शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ी प्राथमिकता बच्चे होना चाहिए

संपादकीय
31 मई 2018


दुनिया के एक प्रमुख और जाने-माने विश्वविद्यालय हार्वर्ड, के एक शोध कार्य का नतीजा है कि बहुत अधिक गर्मी के बीच बच्चों की पढ़ाई पर ऐसा असर पड़ता है कि वे इम्तिहान में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते। इस रिसर्च में तापमान और सफलता के बीच पर्याप्त रिश्ता जोडऩे वाला निष्कर्ष पाया गया है। परीक्षा के दिन अगर गर्मियों में हैं, तो जब तक कमरे एयरकंडीशंड न हों, बच्चों के पर्चे अच्छे नहीं बन पाते। अमरीका के पिछले 13 बरस के एक करोड़ बच्चों पर किया गया यह शोधकार्य सुझाता है कि स्कूल की क्लास को ठंडा रखने के लिए एसी इस्तेमाल करना चाहिए। शोधकर्ताओं ने यह पाया है कि गर्मी के बीच बच्चों की एकाग्रता नहीं हो पाती, वे जल्दी विचलित होते हैं, और वे ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते। 
अब अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों से भारत की स्कूलों के हालचाल की कोई तुलना करना कोई अच्छी बात नहीं है, लेकिन फिर भी एक जगह के शोध-निष्कर्षों से दूसरी जगह कुछ सीखा जा सकता है। भारत जैसे गर्म देश में जहां देश का अधिकतर हिस्सा गर्मियों में बहुत गर्म हो जाता है, वहां पर आमतौर पर इम्तिहान गर्मियों में ही होते हैं। और अधिकतर स्कूलों के कमरों में एसी और कूलर की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती, पंखा भी पता नहीं कितने कमरों में होगा। इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि अधिकतर गरीब बच्चे भयानक गर्मी में भी पैदल आते-जाते हैं, उनमें से जो संपन्न हैं, वे रिक्शा, ऑटोरिक्शा, या साइकिलों से आते-जाते हैं, और पूरी गर्मी झेलते हैं। जब मौसम जानलेवा होने लगता है तो लू से मौत का खतरा देखकर उस डर में राज्य सरकार या कुछ जिलों के कलेक्टर स्कूलों को कुछ दिनों के लिए बंद करते हैं। लेकिन बोर्ड परीक्षाओं के दिन तो पूरे देश में एक सरीखे रहते हैं, और किसी गर्मी से उनकी तारीखें भी नहीं बदलती हैं। ऐसे में बच्चे सेहत का खतरा उठाकर गर्मियों में स्कूल आते-जाते हैं, और शायद बिना किसी पंखे के भी इम्तिहान देते हैं। 
अभी रोजाना किसी न किसी राज्य या बोर्ड की परीक्षाओं के नतीजे आ रहे हैं। और यह बात भी चल रही है कि क्या पूरे देश के लिए एक ही बोर्ड बनाया जा सकता है जिससे बच्चे एक ही कोर्स को पढ़ें, और एक ही तरह की परीक्षा दें। इस सोच के पक्ष और विपक्ष में बहुत से तर्क हो सकते हैं, लेकिन हम इसके छोटे से पहलू पर आज के मुद्दे के संदर्भ में यह कहना चाहते हैं कि भारत इतना लंबा-चौड़ा देश है कि न तो दिन के एक ही वक्त पूरे देश में परीक्षा लेना ठीक है, और न ही किसी एक मौसम में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक परीक्षा ली जा सकती है। इसके लिए फर्क करने की जरूरत है, और परीक्षाओं को बच्चों की इंसानी जरूरतों से अधिक अहमियत देना बहुत ही नासमझी की बात होगी, और गलत काम भी होगा। 
भारत कोई एक देश नहीं है, यह कई बड़े-बड़े प्रांतों में बंटा हुआ है इतना विशाल इलाका है कि यहां एक टाईमजोन भी गलत है। जब उत्तर-पूर्व को जागकर काम करते कुछ घंटे हो जाते हैं, तब भारत का पश्चिमी इलाका जागता है। यह बात भी लंबे समय से चल रही है कि भारत को एक से अधिक टाईमजोन में बांटा जाए। उसके खिलाफ यह तर्क दिया जाता था कि यहां अनपढ़ आबादी बहुत अधिक है जो कि किसी अलग टाईमजोन वाले प्रदेश में पहुंचकर अपनी घड़ी में वक्त नहीं बदल पाएगी। लेकिन अब तो मोबाइल फोन की वजह से वह दिक्कत भी दूर हो गई है और फोन अपने आप अलग जोन में पहुंचकर अपना समय बदल लेंगे। 
लेकिन जिस मुद्दे से बात शुरू की है, उस मुद्दे पर अगर लौटें, तो इम्तिहानों की सहूलियत अधिक महत्वपूर्ण बात नहीं है, देश के अलग-अलग मौसम में रहने वाले बच्चों की अपनी स्थानीय जरूरतों को अधिक महत्व देना चाहिए। हो सकता है कि देश में कई बोर्ड काम करते रहें, और अगर पूरे देश में एक ही बोर्ड हो, तो भी मौसम के हिसाब से वह अलग-अलग प्रदेशों के लिए अलग-अलग इम्तिहान करवा सकता है। भारत इतना गर्म देश है, और यहां की अधिकतर स्कूलें इतनी बदहाल हैं कि बच्चों को भरी गर्मी में भी कोई राहत नहीं मिल सकती। इसलिए बच्चों की सहूलियत को देखकर पूरे देश के लिए कुछ नर्म पैमाने बनाने की जरूरत है। बच्चों की पढ़ाई कारखानों की तरह नहीं करवाई जानी चाहिए कि वे कितनी भी गर्मी में सामान की तरह शिक्षित बनते रहें। अलग-अलग प्रदेशों में छुट्टियों का वक्त भी अलग होना चाहिए, और परीक्षा का वक्त भी। इसके खिलाफ कई तर्क दिए जा सकते हैं कि आगे के दाखिला-इम्तिहानों का वक्त निकल जाएगा, लेकिन लोगों को, जानकार लोगों को बैठकर इन सबका रास्ता निकालना चाहिए, और इसमें सबसे बड़ी, और अकेली प्राथमिकता बच्चे होना चाहिए, पढ़ाई के लिए भी, और परीक्षाओं के लिए भी।  (Daily Chhattisgarh)

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