संपादकीय
13 मई 2018

जो लोग राजनीति में किसी के भविष्य को लेकर ऐसी भविष्यवाणी करते हैं कि वे आसमान पर पहुंच जाएंगे, या मिट्टी में मिल जाएंगे, उनके समझदार होने के लिए बहुत सी मिसालें सामने आती हैं, और लोगों को उनको देखकर अपनी अटकलबाजी पर थोड़ा सा काबू भी लगाना चाहिए। अभी पिछले चार दिनों से दुनिया मेें एक ऐसी चर्चा शुरू हुई है जिसे पखवाड़े भर पहले अगर किसी ने छेड़ा होता, तो उसे बावला कहा जाता। आज उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर जिस तरह की रोक लग रही है और अमरीका के साथ उत्तर कोरिया के शासक की अगले हफ्ते जो बातचीत होने जा रही है, उसे लेकर दुनिया हक्का-बक्का हैं। अभी कुछ हफ्ते पहले की ही बात थी जब ऐसा लग रहा था कि तीसरा विश्व युद्ध शुरू होने वाला है, और अब हाल यह है कि उत्तर कोरिया का परमाणु कार्यक्रम बंद करने की घोषणा हो चुकी है, और ट्रंप और किम सिंगापुर में बातचीत करने वाले हैं, सारा तनाव खत्म होता दिख रहा है, और यह चर्चा शुरू हुई है कि क्या उत्तर कोरिया का परमाणु खतरा दुनिया पर से हटाने में कामयाब होने पर ट्रंप को नोबल शांति पुरस्कार भी दिया जा सकता है, या दिया जाना चाहिए? ट्रंप को नोबल शांति पुरस्कार, अभी कुछ ही हफ्ते पहले तक जिसे अमरीका का तानाशाह सा माना जाता था, आज एक कामयाबी उसे कहीं से कहीं पहुंचा दे रही है।
लोगों को याद होगा कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद उस वक्त के वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को तुरंत हटाने की बात हो रही थी, वह बात धरी रह गई, और मोदी जनता के बीच से लगातार चुनाव जीतकर गुजरात के मुख्यमंत्री बने रहे। जब पूरी दुनिया ने उनको अछूत मानकर वीजा देने से मना कर दिया था, तो वे आगे बढ़ते-बढ़ते दुनिया की एक ऐसी कुर्सी पर पहुंचे कि उन्हें अब दुनिया के किसी देश जाने के लिए वीजा की जरूरत भी नहीं रही, और अब वे देशों के न्यौते पर उनके मेहमान होकर वहां जाते हैं। दुनिया में कौन ऐसी कल्पना भी कर सकते थे, लेकिन ऐसा हुआ। भाजपा के भीतर जो बड़े-बड़े नेता थे, वे मोदी की शोहरत और कामयाबी की सुनामी में बहकर हाशिए पर ऐसे पहुंचे कि वे पार्टी के सालाना जलसों के गुलदस्ते होकर रह गए हैं, और अब कोई उनका नामलेवा भी नहीं है।
इस बात की चर्चा इसलिए जरूरी लग रही है कि जब-जब कोई चुनाव सामने आते हैं, किसी देश या प्रदेश में लोग किसी पार्टी या उम्मीदवार के लिए अंधाधुंध भविष्यवाणियां करने लगते हैं, इतने विशेषण इस्तेमाल होते हैं कि अगर बात ठीक से दर्ज रहे, तो राजनीतिक विश्लेषकों को बाद में मुंह दिखाने में भी थोड़ी सी दिक्कत हो। यह बात महज राजनीति के लिए नहीं है, कारोबार के लिए भी है। आज ही एक खबर है कि मुंबई में रिलायंस उद्योग समूह की अनिल अंबानी वाली कंपनी अपने घाटे को पूरा करने के लिए अपने मुख्यालय को खाली करके दूसरे सस्ते इलाके में जा रही है, और मुख्यालय की इमारत छोड़कर अनिल अंबानी भी दूसरी जगह बैठने जा रहे हैं। एक वक्त था जब हिन्दुस्तान में टाटा-बिड़ला के बाद सिर्फ अंबानी का नाम रहता था, और अब अंबानियों में एक आसमान पर है, और एक जमीन पर। इसलिए लोगों को अपने निष्कर्ष निकालते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि बहुत सी बातें कल्पना से परे की भी होती हैं, ऐसी स्थितियां आ जाती हैं जिनके बारे में किसी ने देखा-सुना न हो। जिंदगी के हालात हमेशा काबू में नहीं रहते, और लोगों को भविष्यवाणी करते हुए किसी नतीजे पर ऐसे छलांग नहीं लगाना चाहिए जैसे कि किसी मेंढक ने लगाई हो। लोगों को अचानक कूदकर किसी जगह पहुंचने की खूबी मेंढक पर छोड़ देनी चाहिए, और अपने नतीजों में हमेशा ही संभावना और आशंका की गुंजाइश बाकी रखनी चाहिए। आज दुनिया के बड़े नेताओं में सबसे अधिक सनकी, और बदचलन, और घटिया इंसान दिख रहा डोनाल्ड ट्रंप नोबल शांति पुरस्कार का हकदार भी समझा जा रहा है, और इससे अधिक हैरान करने वाला फेरबदल कुछ हफ्तों के भीतर और क्या हो सकता था? अनुपम खेर का एक टीवी कार्यक्रम याद पड़ता है जिसमें वे बार-बार कहते हैं कि कुछ भी हो सकता है। (Dailychhattisgarh)
-सुनील कुमार
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