आयरलैंड के जनमतसंग्रह से नफरतजीवी कुछ सीखें

संपादकीय
27 मई 2018


योरप में आयरलैंड को एक धर्मालु देश माना जाता है। वहां के लोगों में ईसाई कैथोलिक धर्म को मानने वाले लोगों की बहुतायत है। और 78 फीसदी से ज्यादा कैथोलिक लोग हैं, बाकी लोगों में भी गैरकैथोलिक ईसाई काफी हैं, लेकिन तकरीबन 10 फीसदी लोग बिना धर्म वाले भी हैं। ऐसे देश में गर्भपात एक बहुत बड़ा मुद्दा है क्योंकि धर्म गर्भपात के खिलाफ रहता है, और दशकों से आयरलैंड में इस मुद्दे पर बहस चल रही थी, लेकिन कोई सरकार इस पर से रोक हटा नहीं पाई थी। अभी छह बरस पहले वहां पर भारतीय मूल की एक महिला सविता हलप्पनवार का अनायास ही गर्भपात हुआ, लेकिन डॉक्टरों ने मेडिकल तरीके से भ्रूण को निकालने से मना कर दिया क्योंकि भ्रूण तब तक गर्भ के भीतर भी जिंदा था। नतीजा यह हुआ कि मेडिकल-गर्भपात के बिना इस महिला की ही मौत हो गई। तब से वहां पर वे महिलाएं और वे लोग बड़ा आंदोलन कर रहे थे, और कल इस मुद्दे पर देश में जनमत संग्रह हुआ। 
यह महज आयरलैंड में ही नहीं, अमरीका में भी हर चुनाव में एक बड़ा मुद्दा रहता है, और राष्ट्रपति पद के हर प्रत्याशी से, या राज्य के गवर्नर के उम्मीदवार से भी यह उम्मीद की जाती है कि वे गर्भपात के हक पर अपने विचार साफ करें। अमरीका की दोनों बड़ी राजनीतिक पार्टियों के बीच भी इस मुद्दे पर साफ असहमति रहती है। और जाहिर है कि अमरीका भी ईसाई बहुतायत वाला देश है और वहां मतदाताओं के बहुमत की धार्मिक सोच चुनाव में मायने तो रखती ही है। ऐसे में आयरलैंड में इस मुद्दे पर कल के जनमतसंग्रह में 66 फीसदी से अधिक लोगों ने महिलाओं को गर्भपात का हक देने के लिए वोट दिया। इससे आधे से कम ही लोग गर्भपात पर रोक की जिद पर अड़े रहने वाले थे। 
भारत एक भारी धार्मिक देश है, यहां पर नास्तिक लोगों की गिनती बहुत कम है, लेकिन हिन्दू धर्म के भीतर गर्भपात कोई मुद्दा ही नहीं है। बल्कि यह पूरी तरह से अहिंसक जैन धर्म में भी कोई मुद्दा नहीं है, इसके खिलाफ वहां कोई फतवा या आंदोलन नहीं है। इसी तरह इस देश के दूसरे धर्मों में भी गर्भपात के खिलाफ कुछ नहीं है, और ईसाई धर्म अपनी बुनियादी सोच और परंपरा के मुताबिक इसके खिलाफ है। लेकिन भारत में कभी ऐसी कोई आवाज भी नहीं उठी कि गर्भपात पर रोक लगाई जाए। बल्कि भारत सरकार और राज्य सरकारों के अस्पतालों में मुफ्त गर्भपात की सहूलियत है। ऐसे में यह सोचना थोड़ा मुश्किल होता है कि पश्चिम का कोई बहुत ही विकसित देश अपनी धार्मिक परंपरा के चलते अपनी महिलाओं को ऐसा हक नहीं देता था। लेकिन आज यहां इस मुद्दे पर लिखने की एक दूसरी वजह है। 
आयरलैंड में भारत से गई हुई एक भारतवंशी महिला की इस तरह की मौत से विचलित होकर वहां के समाज ने गर्भपात के फैसले को महिला का हक साबित करने और उसका कानून बनवाने के लिए ऐसा आंदोलन चलाया कि जनमतसंग्रह करवाना पड़ा, और अब शायद वहां कानून में फेरबदल भी हो जाएगा। इस मामले को बारीकी से देखें तो दूसरे धर्म, दूसरी नस्ल, दूसरे रंग, दूसरे देश से आई हुई महिला वहां पर इतना बड़ा मुद्दा बनी। क्या हिन्दुस्तान में दूसरे देशों से आए हुए लोग, उनका हक, ऐसा मुद्दा बन सकते हैं? क्या यहां पर शरण लेने वाले लोगों के हक को लेकर स्थानीय लोगों में ऐसी संवेदनशीलता आ सकती है? क्या इस देश के भीतर भी कश्मीर या उत्तर-पूर्व जैसे सरहदी प्रांतों से बाकी हिस्से में आने वाले लोगों के लिए इस बाकी हिस्से के लोगों  में संवेदनशीलता आ सकती है? यह याद रखने की जरूरत है कि किस तरह दिल्ली और बेंगलुरू जैसे महानगरों में भी उत्तर-पूर्व और कश्मीर से आए हुए लोगों के साथ हिंसा होती है। जयपुर जैसी राज्य की राजधानी से कश्मीरियों को हॉस्टल से मारकर भगाया जाता है। यह देश अपने ही कई इलाकों के लोगों को बराबरी का इंसान नहीं मानता। ऐसे में ऐसे अलगाव और ऐसी नफरत-हिकारत के साथ आयरलैंड की इस हमदर्दी को रखकर तुलना करने की जरूरत है, सोचने और समझने की जरूरत है। 
इसी सिलसिले में दो दिन पहले भाजपा सांसद आलोक कटियार के उस बयान को देखने की जरूरत है जो उन्होंने फिल्म अभिनेत्री और यूनिसेफ की राजदूत, प्रियंका चोपड़ा के बांग्लादेश में रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों में जाने के बाद दिया है। प्रियंका वहां पर यूनिसेफ की सद्भावना-राजदूत की हैसियत से गई थीं, और ऐसे प्रचार से यूनिसेफ को दुनिया भर में ऐसी मानवीय त्रासदी की तरफ लोगों का ध्यान खींचने में मदद मिलती है। और ऐसी मदद से ही आर्थिक मदद भी जुटती है। प्रियंका के इस शरणार्थी शिविर जाने को लेकर इस भाजपा सांसद ने कहा कि जिन लोगों को रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों से हमदर्दी है, उनको हिन्दुस्तान में रहने का हक नहीं दिया जाना चाहिए। 
किसी धर्म का सम्मान और अपमान उस धर्म को मानने वाले लोगों की कथनी और करनी से होता है। आलोक कटियार सरीखे नफरतजीवी और हिंसक-फतवेबाज लोग दुनिया भर में हिन्दुस्तान के हिन्दुओं की साख पर कालिख पोतने के अलावा कुछ नहीं करते। ऐसे लोगों को आयरलैंड से कुछ सीखना चाहिए जहां एक पूरे का पूरा जनमतसंग्रह एक भारतवंशी के हक की बात से शुरू हुआ, और आज इस नतीजे पर पहुंचा। (Daily chhattisgarh)

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