औरत पर लादी गई ऊंची एड़ी

28 मई 2018

इस पखवाड़े फ्रांस के, और दुनिया के सबसे बड़े फिल्म समारोह, कान, में एक बात तस्वीरों और खबरों में आई और चली गई। एक अमरीकी अभिनेत्री जिसकी एक फिल्म वहां दिखाई जानी थी उसने वहां ग्लैमर के लिए मशहूर रेड कार्पेट पर ऊंची एड़ी के अपने सैन्डल उतार दिए, और वहां से आगे वह नंगे पैर गई, और उसी तरह बैठकर उसने समारोह में हिस्सा लिया। उसने इस समारोह की इस नीति, और इस नियम का विरोध करने के लिए ऐसा किया कि इस रेड कार्पेट पर जो भी महिलाएं आएं, उन्हें ऊंची एड़ी के सैन्डल पहनना ही होगा। लोगों को यह अच्छी तरह याद होगा कि भारतीय फिल्म अभिनेत्री और विश्व सुंदरी रही हुई ऐश्वर्या राय एक कॉस्मेटिक कंपनी का प्रचार करते हुए हर बरस इस समारोह में चकाचौंध कपड़े पहनकर रेड कार्पेट पर आती हैं, और कैमरों पर छा जाती हैं। फैशन और ग्लैमर की दुनिया में यह बात बहुत बड़ी खबर रहती है कि कौन सी फिल्म अभिनेत्री या मॉडल किस डिजाईनर के बनाए हुए कपड़े पहनकर इस लाल कालीन पर चलती हैं।
कान फिल्म समारोह की महिलाओं की पोशाक पर लगाई गई बंदिशों का विरोध दो-तीन बरस पहले भी हुआ था जब बहुत सी अभिनेत्रियों ने इसका विरोध किया था, और ऐसी पचास महिलाओं को वहां रोक दिया गया था। इसके बाद एक अभियान चला था जिसमें ऐसी प्रमुख महिलाओं ने उन जूतों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट की थीं जिनमें वे सबसे अधिक आराम महसूस करती हैं। महिलाओं की पोशाक पर यह बंदिश उस समारोह में है जो कि बुनियादी तौर पर फिल्म कला का एक जलसा है, और जहां दुनिया के सबसे नामी-गिरामी फिल्मकार अपनी फिल्मों के साथ पहुंचते हैं। इसके साथ में ग्लैमर के लिए पोशाक का ऐसा कायदा बनाना एक निहायत ही बेहूदी बात है।
लेकिन महिलाओं की पोशाक को लेकर समाज से लेकर बाजार तक बंदिशों को बढ़ावा इसलिए दिया जाता है कि महिलाओं को खरीददारी और तैयार होने की बंदिशों में बांधकर रखा जाता, और उसे खुली सोच से आगे बढऩे से बिना कहे ही रोक दिया जाए, और एक निहायत ही फिजूल के ग्लैमर में उलझाकर रख दिया जाए। ऐसा करने में बाजार की तो कमाई की एक बहुत जाहिर सी बदनीयत है ही, हजारों बरस से मर्दों की चली आ रही वह बदनीयत भी इसके पीछे है जिसे औरत को आगे बढऩे से रोकने के लिए उसे साज-सज्जा और कपड़ों में उलझाने की साजिश चली आ रही है।
एक अंतरराष्ट्रीय समारोह में नामी-गिरामी और मशहूर औरतों का ऐसा प्रतीकात्मक विरोध तो ठीक है, लेकिन क्या इससे बाजार को कोई फर्क पड़ेगा? कई लोगों का यह मानना है कि जब से भारत फैशन और कॉस्मेटिक का एक बड़ा बाजार बना, यहां के लोगों की खरीदी की ताकत बढ़ी, तब से भारत की सुंदरियां विश्व सुंदरी के खिताब जीतने लगीं। इस बात में कितनी सच्चाई है यह तो ऐसी प्रतियोगिताओं के आयोजक जानें, लेकिन हिन्दुस्तान में अभी कल कोबरापोस्ट नाम के एक भांडाफोड़ समाचार पोर्टल ने भारत में सौंदर्य स्पर्धा करवाने वाली एक प्रकाशन कंपनी के मुखिया का जैसा स्टिंग ऑपरेशन किया है, उससे यह उजागर हुआ है कि भारत सुंदरी बनने के लिए जिन सवालों को पूछा जाता है, उनमें हिंदुत्व के सवालों को भरा जा सकता है, भुगतान करके। कोबरापोस्ट का यह भांडाफोड़ एक अलग और बड़ा मुद्दा है, लेकिन यह बात जगजाहिर है कि जिन मुकाबलों से कारोबार का नफा-नुकसान जुड़ा होता है, वहां पर  फैसलों को खरीदने के काम में कंपनियां तो लगी रहती हैं, अब फैसले बिकते हैं या नहीं, इस बारे में कुछ कहना मुमकिन नहीं है, और ठीक भी नहीं है।
लेकिन आज की बुनियादी बात पर अगर लौटें तो एक औरत को उसके बदन के भीतर ही कैद कर लेने की मर्द की साजिश किस्म-किस्म से चलती है। और फिर इस देह को इतनी खूबसूरत देह बनाने की कोशिश होती है कि वह जेल न लगे, जन्नत लगे। बाजार की साजिश भी इसमें हिस्सेदार रहती है जो कि किसी लड़की या औरत के मन को स्थायी रूप से अपने बारे में हीनभावना में डाले रखती है। अपने रंग को लेकर, अपने कद को लेकर, अपने बालों को लेकर, बदन के आकार को लेकर बाजार आम लड़कियों और महिलाओं के सामने कुछ खास चुनिंदा मिसालों को खरीदकर इस तरह पेश करता है कि हर आम लड़की या महिला अपनी पूरी जिंदगी उन मिसालों की तरह बनने के फेर में हीनभावना से गुजरती रहें, और बाजार की ग्राहक बनी रहें।
लोगों को याद होगा कि दुनिया की, खासकर संपन्न दुनिया की, अधिकतर लड़कियों के बीच बार्बी नाम की जो गुडिय़ा लोकप्रिय है, उसकी कद-काठी इस असंभव किस्म की बनाई गई है कि किसी आम लड़की के लिए वैसा बन पाना तकरीबन नामुमकिन रहता है, अगर वह सारे ही वक्त कसरत और मेकअप से, और हो सकता है कि सर्जरी से भी अपने आपको बार्बी की तरह ढालने में न लगी रहे। एक लड़की या औरत का ऐसा अनुत्पादक संघर्ष बाजार के लिए बड़ा ही उत्पादक होता है, और इस बाजार के लिए लड़कियों और महिलाओं में हीनभावना एक बड़ा ही उपजाऊ खेत होता है। इसलिए असल जिंदगी के खेत को जोत-जोतकर फैशन और सौंदर्य का बाजार हीनभावना की फसल को बढ़ावा देने में लगे रहता है।
औरतें अपनी देह का रख-रखाव कैसा करें, इसे ग्लैमर की दुनिया के गढ़े गए नकली और असंभव पैमाने सुझाते हैं, और तय करते हैं। नतीजा यह निकलता है कि दुनिया की चुनिंदा अभिनेत्रियों, गायिकाओं, और मॉडलों को देख-देखकर बाकी दुनिया की लड़कियां और औरतें अपने आपको उन्हीं पैमानों पर ऊपर ले जाने की लड़ाई में अपनी जिंदगी गंवा बैठती हैं। इस संघर्ष में असल जिंदगी की क्षमता, संभावना, कल्पनाशीलता, रचनाशीलता, ये तमाम बातें धरी रह जाती हैं, और चुनिंदा औरतों को बाजार साल भर ऐसे समारोहों के लिए तैयार करने में लग जाता है जहां उनकी एक झलक कई ब्रांडों का बाजार बढ़ाने का काम आसानी से कर जाती हैं।
ऐसे बाजारू जलसों में औरतों के ऊंची एड़ी पहनने की बंदिश के खिलाफ जो पहल हुई है, वह दुनिया में कोई क्रांति नहीं लाने वाली है, लेकिन वह लड़कियों के बीच अपने कद को लेकर हीनभावना को घटाने का काम कर सकती है। यह बात जगजाहिर है और सहज-समझ की है कि ऊंची एड़ी का मतलब औरत का कोई काम न करना, या क्षमता से कम करना भी होता है। वह आराम से आदमियों की तरह के जूते-चप्पल में रह सके, तो वह अधिक सेहतमंद भी रह सकेगी, और अधिक उत्पादक भी हो सकेगी। लेकिन उसे जिस तरह के दिखावे में झोंक दिया जाता है, उसके विरोध को ठीक से समझने की जरूरत है, और दुनिया की लड़कियों और औरतों को उन पर लादे गए खूबसूरती के पैमानों को उतार फेंकने की भी जरूरत है।
इसके लिए यह भी जरूरी है कि लड़कियां और महिलाएं अपने रूप-रंग, और अपनी कद-काठी को लेकर बेचैनी और हीनभावना में रहना बंद करें, और एक आत्मविश्वास के साथ जिएं, और आगे बढ़ें, और यह आगे बढऩा ऊंची एड़ी के सैन्डलों में तो हो नहीं सकता। (Daily Chhattisgarh)

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