कर्नाटक की जीत-हार के मायने समझने की जरूरत

संपादकीय
15 मई 2018


भारत जैसे चुनावी लोकतंत्र में किसी भी चुनाव के बाद उसका विश्लेषण बड़ा आसान हो जाता है क्योंकि नतीजों को लेकर कई घिसे-पिटे विशेषणों का इस्तेमाल करके यह साबित किया जा सकता है, और जाता है, कि यह जीत कैसे हासिल हुई, या यह हार हुई तो कैसे हुई। कर्नाटक के चुनाव को लेकर टीवी चैनलों में मतदान के बाद जो सर्वे करवाए, उनमें अधिक का अंदाज भाजपा की जीत का था, लेकिन कुछ सर्वे ऐसे भी थे जो कांगे्रस की जीत बताते थे। इस प्रदेश के चुनाव को कुछ महीनों बाद के छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान के विधानसभा चुनावों के पहले के रूख से भी जोड़कर देखा जा रहा था और दूसरी तरफ यह भी देखा जा रहा था कि क्या यह मोदी लहर के दक्षिण प्रदेश का सुबूत साबित होगा। अभी जब ये नतीजे आ ही रहे हैं, ऐसा दिखाई दे रहा है कि भाजपा अकेले अपने बूते पर सरकार बनाने के करीब पहुंच रही है, कांगे्रस सर्वे की अटकलों से कम सीटों के साथ दूसरे नंबर पर है और जेडीएस को अंदाज से कुछ अधिक सीटें मिल रही हैं।
कर्नाटक में अभी तक जो आसार दिख रहे हैं, उनके मुताबिक परंपरा के अनुसार भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते सरकार बनाने का न्यौता मिलना चाहिए। लेकिन कांगे्रस और जेडीएस की सीटें मिलाकर अभी भाजपा से अधिक हैं, और ऐसे में जोड़-तोड़ की राजनीति में कुछ भी हो सकता है। हम सरकार को लेकर दोपहर एक बजे यह लिखते हुए कोई अटकल लगाना नहीं चाहते, लेकिन चुनावी नतीजों में भाजपा की जो कामयाबी स्थापित हुई है, उस पर चर्चा जरूर होनी चाहिए। देश के बहुत से राजनीतिक विश्लेषकों ने इस बात को लिखा और कहा है कि भाजपा चुनाव जीतने की एक ऐसे कामयाब मशीन हो गई है जो कि हर कीमत पर चुनाव जीतने और सरकार बनाने की नीयत के साथ मैदान पर उतरती है, और अमूमन जीतती है। लोगों ने यह भी कहा है कि कर्नाटक को जीतने के लिए भाजपा ने जिस तरह वहां एक वक्त भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए येदियुरप्पा को भावी सीएम का चेहरा बनाकर पेश किया और देश के सबसे बड़े खनिज घोटालेबाज रेड्डी भाईयों के करीबी लोगों को आधा दर्जन से अधिक सीटें दीं, प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार पर जितना वक्त लगाया, उन सबका मिलाजुला नतीजा यह जीत है। और यह जीत भाजपा को बहुत से समझौते करने के बाद हासिल हुई है, यह कोई आसान जीत नहीं है।
अभी विश्लेषकों के जो आंकड़े टीवी स्क्रीन पर तैर रहे हैं, उनके मुताबिक कर्नाटक में भाजपा की इस ताजा जीत के बाद देश में एनडीए मतदाताओं की सबसे बड़े हिस्से पर राज कर रही है, और कांगे्रस का राज अगर कर्नाटक से हट जाता है, तो वह अपने सहयोगियों के साथ मिलकर भी देश में कुल ढाई फीसदी मतदाताओं पर ही राज कर रही है। इन आंकड़ों के महत्व को कम आंकना इसलिए ठीक नहीं है कि देश में एक-एक कर तकरीबन सारे ही राज्यों को खोने के बाद कांगे्रस पार्टी के पास अब खोने को कुछ बचा भी नहीं है। गिनेचुने एक-दो राज्यों में जिन सहयोगी दलों के साथ कांगे्रस का तालमेल है, वहां भी नरेन्द्र मोदी की आंधी और अमित शाह का राजनीतिक-चुनावी मैनेजमेंट कांगे्रस के साथियों को शायद अधिक वक्त तक साथ न रहने दें। 
इस चुनाव का रूख प्रचार के बीच में कब बदला इसे लेकर भी कुछ विश्लेषकों ने एक अटकल पेश की है। उनका मानना है कि जब राहुल गांधी ने यह कहा कि 2019 के चुनाव में अगर कांगे्रस का बहुमत आता है, तो वे भी प्रधानमंत्री बन सकते हैं, या बनेंगे। हालांकि राहुल ने यह बात एक बंद कमरे की बैठक में एक सवाल के जवाब के रूप में ही कही थी, लेकिन अखबार और टीवी की सुर्खियां कभी पूरी बात पर तो बनती भी नहीं हैं, सबसे नाटकीय गिनेचुने शब्दों को लेकर मीडिया दौड़ पड़ता है, और वैसा ही राहुल के इस बयान के साथ भी हुआ। भाजपा को इस बयान के बाद कांगे्रस पर हमले का एक बड़ा मौका हाथ लगा, और उसने फिर कोई कसर बाकी नहीं रखी। चुनाव तो किसी रियायत वाला खेल होता नहीं है, और इसके बीच में राहुल जैसी चूक कोई गलत बात चाहे न हो, गलत मौके पर कही गई एक आम बात जरूर थी जो कि आत्मघाती साबित हुई। फिर भी हम अकेली इसी लापरवाह बात को कांगे्रस की शिकस्त के लिए जिम्मेदार नहीं मानते, और देश को अब कम से कम आज तो यह मानने की जरूरत है कि कांगे्रस अप्रासंगिक हो गई है, और भाजपा नरेन्द्र मोदी की शोहरत, और अमित शाह के मैनेजमेंट की लहरों पर सवार है। 
मोदी-शाह ने भारत की चुनावी राजनीति को एक बिल्कुल ही नया तेवर दे दिया है, और उसे समझे बिना उससे निपटना किसी पार्टी के लिए मुमकिन नहीं है। जो लोग अपने पुराने तजुर्बे को लेकर इस नए दौर का चुनाव लडऩे के लिए अपने को काबिल मानते हैं, उनके दिन गिनेचुने ही बचे हैं। एक वक्त भारत पर हमला करने वाले लोग बारूद लेकर आए थे, और उस नए हथियार का सामना करने के लिए भारतीय राजाओं के पास महज तलवार-भाले थे। आज मोदी-शाह के मुकाबले बाकी पार्टियों के पुराने हथियार औजार जितने भी नहीं रह गए हैं। कांगे्रस ने कर्नाटक में भाजपा विरोधी जेडीएस और बसपा के साथ चुनाव के पहले किसी तरह का तालमेल नहीं किया, और उसका यह एक फैसला मतदान से पहले और मतगणना के बाद दोनों ही वक्त उसके लिए नुकसानदेह साबित हुआ। यहां एक लाईन यह बताना जरूरी है कि कर्नाटक से बहुत दूर बैठी हुईं ममता बैनर्जी ने कांगे्रस को यह सुझाव दिया भी था।
अभी आंकड़े चढ़-उतर रहे हैं, और आने वाले घंटे यह साबित करेंगे कि सरकार बनाने का न्यौता किसे मिलेगा, सरकार बनेगी किसकी, लेकिन अभी इस बीच हमने भाजपा की जीत और कांगे्रस की हार पर ही आज की बात सीमित रखी है। आगे-आगे देखें, होता है क्या? (Daily Chhattisgarh)

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