एक छोटे से मुद्दे पर बड़ी बात

संपादकीय
4 मई 2018


कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी पहले भी कई बरस राज कर चुकी है, और अभी चुनाव में वह एक मजबूत दावेदार तो है ही। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार कर्नाटक के चुनाव प्रचार को मथ रहे हैं, और भाजपा वहां अपनी अच्छी संभावनाएं देख रही है। ऐसे में जाहिर है कि चुनाव घोषणा पत्र में बहुत सी बातों को रखकर मतदाताओं के बहुत बड़े तबके की हमदर्दी पाने की कोशिश हर राजनीतिक दल करता ही है। भाजपा के इस राज्य के घोषणा पत्र में किसानों के एक लाख तक के कर्जमाफी की बात तो है, और उसके अलावा भी दूसरी बहुत सी बातें हैं, जिन पर लिखना आज का मकसद नहीं है। लेकिन इससे परे एक छोटी सी लगनी वाली बात ऐसी है जिस पर चर्चा कर्नाटक चुनाव से परे भी जरूरी है। वहां भाजपा ने वायदा किया है कि उसकी सरकार बनी तो बीपीएल, यानी गरीबी की रेखा के नीचे की, महिलाओं को सेनेटरी नैपकिन मुफ्त दिया जाएगा, छात्राओं को मुफ्त दिया जाएगा, और बाकी महिलाओं को भी वह एक रूपए में उपलब्ध रहेगा। 
कहने को तो यह बात चर्चा के लायक भी बहुत से लोगों को नहीं लगेगी, और लगेगा कि एक बहुत छोटे और गैरजरूरी सामान पर लिखा जा रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि यह छोटा सा सामान गरीब लड़कियों और महिलाओं की जिंदगी में इतना मायने रखता है कि इससे उनकी सेहत, उनकी कार्यक्षमता, उनका आत्मविश्वास, और उनका व्यक्तित्व जुड़ा होता है। जो गरीब लड़कियां या महिलाएं सेनेटरी नैपकिन खरीद नहीं पाती हैं, उनकी तकलीफ वे ही जानती हैं। इसलिए देश में कुछ ऐसे स्वयंसेवी संगठन हैं जिन्होंने बड़े पैमाने पर इसे बनाना शुरू किया है, और कम दाम पर गरीबों को हासिल करवाना भी शुरू किया है। छत्तीसगढ़ के भी बहुत से स्कूलों में लड़कियों के लिए ऐसी मशीनें लगाई गई हैं जहां वे बहुत कम दाम पर इसे पा सकती हैं। लेकिन इसकी उपलब्धता के साथ-साथ इसके दूसरे पहलू की वजह से भी हम इस पर चर्चा कर रहे हैं। भारत में धार्मिक और सामाजिक स्तर पर महिलाओं की माहवारी के वक्त उन्हें अछूत माना जाता है, और उन्हें सभी कामों से परे रखा जाता है। शहरीकरण के साथ-साथ यह रूढि़ टूट रही है, लेकिन शहरों से परे यह अब भी आम हैं, और शहरों में भी संयुक्त परिवारों में, धार्मिक संकीर्णता वाले परिवारों में यह धड़ल्ले से जारी है। 
दरअसल भारतीय समाज की सोच परंपरागत रूप से एक मर्दाना सोच रही है, और उसमें महिलाओं को ही विधवा के कपड़े, उसे माहवारी में अपवित्रता, उसे पिता की दौलत में हक न देना, उसे बराबरी की तनख्वाह न देना जैसे हजारों किस्म के भेदभाव जारी हैं। इसी के चलते एक लड़की की जिंदगी में कुदरत की दी हुई माहवारी की चर्चा को भी ऐसा अवांछित और अछूत मान लिया जाता है कि देश की कुछ स्कूलों में जब बच्चियों को इसके बारे में सिखाया-समझाया जा रहा था, तो उसे सेक्स-शिक्षा करार देते हुए उसके खिलाफ आंदोलन होने लगे थे। समाज में न केवल इस बात की बड़ी जागरूकता की जरूरत है कि दुनिया के जितने भी मर्द पैदा हुए हैं, वे औरत के शरीर की ऐसी प्रकृति की वजह से ही हुए हैं जिसमें माहवारी एक अनिवार्य और अपरिहार्य हिस्सा है। दुनिया के मर्दों को अपना जन्म तो चाहिए, लेकिन अपनी मां के शरीर की इस प्राकृतिक प्रक्रिया के बारे में वे चर्चा भी करना नहीं चाहते, वे महिला की इस जरूरत को समझना भी नहीं चाहते। नतीजा यह होता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बनाए सेनेटरी नेपकिन के मुकाबले बाजार में और कुछ टिकता नहीं। लेकिन अब तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है, और कुछ महीनों बाद छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान में जो चुनाव होने जा रहा है, हमारा ख्याल है कि अगर इन प्रदेशों के राजनीतिक दल समझदार होंगे, तो इस मुद्दे को चुनावी घोषणा पत्र में जरूर शामिल करेंगे। इस बीच महिला संगठनों से लेकर महिला अधिकारों की फिक्र करने वाले बाकी संगठनों तक सभी को यह चाहिए कि छोटे से लगने वाले इस बड़े मुद्दे को लेकर राजनीतिक दलों के सामने चुनौती फेंकें और उन्हें घोषणा पत्र में इसे जोडऩे के लिए बेबस करें। हमारा तो यह भी ख्याल है कि जो राष्ट्रीय पार्टियां इन चुनावों में उतरने वाली हैं, उन सबसे महिला हक के हिमायती लोगों को यह भी खुलासा करने को कहना चाहिए कि संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण कब तक होगा और कौन सी पार्टी इस पर क्या रूख रखेगी। यह सही मौका है कि महिला आरक्षण विधेयक को लेकर देश की महिलाएं आने वाले सभी विधानसभा चुनावों में एक ऐसा माहौल बनाएं कि अगले आम चुनाव के पहले ही संसद में महिला आरक्षण एक हकीकत हो सके। (Daily Chhattisgarh)

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