विधानसभाएं दिलचस्प होंगी क्योंकि अभी-अभी विपक्ष बने लोगों के गलत काम ही चर्चा में हो सकते हैं

संपादकीय
14 दिसंबर 2018


अगले कुछ दिनों में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में विधानसभा का सत्र होगा, और उसमें कांग्रेस पार्टी को तीनों राज्यों में बहुमत साबित करना होगा। छत्तीसगढ़ में तो तीन चौथाई बहुमत से कांग्रेस जीती है, और भाजपा सवा दर्जन विधायकों की रह गई है, इसलिए इस राज्य में तो कोई दिक्कत नहीं है, राजस्थान में भी कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत है, लेकिन मध्यप्रदेश में भी बसपा और सपा के खुले समर्थन के बाद कांग्रेस को कोई दिक्कत नहीं रहेगी। ऐसे में इन तीनों राज्यों में विधानसभा का सत्र बड़ा दिलचस्प एक दूसरी वजह से रहने वाला है। 
आमतौर पर विपक्ष के विधायक सत्ता की खामियों को, सरकार के गलत कामों को उठाते हैं, सरकार को घेरते हैं, और सरकार से जवाब मांगते हैं। अब इस विधानसभा में, तीनों ही राज्यों में, कांग्रेस पांच या पन्द्रह बरस बाद सत्ता में आ रही है इसलिए न सिर्फ महज पिछले पांच बरस के सरकारी घोटालों में उसका कोई हाथ नहीं है, बल्कि मप्र-छत्तीसगढ़ में पिछले पन्द्रह बरस के भ्रष्टाचार और गलत कामों में उसका कोई हाथ नहीं है। ऐसे में विधानसभा का विपक्ष जो कि भाजपा है, वह सवाल पूछेगी तो क्या पूछेगी? दूसरी तरफ सत्तारूढ़ कांग्रेस के विधायकों के पास पिछले पन्द्रह बरस की विधानसभाओं में उठाए गए मुद्दे तो हैं ही, इस पूरे चुनाव के दौरान सामने आए कई तरह के गलत काम भी उनके हाथ हैं, इसलिए यह एक दिलचस्प नजारा होगा कि कांग्रेस के लोग ही विपक्षी तेवरों के साथ सवाल करेंगे, और कांग्रेस के ही मंत्री सरकारी फाईलों तक पहुंच के साथ, पिछली सरकार के बहुत से फैसलों पर, बहुत से कामों पर जवाब देंगे, बड़ी आसानी से जांच की घोषणा करेंगे, जहां जरूरी होगा अफसरों को निलंबित करेंगे, और कांग्रेस पार्टी के ही विधानसभा अध्यक्ष होंगे, जिनकी तरफ से कोई गैरजरूरी रोक-टोक नहीं होगी। 
विधानसभाओं का यह माहौल कुछ अटपटा होगा, और कुछ हफ्तों के लिए या शुरुआती एक-दो सत्रों के लिए होगा। तब तक तो कांग्रेस की सरकारें ऐसा कुछ गलत काम कर भी नहीं पाएंगी कि जिन्हें लेकर विपक्ष में बैठी भाजपा कोई सवाल कर सके। यह मौका, ये कुछ हफ्ते या महीने आने वाले लोकसभा चुनाव के ठीक पहले के होंगे, और ऐसे में दोनों प्रदेशों में सत्तारूढ़ कांग्रेस के पास यह अनोखा मौका रहेगा कि उसकी पहुंच सरकारी फाईलों तक रहेगी, सरकारी अफसर उसकी सरकार के मातहत रहेंगे, और वह विधानसभा में अपने गैरमंत्री-विधायकों की ओर से पिछली सरकार के काम पर सवाल उठवा सकेगी, और अपने मंत्रियों की ओर से उस पर जांच की घोषणा करवा सकेगी। अगर कांग्रेस पार्टी समझदारी से इस रणनीति पर काम करेगी, तो आने वाले महीनों में वह जनता के सामने पिछली सरकार के गलत कामों के पुख्ता सुबूत रख सकेगी, और जाहिर है कि 2019 के आम चुनावों के पहले के इन गिने-चुने महीनों में वह सदन के भीतर से भी एक किस्म का अघोषित चुनाव प्रचार कर सकेगी। 
राजनीति की जुबान में कुछ लोग ऐसी बातों को बदला निकालना या दुश्मनी भंजाना कहते हैं, लेकिन हमको इसमें कुछ गलत इसलिए नहीं लगता कि किसी भी सरकार को पिछली सरकार के गलत कामों को अनदेखा करके उन्हें माफ कर देने का कोई हक नहीं रहता। बल्कि हर सरकार की यह जिम्मेदारी रहती है कि वह पिछली सरकार के किए गलत कामों पर अपने कार्यकाल में कार्रवाई करें क्योंकि जनता ने उसे सरकार चलाने के लिए चुना है, और यह सरकार चलाने का एक जरूरी और अनिवार्य हिस्सा है। कई बरस पहले भी हमने यह बात लिखी थी कि हर सरकार को आते ही पिछली सरकार के उन तमाम गलत कामों की जांच शुरू करनी चाहिए जिन मुद्दों को उसने चुनाव प्रचार के दौरान, मीडिया में, या पिछली विधानसभा में उठाया था। अपने उठाए मुद्दों के प्रति ईमानदार बने रहना लोकतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। हमारा मानना है कि हर बरस विधानसभा के पटल पर रखी जाने वाली सीएजी की रिपोर्ट को उठाकर उसमें गिनाए गए सरकारी घपलों की जांच भी करनी चाहिए। एक-दूसरे के गलत कामों को रहमदिली से दफन कर देने का कोई हक लोकतंत्र किसी सरकार को नहीं देता। सरकार की संविधान की शपथ उस पर यह जिम्मा डालती है कि जो भी गलत काम उसकी जानकारी में आएं, उन पर कार्रवाई की जाए। न सिर्फ आज कांग्रेस सरकारों को, बल्कि बाद में भी किसी भी प्रदेश में जिस पार्टी की भी सरकार आए, उसे अनिवार्य रूप से ऐसी एक जांच बिठानी चाहिए, और उसके सामने उन तमाम भ्रष्टाचारों को रख देना चाहिए जो कि उसने विपक्ष में रहते हुए उठाए थे, या जिन्हें मीडिया ने उठाया था, या जो सरकारी रिकॉर्ड में किसी का भी उठाया हुआ हो।  (Daily Chhattisgarh) 

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