संपादकीय
20 मई 2018

कर्नाटक विधानसभा में कल बहुमत साबित करने के पहले ही भाजपा के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने इस्तीफे की घोषणा कर दी, और इधर राष्ट्रगान बजते रहा, उधर वे अपने विधायकों के साथ राजभवन रवाना हो गए ताकि उस राज्यपाल को इस्तीफा दे सकें जिसने नाजायज तरीके से उन्हें न्यौता देकर शपथ दिलाई थी। यह इस्तीफा कई किस्म का था। यह भाजपा की तैयारी का इस्तीफा भी था, और सबसे बड़ा इस्तीफा तो यह राज्यपाल का अपनी जिम्मेदारियों से था। जिस राज्यपाल को असीमित अधिकार दिए गए हैं कि वह किसे सरकार बनाने न्यौता दे, उस राज्यपाल ने उसका असीमित बेजा इस्तेमाल करके एक ऐसी सरकार बनवाई जो बिना दल-बदल या खरीद-फरोख्त के बहुमत साबित नहीं कर सकती थी। इसलिए सामाजिक जीवन की मर्यादा यह मांगती है कि ऐसा राज्यपाल बिना देर किए इस्तीफा दे।
कहने के लिए राज्यपाल और भाजपा के सामने कई किस्म की मिसालें जुट जाएंगी कि जब केन्द्र पर कांग्रेस पार्टी का एकाधिकार था तब बहुत से राज्यपालों ने बहुत से राज्यों में कैसा-कैसा बर्ताव किया था, और तब किसने इस्तीफा दिया था। वैसी तमाम बातें इतिहास की किताबों में अच्छी तरह दर्ज होंगी, लेकिन हमारे सरीखे रोजाना के अखबारनवीसों की नसीहत या मांग उस दिन की जरूरत पर रहती है जिस दिन वह अखबार छपना है। इसलिए इतिहास को देखने की एक सीमा रहती है, और वर्तमान की यह मांग रहती है कि भविष्य को और अधिक तबाह होने से बचाया जाए। इसलिए भाजपा एक पार्टी के रूप में चाहे जैसा बर्ताव करे, जिस राज्यपाल को संविधान की रक्षा की शपथ दिलाई गई थी, और जिसका दर्जा निर्वाचित राज्य सरकार से ऊपर रहता है, उसे अपने ऐसे बेईमान बर्ताव के बाद तुरंत कुर्सी छोड़ देना चाहिए। और यह पैमाना बाकी राज्यपालों पर भी, बाकी मामलों में भी लागू होना चाहिए। लोगों को याद होगा कि बीच-बीच में कुछ लोग राज्यपाल के ओहदे को ही बेईमानी के खतरों से भरा हुआ, और निहायत गैरजरूरी बताते आए हैं। हम खुद इस अखबार मे इसी जगह पर बरसों से यह लिखते आए हैं कि ऐसी सामंती व्यवस्था खत्म होनी चाहिए जो कि एक निर्वाचित सरकार और मुख्यमंत्री के ऊपर एक अनैतिक नियंत्रण के लिए अंग्रेजी राज की बनाई हुई दिखती है। भारत में राज्यपालों की व्यवस्था में लोकतंत्र के साथ बेईमानी ही अधिक की है, न कि कोई संवैधानिक योगदान दिया है।
जहां तक कल की भाजपा की शिकस्त का सवाल है तो वह कर्नाटक से अधिक है, और कर्नाटक से दूर-दूर तक है। कल का नुकसान बेंगलुरू शहर तक सीमित नहीं रहने वाला है, यह देश भर में भाजपा के खिलाफ गैरएनडीए पार्टियों की एक नई एकजुटता की संभावना की शुरुआत हो सकता है। जब बिल्ली किसी घर में घुसकर दूध पी जाती है, तो वह नुकसान महज दूध का नहीं होता, बड़ा और असल नुकसान यह होता है कि बिल्ली ने घर देख लिया, और दूध का बर्तन पहचान लिया। इसी तरह आज गैरएनडीए पार्टियों ने एक नई संभावना की शिनाख्त कर ली है जो कि देश के दर्जन भर राज्यों में जगह-जगह आगे बढ़ सकती है जहां पर कि कांग्रेस या दूसरी पार्टियां चुनाव के पहले या चुनाव के बाद एक गठबंधन या तालमेल बना सकती हैं, और भाजपा-एनडीए के सामने एक सचमुच की चुनौती बन सकती हैं। जैसा कि कर्नाटक को लेकर कुछ लोगों का यह मानना है कि भाजपा के भीतर कुछ लोग ऐसे भी थे जो सरकार बनाने का ऐसा दुस्साहसी दावा करने के खिलाफ थे, और चाहते थे कि कांग्रेस-जेडीएस मिलकर सरकार बनाएं, एक-दूसरे को गिराएं, और तब भाजपा के लिए एक बेहतर मौका सामने आएगा। लेकिन वैसा हुआ नहीं, और सुप्रीम कोर्ट की दखल के अंदाज के बिना भाजपा ने एक पखवाड़े के वक्त को जुगाड़ के लिए काफी मान लिया। अपनी मर्जी का राज्यपाल होने का भी यह नुकसान हुआ कि अपनी ताकत और संभावना तौलने की जरूरत सूझी ही नहीं। अब देश में जगह-जगह कांग्रेस हो सकता है कि क्षेत्रीय पार्टियों के साथ एक बेहतर तालमेल को अच्छा समझे, और अपनी सीमित रह गई औकात की हकीकत जानकर, मानकर, छोटी-छोटी भागीदारियों को इज्जत का मुद्दा न बनाकर जिंदा रहना सीखे। कर्नाटक से भारत की क्षेत्रीय पार्टियों को भी कांग्रेस के साथ मिलकर बात करने की एक संभावना दिखेगी, और यही बेंगलुरू की विधानसभा से निकला हुआ संदेश है। (Daily Chhattisgarh)
-सुनील कुमार
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