प्रदूषण के दाग से आजाद हुआ रायपुर, लेकिन बहुत काम बाकी

संपादकीय
3 मई 2018


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर अभी कुछ बरस पहले तक देश के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में से एक थी, और यहां पर हवा इतनी जहरीली हो गई थी, कि वह सेहत के लिए फिक्र का सामान बन गई थी। लेकिन ताजा आंकड़े बताते हैं कि यह शहर प्रदूषित शहरों की लंबी लिस्ट से बाहर हो गया है, और इसने लगातार चीजों को सुधारा है। यह उस वक्त हुआ है जब दुनिया के पन्द्रह सबसे प्रदूषित शहरों में से चौदह भारत के निकले हैं, और इनमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की संसदीय सीट वाराणसी शामिल है। जिस गंगा को साफ करने के लिए एक पूरा मंत्रालय बनाकर एनडीए सरकार ने हजारों करोड़ रूपए का बजट रखा, जिस बनारस में प्रधानमंत्री अपने विदेशी मेहमानों को लेकर जाते हैं, वह दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में तीसरे नंबर पर हैं। इस तीर्थस्थान और धार्मिक नगरी को प्रधानमंत्री की वजह से भी प्राथमिकता मिलनी थी, और उत्तरप्रदेश के भगवा मुख्यमंत्री की धार्मिक प्राथमिकताओं की वजह से भी, लेकिन यह शहर दुनिया में तीसरे नंबर का सबसे बदहाल शहर पाया गया है। और यह सर्वे किसी ऐरी-गैरी संस्था ने नहीं किया है, बल्कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने किया है। 
छत्तीसगढ़ के रायपुर में सरकार की कोशिशों से फर्क पड़ा है। आज भी और बहुत कुछ करने की गुंजाइश बाकी है, लेकिन फिर भी एक बदनाम लिस्ट से बाहर निकलना छोटी बात नहीं है, खासकर तब जब छत्तीसगढ़ की इस राजधानी में खुद सरकार के सैकड़ों करोड़ के निर्माण कार्य चल रहे हैं जिनसे कई किस्म का प्रदूषण होता ही है। इसके बावजूद उद्योगों के प्रदूषण, सड़कों पर गाडिय़ों के प्रदूषण, और निर्माण के प्रदूषण पर कड़ाई से रोक लगाकर राज्य सरकार ने जनता का भला भी किया है, और बाकी दुनिया में इस शहर और प्रदेश का खराब नाम भी ठीक किया है। 
हम रूबरू जिस प्रदूषण को देखते हैं, उसे और सुधारने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ के अखबारों में लगातार ऐसी तस्वीरें छपती हैं कि लोग कचरा जला रहे हैं, या कचरे के ढेर में आग लग रही है। सरकार और म्युनिसिपल को जगह-जगह ऐसे टेलीफोन नंबर लिखकर जनता को बताना चाहिए कि वह ऐसी आग की खबर किसे करे। प्लास्टिक का कचरा जलने से हवा में जो जहर घुलता है, उसकी कोई भरपाई नहीं हो सकती, और इसे पूरी ताकत से रोकना चाहिए। दूसरी बात डीजल गाडिय़ों की धुएं की है, और छत्तीसगढ़ में इस मोर्चे पर बहुत कुछ करना बाकी है। सरकार को अपनी सीमित ताकत पेट्रोल-मोटरसाइकिलों, और आधुनिक कारों पर खर्च करने के बजाय ट्रक-बस और ऑटोरिक्शा-मालवाहक गाडिय़ों पर लगानी चाहिए जिससे भारी प्रदूषण फैलाने वाले लोगों पर कार्रवाई हो सके। यह हमारा रूबरू देखा हुआ है कि इस मोर्चे पर बहुत काम होना बाकी है, और सबसे प्रदूषित शहरों की लिस्ट से बाहर आ जाने से ही चैन से नहीं बैठना चाहिए, बल्कि लगातार कार्रवाई करनी चाहिए। इस किस्म की तमाम जानकारियों के लिए सूचना देने वाले लोगों को जुर्माने का एक हिस्सा बतौर ईनाम देना चाहिए जिससे सरकार के पास सूचना अधिक आ सकेगी, और जो गाडिय़ां लगातार प्रदूषण फैला रही हैं, उन पर तुरंत रोक भी लग सकेगी। 
भारत में तकरीबन सभी जगह सरकारी ढांचे में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार रहता है, और छत्तीसगढ़ में जिस आरटीओ पर गाडिय़ों की फिटनेस परखने की जिम्मेदारी रहती है, वह संगठित भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी मिसाल रहता है। इसलिए गाडिय़ों के प्रदूषण को रोकने में जनभागीदारी के सिवाय कोई दूसरा रास्ता नहीं है, और लोग ऐसे धुएं की तस्वीरें भी भेज सकते हैं, या फोन पर खबर कर सकते हैं, और सरकार अगले चौराहे पर ही ऐसी गाडिय़ों को रोक सके, उसका इंतजाम भी बहुत मुश्किल नहीं है। जब प्रदूषण फैलाने वाले लोगों पर तेजी से कार्रवाई बढ़ेगी, तो लोगों का तेजी से सुधरना भी शुरू होगा। लेकिन प्रदूषण को कम करने के लिए म्युनिसिपल को कचरे के निपटारे की दीर्घकालीन योजना भी बनानी पड़ेगी, वरना लोगों को कुछ महीने पहले की याद होगी कि किस तरह दिल्ली में कचरे का एक पहाड़ इतना ऊंचा हो गया था कि उसके खिसककर गिर जाने से उसके नीचे हादसा भी हो गया था। प्रदूषण घटाने के बहुत से मोर्चे हैं, और छत्तीसगढ़ को तसल्ली से बैठने के बजाय व्यापक जनभागीदारी के साथ इसे सबसे साफ प्रदेश बनाने की चुनौती मंजूर करनी चाहिए, और काम करना चाहिए। (Daily Chhattisgarh)

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