सोनिया से राहुल का कोई मुकाबला नहीं

संपादकीय
8 मई 2018


सोनिया और राहुल में एक बुनियादी फर्क है। सोनिया गांधी कम बोलती हैं, और जब बोलती हैं तो अपने पर काबू रखना जानती हैं। उन्होंने गुजरात के चुनाव में मोदी को मौत का सौदागर जरूर कहा, लेकिन वह बात चुनावी भाषण की शब्दावली थी, न कि कोई ठोस बात। वह उनके खिलाफ इस्तेमाल जरूर हुई, लेकिन वह कोई चूक नहीं थी। आज कर्नाटक चुनाव के बीच से राहुल गांधी ने मीडिया से बातचीत में 2019 के चुनावों में कांग्रेस का बहुमत आने पर प्रधानमंत्री बनने से इंकार नहीं किया। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि अगर बहुमत आता है तो क्यों नहीं? 
राजनीति में सच तो ठीक है, लेकिन अपनी पार्टी के हितों के खिलाफ जाकर एक लापरवाह सच ठीक नहीं है। इस बात को कौन नहीं जानता कि कांग्रेस का बहुमत आने पर राहुल गांधी ही पार्टी की पसंद रहेंगे, लेकिन यह बात औरों के कहने की होनी चाहिए, अपने खुद के कहने की नहीं होनी चाहिए। उनकी इस एक लापरवाह बात का एक बेजा चुनावी इस्तेमाल तय है, और यह बात 2019 के चुनाव में मोदी और एनडीए के खिलाफ किसी गठबंधन की संभावनाओं को कमजोर करने के लिए भी इस्तेमाल होना तय है। लोगों को याद होगा कि किस तरह जब अटल सरकार के बाद यूपीए सत्ता में आई, और उस जीत का सबसे बड़ा हक कांग्रेस पार्टी और सोनिया गांधी को था, और सांसदों ने, कांग्रेस सांसदों ने, एक मत से सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री मनोनीत किया था, और किस तरह सोनिया ने अपने सिर पर रखा जा चुका ताज मनमोहन सिंह के सिर पर रखकर बड़प्पन, दरियादिली, और एक समझदारी भी दिखाई थी। वैसा करके सोनिया गांधी ने भाजपा के भीतर की उन बड़बोली बड़ी-बड़ी नेताओं से सिर मुंडाने का मौका भी छीन लिया था जिन्होंने इसकी खुली सार्वजनिक घोषणा की थी। सोनिया गांधी ने भाजपा की ऐसी नेताओं से राजनीति से संन्यास लेने का मौका भी छीन लिया था, और उन्होंने अपनी समझ से उस वक्त की सबसे अच्छी पसंद मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था। जब यूपीए दूसरी बार सत्ता में आई तब भी बहुत से लोगों का यह अंदाज था और यह चाह थी कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाए, लेकिन सोनिया गांधी ने ऐसी किसी चर्चा को भी आगे नहीं बढऩे दिया था। 
सार्वजनिक जीवन में समझदारी इसमें होती है कि कई किस्म के ऐसे सच अपने मुंह से बोलने से बचा जाए, जो न केवल गैरजरूरी हैं, बल्कि जो आत्मघाती भी हैं। आज 2019 के चुनाव को लेकर देश में मोदी के खिलाफ एक बड़ा मोर्चा खड़ा करने की शुरुआती सुगबुगाहट चल रही है। कांग्रेस से यह उम्मीद की जाती है कि वह ऐसे किसी मोर्चे में शामिल होकर उसे मजबूती दे, और ऐसा करते हुए अपनी कोई शर्तें न रखे। यह बात भी जगजाहिर है कि ऐसे किसी गठबंधन के बिना कांग्रेस पार्टी महज अपने बूते पर 2019 में मोदी को शिकस्त नहीं दे सकती, और जब कभी कोई मोर्चा चुनाव लड़ता है, तो यह स्वाभाविक बात रहती है कि उसके सत्ता में आने पर उसकी सबसे बड़ी पार्टी के चुनाव हुए मुखिया को मोर्चा या गठबंधन का मुखिया बनाया जाए। 
कहने के लिए राहुल गांधी ने एक सवाल के जवाब में यह बात कही है, लेकिन राजनीतिक परिपक्वता यह होती कि वे ऐसा कहने से बचते। उनके खिलाफ विपक्ष के पास आज जो सबसे बड़ी तोहमत है, वह कुनबापरस्ती की है। और यह बात देश के एक बड़े तबके को सुहाती भी है। ऐसे में उम्मीद की जाती है कि कुनबापरस्ती की और बातें न की जाएं। राहुल गांधी ने एक सवाल के एक सरल से जवाब में यह मौका खो दिया है। राजनीति सरलता का खेल नहीं है, इसमें चतुराई की जरूरत भी रहती है, फिर चाहे वह धूर्तता न रहे, महज चतुराई रहे। कांग्रेस को देश में अगले आम चुनावों में संभावित गठबंधन को लेकर अपना दिमाग भी साफ रखना चाहिए, और अपनी जुबान का इस्तेमाल भी समझदारी से करना चाहिए। वरना उत्तरप्रदेश के अभी हाल के लोकसभा उपचुनावों में बसपा और सपा के गठबंधन का साथ न देकर, भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़कर कांग्रेस ने एक रणनीतिक चूक की, और उससे उसकी औकात पता लग चुकी है। अब कांग्रेस को किसी संभावित गठबंधन के मुखिया होने की चाह को छोड़कर, ऐसे गठबंधन की राह को मजबूत करने का काम करना चाहिए, और बाकी बातें तो संसदीय-चुनावी राजनीति में अपने आप होती हैं। (Daily Chhattisgarh)

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