संपादकीय
12 मई 2018

इधर कर्नाटक में चुनाव प्रचार खत्म हुआ, और उधर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस तरह नेपाल पहुंचे कि मानो वे भारत में ही हैं, और कर्नाटक में चुनावी जीत के लिए प्रार्थना करने एक के बाद दूसरे मंदिर जा रहे हैं, कहीं ढोल बजा रहे हैं, कहीं झांझ बजा रहे हैं। और कांग्रेस ने इस मुद्दे को उठाया, लेकिन लोकतंत्र का यह लचीलापन ही उसकी खूबी है कि नियम-कायदों के बीच किस तरह फायदा उठाया जा सकता है। अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया के अकेले हिन्दू राष्ट्र रहे नेपाल में जाकर जो कुछ कर रहे हैं, वह चुनाव आयोग के नियम-कायदे से परे की बात है। अब यह तो भारतीय मीडिया की मजबूरी है कि मोदी दूसरे देशों में जो करें, उसे भारत में दिखाएं, क्योंकि मोदी पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो हिन्दुस्तानी निजी मीडिया को अपने साथ विदेश नहीं ले जाते। पहले के तमाम प्रधानमंत्री अपने विमान में चुनिंदा पत्रकारों को ले जाते थे, लेकिन उससे भी उन्हें उतना कवरेज नहीं मिलता था जितना मोदी को बिना किसी को ले जाए मिलता है। इसलिए अगर कर्नाटक चुनाव पर मोदी के नेपाल प्रवास का कोई असर पडऩा है, तो उसमें वे क्या कर सकते हैं? हम तो महज यही कह सकते हैं कि मोदी इतने चतुर हैं कि उन्होंने कर्नाटक प्रचार खत्म होने के बाद और मतदान चलने तक ऐसा देश चुना जो कि कर्नाटक के हिन्दू मतदाताओं को सुहाए।
भारतीय लोकतंत्र में चुनावी फायदा पाने का यही एक तरीका नहीं है, ऐसे और भी बहुत से दूसरे तरीके हैं जो कि चुनाव प्रचार न लगते हुए भी मतदाताओं को प्रभावित करते हैं। 2014 के चुनाव में जब नरेन्द्र मोदी एक ऐतिहासिक बहुमत के साथ जीतकर आए थे, उसके ठीक पहले के महीनों को अगर देखें तो कम से कम हिन्दी मनोरंजन-टीवी पर कई ऐसे सीरियल चल रहे थे जो कि भारत की पुरानी ऐतिहासिक कहानियों की कल्पना पर गढ़े गए थे, और जो मुगलों या मुस्लिमों की ज्यादतियां बताते थे, या कि जो हिन्दू-इतिहास की गौरवगाथा बताते थे। हम इसे कोई अनायास जुट गया संयोग नहीं मानते, और बाजार-कारोबार जिस तरह से मोदी के साथ था, तो उसमें कोई हैरानी नहीं है कि अदानी-अंबानी जैसे बड़े घरानों से जुड़े चैनलों या टीवी निर्माताओं के साथ मिलकर ऐसी कोई योजना बनाई गई हो। लेकिन लोकतंत्र में इन तमाम बातों की छूट है, और जो पार्टी आधी सदी से ज्यादा इस देश पर राज कर चुकी है, उस कांग्रेस पार्टी में अगर इतनी समझबूझ और इतनी चतुराई नहीं है, तो यह उसका दीवालियापन है।
हमने कांग्रेस के इतिहास में आपातकाल को देखा हुआ है कि उस दौर में मीडिया और फिल्मों को इस्तेमाल करके जनमत को किस तरह प्रभावित करने की कोशिश की गई थी। किस तरह किस्सा कुर्सी का नाम की फिल्म को जलाया गया था, बर्बाद किया गया था, और वे सारी सरकारी-कांग्रेसी साजिशें बाद के जांच आयोग में सामने भी आईं थीं। इसलिए भारतीय चुनावी लोकतंत्र को चतुराई या धूर्तता से परे का कोई पवित्र सामान मान लेना ठीक नहीं है, यह लोकतंत्र सभी किस्म के प्रभावों की गुंजाइश रखकर ही चलता है। अब मोदी ने नेपाल के मंदिरों का कार्यक्रम रातों-रात तो बना नहीं लिया, कई दिनों पहले से यह तय किया गया होगा, और नेपाल की सीता और भारत के राम की कहानी का अगर कर्नाटक चुनाव के वक्त इस्तेमाल करने की समझ किसी प्रधानमंत्री में हैं तो फिर वह प्रधानमंत्री उसका चुनावी फायदा पाने का हकदारभी है। कांग्रेस को इस मुद्दे पर रोना-पीटना छोड़कर अपने दिमाग का बेहतर इस्तेमाल करना सीखना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)
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