दीवारों पर लिक्खा है, 16 दिसंबर

कांग्रेस के सबसे संघर्षशील नेता के माथे अभूतपूर्व मेहनत और जीत से बंधा सीएम का सेहरा..

संपादकीय
16 दिसंबर 2018


-सुनील कुमार
तीन-चार दिनों के कश्मकश के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल को पार्टी ने आज राज्य का मुख्यमंत्री चुना है। अठारह बरस के इतिहास में छत्तीसगढ़ के वे पहले निर्वाचित कांग्रेसी मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, और राज्य में अपनी पार्टी को ऐतिहासिक, और अविश्वसनीय बहुमत दिलाने का सेहरा उनके सिर बंधा है। छत्तीसगढ़ कांग्रेस में मुख्यमंत्री के लायक राजनीतिक कदकाठी के चार दिग्गज आखिरी पल तक कांग्रेस हाईकमान के सामने एक मुश्किल पसंद खड़ी कर चुके  थे,लेकिन बिना किसी बाहरी तनाव के, बंद कमरे में इन चारों ने राहुल गांधी, और शायद सोनिया गांधी,के साथ बैठकर प्रदेश की लीडरशिप का यह मुद्दा सुलझाया जो कि छोटी बात नहीं थी। इस राज्य में पन्द्रह बरस का विपक्षी बनवास झेलने के बाद भूपेश बघेल ने पिछले पांच बरस की अनथक लड़ाई से कांग्रेस को ऐसी फतह तक पहुंचाया, और संघर्ष की वजह से अगर किसी को यह कुर्सी मिलनी थी, तो इसी जगह हमने तीन-चार दिन पहले लिखा था कि भूपेश बघेल उसके एक सबसे बड़े हकदार हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी राज्य बनने से लेकर अब तक लगातार तरह-तरह की भीतरी साजिशों, और भीतरघातों को झेलते आ रही थी, और उसका जिस तरह का सामना भूपेश बघेल ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद किया था, वह अभूतपूर्व था, और उसी ने कांग्रेस को आज इस दर्जे की, इस कद की जीत तक पहुंचाया है। भूपेश बघेल प्रदेश की पहली कांग्रेस सरकार में जोगी के साथ मंत्री तो रहे, लेकिन जोगी ने कभी उन्हें उनका जायज हक नहीं दिया, सम्मान नहीं दिया, और वे सरकार के भीतर भी एक किस्म से विपक्ष जैसी तकलीफ झेलते रहे। और फिर बाद के पन्द्रह बरस तो सचमुच का विपक्ष तो था ही। 


कांग्रेस में भूपेश बघेल अपने जिस आक्रामक तेवर के साथ विपक्ष की राजनीति करते रहे, एक हारी और थकी हुई पार्टी को खड़ा करते रहे, उसे जोगीमुक्त करते रहे, उसकी वजह से उनका एक दमदार व्यक्तित्व पार्टी और प्रदेश के सामने अच्छी तरह स्थापित हुआ। इसी कॉलम में हमने पिछले बरसों में आधा दर्जन से अधिक बार यह लिखा था कि प्रदेश में भूपेश बघेल कांग्रेस को जिस तरह से चला रहे हैं, उस तरह देश में भी कांग्रेस पार्टी नहीं चल रही है, और प्रदेश कांग्रेस की विपक्षी भूमिका कांग्रेस की राष्ट्रीय विपक्षी भूमिका के मुकाबले अधिक दमदार बनी हुई थी। उन्होंने इतने पूरे बरसों में बहुत ताकतवर मुख्यमंत्री रहे डॉ. रमन सिंह के साथ किसी तरह का कोई समझौता नहीं किया, और भाजपा सरकार के तमाम कामकाज पर एक बहुत तेज-तर्रार विपक्षी नेता का काम किया। सरकार की तरफ से भूपेश बघेल के पारिवारिक या निजी जमीन-जायदाद के मामलों पर उनको घेरने की कोशिशें लगातार हुईं, लेकिन पल भर को भी वे कमजोर पड़ते नहीं दिखे। अजीत जोगी से किसी भी तरह का तालमेल न रखने से लेकर बिना बसपा-गठबंधन चुनाव में जाने जैसे उनके तमाम फैसलों पर कांग्रेस के ही कई नेता संदेह रखते थे, और जीत के लिए इन बातों को जरूरी बताते थे। लेकिन भूपेश बघेल अकेले अड़े रहे, और उन्होंने पल भर के लिए भी जोगी की मदद के बारे में नहीं सोचा, और आज जब सारे नतीजे सामने हैं, तो भूपेश का अंदाज, उनकी रणनीति सब सही साबित होते हैं। 

अब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के रूप में भूपेश बघेल के सामने चुनौतियां एकदम ही अलग होंगी। विपक्षी लड़ाकू तेवर की अब न जरूरत है, और न ही गुंजाइश। दूसरी तरफ उनका मंत्रिमंडल और कांग्रेस का पार्टी संगठन ऐसे बड़े-बड़े और दिग्गज नेताओं से भरा रहेगा जो कि उम्र और तजुर्बे में उनसे आगे हो सकते हैं, लेकिन कामयाबी में उनसे आगे कोई नहीं रहेगा। पुरानी कही हुई बात है कि सफलता से बहस नहीं होती, इसलिए वे सरकार और पार्टी में सबसे अधिक वजन रखेंगे, और न सिर्फ छत्तीसगढ़ में, न सिर्फ कांग्रेस में, बल्कि दूसरे प्रदेशों और दूसरी पार्टियों में भी मुख्यमंत्री ही सत्तारूढ़ पार्टी के अघोषित मुखिया रहते हैं, और इसलिए छत्तीसगढ़ में उन्हें अधिक दिक्कत नहीं होगी। कुछ महीनों के बाद आने वाले लोकसभा चुनावों में उनका पहला इम्तिहान होगा, और उन्हें आज रात से ही कॉपी-किताब और स्लेट-पट्टी लेकर इस इम्तिहान की तैयारी शुरू करनी पड़ेगी। इस तैयारी की ही एक कड़ी सरकार के ढांचे को अपने मकसद और अपनी मर्जी के मुताबिक बनाने से शुरू होगी। डेढ़ दशक के निरंतर भाजपा-रमन राज में अधिकारियों की जगह और उनका रूख सब कुछ एक तरीके से चले आ रहा था, अब एकदम से जो फेरबदल होगा, वह एक बड़ा जटिल फैसला रहेगा। लेकिन दिग्विजय सिंह के साथ मंत्री के रूप में काम कर चुके भूपेश बघेल को सरकार में विभाग चलाने का, और दिग्विजय के अंदाज में संगठन चलाने का काफी तजुर्बा रहा है जो कि इन आने वाले बरसों में उनके बहुत काम आएगा। उनके साथ मंत्रिमंडल में और संगठन में जो लोग रहेंगे, उनमें भी दिग्विजय के साथी रहे लोगों की बहुतायत रहेगी, इसलिए वे एक सरीखी संस्कृति के आदी लोग रहेंगे। 

लोकसभा चुनाव में राज्य की ग्यारह सीटों पर कांग्रेस को खड़ा करने की एक पहाड़ सी जिम्मेदारी उनके सामने रहेगी क्योंकि आज इनमें से कुल एक सीट पर निर्वाचित कांग्रेस सांसद ताम्रध्वज साहू हैं, बाकी सारी सीटें भाजपा के कब्जे में हैं। इस नौबत को बदलना आसान नहीं रहेगा, लेकिन उससे जरा भी कम उम्मीद राहुल गांधी की नहीं रहेगी क्योंकि उनका भविष्य इन्हीं सीटों से तय होगा। भूपेश बघेल ने डेढ़ दशक की विपन्नता झेली हुई पार्टी को भी इस विधानसभा चुनाव में अभूतपूर्व संपन्नता से चुनाव लडऩे वाली भाजपा के मुकाबले जिस तरह कामयाब किया, उन्हें लोकसभा चुनाव लडऩे में तो दिक्कत नहीं होगी, लेकिन सरकारी मोर्चे पर खासी दिक्कत आने के आसार हैं। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में जितने वायदे किए हैं, उनको पूरा करने में पहले बरस में बीस हजार करोड़ रूपए अतिरिक्त लगने का एक अंदाज है। इसका खासा हिस्सा लोकसभा चुनाव के पहले कर्जमाफी में, बकाया धान बोनस में, और धान के बढ़े रेट में लगेगा। यह दिक्कत छोटी नहीं रहेगी, लेकिन अगर सरकार मौजूदा भ्रष्टाचार को घटा सकेगी, तो प्रदेश के बजट में इतनी बचत हो भी सकती है। यह पूरा बोझ बजट का बीस फीसदी ही होगा, और अभी तक का भ्रष्टाचार इससे कम भी नहीं रहा होगा। 

भूपेश बघेल और कांग्रेस पार्टी के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी रहेगी कि पार्टी के अंधाधुंध जीतकर आए विधायकों को उनकी उम्मीदों, उनके महत्व, और उनकी क्षमता के मुताबिक ओहदों पर रखना, और फिर उनसे प्रदेश की उम्मीदें पूरी करवाना। प्रदेश कांग्रेस में बराबरी के वजन के इतने नेता हैं कि उनमें आपस में तनातनी भी हो सकती है, और बरसों बाद सत्ता में आने पर उनके बीच कई किस्म का मुकाबला भी हो सकता है। इसलिए मुख्यमंत्री के रूप में भूपेश बघेल का काम न आसान होगा, और न असंभव भी होगा। वे एक कामयाब मुख्यमंत्री बनने की तमाम संभावनाएं रखते हैं, और जो प्रदेश अध्यक्ष अपनी पार्टी को इस तरह आसमान पर ले जाकर बिठा सकता है, उसमें कोई तो बात है ही। यह राज्य नोटबंदी-जीएसटी से भी थका हुआ है, पिछली भाजपा सरकार के भारी भ्रष्टाचार से भी थका हुआ है, मंत्रियों और विधायकों की बददिमागी से भी थका हुआ है, अफसरों से लेकर निचली सरकारी मशीनरी के भ्रष्टाचार से भी थका हुआ है। भूपेश बघेल के सामने ये तमाम बातें एक ऐसी फेहरिस्त की तरह रहेंगी कि उनकी सरकार और उनकी पार्टी को क्या-क्या नहीं करना है। हम उम्मीद करते हैं कि आने वाले बरस छत्तीसगढ़ की बेहतरी के होंगे, और जिन बातों की वजह से छत्तीसगढ़ से भाजपा मटियामेट हुई है, उन बातों को ध्यान में रखते हुए अगली सरकार अपनी अलग और नई कल्पनाशीलता से काम करेगी, और पांच महीनों में ही लोगों के सामने एक ऐसा चेहरा रख सकेगी जिसकी वजह से राहुल गांधी को इस राज्य से लोकसभा की सीटें मिलें। (Daily Chhattisgarh) 

नई सरकारें न सिर्फ राज्यों का बल्कि राहुल गांधी का भी भविष्य तय करने जा रही हैं...

संपादकीय
15 दिसंबर 2018


छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान, इन तीनों ही प्रदेशों में अगले चार दिनों में नई सरकार काम सम्हाल लेंगी, और कांग्रेस की ये तीनों सरकारें भाजपा सरकार के बाद एक फेरबदल लाने की चुनौती भी झेल रही होंगी, और उसके साथ-साथ राहुल गांधी का भविष्य तय करने की जिम्मेदारी भी इन्हीं पर होगी। आज जरूर राहुल ने इन तीनों राज्यों के मुखिया तय किए हैं, लेकिन छह महीने के बाद के आम चुनाव में देश का मुखिया कौन हो, यह तय करने में इन तीन मुख्यमंत्रियों का भी बड़ा हाथ रहेगा। इसलिए चुनौती का एक मोर्चा तो कांग्रेस ने इन तीनों राज्यों में विधानसभा चुनाव जीतकर फतह किया है, लेकिन शायद उससे बड़ी एक दूसरे किस्म की चुनौती उनके सामने हैं। इन तीनों मुख्यमंत्रियों पर कांग्रेस के विधानसभा चुनाव घोषणापत्र को पूरा करने की जिम्मेदारी भी रहेगी, और उसके लिए उन्हें पांच बरस नहीं, पांच महीने ही मिल रहे हैं, और इतने में ही मतदाता हंडी के चावल के एक दाने को मसलकर बाकी चावल पकने का अंदाज लगाएंगे। 
इन तीनों राज्यों में छत्तीसगढ़ में चुनौती और भी बहुत बड़ी है क्योंकि यहां कांग्रेस को जनता ने छप्पर फाड़कर इतनी सीटें दी हैं जितनी कि किसी कांग्रेसी ने अपने सबसे सुखद सपने में भी नहीं देखी थीं। दो तिहाई का दावा करने वाले कांग्रेसियों को जनता ने तीन चौथाई सीटें नहीं थमाई हैं, बल्कि उम्मीदों का एक इतना बड़ा टोकरा कांग्रेस के सिर पर रखा है कि उसे ढोते हुए कमर टूटने लगेगी, और जनता बहुत गौर से यह देखती भी रहेगी। चुनाव घोषणापत्र के तहत किसानी कर्ज की तुरंत माफी के लिए गंगाजल लेकर खाई गई कसम खासी नाटकीय थी, लेकिन गंगा की कसम की गंभीरता को लोग ग्यारहवें दिन देखने और पूछने लगेंगे। दूसरी बात यह कि 90 में से 68 विधायक कांग्रेस के हैं, वे पन्द्रह बरस बाद सत्ता में आई हुई पार्टी के विधायक हैं, और जाहिर है कि उनकी अपनी राजनीतिक-आर्थिक महत्वाकांक्षाएं भी होंगी, और उनको पूरा करते हुए वे ऐसे चूक कर सकते हैं कि लोकसभा चुनाव के पहले वे पार्टी की साख खतरे में डालें। छत्तीसगढ़ में स्टिंग ऑपरेशनों की मजबूत परंपरा कायम हो चुकी है, और कांग्रेस को अपनी साख बचाने के लिए सबसे पहले अपने तमाम विधायकों, मंत्रियों और निगम मंडल अध्यक्षों, और पार्टी पदाधिकारियों का यह प्रशिक्षण करना चाहिए कि इक्कीसवीं सदी की डिजिटल टेक्नालॉजी के बीच उन्हें किस तरह चौकन्ना जीना है। ऐसा न होने पर किसी पार्टी का क्या हश्र होता है, यह भाजपा इस चुनाव में साबित भी कर चुकी है, जबकि भाजपा के खिलाफ किए गए अधिकतर स्टिंग अभी तक चुनावी इस्तेमाल में आए भी नहीं है, वे बस आए और धरे रह गए। लेकिन आने वाले दिन ऐसे हो सकते हैं कि वे लोकसभा चुनाव के नतीजों को बिगाड़ सकते हैं। 
कांग्रेस के सामने अपनी सरकार के इस कार्यकाल में और भी प्रशासकीय चुनौतियां रहेंगी क्योंकि केन्द्र में भाजपा की अगुवाई वाली नरेन्द्र मोदी की सरकार उसके प्रति वैसी रहमदिल नहीं रहेगी जैसी कि मनमोहन सिंह की सरकार रमन सिंह के लिए थी। यह एक अलग बात है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने छत्तीसगढ़ की रमन सरकार के साथ यूपीए के दस बरस में भारी भेदभाव का आरोप चुनावी सभाओं में लगाया, लेकिन छत्तीसगढ़ के लोग इस बात के गवाह हैं कि दस बरस में रमन सिंह को कभी मनमोहन सिंह से कोई शिकायत नहीं रही। लेकिन आने वाला आधा बरस ऐसा नहीं रहने वाला है, और कांग्रेस सरकार को अपने सभी चुनावी मुद्दों को लेकर न सिर्फ भाजपा से, बल्कि केन्द्र सरकार से भी एक कड़ी चुनौती रहेगी। कांग्रेस के मुख्यमंत्री के सामने एक चुनौती यह भी रहेगी कि राज्य के अफसरों में से वह किनको रमन सिंह के प्रति वफादार मानकर अलग करेगी, और किन लोगों से काम लेगी। हर सरकार की अपनी कुछ पसंद-नापसंद होती है, लेकिन कभी-कभी नापसंदगी इतनी मजबूत हो जाती है कि वह सरकार के लिए नुकसानदेह भी रहती है। इसलिए छत्तीसगढ़ के अगले मुख्यमंत्री को अफसरों को अलग-अलग जिम्मा देते हुए समझदारी से भी काम लेना होगा, और हो सकता है कि राजनीतिक पसंद-नापसंद को कुछ हद तक अलग भी रखना होगा। इस पार्टी को सरकार चलाने का देश में सबसे लंबा तजुर्बा है, और मछली के बच्चे को तैरना सिखाने की हमारी कोई नीयत नहीं है, हम महज आम पाठकों के सामने मुद्दों को रखने के लिए यह बात लिख रहे हैं। अभी हम जिक्र छत्तीसगढ़ का अधिक कर रहे हैं, लेकिन इनमें से हर बात राजस्थान और मध्यप्रदेश पर भी लागू होती है, और इन सभी राज्यों में कांग्रेस को सत्ता चलाने का लंबा तजुर्बा रहा है। आने वाले महीने न सिर्फ नए मुख्यमंत्रियों, और नए मंत्रियों की अगुवाई में राज्य का भविष्य तय करेंगे, बल्कि उनके नेता राहुल गांधी का भविष्य भी तय करेंगे, और हमें उम्मीद है कि इन दोनों बातों को समझकर नई सरकारें बेहतर काम करेंगी।  (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 15 दिसंबर

बात की बात, 15 दिसंबर

दीवारों पर लिक्खा है, 14 दिसंबर

विधानसभाएं दिलचस्प होंगी क्योंकि अभी-अभी विपक्ष बने लोगों के गलत काम ही चर्चा में हो सकते हैं

संपादकीय
14 दिसंबर 2018


अगले कुछ दिनों में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में विधानसभा का सत्र होगा, और उसमें कांग्रेस पार्टी को तीनों राज्यों में बहुमत साबित करना होगा। छत्तीसगढ़ में तो तीन चौथाई बहुमत से कांग्रेस जीती है, और भाजपा सवा दर्जन विधायकों की रह गई है, इसलिए इस राज्य में तो कोई दिक्कत नहीं है, राजस्थान में भी कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत है, लेकिन मध्यप्रदेश में भी बसपा और सपा के खुले समर्थन के बाद कांग्रेस को कोई दिक्कत नहीं रहेगी। ऐसे में इन तीनों राज्यों में विधानसभा का सत्र बड़ा दिलचस्प एक दूसरी वजह से रहने वाला है। 
आमतौर पर विपक्ष के विधायक सत्ता की खामियों को, सरकार के गलत कामों को उठाते हैं, सरकार को घेरते हैं, और सरकार से जवाब मांगते हैं। अब इस विधानसभा में, तीनों ही राज्यों में, कांग्रेस पांच या पन्द्रह बरस बाद सत्ता में आ रही है इसलिए न सिर्फ महज पिछले पांच बरस के सरकारी घोटालों में उसका कोई हाथ नहीं है, बल्कि मप्र-छत्तीसगढ़ में पिछले पन्द्रह बरस के भ्रष्टाचार और गलत कामों में उसका कोई हाथ नहीं है। ऐसे में विधानसभा का विपक्ष जो कि भाजपा है, वह सवाल पूछेगी तो क्या पूछेगी? दूसरी तरफ सत्तारूढ़ कांग्रेस के विधायकों के पास पिछले पन्द्रह बरस की विधानसभाओं में उठाए गए मुद्दे तो हैं ही, इस पूरे चुनाव के दौरान सामने आए कई तरह के गलत काम भी उनके हाथ हैं, इसलिए यह एक दिलचस्प नजारा होगा कि कांग्रेस के लोग ही विपक्षी तेवरों के साथ सवाल करेंगे, और कांग्रेस के ही मंत्री सरकारी फाईलों तक पहुंच के साथ, पिछली सरकार के बहुत से फैसलों पर, बहुत से कामों पर जवाब देंगे, बड़ी आसानी से जांच की घोषणा करेंगे, जहां जरूरी होगा अफसरों को निलंबित करेंगे, और कांग्रेस पार्टी के ही विधानसभा अध्यक्ष होंगे, जिनकी तरफ से कोई गैरजरूरी रोक-टोक नहीं होगी। 
विधानसभाओं का यह माहौल कुछ अटपटा होगा, और कुछ हफ्तों के लिए या शुरुआती एक-दो सत्रों के लिए होगा। तब तक तो कांग्रेस की सरकारें ऐसा कुछ गलत काम कर भी नहीं पाएंगी कि जिन्हें लेकर विपक्ष में बैठी भाजपा कोई सवाल कर सके। यह मौका, ये कुछ हफ्ते या महीने आने वाले लोकसभा चुनाव के ठीक पहले के होंगे, और ऐसे में दोनों प्रदेशों में सत्तारूढ़ कांग्रेस के पास यह अनोखा मौका रहेगा कि उसकी पहुंच सरकारी फाईलों तक रहेगी, सरकारी अफसर उसकी सरकार के मातहत रहेंगे, और वह विधानसभा में अपने गैरमंत्री-विधायकों की ओर से पिछली सरकार के काम पर सवाल उठवा सकेगी, और अपने मंत्रियों की ओर से उस पर जांच की घोषणा करवा सकेगी। अगर कांग्रेस पार्टी समझदारी से इस रणनीति पर काम करेगी, तो आने वाले महीनों में वह जनता के सामने पिछली सरकार के गलत कामों के पुख्ता सुबूत रख सकेगी, और जाहिर है कि 2019 के आम चुनावों के पहले के इन गिने-चुने महीनों में वह सदन के भीतर से भी एक किस्म का अघोषित चुनाव प्रचार कर सकेगी। 
राजनीति की जुबान में कुछ लोग ऐसी बातों को बदला निकालना या दुश्मनी भंजाना कहते हैं, लेकिन हमको इसमें कुछ गलत इसलिए नहीं लगता कि किसी भी सरकार को पिछली सरकार के गलत कामों को अनदेखा करके उन्हें माफ कर देने का कोई हक नहीं रहता। बल्कि हर सरकार की यह जिम्मेदारी रहती है कि वह पिछली सरकार के किए गलत कामों पर अपने कार्यकाल में कार्रवाई करें क्योंकि जनता ने उसे सरकार चलाने के लिए चुना है, और यह सरकार चलाने का एक जरूरी और अनिवार्य हिस्सा है। कई बरस पहले भी हमने यह बात लिखी थी कि हर सरकार को आते ही पिछली सरकार के उन तमाम गलत कामों की जांच शुरू करनी चाहिए जिन मुद्दों को उसने चुनाव प्रचार के दौरान, मीडिया में, या पिछली विधानसभा में उठाया था। अपने उठाए मुद्दों के प्रति ईमानदार बने रहना लोकतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। हमारा मानना है कि हर बरस विधानसभा के पटल पर रखी जाने वाली सीएजी की रिपोर्ट को उठाकर उसमें गिनाए गए सरकारी घपलों की जांच भी करनी चाहिए। एक-दूसरे के गलत कामों को रहमदिली से दफन कर देने का कोई हक लोकतंत्र किसी सरकार को नहीं देता। सरकार की संविधान की शपथ उस पर यह जिम्मा डालती है कि जो भी गलत काम उसकी जानकारी में आएं, उन पर कार्रवाई की जाए। न सिर्फ आज कांग्रेस सरकारों को, बल्कि बाद में भी किसी भी प्रदेश में जिस पार्टी की भी सरकार आए, उसे अनिवार्य रूप से ऐसी एक जांच बिठानी चाहिए, और उसके सामने उन तमाम भ्रष्टाचारों को रख देना चाहिए जो कि उसने विपक्ष में रहते हुए उठाए थे, या जिन्हें मीडिया ने उठाया था, या जो सरकारी रिकॉर्ड में किसी का भी उठाया हुआ हो।  (Daily Chhattisgarh) 

राहुल छत्तीसगढ़ का नहीं आज शाम अपना भी भविष्य तय करने जा रहे..

संपादकीय
13 दिसंबर 2018


जिन तीन राज्यों में कांग्रेस को आज मुख्यमंत्री तय करने हैं, और इन शब्दों के छपने तक जो हो सकता है कि तय हो भी चुके रहें, वहां पर कांग्रेस का काम आसान नहीं है। खासकर छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जिसमें आधा दर्जन दिग्गज नेताओं के बीच से कांग्रेस हाईकमान को मुख्यमंत्री, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, विधानसभा अध्यक्ष, विधानसभा उपाध्यक्ष चुनना है। सबसे ऊपर जिन चार नामों की चर्चा चल रही है, उनको लेकर भी एक दुविधा यह है कि इनमें से कौन ऊपर समझे जाने वाले किस पद पर किसी और की तैनाती के बाद उससे नीचे समझे जाने वाले पद पर काम करने के लिए सहमत हो, या खुश रहे। दूसरी दिक्कत यह है कि कांग्रेस पार्टी को छत्तीसगढ़ में छह महीने के भीतर आम चुनाव भी लडऩे हैं, और लोकसभा में आज राज्य की 11 सीटों में से उसके पास कुल एक सीट है। इस बार विधानसभा के जो नतीजे रहे हैं, उन्हें देखते हुए कांग्रेस यह कोशिश करेगी कि लोकसभा की अधिक से अधिक सीटें उसके हाथ लगें, और इसके लिए न सिर्फ इन शुरुआती महीनों में सरकार को बहुत अच्छा चलना होगा, बल्कि संगठन को भी चुनावी तैयारियों में पहले दिन से जुट जाना होगा। और यह संतुलन आसान नहीं रहेगा, बल्कि यह चुनाव अभियान के महीनों के मुकाबले कुछ अधिक मुश्किल रहेगा। 
कांग्रेस के सामने एक पसंद यह हो सकती है कि इस राज्य के पिछले 18 बरस के इतिहास को देखते हुए कोई ऐसा मुख्यमंत्री तय करे जो कि सरकार भी चलाए, और अघोषित रूप से प्रदेश में पार्टी का मुखिया भी रहे, फिर अध्यक्ष चाहे कोई और रहे। इन 18 बरसों में जोगी और रमन सिंह मुख्यमंत्री रहते हुए कांग्रेस और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष कब-कब कौन थे, यह लोगों को ठीक से याद भी नहीं होगा। इसलिए सत्ता का घोषित मुखिया संगठन का भी अघोषित मुखिया रहते आया है, और ऐसे में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी ऐसा एक मुख्यमंत्री आज बना सकती है जो कि इन दोनों जिम्मेदारियों को निभा सके, और फिर चाहे घोषित रूप से पार्टी का कोई और प्रदेश अध्यक्ष रहे। जिन आधा दर्जन नामों पर इन पदों के लिए चर्चा चल रही है, मोटे तौर पर उन्हीं के बीच से इन पर नाम तय होंगे, लेकिन कौन किसके मातहत काम करने तैयार हो, यह एक बड़ी दुविधा रहेगी, और राहुल गांधी के इन पदों पर फैसले लेने की जिम्मेदारी से रश्क नहीं किया जा सकता। यह बड़ी चुनौती रहेगी, इतनी बड़ी जीत के बाद। शायद इसीलिए एक चर्चा यह चल रही है कि छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान में एक-एक उपमुख्यमंत्री भी बनाया जाए, और ऐसी नौबत का मतलब किसी संस्था का टॉप-हैवी हो जाना होता है। 
इसके साथ-साथ छत्तीसगढ़ में आम चुनावों के उम्मीदवार भी ध्यान में रखकर न सिर्फ इन आधा दर्जन पदों पर नाम तय होंगे, बल्कि मंत्रिमंडल के नाम तय करते हुए भी यह देखा जाएगा कि आज के 65 से अधिक विधायकों में से किनको लोकसभा का चुनाव लड़वाया जा सकता है। आज कांग्रेस के पास बहुमत इतना अधिक है कि तमाम 11 सीटों पर अगर विधायकों को लड़वाया जाए, तो भी विधानसभा में बहुमत की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। ठीक ऐसी ही हालत कुचली गई भाजपा के साथ है जिसके सवा दर्जन विधायकों में से कुछ को अगर लोकसभा लड़वाया जाए, तो भी उसके अल्पमत की दुबली काया पर कोई फर्क नहीं पड़ता। यह हफ्ता कांग्रेस के तमाम मंत्रियों के तय हो जाने का भी रहेगा, और यह तय है कि लोकसभा चुनाव की उम्मीदवारी को ध्यान में रखकर ही यह फैसला होगा। 
जिस तरह किसी प्रदेश में जब खेतों में बम्पर क्रॉप हो जाती है, तब फसल का दाम जमीन पर औंधे मुंह गिर पड़ता है। इसलिए आज छत्तीसगढ़ में कांग्रेस विधायकों की ऐसी बम्पर क्रॉप हुई है कि मुख्यमंत्री पद के लायक समझे जाने वाले विधायकों की गिनती भी आधा दर्जन हो गई है। आज शाम छत्तीसगढ़ का भविष्य कांग्रेस पार्टी तय करने जा रही है। तीन हफ्ते पहले प्रदेश की जनता ने कांग्रेस का भविष्य तय किया था, और जिस हैरतअंगेज बहुमत के साथ कांग्रेस को छत्तीसगढ़ी जनता ने चुना है, उसने पार्टी को अधिकार तो कम दिया है, जिम्मेदारी अधिक दी है। आज से लेकर मंत्रिमंडल तय होने तक जनता यह भी देखेगी कि कांग्रेस हाईकमान उस जिम्मेदारी पर कितना खरा उतर रहा है। कांग्रेस के लिए यह मौका न सिर्फ एक बड़ी चुनौती का है, बल्कि इससे ही छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों पर खुद राहुल गांधी का भविष्य भी तय होगा। (Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 13 दिसंबर