीन लगवा चुके हैं? बात सही भी है, गैरजिम्मेदार लोगों के हिस्से का नुकसान जिम्मेदार लोग क्यों झेलें ?

लेकिन अमेरिका और टीकों से परे की बात देखें तो भी दुनिया भर में यह देखने मिलता है कि किसी कार्यक्रम में समय पर पहुंचने वाले लोग अपने वक्त की बर्बादी करते उन लोगों का इंतजार करने को मजबूर रहते हैं जो देर से आने की आदत रखते हैं और कार्यक्रम जिनके लिए इंतजार करते रहता है। और तो और अपनी खुद की शादी में दूल्हा-दुल्हन कई बार दावत में इतनी देर से पहुंचते हैं कि वहां आए हुए मेहमान उनके इंतजार में खड़े रहते हैं। किसी बैठक में भी यही होता है कि समय पर पहुंचे हुए लोग अपने मन में खुद को और लेट-लतीफ लोगों को कोसते हुए बैठे रहते हैं, और देर से आने वाले लोग मजे से हंसते-मुस्कुराते पहुंचते हैं।

जो लोग सिगरेट-बीड़ी नहीं पीते हैं, उन्हें किसी जगह पर मौजूद दूसरे ऐसे लोग तकलीफ देते हैं, लेकिन ऐसे अनचाहे धुंए को झेलने के लिए मजबूर लोग नुकसान पाते हुए वहां खड़े या बैठे रहते हैं। हिंदुस्तान में यह सिलसिला इतना अधिक है कि बहुत से लोगों को यह अफसोस होता है कि वे इतने असभ्य देश में पैदा क्यों हुए हैं जहां एक काल्पनिक इतिहास के ऊपर तो सबको गर्व है, लेकिन आज मौजूद शर्मनाक वर्तमान पर किसी को शर्मिंदगी नहीं है। अभी छत्तीसगढ़ में भाजपा की एक बड़ी नेता और छत्तीसगढ़ की प्रभारी डी पुरंदेश्वरी ने कहा कि भाजपा के लोग एक बार थूक दें तो भूपेश बघेल की पूरी सरकार बह जाएगी। बात सही भी हो सकता है क्योंकि भाजपा छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक सदस्यों वाली पार्टी होने का दावा करती है, और उसके बहुत से लोग तंबाकू-गुटखा खाकर इतना इतना थूक उगलते हैं कि हो सकता है कि एक सैलाब आ जाए। जो लोग सार्वजनिक जगहों पर नहीं थूकते हैं उन्हें ही दूसरों का ऐसा थूका हुआ अधिक खटकता है। जो लोग हर कुछ देर में किसी ना किसी साफ-सुथरी और सार्वजनिक जगह को देखकर थूकने में लग जाते हैं, उन्हें तो भला क्या बुरा लगता होगा।

किसी संपन्न कॉलोनी में भी रहने वाले लोगों को आसपास के असभ्य पड़ोसियों और उनके मेहमानों की बदतमीजी को झेलना पड़ता है, जिनकी गाडिय़ां आड़ी-तिरछी खड़ी रहती हैं, जो घरों के बाहर जोर-जोर से फिजूल की बात करते हुए मोबाइल फोन लिए टहलते रहते हैं, आते जाते घर की घंटी की जगह हॉर्न बजाते हैं और रास्ता रोकते हैं, और अड़ोस-पड़ोस की दीवार पर पेशाब करने में जुट जाते हैं। ऐसे लोग गिनती में बहुत कम रहते हैं जो अपने घर आने वालों या अपने मेहमानों को तमीज याद दिलाने की जहमत उठाएं। अधिकतर लोग दूसरों के प्रति किसी भी जिम्मेदारी को लेकर पूरी तरह बेफिक्र रहते हैं और अपने अधिकारों का दावा करने के लिए उतने ही चौकन्ने रहते हैं।

हिंदुस्तानी लोगों का यह मिजाज बड़ा ही दिलचस्प है कि हर सुबह अपने घर-दुकान के सामने का कचरा झाड़ू से सडक़ के दूसरी तरफ कर दें, मानो सडक़ एक सरहद है और उसकी दूसरी तरफ कोई दुश्मन देश है। एक बार दुनिया के सभ्य देशों में जाकर जो हिंदुस्तानी लौटते हैं उनका मोटा-मोटा अंदाज यह रहता है कि वहां जैसी सभ्यता, वहां जैसी साफ-सफाई और साफ हवा, तमीज हिंदुस्तान में सैकड़ों बरस तक नसीब नहीं होनी है। यहां पर लोग दूसरे लोगों की गंदगी और गलतियों की तकलीफ भुगतने के लिए मजबूर रहते हैं, और गंदगी फैलाने वाले, परेशानी फैलाने वाले लोग इस हद तक बेशर्म रहते हैं कि उन्हें शायद इस बात का एहसास भी नहीं होता कि वह कुछ गलत कर रहे हैं।

हिंदुस्तान की सडक़ों पर देखें तो दारु पिए हुए या दूसरे किस्म के नशे में गाड़ी चलाने वाले लोगों की संख्या कम नहीं रहती है। लेकिन लोग उन्हें रोक नहीं सकते क्योंकि रोकने का काम पुलिस का है, और पुलिस उन्हें कई वजहों से नहीं रोकती क्योंकि एक तो उसकी क्षमता इतनी गाडिय़ों और ड्राइवरों को जांचने की नहीं है, दूसरा यह कि इनमें से जो पिए हुए रहते हैं उनसे कुछ कमाई हो जाती है, इसलिए भी वह उन्हें जाने देते हैं। लेकिन सवाल ये उठता है कि सडक़ों पर पिए हुए लोग दूसरों पर खतरा रहते हैं। वे अपनी जान खतरे में डालें न डालें, दूसरों को कुचल सकते हैं। ऐसे में सडक़ों पर जिम्मेदारी से चलने वाले लोगों के क्या अधिकार हैं जिससे वे पिए हुए या नशे में लोगों को रोक सकें ? जो जिम्मेदार हैं उनके कोई अधिकार नहीं है, और जो गैरजिम्मेदार हैं उन पर कोई रोक नहीं है। हिंदुस्तान में सार्वजनिक जगहों का यही हाल है।

लोग अपने बच्चों को महंगी गाडिय़ां खरीद कर देते हैं जिनमें से बच्चे किसी के साइलेंसर फाड़ देते हैं, किसी के हेडलाइट को बदल देते हैं, किसी में प्रेशर हॉर्न लगवा लेते हैं, और दूसरों का जीना हराम करते चलते हैं। कभी-कभार भूले-भटके कोई अफसर ऐसी कुछ दर्जन गाडिय़ों पर कोई कार्यवाही करवा दे तो करवा दे, वरना आमतौर पर किसी को इनमें कोई बुराई नहीं दिखती क्योंकि हमारा मिजाज ही ऐसा हो गया है कि इस देश में तकलीफ पाना लोगों की बदनसीबी है, पिछले जन्मों के कर्मों का नतीजा है,  और इसमें सरकार का या किसी और का दखल देना ठीक नहीं है।

कुल मिलकर जिम्मेदार लोगों की किस्मत में भड़ास में जीने के अलावा और कुछ नहीं है। अगले जन्म में किसी सभ्य देश में पैदा होने के लिए इस जन्म में कुछ नेक काम करते चलें।

(Daily Chhattisgrh)

दीवारों पर लिक्खा है, 5 सितम्बर 2021


 

जिन पर संवैधानिक जिम्मा है वैज्ञानिक सोच बढ़ाने का, वे लगे हैं पाखंड को बढ़ाने में...

 5 सितम्बर 2021

  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुधवार को एक निर्णय में कहा कि वैज्ञानिक मानते हैं कि गाय ही एकमात्र पशु है जो ऑक्सीजन लेती और छोड़ती है, तथा गाय के दूध, उससे तैयार दही तथा घी, उसके मूत्र और गोबर से तैयार पंचगव्य कई असाध्य रोगों में लाभकारी है। हिंदी में लिखे अपने आदेश में जस्टिस शेखर कुमार यादव ने दावा किया है, ‘भारत में यह परंपरा है कि गाय के दूध से बना हुआ घी यज्ञ में इस्तेमाल किया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इससे सूर्य की किरणों को विशेष ऊर्जा मिलती है जो अंतत: बारिश का कारण बनती है।’ कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा, ‘‘हिंदू धर्म के अनुसार, गाय में 33 कोटि देवी देवताओं का वास है। ऋगवेद में गाय को अघन्या, यजुर्वेद में गौर अनुपमेय और अथर्वेद में संपत्तियों का घर कहा गया है। भगवान कृष्ण को सारा ज्ञान गौचरणों से ही प्राप्त हुआ।’’  फैसले में लिखा गया है कि गाय को सरकार राष्ट्रीय पशु घोषित करे और हर हिन्दू को उसकी रक्षा का अधिकार रहे।

हिंदुस्तान बड़ी दिलचस्प जगह बनते जा रहा है। यहां पर बड़ी-बड़ी अदालतें अवैज्ञानिक बातों को विज्ञान कहकर उसे लगातार बढ़ावा दे रही हैं, और संविधान की मूल भावना में अच्छी तरह साफ-साफ लिखी गई इस बात के खिलाफ काम कर रही हैं कि देश में एक वैज्ञानिक सोच विकसित की जानी है। भारतीय संविधान की धारा 51-ए यह कहती है कि हर नागरिक की यह बुनियादी जिम्मेदारी है कि वे वैज्ञानिक सोच विकसित करें। संविधान कहता है कि वैज्ञानिक सोच लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद, और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना विकसित करते हैं।

देश के सबसे बड़े इस हाई कोर्ट के इस जज ने तमाम किस्म की अवैज्ञानिक बातों को लिखकर यह लिख दिया है कि वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं। अब इस फैसले के खिलाफ जब तक सुप्रीम कोर्ट से कोई आदेश नहीं आता है, तब तक इस देश में गाय के नाम पर पाखंड फैलाने वाले धर्मांध लोगों के हाथ एक बड़ा हथियार लग गया है। गाय के ऑक्सीजन छोडऩे को भाजपा के एक मुख्यमंत्री और ढेर सारे दूसरे मंत्रियों और नेताओं के साथ-साथ अब एक हाई कोर्ट जज ने भी सर्टिफिकेट दे दिया है। लोगों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले एक-दूसरे हाई कोर्ट, राजस्थान के जज महेश चंद्र शर्मा ने यह कहा था कि मोर सेक्स नहीं करते और मोर के आंसुओं को पीकर मोरनी गर्भवती हो जाती है। कुछ साल हुए हैं जब एक हाईकोर्ट जज ने यह लिखा था कि गीता को भारत का राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करना चाहिए। लोगों को राजस्थान से निकलकर आने वाले एक हाई कोर्ट जज का वह फैसला याद है जिसमें उन्होंने सती प्रथा का समर्थन किया था। अलग-अलग समय पर इस केस में के फैसले लिखने वाले लोग जब हाईकोर्ट में बैठे हुए दिखते हैं तो लगता है कि बाकी मामलों में इनका राजनीतिक रुझान इनकी धार्मिक मान्यताएं इनके सांस्कृतिक पूर्वाग्रह इनके फैसलों को किस तरह प्रभावित करते होंगे। जो साधारण जानकारी है उसके मुताबिक सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के किसी जज को हटाने के लिए संसद की एक लंबी कार्रवाई की जरूरत पड़ती है और वह आसान नहीं होती है। जज को हटाने के लिए एक महाभियोग चलाना पड़ता है जिसके लिए बहुत सारे सांसदों की जरूरत पड़ती है। और आज तो यह सारे जज जिस भाषा को बोल रहे हैं, जैसे विचार सामने रख रहे हैं, वह तो संसद में सबसे बड़े गठबंधन की भाषा है, तो फिर वहां पर इनके खिलाफ क्या हो सकता है? लेकिन सोशल मीडिया पर, सार्वजनिक जीवन में जजों के ऐसे पूर्वाग्रहों के खिलाफ लगातार लिखे जाने की जरूरत है, और उन्हें संविधान की वैज्ञानिक जिम्मेदारी याद दिलाने की जरूरत है, ताकि अगली बार कोई दूसरा जज इस तरह का कुछ लिखते हुए चार बार सोच तो ले।

अभी-अभी हमने अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के बारे में लिखा था कि किस तरह एक बहुत ही दकियानूसी कानून को बनाने वाले राज्य में उसे रोकने से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया क्योंकि जजों का बहुमत बहुत ही संकीर्णतावादी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बनाए हुए लोगों का था। भारत में जिस तरह सामाजिक हकीकत को अनदेखा करके, सर्वधर्म समभाव को अनदेखा करके कुछ जज जिस तरह कट्टरता की बात को बढ़ावा देते हैं, जिस तरह वे वैज्ञानिकता और पाखंड को बढ़ाते हैं, वह बहुत भयानक है। जाहिर है कि ऐसे जज बहुत से मामलों में अपनी इसी विचारधारा के चलते हुए किसी नेता, या किसी सरकार, या किसी नीति के पक्ष में अनुपातहीन ढंग से झुके हुए भी रहेंगे। भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने अपने आपको अवमानना का एक कानून बनाकर जिस तरह एक फौलादी कवच के भीतर सुरक्षित रखा हुआ है, उस गैरजरूरी हिफाजत को भी खत्म करने की जरूरत है। अवमानना के कानून के चलते अगर किसी जज या उसके फैसले की कोई आलोचना होती है, तो छुईमुई के पत्तों की तरह संवेदनशील न्यायपालिका तुरंत ही उसके खिलाफ कार्रवाई शुरू कर देती है। इस बारे में भी देश के जागरूक तबके ने लगातार इस मुद्दे को उठाया है कि अवमानना का यह कानून खत्म किया जाना चाहिए ताकि अदालत के फैसले, उसकी सोच के बारे में जनता के बीच एक खुली चर्चा हो सके।

अदालत का अपने आपको जनचर्चा से इस तरह ऊपर रखना अलोकतांत्रिक रवैया है। अब तो सोशल मीडिया की मेहरबानी से बहुत से लोग बिना डरे-सहमे और शायद अवमानना के कानून से अनजान रहते हुए कई बातें लिख भी देते हैं। और यह लोकतांत्रिक सिलसिला आगे बढऩा चाहिए क्योंकि हो सकता है कि किसी दिन ऐसे किसी मामले को अवमानना के तहत कटघरे में खड़ा किया जाए तो उस पर होने वाली बहस इस कानून की संवैधानिकता को खत्म करने के काम आ जाए। फिलहाल हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर किसी हाईकोर्ट के ऐसे फैसले का नोटिस लेना चाहिए, और उसे खारिज करने के लिए किसी अपील का इंतजार नहीं करना चाहिए, खुद होकर यह काम करना चाहिए। देश में सरकार से लेकर न्यायपालिका तक और सांसदों तक पर वैज्ञानिक सोच को विकसित करने की संवैधानिक जिम्मेदारी है, लेकिन यह तीनों ही संस्थाएं लगातार अवैज्ञानिक बातों को बढ़ावा देने में लगी हुई हैं। इन तीनों को संवैधानिक जिम्मा याद दिलाते हुए लोगों के बीच बहस छिडऩी चाहिए और इन पर खुलकर लिखा जाना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 4 सितम्बर 2021


 

पसंदीदा जजों का बहुमत हो तो फिर सरकार के लिए सैयां भये कोतवाल वाला हाल

  4 सितम्बर 2021

  हिंदुस्तान के सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के बीच इन दिनों कई किस्म की लिस्ट घूम रही हैं। सुप्रीम कोर्ट में कितने जज बनाना है, या देश के बहुत से हाईकोर्ट में खाली पड़ी हुई कुर्सियों में निचली अदालतों के किन जजों को, या हाई कोर्ट के किन वकीलों को जज बनाना है, इस पर केंद्र सरकार के साथ सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम की बनाई लिस्ट पर चर्चा चल रही है, और सरकार की पसंद-नापसंद पर सुप्रीम कोर्ट अपनी असहमति भी जता रहा है। दरअसल किसी भी लोकतंत्र में जब सरकार के पास यह अधिकार रहता है कि वह किसी को जज बना सके या किसी का जज बनना रोक सके तो फिर हिंदुस्तान की तरह का सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम रहने पर भी केंद्र सरकार कुछ लोगों के नाम तो रोक ही सकती है। और दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट से जुड़े हुए बहुत से लोगों का यह मानना है कि केंद्र सरकार अपने प्रभाव और दबाव का इस्तेमाल करके सुप्रीम कोर्ट के सर्वशक्तिमान कॉलेजियम से भी अपनी पसंद के लोगों के नाम आगे बढ़वा लेती है और फिर उन्हें तुरंत मंजूरी भी दे देती है। इससे दो बातें होती हैं एक तो केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी की जो विचारधारा है, उस पर जब अदालतों में किसी मामले में बहस होती है, तो ऐसे मनोनीत जज उसमें सरकार के काम आते हैं। सरकार की विचारधारा के काम आते हैं और कई मामलों में तो सरकार के फैसलों को भी सही ठहराने में उनकी भूमिका बहुत से लोगों को समझ आ जाती है। सुप्रीम कोर्ट के जजों में तो कई बार ऐसा साफ दिखने लगता है कि कौन-कौन से जज सरकार समर्थक हैं, और कौन-कौन से जज जनता के हितों की बात करते हैं। तो कहने के लिए तो हिंदुस्तान जैसे लोकतंत्र में कार्यपालिका और न्यायपालिका की बिल्कुल अलग-अलग भूमिका है और न्यायपालिका का एक किस्म से कार्यपालिका पर काबू भी रहता है, लेकिन जजों को बनाने के मामले में सरकार अपनी ताकत और प्रभाव का इस्तेमाल करके अपनी पसंद के लोगों को बिठा लेती है। ये लोग सरकार के बड़े लोगों को बड़े-बड़े जुर्म के बाद भी बचाने में काम आते हैं।

लेकिन यह बात महज हिंदुस्तान में हो ऐसा भी नहीं है। अमेरिका में तो सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायर होते नहीं हैं, और उनके मरने पर ही कोई कुर्सी खाली होती है। ऐसे में किसी राष्ट्रपति को 4 बरस के अपने कार्यकाल में कितने जजों को मनोनीत करने का मौका मिला है, इस बात को बड़ा ही महत्वपूर्ण माना जाता है। पिछले रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ऐसे कई मनोनयन का मौका मिला, और उन्होंने अपनी पार्टी की सोच के मुताबिक संकीर्णतावादी जजों को तैनात करवाया, जिससे उनके सामने किसी मामले के जाने पर वह रिपब्लिकन पार्टी की सोच, संकीर्ण सोच के मुताबिक सोचे सकें, और फैसला दें। इसका एक बड़ा सुबूत अभी 3 दिन पहले सामने आया जब अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने वहां के एक राज्य टेक्सास के बनाए हुए एक नए कानून पर अमल रोकने से बहुमत से इंकार कर दिया। जितने जज इस फैसले में शामिल थे, उनमें अधिक ऐसे थे जिन्होंने तुरंत कोई दखल देने से मना कर दिया, और नतीजा यह हुआ कि आधी रात तक चले इस मामले में, तारीख बदलते ही टेक्सास में यह विवादास्पद कानून लागू हो गया।

रिपब्लिकन पार्टी के बहुमत वाले इस राज्य ने एक कानून बनाया है जिसके तहत 6 हफ्ते से अधिक की गर्भवती महिला का गर्भपात नहीं किया जा सकेगा। चिकित्सा विज्ञान बताता है कि अधिकतर गर्भवती महिलाओं को 6 हफ्ते में तो यह पता भी नहीं चलता है कि वे गर्भवती हैं। ऐसी महिलाओं की जांच में भी 6 हफ्ते के बाद ही पेट के बच्चे की धडक़न का पता लगता है। इस राज्य ने जो कानून बनाया है उसके मुताबिक अब तकरीबन कोई भी महिला गर्भपात नहीं करा सकेगी क्योंकि अधिकतर गर्भपात तो इन छह हफ्तों के बाद ही होते हैं। इस राज्य की सरकार ने इस कानून को लिखते हुए इस धूर्तता के साथ इसे बनाया कि इसमें सुप्रीम कोर्ट भी कोई दखल ना दे सके। अदालत में किसी मामले को, किसी कानून को चुनौती देते हुए ऐसे लोगों को नोटिस देना होता है जिन पर उस कानून को लागू करने की जिम्मेदारी रहती है। सरकार के बनाए हुए कानून के खिलाफ अदालतों में पहुंचे हुए लोग आमतौर पर सरकार के नुमाइंदों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करते हैं। लेकिन इस कानून को लिखते हुए टेक्सास की सरकार ने यह होशियारी दिखाई कि इसे लागू करने का जिम्मा उसने जनता पर डाल दिया। जनता में से कोई भी व्यक्ति अगर अदालत में यह साबित कर सके कि किसी महिला ने 6 हफ्तों के बाद गर्भपात करवाया है तो उस महिला सहित उसके सारे मददगार, डॉक्टर क्लीनिक, नर्स, और तो और उसे क्लीनिक तक ले जाने वाले टैक्सी ड्राइवर तक के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो सकता है, और अगर यह मुकदमा साबित हो गया, तो इन तमाम लोगों पर दस-दस हजार डॉलर का जुर्माना हो सकता है, और मुकदमा करने वाले व्यक्ति को दस हजार डॉलर मिलेंगे और वकील का खर्च भी मिलेगा। इस तरह टैक्सास की सरकार ने इस कानून को लागू करवाने का जिम्मा आम जनता को दे दिया है कि वही शिकायत करके इसे लागू करवा सकती है, वहीं अदालत में जाकर किसी के खिलाफ केस कर सकती है।

 अमेरिका के कानून के विश्लेषक यह मान रहे हैं कि बहुत ही धूर्तता के साथ ऐसा कानून बनाया गया है कि जिस पर अदालत का कोई बस ना चले और अमेरिका का सुप्रीम कोर्ट भी अपने पुराने फैसलों के रहते हुए भी इस कानून पर रोक न लगा सके। नतीजा यह हुआ है कि अमेरिकी संविधान में और सुप्रीम कोर्ट के कई दशक पहले के फैसलों में पूरी तरह से स्थापित यह बात धरी रह गई कि गर्भपात महिला का अधिकार है, महिला का शरीर उसका अधिकार है। अब दूसरा खतरा यह आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट के संकीर्णतावादी जजों के बहुमत ने जब इस कानून में दखल देने से मना कर दिया है, किसी तरह का स्थगन देने से मना कर दिया है, तो अब रिपब्लिकन सरकारों वाले एक दर्जन दूसरे राज्य भी ठीक ऐसा ही कानून बना सकते हैं, और उससे उनका बहुत पुराना राजनीतिक मुद्दा लागू हो सकता है कि किसी भी तरह के गर्भपात पर पूरी तरह रोक लगाई जाए।

यह समझने की जरूरत है कि जब सुप्रीम कोर्ट में जज अपनी विचारधारा के बना दिए जाएं, और सरकार कानून ऐसा बना दे कि उसमें कोर्ट का दखल नामुमकिन सा हो जाए तो फिर सरकार अदालत के काबू से बाहर अपनी मनमानी कर सकती है। अमेरिका में आज यही हो रहा है और असहमति दर्ज कराने वाले जज संख्या में कम पड़ रहे हैं, और वे एक राज्य सरकार की इस हरकत पर अपना आक्रोश, अपनी निराशा दर्ज भी कर रहे हैं कि एक सरकार ने एक ऐसा कानून बना दिया है कि जिसमें अदालत दखल ना दे सके, और अदालत के कुछ जज या जजों का बहुमत उस कानून को स्थगित करने का काम भी नहीं कर रहा है। जजों के बीच बहुत गहरे मतभेद इसे लेकर हुए हैं, और आज हालत यह है कि टेक्सास में किसी महिला का अपने बदन पर कोई अधिकार नहीं बच गया है। बाकी देश में भी जहां-जहां रिपब्लिकन पार्टी की सरकारें हैं, इसी की कार्बन कॉपी लागू होने का खतरा हो गया है। दुनिया के बाकी लोकतंत्रों को भी इस बात से सबक लेना चाहिए कि अगर जजों की नियुक्ति सत्तारूढ़ लोग अपनी मर्जी से कर सकते हैं तो फिर वह अपनी मर्जी से कुछ भी कर सकते हैं और अदालतें मूक दर्शक बनी बैठी रह सकती हैं।

(Daily Chhattisgarh)

..कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई वफादार नहीं होता

  3 सितम्बर 2021

  जिन लोगों की अफगानिस्तान के ताजा हाल में दिलचस्पी है, और जो अंतरराष्ट्रीय मामलों में विदेश नीति में दिलचस्पी रखते हैं, वे लोग भारत को लेकर हमारी तरह कुछ फिक्रमंद  भी हैं कि आज पाकिस्तान और चीन, अफगानिस्तान के तालिबान के एकदम करीब हैं, और हिंदुस्तान अलग-थलग पड़ गया है, क्योंकि यह पिछली अफगान सरकार के साथ इतना अधिक जुड़ा हुआ था कि वह तालिबान से दूर चला गया था। जब पिछले बरस अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान के साथ एक लिखित समझौता किया था और अमेरिका की फौज को अफगानिस्तान से वापस बुला लेना तय किया था, उस वक्त भी भारत पीछे रह गया। उसने मौके को समझा नहीं और अफगानिस्तान के साथ अपने रिश्तों को उसने वहां की मौजूदा सरकार के साथ रिश्तों तक सीमित रखा। उसे यह सूझा ही नहीं कि बाकी कई देश तालिबान को सम्भावना मानकर उसके साथ भी रिश्ते बना रहे थे। खैर जो हो गया सो हो गया, अब भारत सरकार ने अफगानिस्तान से बाहर तालिबान से बातचीत शुरू की है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने करीब 10 दिन पहले ही इसी जगह इस बात को लिखा था कि भारत को तालिबान के साथ बात शुरू करनी चाहिए, क्योंकि और कोई रास्ता नहीं है।

जिन लोगों को यह लग रहा है कि पाकिस्तान आज तालिबान के करीब है और इस नाते भारत, पाकिस्तान, चीन के इस तनावपूर्ण त्रिकोण में वह भारत के मुकाबले बेहतर हालत में है, उन्हें तस्वीर के बाकी पहलुओं को भी देखना चाहिए। पाकिस्तान की जमीन पर बरसों से 14 लाख से अधिक अफगान शरणार्थी चले आ रहे हैं। और इसके भी पहले से अमेरिका की मदद के तलबगार पाकिस्तान को अपनी जमीन पर अफगान शरणार्थियों के बीच मदरसों का जाल बिछाने की इजाजत देनी पड़ी थी, और पाकिस्तान की जमीन पर ही अफगानिस्तान में मौजूद रूसी फौजियों से लडऩे के लिए हथियारबंद दस्ते तैयार हो रहे थे। पाकिस्तान की जमीन पर धर्मांध और कट्टर लड़ाके तैयार करने वाले मदरसों का नुकसान खुद पाकिस्तान को अपनी जमीन पर अपने लोगों के बीच कम नहीं हुआ है। पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता और धर्मांधता फैलने के पीछे जो वजहें हैं उनमें से एक यह भी है कि उसकी जमीन पर अफगान शरणार्थियों के बीच अफगान लड़ाके तैयार किए जा रहे थे। इसलिए आज अगर अफगानिस्तान में इस्लामी कट्टरता के साथ अगर कोई सरकार बन रही है और उसका पाकिस्तान से बड़ा गहरा रिश्ता रहा है, तो यह रिश्ता कोई दौलत नहीं है, यह रिश्ता एक किस्म से एक बोझ भी है।

आज अफगानिस्तान के पास अड़ोस-पड़ोस के देशों को देने के लिए कुछ नहीं है, और उनसे मदद लेने के लिए उसकी जरूरतें अंतहीन हैं। ऐसे में पाकिस्तान और चीन के अलावा ईरान और रूस से भी अफगानिस्तान की तालिबान सरकार की बड़ी उम्मीदें रहेंगी। यह भी समझने की जरूरत है कि संयुक्त राष्ट्र का अंदाज यह है कि अफगानिस्तान में दसियों लाख लोगों के भूखे रहने का एक बहुत बड़ा खतरा आ खड़ा हुआ है। खबरें बताती हैं कि किस तरह आज अफगानिस्तान के लोग वहां की बेरोजगारी, भुखमरी और वहां पर हिंसा के खतरे को देखते हुए पाकिस्तानी सरहद पर इक_ा हैं, और पाकिस्तान के भीतर जाना चाहते हैं, क्योंकि इस जमीन पर पहले के आए हुए अफगान शरणार्थी बसे हुए हैं, और उन्हें धर्म के नाम पर, जुबान के नाम पर, पाकिस्तान में हमदर्दी और सिर छुपाने की जगह मिलने की उम्मीद है। यह नौबत किसी भी देश के लिए एक बहुत बड़ा बोझ रहती है और पाकिस्तान पहले से यह बात कहते आया है कि वह और अधिक अफगान शरणार्थियों का बोझ नहीं उठा सकता, उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है। फिर एक बात यह भी है कि आज अफगानिस्तान से जो लोग देश छोडक़र पाकिस्तान आ रहे हैं, ऐसे लोगों के बारे में तालिबान सरकार का क्या रुख रहेगा यह भी अभी साफ नहीं है। अमेरिकी सरकार वहां के अपने मददगार रहे जिन लोगों को अफगानिस्तान से ले जाना चाहती थी, उन्हें भी नहीं ले जा पाई है क्योंकि समझौते के तहत 31 अगस्त तक ही अमेरिका को वहां से हट जाना था। एक अंदाज यह है कि पिछले 20 वर्षों में अफगानिस्तान में अमेरिका की मदद करने वाले करीब 3 लाख अफगान ऐसे हैं जिन्हें अमेरिका खतरे में छोडक़र चले गया है, क्योंकि उसके पास भी और कोई चारा नहीं बचा था। इसलिए पाकिस्तान के आज अफगानिस्तान के साथ बहुत ही करीबी रिश्ते से उसे हासिल कम होना है, इन रिश्तों का बोझ ही उस पर अधिक रहेगा। आज पाकिस्तान की अपनी आर्थिक हालत ऐसी नहीं है कि वह अफगानिस्तान की किसी तरह से मदद कर सके। चीन और रूस जैसे दो बड़े और सक्षम देशों को अफगानिस्तान की जो मदद करनी होगी वह वहां की तालिबान सरकार को वे सीधे देना चाहेंगे, उसमें पाकिस्तान कहीं तस्वीर में नहीं आता है। इसलिए 15 लाख शरणार्थियों की संख्या और अगर बढ़ती चली जाती है तो यह पाकिस्तान पर बड़ी तकलीफ की बात रहेगी।

इसलिए अफगानिस्तान से जुड़े हुए अलग-अलग देशों के बारे में आज जो खबरें आ रही हैं, वे उन्हें अफगानिस्तान की नई तालिबान सरकार के साथ बड़े गहरे रिश्ते वाली बतला रही हैं, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि इन तमाम देशों के साथ अपनी घरेलू दिक्कतें ऐसी हैं कि जिनके चलते हुए तालिबान के साथ बेहतर रिश्ते रखना इनकी मजबूरी भी है। चीन के भीतर उईगर मुस्लिमों की एक बड़ी आबादी ऐसी है जो कि चीन की सरकार से बहुत बुरी तरह प्रताडि़त है। चीन पर यह आरोप लगते रहे हैं कि वह इन मुस्लिम समुदायों के लोगों को बहुत बुरी हालत में रखता है, उनके मानवाधिकार कुचलता है। ऐसे में इस्लामी राज कायम करने वाले तालिबान पर यह नैतिक बोझ भी रहेगा कि वह चीन में मौजूद बड़ी संख्या में ऐसे मुस्लिम क़ैदियों के बारे में क्या करता है, क्या रुख रखता है। इसलिए भी चीन तालिबान के साथ अपने रिश्ते ठीक रखना चाहता है कि कहीं अफगान जमीन से चीन के खिलाफ ऐसी बगावत खड़ी ना होने लगे जो कि चीन में मौजूद उईगर मुस्लिमों को आतंकी बनाने का काम करे। दूसरी तरफ रूस में 50 लाख से अधिक मुस्लिम रहते हैं और उसकी दिक्कत यह है कि वह अपनी इस बड़ी मुस्लिम आबादी के बीच किसी किस्म की राजनीतिक बेचैनी या बगावत देखना नहीं चाहता। अगर पड़ोस के अफगानिस्तान के मुस्लिम हथियारबंद लोगों के हाथों अमेरिका के हार जाने का कोई असर रूस में बसे हुए मुस्लिम समुदाय पर होगा, तो उनके भीतर एक अलग राजनीतिक चेतना आ सकती है, उनमें से कुछ बागी तेवरों वाले भी हो सकते हैं। इसलिए रूस की अपनी जरूरत यह है कि अफगानिस्तान की जमीन से कोई ऐसे हथियारबंद भडक़ाऊ या उकसाऊ काम न हों जो कि रूस में मुस्लिम लोगों को भडक़ायें।

खुद पाकिस्तान आज ऐसी नौबत में खड़ा हुआ है कि अफगान जमीन से पाकिस्तान के कई आतंकी समूहों को मदद मिल रही है, और इस बात को पाकिस्तान ने अभी-अभी  औपचारिक रूप से तालिबान के सामने रखा भी है। पाकिस्तान में मौजूद तालिबान समूहों को लेकर अभी अफगान-तालिबान ने यह साफ भी कर दिया है कि उनसे अफगान-तालिबान का कोई लेना देना नहीं है। इसलिए रूस, पाकिस्तान और चीन, इनके बारे में सीधे-सीधे ऐसा मान लेना ठीक नहीं होगा कि इन तीनों ने अमेरिका का विरोध करने के लिए अफगान-तालिबान का साथ दिया है, और आगे देते रहेंगे। इन सबकी घरेलू मजबूरियां भी हैं, जिनके चलते ये तालिबान के साथ अपने रिश्ते ठीक रखना चाहते हैं। भारत की जो सरकार तालिबान को आतंकी मानती थी उसने रातों-रात एक तीसरे देश में तालिबान से औपचारिक राजनयिक बैठक की है, और संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए तालिबान को आतंकियों की एक सूची से बाहर भी करवाया है। ऐसा इसलिए भी है कि भारत पर एक खतरा यह है कि कश्मीर में तालिबान समर्थित समूह आतंकी वारदात कर सकते हैं और भारत तालिबान को कश्मीर को महज एक मुस्लिम मुद्दा मानकर उसमें दखल देने से दूर रखना चाहता है। आज हिंदुस्तान में भारत सरकार के तालिबान से बैठक करने के बारे में व्यंग्य से काफी कुछ लिखा जा रहा है। ऐसा लिखा हुआ पढक़र ही हम इस मुद्दे पर लिखने की सोच रहे थे कि विदेश नीति के मामलों को और देश के राष्ट्रीय हित के मामलों का अतिसरलीकरण, नहीं करना चाहिए। एशिया के इस पूरे हिस्से के जो मिले-जुले हित हैं या जो मिले-जुले खतरे हैं, उनको भी देखते हुए बाकी देश तालिबान के साथ तालमेल बिठाने में लगे हुए हैं, और बदले हुए इस हालात में खुद तालिबान ने यह कहा है कि वह अमेरिका सहित तमाम यूरोपीय देशों के साथ अपने रिश्ते ठीक रखना चाहता है। वह चाहता है कि अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद, अमेरिका और यूरोप के देश लौटें, और तालिबान को अफगानिस्तान बेहतर बनाने में मदद करें। लोगों को यह बात भी कुछ अटपटी लग सकती है, लेकिन जमीनी हकीकत यही रहती है कि तालिबान का राज्य अफगानिस्तान में एक आतंकी राज्य न बन सके, और वह लोकतंत्र के जितने करीब लाया जा सके, उसके लिए दुनिया के देशों को तालिबान से अपना पुराना परहेज छोडक़र उससे बातचीत करनी ही होगी, जो कि भारत ने भी शुरू कर दी है। भारत के इस बातचीत शुरू करने के 10 दिन पहले हमने इस बात का सुझाव दिया भी था। आगे-आगे देखना है कि क्या होता है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 2 सितम्बर 2021


 

मौजूदा कानून के इस्तेमाल की जिम्मेदारी पूरी करने के बजाय नए कानूनों में लगी सरकारें...

  2 सितम्बर 2021

  सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया, वेब पोर्टल और निजी टीवी चैनलों के एक वर्ग में झूठी ख़बरों को चलाने, और उन्हें सांप्रदायिक लहज़े में पेश करने को लेकर चिंता जताते हुए कहा है कि इससे देश का नाम खऱाब हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए ये कहा। इस पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना कर रहे थे। इन याचिकाओं में पिछले वर्ष निज़ामुद्दीन मरकज़ में हुई एक धार्मिक सभा को लेकर ‘फेक न्यूज’ के प्रसारण पर रोक लगाने के लिए केंद्र को निर्देश देने और इसके जि़म्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करने की माँग की गई है। सुनवाई करते हुए अदालत ने पूछा, ‘निजी समाचार चैनलों के एक वर्ग में जो भी दिखाया जा रहा है उसका लहजा सांप्रदायिक है। आखऱिकार इससे देश का नाम खराब होगा। आपने कभी इन निजी चैनलों के नियमन की कोशिश की है?’ उन्होंने कहा, ‘फेक न्यूज और वेब पोर्टल तथा यूट्यूब चैनलों पर लांछन लगाने को लेकर कोई नियंत्रण नहीं है। अगर आप यूट्यूब पर जाएँ तो वहाँ देखेंगे कि किसी आसानी से फेक न्यूज को चलाया जा रहा है और कोई भी यूट्यूब पर चैनल शुरू कर सकता है।’

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का कोई लिखित आदेश या फैसला नहीं आया है लेकिन भरोसेमंद मीडिया में जो खबरें आई हैं उनमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और दो और जजों की जुबानी टिप्पणियां लिखी गई हैं। अगर उन्होंने केवल इतना कहा है तो हमें इससे थोड़ी सी निराशा भी हो रही है क्योंकि सोशल मीडिया, वेबसाइट, और निजी टीवी चैनलों में जिस तरह से सांप्रदायिकता को भडक़ाया जा रहा है, उससे खतरा केवल दुनिया में देश का नाम खराब होने का नहीं है, इससे देश के भीतर लोगों के बीच माहौल खराब हो रहा है, बहुत हद तक हो चुका है। यह खतरा हिंदुस्तान की बदनामी का नहीं है, यह खतरा यहां की आबादी के बीच नफरत की एक खाई खुद जाने का है।

यह बात सही है कि आज बिना किसी काबू के इंटरनेट और सोशल मीडिया पर कोई भी व्यक्ति कुछ भी पोस्ट कर सकते हैं, फेक न्यूज़ फैला सकते हैं, यूट्यूब चैनल पर जो चाहे वह पोस्ट कर सकते हैं, और बाकी सोशल मीडिया का भी ऐसा ही इस्तेमाल चल रहा है। लेकिन आज जितना खतरा इससे है, उतने का उतना खतरा इस बात से भी है कि फेक न्यूज या नफरत को रोकने के नाम पर केंद्र सरकार उसे नापसंद सभी चीजों को रोकने का काम कर सकती है, और झूठ को रोकना तो नाम रह जाएगा, असल में कड़वे सच को रोकने का काम भी होने लगेगा। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कभी-कभी झूठ फैलाने के भी काम आती है, कभी कभी नफरत फैलाने के भी काम आती है, लेकिन इन वजहों से उस स्वतंत्रता को कम करना कोई इलाज नहीं है। और जहां तक सरकारों का बस चले, तो वे अपने को नापसंद तमाम चीजों को रोकने के लिए सोशल मीडिया, इंटरनेट, मैसेंजर सर्विसों, सभी पर एक कड़ा काबू बनाने की कोशिश में लगी ही रहती हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की यह बात सही है कि निजी समाचार चैनलों के एक तबके में जो भी दिखाया जा रहा है उसका लहजा सांप्रदायिक है और यह बात भी सच है कि केंद्र सरकार ने इन चैनलों को काबू में रखने के लिए, इनकी नफरत पर इनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए, कुछ भी नहीं किया है। इसलिए महज टेक्नोलॉजी या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिर पर तोहमत का घड़ा फोड़ देना ठीक नहीं होगा। जहां सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए वहां कार्रवाई न करके कानून को नाकाफी बताना, संचार कंपनियों पर काबू को बढ़ाने की बात करना, सोशल मीडिया और मैसेंजर सर्विसों पर अधिक पकड़ बनाने की बात करना, यह जायज नहीं है। देश में पहले से मौजूद कानूनों का इस्तेमाल न करके नए-नए कानून बनाना या नई-नई ताकत हासिल करना जरा भी न्याय संगत नहीं है।

हर युग में टेक्नोलॉजी आजादी की नई संभावनाएं लेकर आती है। जिस वक्त छपाई चालू हुई उस वक्त भी मौजूदा शासकों को अखबार नापसंद होने लगे क्योंकि उनके तेवर सरकार के हिमायती नहीं रहते थे, और उन में सत्तारूढ़ लोगों की आलोचना भी रहती थी। सरकार को यह लगता था कि यह टेक्नोलॉजी अराजक है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बेजा इस्तेमाल हो रहा है। दुनिया के वे देश जहां लोकतंत्र परिपच् था, और जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अधिक महत्व दिया जाता था, वहां तो काम चल गया था क्योंकि वहां सत्तारूढ़ लोगों को मालूम था कि इस स्वतंत्रता को अधिक कुचलना नामुमकिन नहीं है। लेकिन कई देशों में सरकारें ऐसी कोशिश कर रही हैं कि उसे नापसंद छापने या दिखाने वाले लोगों के खिलाफ तरह-तरह की कार्यवाही की जाए। यह सिलसिला लोकतंत्र को कमजोर और बेअसर बनाने की नीयत वाला है, और राजनीतिक ताकतें जब तक सत्ता पर नहीं पहुंचती हैं, तब तक तो वे आजादी की हिमायती रहती हैं, और सत्ता पर आते ही उन्हें वह आजादी अराजक लगने लगती है। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले की सुनवाई कर रहा है और कई राज्यों की हाईकोर्ट में इससे जुड़े हुए जो मामले चल रहे हैं, उन्हें भी एक साथ जोड़ रहा है। ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने जहां-जहां अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रही हैं, वह भी अदालत के सामने आएगा, और अदालत के मार्फत देश के सामने साफ होगा।

(Daili Chhattisgarh)

एप्पल ने आई-फोन में झांककर चाइल्ड पोर्नोग्राफी पकडऩे की घोषणा की है, एक खतरा और..

  1 सितम्बर 2021

   कैंसर विकसित करने जैसा खतरनाक काम होगा और कंपनी ऐसा नहीं करने वाली है। अदालत के आदेश के बाद भी एप्पल ने ऐसा नहीं किया था।

अब चाइल्ड पॉर्नोग्राफी को रोकने के लिए इस कंपनी ने काफी दूर तक घुसपैठ करने वाली ऐसी तकनीक के इस्तेमाल की घोषणा कर दी है तो लोग चौकन्ने हो गए हैं। मानवाधिकार संगठनों और निजता के समर्थकों का यह मानना है कि अब एप्पल के पास अमेरिकी सरकार या अमेरिकी अदालत में यह तर्क देने की गुंजाइश खत्म हो चुकी है कि उसके पास ऐसी तकनीक ही नहीं है. अब जब वह तकनीक बना चुकी है, तो यह महज वक्त की बात है कि चाइल्ड पॉर्नोग्राफी के बाद सरकार और किस अपराध को रोकने के लिए इस कंपनी पर घुसपैठ का दबाव डालेगी, और धीरे-धीरे सरकार निजता को पूरी तरह से खत्म कर सकेगी क्योंकि कंपनी ने ऐसी तकनीक विकसित कर ली है। अमेरिकी निजता संगठनों का यह भी कहना है कि दुनिया के बहुत से दूसरे देश भी कंप्यूटर और टेलीफोन कंपनियों पर लगातार दबाव डाल रहे हैं कि वे सरकार को घुसपैठ का रास्ता बनाकर दे। एप्पल के मामले में ही अमेरिका में जो बहस चल रही है उसमें यह गिनाया जा रहा है कि चीन में वहां की सरकार ने इस कंपनी पर दबाव डालकर यह इंतजाम कर लिया है कि इसके ग्राहकों की सारी जानकारी चीन में ही इसके सरवर पर रहेगी। लोगों का मानना है कि इससे चीन में आईफोन इस्तेमाल करने वाले लोगों पर सरकार की एक पकड़ बन गई है। अमेरिका में इस पर चल रही बहस के दौरान हिंदुस्तान की सरकार का जिक्र भी किया जा रहा है कि किस तरह वह व्हाट्सएप के पीछे लगी हुई है कि उसे घुसपैठ की इजाजत दी जाए, किस तरह व ट्विटर या फेसबुक पर अपने को नापसंद सामग्री को मिटाने का इंतजाम कर रही है. डिजिटल घुसपैठ के लिए पेगासस जैसे खुफिया हैकिंग सॉफ्टवेयर का भारत में भी इस्तेमाल किए जाने की खबरें तो पिछले कुछ महीनों से चल ही रही हैं, जो कि सुप्रीम कोर्ट में एक गंभीर कगार तक आ पहुंची हैं।

लोग इस बात को लेकर फिक्रमंद हैं कि मोबाइल फोन जैसा निजी सामान अगर किसी कंपनी की बिल्कुल ही आम इस्तेमाल की तकनीक से घुसपैठ के लायक रह जाएगा तो लोगों की व्यक्तिगत जिंदगी कुछ भी नहीं बचेगी, उसमें व्यक्तिगत कुछ भी नहीं रह पाएगा। आज बात एप्पल के कंप्यूटरों की है, और कल हो सकता है कि एप्पल के कोई कर्मचारी कंपनी की नीतियों से बगावत करके इसमें घुसपैठ करें, और वहां की जानकारी को लेकर बाहर निकल जाएं। एप्पल को खुद भी अंदाज है कि उसकी इस मुहिम से उसके ग्राहक बिदक सकते हैं, तो उसने अपने बिक्री करने वाले कर्मचारियों की एक अलग से ट्रेनिंग शुरू की है कि ग्राहकों की तमाम फिक्र को किस तरह सुलझाया जाए और उनका भरोसा किस तरह कायम रखा जाए। लेकिन कुल मिलाकर हकीकत यह है कि एप्पल ने ऐसी तकनीक ना केवल विकसित कर ली है बल्कि उसका इस्तेमाल शुरू करने की घोषणा की है और किसी भी सरकार की इस ताकत पर लार टपक सकती है कि वह लोगों के मोबाइल पर कुछ किस्म की फोटो कुछ किस्मों के वीडियो या कोई भी संदेश ढूंढ सकती हैं। इसके लिए कंपनी पर कब से कितना दबाव पड़ेगा या कंपनी के कंप्यूटरों में घुसपैठ करके सरकार या दूसरी हैकिंग एजेंसियां ऐसा कर पाएंगे, यह खतरा सामने खड़ा ही रहेगा। एप्पल तो दुनिया की एक सबसे बड़ी कंपनी है और इसने अभी कुछ वर्ष पहले तक अमेरिकी सरकार और अमेरिकी अदालत की, आतंक के एक मामले में भी कोई मदद करने से साफ मना कर दिया था। दूसरी तरफ मोबाइल फोन और कंप्यूटर बनाने वाली बहुत सी ऐसी चीनी कंपनियां हैं जिनके बारे में दुनिया भर में यह शक है कि वे चीन की सरकार या खुफिया एजेंसियों को तमाम जानकारियां पहुंचाती हैं। पश्चिम के कई देशों में चीन की ऐसी बदनाम कंपनियों के टेलीफोन एक्सचेंज से लेकर उनके मोबाइल फोन तक इस्तेमाल नहीं किए जा रहे हैं। भारत में भी शायद सरकार, फौज, और खुफिया एजेंसियां ऐसी कंपनियों के सामान इस्तेमाल करने से बचती हैं। अब सवाल यह है कि अगर चाइल्ड पॉर्नोग्राफी को रोकने के नाम पर भी, या शक का फायदा दिया जाए तो यह कह सकते हैं कि चाइल्ड पॉर्नोग्राफी को रोकने के लिए, अगर ऐसी तकनीक विकसित की जा रही है तो वह बेजा इस्तेमाल के लिए भी मौजूद रहेगी। सरकारी खुफिया एजेंसियां और हैकिंग कंपनियां ये सब इस नए रास्ते के कानूनी या गैर कानूनी इस्तेमाल की संभावनाएं ढूंढने में लग चुके होंगे। आज एक कंपनी ने ऐसा किया है, आगे चलकर दूसरी कंपनियां ऐसा करेंगी, और बात मोबाइल से कंप्यूटरों तक चली जाएगी और दुनिया में कुछ भी गोपनीय या निजी नहीं रह जाएगा।

हम शायद ऐसी नौबत को ध्यान में रखते हुए हमेशा से इस बात को लिखते हैं कि लोगों का अपना चाल-चलन ठीक रखना, गैर कानूनी काम से बचना ही अकेला रास्ता है। धीरे-धीरे ऐसी तकनीक भी बन सकती है कि लोगों के मन में कोई बात आए और कंप्यूटर या फोन उसको रिकॉर्ड कर ले, इसलिए लोगों को अपना मन भी साफ-सुथरा रखना सीख लेना चाहिए। आज लोगों के मन में कोई बात आए और कल वह पोस्टर की तरह छपकर सरकारों के पास पहुंच जाए, यह बहुत खतरनाक नौबत होगी। फिलहाल मुजरिमों को पकडऩे और निजी जिंदगी की निजता को खतरे में डालने के बीच एप्पल की यह नई तकनीक आई है, और देखना है कि इसके बेजा इस्तेमाल कबसे सामने आते हैं। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 1 सितम्बर 2021